डरी-सहमी और दरबारी पत्रकारिता को शर्मिंदगी से बचाने के लिए एन राम को शुक्रिया!

Nitin Thakur : एन राम ने मोदी सरकार के सामने वही स्थिति खड़ी कर दी है जो इंडिया टुडे ने शर्म अल शेख मामले में मनमोहन सरकार की बना दी थी। डरी-सहमी और दरबारी पत्रकारिता को शर्मिंदगी से बचाने के लिए एन राम का शुक्रिया किया जाना चाहिए। उनकी सलाह वर्तमान रक्षामंत्री को मान लेनी चाहिए।

जब आपको उस बारे में पता कुछ नहीं तो आराम से बैठिए। पर्रिकर ने नोट लिखा था वो जवाब देंगे। बाकी नोट भी क्या ही लिखा था। नोट की भाषा बता रही है कि उन्हें खुद भी पीएमओ की राफेल डील को लेकर “अतिसक्रियता” का पता नहीं था। सही है, मोदी जी नोटबंदी की तरह राफेल को भी चोरी छिपे ही अंजाम दे रहे थे, और वो भी अपने अफसरों और मंत्रियों की निगाह बचाकर!! ये कैसी “राष्ट्रसेवा” है कि जो डील ट्रांसपेरेंसी से होनी चाहिए थी उसे प्रक्रिया से हटकर किया गया और सुप्रीम कोर्ट के सामने इस पर पर्दा भी डाला गया!!

राष्ट्रवाद का सारा ढोंग चकनाचूर हो गया। सुप्रीम कोर्ट से बोला झूठ बाहर आ गया। एक पूंजीपति के कठपुतली मोदी जी का ‘व्यापार मेरी रगों में है’ का असल मतलब भी खुल गया। विपक्ष ने कम से कम मोदी के कार्यकाल के अंतिम दिनों में अपना अस्तित्व सिद्ध कर दिया है और तारीफ कीजिए अब उस पत्रकारिता की भी जो वाकई पत्रकारिता है। नरेंद्र मोदी राफेल पर जितना पर्दा डलवाते रहे उसकी उतनी परतें खुलती रहीं और अब तो जो ‘द हिंदू’ ने खोला उसे ढंक पाना मुमकिन नहीं। हां ये ठीक है कि रविशंकर प्रसादों, संबित पात्राओं, अरुण जेटलियों, निर्मला सीतारमणों को देश को गुमराह करने का अहम काम आज दोपहर से करना पड़ेगा, लेकिन जैसे लोग अभिषेक मनु सिंघवियों, कपिल सिब्बलों, मनीष तिवारियों की घुमावदार सफाइयों में नहीं फंसे थे वैसे ही मोदी जी के इन अंगरक्षकों के फर्ज़ी तेवरों से डिफेंसिव नहीं होने का वक्त आ चुका है।

सरल भाषा में समझ लीजिए कि एन राम की रिपोर्ट कह क्या रही है…

राफेल सौदा करने को आतुर मोदी के पीएमओ ने फ्रांसीसी सरकार से सीधे बात करके अपने ही रक्षा मंत्रालय और उस टीम की स्थिति कमज़ोर कर दी थी जो राफेल का सौदा साफ सुथरी प्रक्रिया से चाहता था। कमाल की बात है कि बेचारे रक्षा मंत्रालय और राफेल सौदा करनेवाली भारतीय टीम को इसका अंदाज़ा भी बहुत बाद में हुआ कि सुपरबॉस अपने संयुक्त सचिव के मार्फत फ्रेंच रक्षामंत्री के राजनयिक सलाहकार से सौदा पटवा रहे हैं।

जब एक बार बात खुली तो रक्षा मंत्रालय ने कायदे से प्रधानमंत्री कार्यालय को इस दखलंदाज़ी के लिए टोका और यहां तक कहा कि अगर आप हमारी बातचीत से संतुष्ट नहीं तो खुद अपने उचित स्तर से फ्रांस से बात कर लीजिए।
‘द हिंदू’ अख़बार का दावा है कि राफेल मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय के फ्रेंच सरकार से सीधी बात करने पर रक्षा मंत्रालय ने आपत्ति जताई थी और कहा था कि प्रधानमंत्री कार्यालय रक्षा मंत्रालय के ठीक उलट स्टैंड ले रहा है।

तब के रक्षा सचिव जी मोहन कुमार ने एक फाइल पर आधिकारिक नोट लिखकर रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर का ध्यान इस ओर खींचा था। उन्होंने क्या लिखा था, पढ़िए- रक्षा मंत्री जी, कृपया इसे देखें। यह अपेक्षित है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ऐसी बातचीत से बचे जिससे हमारी बातचीत को गंभीर नुक़सान हो रहा है।

