आत्मिक प्रेम स्थापित हुये बिना मात्र शारीरिक स्तर पर किया गया मैथुन मन को तृप्त कर पाता है?

अनुपमा गर्ग-

सेक्सुअलिटी के डिस्कोर्स में कई रोचक प्रश्न, मिथक, विचार सामने आ रहे हैं | कुछ पहली बार सुने हैं, कुछ सुनती आ रही हूँ | एक बहुत ही कॉमन प्रश्न है-

“क्या भावनात्मक रूप से एक हुये बिना सेक्स संतुष्टि प्रदान कर सकता है? दूसरे शब्दों में क्या आत्मिक प्रेम स्थापित हुये बिना मात्र शारीरिक स्तर पर किया गया मैथुन मन को तृप्त कर पाता है? यदि शारीरिक स्तर पर किया गया सेक्स और प्रेम में किये गये सेक्स समान रूप से संतुष्टि दायक हैं तो फिर अन्य अनेक लोगों को मैं देखता हूं कि वे किसी के साथ शारीरिक रूप से मैथुन करने के बाद पुनः शीघ्र ही अपनी संतुष्टि किसी अन्य पुरुष या स्त्री में खोजने लगते हैं, ऐसा क्यों है कि शारीरिक क्षुधा शांत होने पर भी मन अतृप्त रहता है ? मैम, मैं इस संदर्भ में बहुत हद तक अनभिज्ञ हूं इसलिए यह प्रश्न अक्सर मेरे सामने आता है । इस संदर्भ में मेरा ज्ञान ज्यादातर किताबी ही है, इसलिए प्रश्न में तनिक भ्रम सा दिखाई पड़ सकता है इसलिए क्षमा करें।भैरप्पा बहुत दृढ़ता से सम्भोग और मैथुन (sex) और सम्भोग को अलग अलग परिभाषित करता है। वात्स्यायन भी इसमें अंतर करता है। जबकि अंग्रेजी में इसके लिये कोई अलग शब्द ही नहीं है। उपरवास से सम्भोग की प्रक्रिया तक स्त्री और पुरुष का पहुंचना क्या वस्तुतः मैथुन ही है और अगर ऐसा है तो परिणाम में सामान्यतः अंतर क्यों दिखाई देता है। क्यों एक पुरुष सुखी दामपत्य जीते हुये भी अपनी तृप्ति महसूस नहीं कर पाता और क्यों किसी को एक सामान्य चुम्बन भी तृप्ति का बोध करा देता है?”


इसका कोई सीधा जवाब नहीं है | सेक्स व्यक्तिगत होता है | कई लोग हैं, जिन्हें बिना बौद्धिक उत्तेजना के बगैर किया सेक्स संतुष्टि नहीं देता | ऐसे लोगों को Sapiosexual कहा जाता है | दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें प्रेम में ही उत्तेजना, और प्रेमी के साथ किये सेक्स से ही आनंद की प्राप्ति होती है | ऐसे लोगों को Demisexual कहा जाता है।

वहीं Asexual लोग भी हैं, जिन्हें सेक्सुअल उत्तेजना नहीं होती | उन्हें लोगों से प्रेम होता है, वे लोगों से शारीरिक, भावनात्मक सम्बन्ध बना सकते हैं, वे लोगों के गले लग सकते हैं, उन्हें बाहों में भी भर सकते हैं, उन्हें रोमांटिक स्पर्श की इच्छा भी हो सकती है, लेकिन सेक्स या जिसे आप मैथुन या सम्भोग कह रहे हैं, उसकी इच्छा नहीं होती।

ठीक इसी तरह ऐसे लोग भी हैं, जो सेक्स को सिर्फ शारीरिक आवश्यकता की तरह देखते हैं, उसे पूरा भी करते हैं, और उन्हें इसके लिए emotions या commitment या spiritual सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती | इसका व्यक्ति के जेंडर से कोई सम्बन्ध नहीं है | महिलाएं या पुरुष कोई भी ऐसा हो सकता है।

सेक्स को सिर्फ शारीरिक आवश्यकता की तरह देखने वाले लोग इसे पूरा भी करें, ये कोई ज़रूरी नहीं है | इसका मतलब ये भी नहीं, कि वे अपने सेक्सुअल साथी / साथियों के प्रति सम्मान नहीं रखते | ये भी ज़रूरी नहीं, कि बहुत से लोग ये समझते भी हों कि सेक्स उनके लिए मात्रा एक शारीरिक आवश्यकता है | विशेष तौर पर इसलिए क्योंकि सेक्स के बारे में हमारी समझ अधिकतर कंडीशनिंग, सामाजिक और नैतिक मूल्यों, दंड विधान आदि से विकसित होती है।

