दैनिक भास्कर और पीपुल्स समाचार एक दूसरे के काले कारनामों की पोल खोलने में जुटे

व्यापम घोटाले में सीबीआई द्वारा पेश चालान में चौकसे समूह, पीपुल्स ग्रुप और चिरायु के मेडिकल कालेजों मे दाखिले को लेकर उनके मालिकों पर शिकंजा कसा गया है. इनमें चौकसे और पीपुल्स के दैनिक अखबार निकलते हैं. दैनिक भास्कर ने इन ग्रुपों की कारगुजारियों पर विस्तार से लगातार खबर का प्रकाशन किया.

इससे कुपित होकर पीपुल्स समाचार ने भास्कर ग्रुप के खिलाफ मुहिम में देर नहीं की. दोनों अखबारों द्वारा एक दूसरे के काले कारनामों की पोल खोले जाने से आनंद में पाठक वर्ग है. सरकार के लोग चुपचाप तमाशा देख रहे हैं. देखिए पीपुल्स समाचार अखबार में छपी भास्कर समूह के खिलाफ दो खबरें…

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भास्कर ग्रुप का घोटाला खोलने वाले ‘स्वराज एक्सप्रेस’ चैनल के रिपोर्टर को देना पड़ा इस्तीफा

मेरे सभी सम्मानीय मित्रों एवमं मेरे सभी सहयोगियों… 

यह बताते हुए मुझे अत्यंत ख़ुशी हो रहा है कि मैंने अपने पूरे होश में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के रीजनल न्यूज चैनल ‘स्वराज एक्सप्रेस’ के खरसिया रिपोर्टर के पद से त्यागपत्र दे दिया है। कारण यह हैं कि यह चैनल एक समय पत्रकारों का चैनल हुआ करता था किन्तु आजकल इसमें भी कुछ दलाल किस्म के लोग सक्रिय हो गए हैं। मैंने पिछले 1 वर्ष से बिना कोई पेमेंट प्राप्त किये खुद के व्यय से अपना कैमरा, अपना कैमरामेन, अपना इंटरनेट लगाकर काम किया। सबसे ज्यादा कीमती अपना बहुमूल्य एक वर्ष का समय है जिसके मूल्य का आकलन मैं स्वयं नहीं कर सकता हूँ।

मैंने सुबह 6 बजे से रात्रि 12 बजे तक हमेशा सक्रिय होकर लगातार खबर, स्क्रॉल, ब्रेकिंग, पैकेज स्टोरी भेजा लेकिन बदले में हमें आज तक चैनल से एक रुपये भी पारिश्रमिक नहीं मिला। मैंने ग्राम कुनकुनी खरसिया में 300 एकड़ जमीन घोटाला मामले की खबर बनाई। प्रधानमंत्री कार्यालय से मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन को कार्यवाही का पत्र भेजा गया। इस पत्र की छाया प्रति मुझे मिली। इसमें कुनकुनी में दैनिक भास्कर ग्रुप की कंपनी डीबी पॉवर द्वारा गरीब भोले भाले आदिवासियों की जमीन को अपने मीडिया हाउस के ड्राइवर के नाम से खरीदे जाने का जिक्र है। गरीब आदिवासियों के ऊपर मीडिया घराने का धौन्स दिखा के अवैध रूप से ब्रिज एवं रेलवे ट्रैक बनाये जाने का मामला उजागर किया। लेकिन चैनल ने मेरे इस साहसिक खबर को नहीं चलाया। उल्टे छत्तीसगढ़ के एडिटर शैलेश पाण्डेय ने कहा कि तुम डी बी पावर मीडिया घराने के खिलाफ खबर कवरेज करते हो। ऐसा झूठा लांछन लगाया गया।

