ज़मीनी संघर्ष कर जनाधार बना रहे पत्रकार से नेता बने शलभमणि को प्रत्याशी घोषित कर सकती है भाजपा!

अटल के बाद कौन पत्रकार बनेगा जनाधार वाला नेता! संघर्ष और जनाधार के बिना तमाम पत्रकारों को विभिन्न राजनीतिक दल लाल बत्तियों से नवाजते रहे हैं। कोई राज्यसभा भेजा गया तो कोई विधानपरिषद। कोई मुख्यमंत्री का सलाहकार बन गया तो किसी को सूचना आयुक्त बना दिया गया। कुछ नहीं तो पार्टी में शामिल होते ही सीधा टिकट ही दे दिया गया। नतीजतन पत्रकार से नेता बनकर सीधे चुनावी रण में उतरने वाले ओहदे मुंह गिरते रहे। चंदन मित्रा से लेकर एम.जे.अकबर और आशुतोष जैसे तमाम दिग्गज पत्रकार बुरी तरह चुनाव हारे।

पत्रकारिता से राजनीति का सफर करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपवाद थे। इनके सिवा कोई भी पत्रकार जनाधार वाला नेता साबित नहीं हुआ। कारण ये रहा कि पार्टी में कदम रखते ही पत्रकारों को ओहदे या टिकट जैसी नेमतें से नवाज दिया जाता रहा। एम.जे.अकबर, चंदन मित्रा, राजीव शुक्ला, आशुतोष..यूसुफ अंसारी.. तनवीर हैदर उस्मानी… जैसों की दर्जनभर मिसालें हैं।

शलभमणि त्रिपाठी पत्रकारिता छोड़ राजनीति में आने वाले ऐसे नेता हैं जो अपना जनाधार बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वो बतौर प्रवक्ता चैनलों के वातानुकूलित स्टूडियो में बैठने से ज्यादा आम जनता के बीच पार्टी की नुमाइंदगी करना ज्यादा पसंद करते हैं। पार्टी के एक कर्मठ कार्यकर्ता की तरह जमीनी संघर्ष में लगातार पसीना बहा रहे हैं।देवरिया..गोरखपुर और प्रदेश के कई जिलों की आम जनता के बीच शलभ एक लोकप्रिय नेता के रूप में धीरे-धीरे स्थापित होने लगे हैं।

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में धारदार पत्रकारिता से एक कुशल पत्रकार साबित हो चुके शलभमणि ने आईबीएन-7 न्यूज चैनल में यूपी स्टेट हैड का पद छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। जिसके बाद उन्हें पार्टी का प्रवक्ता बनाया गया था। उस बीच अनुमान लगाया जा रहा था कि पार्टी उन्हें चुनाव लड़वा सकती है। यूपी में भाजपा सरकार बनने के बाद ये भी चर्चाएं रही कि वो मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के मीडिया सलाहकार हो सकते हैं।

तमाम चर्चाओं और महत्वकाक्षाओं से दूर रहकर शलभमणि त्रिपाठी ने एक कर्मठ भाजपा वर्कर की तरह जनता के बीच रहकर जनसेवा को ज्यादा समय दिया। पार्टी से ज्यादा आम जनता का नुमाइंदे के रूप में भ्रष्ट तंत्र से लड़े। गुंडों, दबंगों और भू-माफियाओं के खिलाफ मोर्चा लिया। ये सब आसान नहीं था।शलभ नहीं चाहते हैं कि वो बतौर पार्टी प्रवक्ता टीवी चैनलों में पार्टी का पक्ष रखने तक ही सीमित रहें।

शलभमणि त्रिपाठी

अनुशासित पार्टी कार्यकर्ता की तरह निष्ठा, समर्पण और कड़े परिश्रम में लीन इस पत्रकार को भाजपा एक कुशल राजनेता के तौर पर निखारने की कोशिश कर रही है। दो वर्षों में पूत के पांव पालने में नजर आने लगे। जिसे देखकर ही शायद पार्टी ने इन्हें ओहदा देने के बजाय एक कुशल नेता बनाने की ट्रेनिंग देने का मन बना लिया था। भाजपा हाईकमान अब इस कर्मठ कार्यकर्ता से बड़ी उम्मीदें भी करने लगा है। मध्य प्रदेश के चुनौतीपूर्ण चुनाव के खास प्रचारकों में शलभमणि शामिल किये गये।

अनुमान लगाया जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की गुड लिस्ट में शामिल शलभ को पूर्वांचल की किसी लोकसभा सीट का प्रत्याशी घोषित किया जाये।

देवरिया /गोरखपुर (पूर्वांचल) में भाजपा का प्रवक्ता एक जमीनी कार्यकर्ता बनकर एक के बाद एक कुछ ऐसे काम कर गया जिसकी चर्चाएं पूर्वांचल की फिजाओं में गूंजने लगीं। अपने गृह जनपथ देवरिया में उन्होंने भू-माफियाओं के खिलाफ जंग छेड़ कर अवैध कब्जों से मुक्ति दिलायी। दिलचस्प बात ये है कि श्री त्रिपाठी पिछड़ी जातियों के आम जनमानस के दिल में ज्यादा जगह बना रहे हैं।

अभी हाल ही का एक मामला चर्चा में रहा। सपा के सक्रिय कार्यकर्ता प्रशांत यादव ने अपने कैंसर पीड़ित पिता के लिये सपा अध्यक्ष अखिलेश से मदद की गुहार लगाई। इससे पहले कि सपा की तरफ से कोई मदद मिलती शलभमणि मदद के लिए हाजिर हो गये।

इसी तरह देवरिया का एक और किस्सा है। यहां पांडेयचक चौराहे पर रविकेश नाम का एक गरीब पान की दुकान लगाकर परिवार का पेट पालता हैं। इसे पुलिस अकारण पकड़ कर ले गयी, और छोड़ा तब जब पांच हजार की घूस मिल गई। इस शिकायत को लेकर शलभ एसएसपी यहाँ तक कि डीजीपी से मिले। नतीजतन गरीब यादव को न्याय मिला और आरोपी पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया।

नवेद शिकोह
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