कई समाजों में (जैसे हमारे अपने समाज को ही उदाहरण के तौर पर देखें, या जैसे और भी बहुत से साउथ एशियाई देशों में सेक्स को ले कर बहुत कुंठा है), सेक्स की बात करने या, सेक्स की इच्छा दर्शाने पर, या सेक्स कर लेने पर भी, लोगों की सामाजिक, नैतिक प्रताड़ना की जाती है | ऐसे में लोग अक्सर ये दिखाने की कोशिश करते हैं, कि उन्हें अपने साथी से प्रेम भी है | ऐसे समाज में अक्सर, सेक्स की बातें, सेक्स की प्रक्रिया, और सेक्स का अनुभव, सभी बहुत ढोंग और कुंठाओं से भर जाता है।

वहीँ दूसरी ओर, जिन समाजों में सेक्सुअलिटी का सम्यक अध्ययन किया जा रहा है वहां सेक्सुअलिटी के बारे में नए तथ्य सामने आ रहे हैं | जहाँ अपनी सेक्सुअल डिजायर बताने पर पाबन्दी नहीं है, जहाँ सेक्सुअल भिन्नता के लिए दंड का प्रावधान नहीं है, वहां लोग ठीक से और सवालों के साथ, इस सवाल का भी जवाब दे पा रहे हैं | ये एक अलग बात है, कि धीरे धीरे वक़्त बदल रहा है, और जैसे जैसे समाज में लोगों के अनुभव बदलेंगे, वैसे ही धीरे धीरे शायद समाज की सेक्स, संतुष्टि, और आनंद को ले कर अवधारणाएं भी।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, हमने सदियों से इस बारे में बात ही न कर के इस विषय को बेवजह ज़रुरत से ज़्यादा उलझन भरा बना दिया है | सेक्स अनुभव और संवाद का विषय ज़्यादा है, अध्ययन का कम | इसलिए हमारे प्रश्न यदि इस बात पर ज़्यादा ध्यान दें कि हम स्वयं, और अपने साथी को कैसे आनंद पहुंचा सकते हैं, तो हम पाएंगे कि हमारे सम्बन्ध कहीं बेहतर होंगे, बजाय इसके कि कामसूत्र में कितनी मुद्राएं हैं, या भैरप्पा सम्भोग व मैथुन के लिए अलग अलग terms use करते हैं या नहीं।

वैसे सन्दर्भ में बताती चलूँ, कि अंग्रेज़ी में सेक्स शब्द को बहुत आराम से इस्तेमाल किया जाता है, मैथुन के लिए शब्द ‘coitus’ है, लेकिन वहां लोगों से ये उम्मीदें नहीं की जातीं कि वे जब तक शुद्ध भाषा में बात न कर सकें, तब तक उनके प्रश्न, उनके उत्तर, या उनके अनुभवजन्य विचार मान्य नहीं होंगे।

खैर विषय से इतर गए बिना, मूल प्रश्न पर लौटते हुए – सेक्स एक व्यक्तिगत अनुभव है, इसलिए कुछ लोगों को भावनात्मक रिश्ते के बिना संतुष्टि नहीं मिलती, कुछ लोगों को मिलती है | हाँ सहमति ज़रूरी है | भारतीय विधि के प्रावधान के अनुसार सहमति देने का विषय अपने आप में काफी विशद है, इसलिए वो किसी और दिन|

डिस्क्लेमर – मैं सेक्स और सेक्सुअलिटी के सम्बन्ध में बात इसलिए की जाती है कि पूर्वाग्रहों, कुंठाओं से बाहर आ कर, इस विषय पर संवाद स्थापित किया जा सके, और एक स्वस्थ समाज का विकास किया जा सके | यहाँ किसी की भावनाएं भड़काने, किसी को चोट पहुँचाने, या किसी को क्या करना चाहिए ये बताने का प्रयास हरगिज़ नहीं किया जाता।



भड़ास व्हाट्सअप ग्रुप ज्वाइन करें-  https://chat.whatsapp.com/JYYJjZdtLQbDSzhajsOCsG

भड़ास का ऐसे करें भला- Donate

भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849



One comment on “आत्मिक प्रेम स्थापित हुये बिना मात्र शारीरिक स्तर पर किया गया मैथुन मन को तृप्त कर पाता है?”

Leave a Reply

Your email address will not be published.

*

code