पहाड़ के जंगल

पहाड़ समस्त प्राणी जगत के मूलाधार हैं। पारिस्थितिकी और जैव विविधता के आश्रय स्थल हैं। बशर्ते कि पहाड़ विविध प्रजाति के जंगलों से आच्छादित हों। ‘पहाड़’ शब्द की कल्पना मात्र से मस्तिष्क में बर्फ की सफेद चादर से ढके हिमालय, श्रृंखलाबद्ध पहाड़ियों में गहनों की भांति सजे हरे वृक्ष, झरने, गाड़-गधेरे और कल-कल करती नदियों का चित्र उभर आता है। पेड़ ,पानी और पहाड़ का वजूद एक-दूसरे से गहरे तौर पर जुड़ा है। पहाड़ हैं तो पेड़ हैं और पेड़ हैं तो पानी। ये सब मिलकर पहाड़ को ‘पहाड़’ बनाते हैं। इनके बगैर पहाड़, पानी और पर्यावरण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इनमें से एक भी पक्ष के कमजोर होने से पूरा पहाड़ बिखर जाता है। वन विहीन पहाड़ के कोई मायने नहीं होते। पर अनियोजित और लापरवाह प्रबंधन तथा निहित स्वार्थों के चलते आज पहाड़ की पहचान और वजूद दोनों संकट में हैं। उत्तराखंड के जंगलों में साल -दर-साल आग लगने की घटनाओं से यहाँ के जंगल और पहाड़ों के ऊपर मंडरा रहे खतरों की आहट को महसूस किया जा सकता है। इस बहाने मनुष्य और जंगलों के बीच आदिम युग से चले आ रहे अटूट रिश्तों के बिखरने की वजहों की पड़ताल की जानी जरूरी है।

भाजपाई कल तक जिन कांग्रेसियों को गरियाते थे, आज उन्हीं का गुणगान कर रहे!

नैनीताल। अबकी विधानसभा चुनाव में अपनी राजनैतिक संस्कृति और प्रवृति के विपरीत उत्तराखण्ड दल -बदल के दल -दल में बुरी तरह फंस गया है। हालाँकि राज्य  में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने पार्टी के सभी उम्मीदवारों के नाम का ऐलान नहीं किया है। पर भाजपा और कांग्रेस के भीतर जबरदस्त भगदड़ मच गई है। इस चुनावी घमासान में भाजपा के शुचिता, नैतिकता, भ्रष्टाचार और बेईमानी जैसे नारों की हवा निकल गई है। देश को कांग्रेस मुक्त करने के अभियान में जुटी भाजपा उत्तराखण्ड में कांग्रेस युक्त होती जा रही है। राज्य की सत्ता की चुनावी लड़ाई में दलीय पहचान विलुप्ति के कगार पर हैं। “भाजपा ही कांग्रेस है या कि कांग्रेस ही भाजपा है” इनमें फर्क कर पाना मुश्किल होता जा रहा है।

नैनीताल की खूबसूरत नैनी झील अपने सबसे मुश्किल दौर में

नैनीताल : देश-दुनिया के सैलानियों के आकर्षण का केंद्र नैनीताल की खूबसूरत झील इस दौरान अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। मिट्टी-मलबा, कूड़ा-करटक भर जाने से पैदा हुए प्रदूषण के साथ जल स्तर में आई जबरदस्त गिरावट समेत अनेक समस्याओं से जूझ रही नैनी झील के किनारों को अब झील के रखवालों ने ही मिट्टी, पत्थर और सीमेंट से पाटना शुरू कर दिया है। नैनीताल और आसपास के इलाकों को रोजी -रोटी, पानी और पहचान देने वाली झील अब खुद यतीम हो गई है।