अब ध्यान ये भी रखिए कि मोदी सरकार राफेल मामले में जिस सुप्रीम कोर्ट की कथित हरी झंडी लेकर घूम रही है उसे उन्होंने ये सब नहीं बताया। कोर्ट को बताया गया था कि फ्रांस से सिर्फ सात सदस्यीय टीम ने राफेल सौदे पर चर्चा की थी और उसे पूरा किया। जानबूझकर मोदी सरकार ने कोर्ट से ये छिपा लिया कि पीएमओ अलग से भी फ्रांस सरकार से संपर्क में था।

अब ये भी ध्यान रखिए कि अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में जिस नए राफेद सौदे का एलान किया वो लंबी बातचीत के बाद हुए सौदे से काफी कुछ अलग था। दरअसल रक्षा मंत्रालय वाली टीम जिन बातों को लेकर सौदे में फंसी थी, उन बातों को पीएमओ गैर ज़रूरी मान रहा था। उनमें सबसे अहम था राफेल सौदे में किसी बैंक गारंटी को ज़रूरी ना मानना, और उसकी जगह सिर्फ लैटर ऑफ कम्फर्ट से काम चला लेना। इसके पहले भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने जनवरी 2016 में पेरिस में फ्रांसीसी पक्ष से बातचीत की थी। डोभाल ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को सलाह दी थी कि वह राफेल मामले में सार्वभौम गारंटी या बैंक गारंटी की जिद न करें।

अब आप सिर खुजाइए कि आखिरकार इस सौदे को जल्दी से डन करने में मोदी जी की इतनी दिलचस्पी क्यों थी कि हर प्रक्रिया को दरकिनार तो किया ही, अपनो को भी पता नहीं चलने दिया कि वो सौदे को लेकर इतने व्यग्र हैं।

NRamDallaHai का हैशटैग चलानेवाले भक्तों को पता होना चाहिए कि जब उनका भगवान नेता बनने के लेसन ले रहा था तब यही एन राम और “द हिंदू” राजीव गांधी का बोफोर्स खोल रहे थे। उस वक्त यही एन राम और अरुण शौरी बीजेपी की आंख का तारा थे।

ये पत्रकार की नियति है कि वो जिसके खिलाफ खुलासे करेगा वही उसे गाली देगा और अपने चारणों से गाली दिलवाएगा। राजीव के शासनकाल में स्वीडिश रेडियो ने बोफोर्स पर खबर जारी की थी जिसके बाद एन राम की टीम और चित्रा सुब्रह्मण्यम ने इस पर जमकर काम किया। चित्रा ने 350 दस्तावेजों को मथकर बोफोर्स पर राजीव गांधी की सरकार को हिलाकर रख दिया। उस वक्त सीतारमणों और पर्रिकरों की तरह कमज़ोर रक्षामंत्री और नेता नहीं थे। वीपी सिंह ने मोर्चा खोल दिया था। इसे कोई अवसरवादिता कहे तो शौक से कहता रहे।

अखबार और चित्रा पर सरकार ने इतना दबाव डाला कि “द हिंदू” ने खबर को कवर करना बंद कर दिया और चित्रा ने नौकरी ही बदल दी मगर देर हो चुकी थी। द स्टेट्समैन और इंडियन एक्सप्रेस ने कवरेज जारी रखी।

अब एक और बात बता दूं जो भक्तों के फरिश्तों को भी पता ना होगी। रक्षामंत्री बनते ही पर्रिकर ने हथियार दलालों को कानूनी बनाने की हसरत जताई थी। उन्होंने रास्ता खोला कि दलाल गैर कानूनी से कानूनी हो जाएं, बस शर्त यही होगी कि हथियार बेचनेवाली कंपनियां उन्हें भारत में company representative के तौर पर नियुक्त करें।

फिर कुछ महीनों बाद खबर आई कि मोदी सरकार की हथियार खरीद की नई गाइडलाइंस Defence Procurement Procedure (DPP), 2016 का हिस्सा बन गईं। अब ये तो पता नहीं कि इससे कौन कितना लाभान्वित हुआ लेकिन दलालों और बिचौलियों के मामले पर कांग्रेस को कोसनेवाले (कोसना ही चाहिए) मोदी सरकार की आराधना करने के अलावा सवाल भी पूछा करें।

अब भक्त इस पोस्ट को “आग की तरह” फैलाकर अपना भला करना चाहें तो करें, अपने मित्रों से तो मैं अपील करूंगा ही कि वो इसे साझा करें और नए तथ्य खोजें, साथ ही जोड़ते जाएं। अंत में एन राम को पत्रकारिता के इस विद्यार्थी का शुक्रिया जिन्होंने हमेशा निशाने पर रहनेवाली पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को रीस्टोर किया। (संदर्भ- Ipannewspack, indian express)

पत्रकार नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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Bhadas4media ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಮಂಗಳವಾರ, ಫೆಬ್ರವರಿ 5, 2019
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