चैनल के एक जिम्मेदार अधिकारी ने मुझे कहा कि दैनिक भास्कर के खिलाफ लिखोगे तो वह हमारे चैनल की बैंड बजा देगा। ऐसे में मुझे अहसास हुआ कि किसी व्यक्ति के द्वारा 100 रु के घोटाला को दिनभर खबर बना के चलाने वाले लोगों के पास सैकड़ों करोड़ के घोटाले की खबर चलाने की हिम्मत नहीं है और ऐसे लोगों के साथ काम करना अपने समय एवं नैतिक मूल्यों की बर्बादी है। जो लोग दूसरे मीडिया हॉउस के 100 एकड़ से ज्यादा के आदिवासी भूमि की बेनामी खरीदी एवं अवैध निर्माण पर पर्दा डालना चाहता हैं, ऐसे लोगों के साथ काम करना बेकार है।

जो व्यक्ति दूसरा चैनल छोड़ के इस चैनल में आया हो उनके द्वारा मुझ पर झूठा लांछन लगाते हुए डीबी के खिलाफ खबर बनाने पर बदनाम करने की धमकी देने वाले को करारा जवाब देते हुए मैं स्वयं स्वराज एक्सप्रेस चैनल के खरसिया रिपोर्टर का पद छोड़ रहा हूँ। चैनल में हमारे साथ 1 वर्ष तक खबर के बदले पारिश्रमिक दिए जाने के नाम पर धोखा ही किया गया। मांड प्रवाह अख़बार एवं सोशल मीडिया के माध्यम से हमेशा गरीबों एवं शोषितों की आवाज उठाता रहूंगा। गरीबों को लूटने वालों का फर्दाफाश करता रहूंगा।

सत्यमेव जयते

आपका

भूपेंद्र किशोर वैष्णव

(स्वतंत्र पत्रकार)

खरसिया

9754160816

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डीबी कॉर्प ने मुंबई के ब्यूरो चीफ सहित कई पत्रकारों को बनाया मैनेजेरियल और एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ!

मुंबई से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट…

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सबसे ज्यादा शिकायत डीबी कॉर्प लिमिटेड के अखबारों- दैनिक भास्कर, दिव्य भास्कर और दिव्य मराठी आदि के मीडियाकर्मियों ने कर रखी है। इस संस्थान के पत्रकारों ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय सहित महाराष्ट्र के लेबर डिपार्टमेंट और मुंबई के लेबर कोर्ट में तमाम शिकायतें कर रखी हैं। एक तरफ जहां डी बी कॉर्प का दावा है कि वह खूब लाभ कमा रहा है, वहीं जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के मानकों के मुताबिक वेतन न देना पड़े, इसके लिए इस कंपनी ने अपने मुंबई के माहिम दफ्तर में कार्यरत कई सीनियर पत्रकारों को मैनेजेरियल और एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ बना दिया है। पत्रकारों को इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उन्हें संपादकीय में नहीं बल्कि मैनेजर और एडमिन स्टाफ में रख कर काम लिया जा रहा है।

डीबी कॉर्प ने माहिम ऑफिस में कर्मचारियों की संख्या भी काफी कम, मात्र 13, बताई है, जबकि यहां 70-75 लोग काम करते हैं। यह खुलासा हुआ है आर टी आई के जरिये। हम अगर माय एफएम, डीबी डिजिटल और मार्केटिंग स्टाफ को छोड़ दें, तब भी वहां मजीठिया वेज बोर्ड के हकदार कर्मचारियों की अच्छी-खासी संख्या छिपायी गई है। सो, भास्कर प्रबंधन जिन-जिन के नामों को छिपाकर उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से वंचित रखना चाहता है, उनके नाम आपको हम बताएंगे।

