आखिर फांसी की सज़ा की पुष्टि की सुप्रीमकोर्ट ने, विरल से विरलतम मामले में आरोपी की मौत की सज़ा बरक़रार

जेपी सिंह

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सदाशिवम के कार्यकाल से अधिकांश मामलों में किसी न किसी बात को लेकर उच्चतम न्यायालय या तो फांसी की सज़ा को स्थगित करता रहा है या फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदलता रहा है. यहाँ तक कि हल ही में बने पोस्को एक्ट के तहत मिली फांसी की सजा को भी स्थगित कर दिया जा रहा है. ऐसे में उच्चतम न्यायालय ने एक फ़ैसले में दो नाबालिग़ सहित एक ही परिवार के छह लोगों की हत्या के एक आरोपी की मौत की सज़ा की पुष्टि कर दी है.

न्यायमूर्ति एके सीकरी, एस अब्दुल नज़ीर और एमआर शाह की पीठ ने 5 मार्च 19 को दिए गये फैसले में एक ही परिवार के छह लोगों की हत्या के आरोपी ख़ुशविंदर सिंह की मौत की सज़ा को सही ठहराया है . मारे गए लोगों में दो नाबालिग़ थे. सत्र अदालत ने सिंह को आईपीसी की धारा 364, 302, 307, 201 और 380के तहत दोषी माना था. बाद में हाईकोर्ट ने भी आरोपियों की अपील ठुकरा दी और उनकी सज़ा बरक़रार रखी थी.

न्यायमूर्ति शाह ने यह फ़ैसला सुनाया. मौत की सज़ा के औचित्य पर कुल 27 पृष्ठ वाले इस फ़ैसले के सिर्फ़ दो पृष्ठ में यह बताया गया है कि इस मामले में मौत की सज़ा क्यों उचित है.कोर्ट ने कहा कि आरोपी के वक़ील आरोपियों की सज़ा को काम किए जाने के बारे में कोई इस तरह की परिस्थिति का ज़िक्र नहीं कर पाए जिसकी वजह से मौत की सज़ा को आजीवन कारावास की सज़ा में बदल दिया जाए.

फ़ैसले में कहा गया है कि आरोपी ने छह निर्दोष लोगों का पूर्व नियोजित तरीक़े से क़त्ल किया है.उसने बहुत ही सावधानी से उपयुक्त समय का चुनाव किया.उसने धोखे से पहले तीन लोगों को अगवा किया और उन्हें एक नहर के पास ले जाकर उन्हें नींद आने वाली गोलियाँ दे दी और फिर उन्हें आधी रात को नहर में धक्का दे दिया ताकि उसके अपराध का पता नहीं चल पाए.इसके बाद उसने अन्य तीन लोगों की हत्या कर दी.

अपने फ़ैसले में पीठ ने मुकेश बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य मामले में आए फ़ैसले का हवाला दिया और कहा कि यह मामला ‘विरलों में विरल’ श्रेणी में है। कोर्ट ने मौत की सज़ा को जायज़ ठहराते हुए कहा किसज़ा को गंभीर बनाने वाली स्थिति अभियोजन के पक्ष में है और आरोपी के ख़िलाफ़ है . इसलिए गंभीर और सज़ा को कम करने वाली स्थितियों के बीच संतुलन बनाने के क्रम में हमारा मानना है कि मामला जिस तरह से गंभीर है, उससे इस मामले का संतुलन इस बात से पैदा होता है कि आरोपी को मौत की सज़ा दी जाए. मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, हमें लगता है कि इस मामले में मौत की सज़ा के अलावा कोई भी वैकल्पिक सज़ा उपयुक्त नहीं होगी. अपराध को बहुत ही नृशंस तरीक़े से अंजाम दिया गया है और इसने समाज की सामूहिक चेतना को झकझोर दिया है.

