मोदी सरकार हो या और सरकारें। कुछ प्रेस मालिकों को इसलिए नागदेव के सामन पूजती हैं कि वे उनकी छवि बनाते हैं, नतीजन प्रेस में लेबर लॉ किस बदहाली में है, पत्रकारों के वेज दिलाने की हिम्मत कोई सरकार नहीं कर पाई। यही काम मोदी सरकार भी कर रही है। प्रेस मालिक अपना राजधर्म निभा रहे हैं, सोशल मीडिया में सरकार की आलोचना हो रही है। लेकिन मजीठिया वेतनमान की बात आती हैं तो मोदी सरकार का राजधर्म चीन-भारत युद्ध, काश्मीर विवाद, पाकिस्तान को सबक सिखाने चला जाता है। लेकिन देश के भीतर जिन दुश्मनों को सबक सिखाना है उन्हें नहीं सिखाया जाता। जब आप देश में ठीक से लेबर लॉ लागू नहीं करा पा रहे हैं। कुछ उद्योगपतियों के सामने इतने असहाय हैं तो फिर चीन, पाकिस्तन की क्या बात करते हैं?
आपने देश में रोजगार पैदा करने की बात की। आपकी सरकार आने के बाद एक करोड़ लोग बेरोजगार हो गए। भुखमरी की बात किए, खाद्य सुरक्षा गारंटी एक नवंबर से पूरे देश में लागू हो गया लेकिन पांच किलो अनाज में महीने भर किसका पेट चलता है। और जब 77 प्रतिशत आबादी के पास प्रतिदिन आय का कोई जरिया नहीं है तो वह अनाज कहां से खरीदे। अनाज सीमा 5 से बढ़ाकर 15 किलो करने की जरूरत है।
कैसा हो कंपनी राज?
देश में उद्योगपतियों के बढ़ते दखल के बीच सरकार को डेनमार्क का नियम लागू करना चाहिए कि हर कर्मचारी को कंपनी का शेयरधारक बनाए। जिससे उद्योगपति मनमानी ना कर पाए और देश के नागरिकों के बीच आर्थिक असमानता भी दूर हो। लेकिन मोदी सरकार उद्योगपतियों के बातों में आकर श्रम कानूनों को ही शिथिल करने का प्रयास कर रही है। अभी भी श्रम कानून सिर्फ जुर्माने तक सीमित हैं और कुछ गद्दार जज यह भी नहीं लगाते। वे अपने स्वविवेकाधिकार का उपयोग कर सरकार और लेबर को चूना लगाकर अपना घर भर लेते हैं।
महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार
[email protected]
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mm
November 7, 2016 at 6:51 pm
JAI HO BHARAT SARKAR…..! JAI HO….!
Parantu, isme sirf Bharat Sarkar hi nahi, Sabhi Rajya Sarkar ko bhi Jod len… kyonki yadi Rajya Sarkar chah le, to Majithia to kya, ye Tuchchey Malik kuchh bhi de sakte hain apni gardan bachaney ke liye…
अरुण श्रीरीवास्तव
November 8, 2016 at 2:14 am
आदरणीय महेश्वरी जी अक्सर आप हम पत्रकारों की सहायता करते रहते हैं इसके लिए आपको बधाई। मैंने खुद क ई बार सवाल किये आपने उसका जवाब दिया।
एक जानकारी देने की कृपा करें।
1:- आरसी काटने की प्रक्रिया क्या है ?
2:- इसे काटता कौन है ?
उत्तराखंड का श्रम विभाग दायर क्लेम को तीन तारीख के बाद पीठासीन अधिकारी श्रम न्यायालय को भेज दे रहा है।
मैंने खुद लेबर कमिश्नर को राजस्थान हाईकोर्ट का हवाला देते हुए उसका डीसीजन (जिसमें उसने श्रम विभाग को लताड़ लगाते हुए मामला वापस कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब लेबर कोर्ट सुनवाई करेगा।)
सर कृपया इसपर मार्गदर्शन देने की कृपा करें।
अरुण श्रीवास्तव
देहरादून।
07017748031
Maheshwari Prasad Mishra
November 10, 2016 at 4:37 pm
अरुण जी
जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार वसूली पत्रक जारी करने का अधिकार श्रम पदाधिकारी को है। इसके लिए सहायक श्रमायुक्त से लेकर ऊपर के अधिकारी आरसी जारी कर सकते हैं। और वसूली पत्रक कलेक्टर को जाता है। कलेक्टर कंपनी को नोटिस जारी करता है यदि फिर भी कंपनी ने एक माह में पैसा नहीं दिया तो कलेक्टर से कुर्की का अनुरोध करना पड़ता है और कलेक्टर कुर्की आदेश जारी करता है।
लेकिन श्रम विभाग में कर्मचारी और कंपनी प्रबंधन के बीच कुछ विवाद हो गया, ऐसा विवाद जिसमें श्रमाधिकारी विवाद सुलझाने में असमर्थ रहता है तो उसे औद्योगिक विवाद मानते हुए श्रम न्यायालय को मामला प्रेषित कर दिया जाता है। श्रम न्यायालय में फिर आवेदक को अपना परिवाद पत्र दाखिल करना होता है। यहां कोर्ट दोनों का पक्ष जानने के बाद फैसला सुनाती है और डीजे (जिलान्यायाधीश) को वसूली पत्रक भेज देती है। और डेजी एक माह में पैसा वसूल करता है। इस बीच कंपनी हाईकोर्ट भी जाती है तो 50 प्रतिशत राशि लेबर कोर्ट में जमा करनी पड़ती है।
लेबर कोर्ट में जब मामला चले तो इस बात का ध्यान रखे कि कंपनी को कोई मौका ना दें। जैसे कंपनी ने कह दिया कि यह हमारा कर्मचारी नहीं है। तो लेबर कोर्ट से निवेदन करें कि कंपनी ओरिजनल उपस्थिति पंजीयन की प्रति, सैलरी स्लीप की प्रति पेश करें। हम इस कंपनी के कर्मचारी है इसका प्रमाण यह है।
अब कोर्ट को आदेश पत्रक में आदेश करने दे कि कंपनी ओरिजन पेश करे। इससे कंपनी का झूठ पकड़ा जाएगा और वह हाईकोर्ट अपील करने नहीं जा पाएगा क्योंकि उसे कोई मुद्दा ही नहीं मिलेगा।
अरुण श्रीवास्तव
November 13, 2016 at 1:55 pm
शुक्रिया महेश्वरी जी, मेरे क्लेम में सीए ने पद ही गलत कर दिया है जिसके कारण मामला लेबर कोर्ट चला गया है। मैने दूसरे सीए से क्लेम बनवाया है। 23 को सुनवाई है।