वे नाम हैं- गुजराती अखबार ‘दिव्य भास्कर’ के राजेश पटेल (सहायक संपादक), विपुल शाह (रिपोर्टर कम सब एडिटर), समीर पटेल (सब एडिटर) और मनीष पटेल (कंपोजिटर)। यहां पर कंपनी के चमचों को शर्म आनी चाहिए कि मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक देय राशि से बचने के लिए कुछ समय पहले ही आफिस ब्वाय जॅार्ज कोली को कॅान्ट्रैक्ट पर कर दिया गया, जबकि वह करीब 10 वर्षों से पेरोल पर था। अब बात इसी कंपनी के मराठी अखबार ‘दिव्य मराठी’ के कर्मवीरों की, जिनके नाम कंपनी ने छिपाए हुए हैं… ये नाम हैं- प्रशांत पवार (सहायक संपादक), प्रमोद चुंचूवार (ब्यूरो चीफ), शेखर देशमुख (संपादक-रसिक), विनोद तलेकर (प्रिंसिपल करेस्पॅान्डेंट), चंद्रकांत शिंदे (स्पेशल करेस्पॅान्डेंट), मृण्मयी रानाडे (संपादक-मधुरिमा), समीर परांजपे (सहायक समाचार संपादक), सुजॅाय शास्त्री (सहायक समाचार संपादक) और तुकाराम पवार (कंप्यूटर आपरेटर)।

कंपनी ने जो 13 नाम कामगार आयुक्त कार्यालय में दिए हैं, उन्हें भी पत्रकार के साथ-साथ प्रबंधकीय एवं प्रशासनिक क्षमता से लैस बता दिया है। ये नाम हैं- दैनिक भास्कर के ब्यूरो चीफ अनिल राही, जो बतौर पत्रकार महाराष्ट्र शासन द्वारा मान्यताप्राप्त हैं, मगर कंपनी उन्हें भी मैनेजेरियल स्टाफ मानती है। इसके बाद दूसरा नाम धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का है। गौर करने की बात यह है कि पत्रकार के तौर पर धर्मेन्द्र प्रताप सिंह को भी महाराष्ट्र सरकार ने मान्यता दे रखी है और इन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर की मांग को लेकर लेबर कोर्ट के अलावा एडवोकेट उमेश शर्मा के जरिये सुप्रीम कोर्ट में भी केस लगा रखी है।

अन्य प्रमुख नाम हैं- सीनियर रिपोर्टर सुनील कुकरेती, रिपोर्टर कम सब एडिटर उमेश कुमार उपाध्याय, फीचर एडिटर चंडीदत्त शुक्ला, सीनियर रिपोर्टर विनोद यादव, सीनियर करेस्पॅान्डेंट सलोनी अरोड़ा और प्रियंका चोपड़ा। डी बी कॉर्प ने जिन कर्मचारियों की लिस्ट कामगार विभाग को सौंपी है, उसमें पत्रकार से प्रबंधक और प्रशासक बने इन लोगों के अलावा लतिका चव्हाण और आलिया शेख नामक दो  रिसेप्शनिस्ट का भी नाम शामिल है।

लतिका और आलिया ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लेकर मुंबई के कामगार विभाग में कंपनी प्रबंधन के विरुद्ध पहले ही शिकायत कर रखी है, जिसकी सुनवाई जारी है। हां, इस सूची में इन्वेस्टर हेड प्रसून पांडे और उनकी सहयोगी (डिप्टी मैनेजर) सोनिया अग्रवाल का नाम जरूर चौंकाता है। वह इसलिए, क्योंकि मार्केट से निवेशक ढूंढने के लिए नियुक्त इन दोनों जन को नेम ऑफ़ द जर्नलिस्ट के रूप में दिखाने की मजबूरी जहां समझ से परे है, वहीं सोनिया अग्रवाल का तो अक्टूबर (2016) की पहली तारीख को ही मुंबई से भोपाल ट्रांसफर किया जा चुका है। ऐसा दावा मुंबई के इंडस्ट्रियल कोर्ट में एचआर के सतीश दुबे ने एक हलफनामा के जरिए किया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
shashikantsingh2@gmail.com
9322411335

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