फांसी की सजा तभी जब आजीवन कारावास अनुपयुक्त हो

इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग से रेप और हत्या के दोषी शख्स की फांसी की सजा को 25 साल कठोर कारावास में बदल दिया. फांसी की सजा पर टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति एनवी रमना,न्यायमूर्ति एमएम शांतनागौदर और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने 12 मार्च 19 को सुनाये गये फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों की सुनवाई का तरीका यथार्थवादी,तार्किक और तटस्थ होना चाहिए.फांसी की सजा अपवाद के तौर पर ही दी जा सकती है.

उच्चतम न्यायालय कहा कि फांसी की सजा तभी मिलनी चाहिए जब आजीवन कारावास का विकल्प पूरी तरह से उपयुक्त न हो. 2015 में एक नाबालिग के साथ रेप के बाद मर्डर करने के दोषी शख्स की फांसी की सजा को उच्चतम न्यायालय ने 25 साल कैद की सजा में बदल दिया. कोर्ट ने कहा कि जघन्य अपराधों में फांसी की सजा तभी मिलनी चाहिए जब आजीवन कैद की सजा का औचित्य न रहे.

यह पीड़ित लड़की एलकेजी में पढ रही थी जब उसके साथ यह पाशविक कृत्य हुआ. आरोपी को निचली अदालत ने दोषी ठहराया उसे पीठ ने सही बताया औरकहा कि यद्यपि साक्ष्य में कई संगतियाँ हैं और प्रक्रियागत ख़ामियों को सामने लाया गया है पर इसकी वजह से आरोपी को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता है. पीठ ने कहा कि इस मामले में मौत की सज़ा जायज़ नहीं है. कोर्ट ने कहा कि उसके व्यवहार और आपराधिक रेकर्ड नहीं होने को देखते हुए वह इस बात से सहमत नहीं है कि आरोपी में कोई सुधार नहीं हो सकता.

स्थापित विचार के अनुसार, आजीवन कारावास नियम है जबकि मौत की सज़ा अपवाद.जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने संतोष कुमार सिंह बनाम सीबीआई (2010) 9 एससीसी 747 मामले में अपने फ़ैसले में पहले कहा है कि सज़ा देना एक कठिन कार्य है.पर जब विकल्प आजीवन कारावास और मौत की सज़ा में चुनना हो, और कोर्ट को दोनों में से कोई सज़ा चुनने में मुश्किल हो तो उचित यह है कि कमतर सज़ा सुनाई जाए. पीठ ने तब आरोपी की मौत की सज़ा को बदलकर उसे 25साल के आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई.

इस बीच उच्चतम न्यायालय ने पिछले दिनों तीन माह की एक बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या करने के एक आरोपी की मौत की सज़ा स्थगित कर दी. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, एस अब्दुल नज़ीर और संजीव खन्ना की पीठ ने नवीन @अजय को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के फ़ैसले के ख़िलाफ़ विशेष अनुमति याचिका बिचारार्थ स्वीकार कर लिया.

फांसी की सजा के प्रावधान वैध

इसके पहले नवम्बर 18 में उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने 2 अनुपात 1 से बहुमत के आधार पर कानून की किताब में अधिकतम सजा के तौर पर फांसी की सजा के प्रावधान को कानूनन वैध ठहराया था . हालांकि पीठ के वरिष्ठ सदस्य जस्टिस कुरियन जोसेफ ने विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि फांसी की सजा देने से समाज में अपराध नहीं घटा है. फांसी की सजा का प्रावधान अपराधियों को हतोत्साहित करने में नाकाम रहा है.

उच्चतम न्यायालय ने फांसी के कानूनन वैध होने की राय तीन लोगों की हत्या के जिस मामले में दी, उसमें अपने फैसले के दौरान पीठ ने आरोपी को फांसी की सजा से राहत भी दी. पीठ ने इस मामले में सर्वसम्मति से दोषी छन्नूलाल वर्मा की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया. वर्ष 2011 में तीन लोगों की हत्या के आरोप में वर्मा को फांसी की सजा सुनाई गई थी. कोर्ट का कहना था कि ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण पेश नही किया गया कि दोषी वर्मा में सुधरने की गुंजाइश न बची हो.

लेखक जेपी सिंह इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं. उनसे संपर्क
singhjp19@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *