इंटर्नशिप के बाद नौकरी न मिलने को शोषण बताने वाले युवा मित्रों के लिए कुछ बातें…

Paramendra Mohan : हाल के दिनों में मैंने कुछ ऐसे पोस्ट या वेबसाइट पर खबरें देखीं, जिसमें युवा पत्रकारों ने अपने शोषण की कहानी बताई है, न्यूज़ चैनल्स और अखबारों पर इंटर्नशिप के दौरान काम कराने और फिर नौकरी नहीं देने के आरोप लगाए हैं। ये भी कहा गया है कि मीडिया में नौकरी उन्हीं को मिलती है, जिनका अप्रोच होता है, रेफ्रेंस होता है, जुगाड़ होता है। ये तमाम बातें गलत हैं, ये तो नहीं कहना चाहता, लेकिन सच बिल्कुल यही है, मैं इसे भी स्वीकार करने को तैयार नहीं हूं। जिन इंटर्न्स की इंटर्नशिप खत्म होते-होते नौकरी लग गई, उनके बारे में क्या कहेंगे?

मेरा अनुभव ये कहता है कि अगर आपने मीडिया को अपने करियर के तौर पर चुना है तो फिर आप इस बात को गांठ बांध ले कि संघर्ष ही जीवन है, अवसर कम है, आकांक्षी बहुत हैं और आम परीक्षाओं की तुलना में यहां प्रति सीट ज्यादा दावेदार हैं। युवा मित्रों से मेरा साफ तौर पर कहना है कि बमुश्किल छह महीने या साल भर की इंटर्नशिप के बाद आप नौकरी की गारंटी चाहते हैं, जबकि इसी देश में चार-चार बार प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने के बाद भी नौकरी नहीं लग पाती, हर फील्ड में प्रोजेक्ट्स करने होते हैं और कहीं भी प्रोजेक्ट पूरा होने का मतलब नौकरी की गारंटी नहीं होती। हार मानने वालों के लिए मीडिया नहीं है।

देश में राष्ट्रीय स्तर के महज 10-12 हिंदी चैनल और आधा दर्जन इंग्लिश न्यूज़ चैनल हैं। इनमें से ज्यादातर 5-10-20 साल से चल रहे हैं, ऐसे में यहां वैकेंसी तभी बनती है, जब कोई एक चैनल से दूसरे चैनल में जाता है, फिर नए लोगों के लिए स्थापित चैनलों में गुंजाइश कितनी है, इस बारे में सोचें। रीज़नल चैनल्स हैं, लेकिन वहां जाना युवा पत्रकारों की पहली प्राथमिकता होती नहीं और वहां भी वैकेंसी की यही स्थिति है। दूसरी ओर, हर साल सरकारी और निजी संस्थानों से पास आउट पत्रकारिता छात्रों की संख्या इतनी होती है कि महज दो बैच में उतने नए पत्रकार आ रहे हैं, जितने पहले से कार्यरत हैं। इंटर्नशिप करके नौकरी न मिल पाने को शोषण बताने वाले युवा मित्र, ज़रा सोचें कि क्या इंटर्नशिप के लिए चयन ही कोई आसान है?

नौकरी तो छोड़िए, इंटर्नशिप के लिए भी कितनी कोशिशें करनी होती है, क्या ये किसी से छिपा है? जहां तक रेफ्रेंस-अप्रोच से जुगाड़ को नौकरी मिलने की गारंटी कहा जा रहा है, उसका एक सच ये भी है कि कई बड़े चैनलों में काम करने और कई बड़े पदों पर बैठे वरिष्ठ मित्रों के बावजूद नौकरी छोड़ कर वापसी करने या नौकरी छूटने पर नई नौकरी तलाशने के लिए हमारे कई साथी महीनों से भटक रहे हैं और मुझे भी इसका अनुभव हो चुका है। कहीं ऐसा नहीं होता कि किसी ने रेफर कर दिया तो बिना टेस्ट, बिना इंटरव्यू सीधे अप्वाइंटमेंट लेटर मिल जाता है, हां ये जरूर हो सकता है कि ये रेफ्रेंस आपको टेस्ट टेबल, इंटरव्यू बोर्ड तक बिना अप्रोच वालों की तुलना में कछ पहले पहुंचा सकता है और ये भी जान लें कि कोई कितना भी करीबी क्यों न हो, रेफ्रेंस तभी देता है, जब आप काम में मजबूत होते हैं क्योंकि उसे खुद भी अपनी नौकरी बचानी होती है।

ऐसा भी नहीं है कि जिनके पास नौकरी नहीं है, वो काम में कमज़ोर हैं, लेकिन ये कोई सरकारी क्षेत्र के उपक्रम नहीं हैं, जो एक बार नौकरी मिल गई तो फिर रिटायरमेंट तक चलती ही रहेगी, ये चलेगी संस्थान की ज़रूरत और मीडियाकर्मियों की काबिलियत के दम पर, ये शीशे की तरह साफ है। मैं युवा मीडिया छात्रों को न हताश करना चाहता हूं और न ही ये कहना चाहता हूं कि इस क्षेत्र को चुनकर उन्होंने गलत किया, मेरी कोशिश बस इस स्थिति को व्यावहारिकता के साथ बताने की है।

न्यूज़ चैनल्स अब रीज़नल के बाद नगरीय स्तर पर भी आने वाले हैं, शुरुआत हो चुकी है, इससे वैकेंसी बढ़ेगी। दूसरी बात, प्रिंट मीडिया में भी अपनी जगह तलाशें और सबसे बड़ी बात ये कि डिज़िटल मीडिया अब हर न्यूज़ चैनल्स के साथ-साथ प्रिंट मीडिया की ज़रूरत भी बन चुकी है, आज ही एएनआई के सोशल मीडिया के लिए वैकेंसी आई है, वहां भी आवेदन करते रहें। खुद को नकारात्मकता में न घिरने दें कि इंटर्नशिप कर लिया, आने-जाने-खाने-चाय के पैसे भी जेब से गए और नौकरी भी नहीं मिली, ये आपने अपनी मर्जी से निवेश किया है अपने भविष्य के लिए और काम में मजबूत होंगे तो इंटर्नशिप के दौरान भी ऐसी छाप छोड़ देंगे कि वहीं के वरिष्ठ आपको बुलाकर नौकरी देंगे, लेकिन नहीं होंगे तो फिर नौकरी मिलने के बाद भी नहीं बचा पाएंगे, ये डारविन का सिद्धांत भी है, सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट…तो प्रयास फिटेस्ट बनने का करें, थोड़े से संघर्ष में ही अगर फीट आने लगे तो फिर इस क्षेत्र का मोह त्याग दें।

वरिष्ठ पत्रकार परमेंद्र मोहन की एफबी वॉल से.

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Comments on “इंटर्नशिप के बाद नौकरी न मिलने को शोषण बताने वाले युवा मित्रों के लिए कुछ बातें…

  • ये वरिष्ठ नहीं फर्जी है। यहां क्या होता है। इसे पता है। फ़ालतू का ज्ञान पेल रहा है।

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  • Deepak pandey says:

    मेरे हिसाब से तो एक इंटर्न को बस हेल्पर की तरह कार्य करने देते है और बाद में सर्टिफिकेट देके विदाई कर देते है। नौकरी तो बहुत दूर की बात है।

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  • Adv. Shyam kishore Tripathi says:

    मैं परमेन्द्र मोहन जी की बात से बिल्कुल इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता। हाँ यह ज़रूर बोलना चाहूंगा कि समय लगता है, जब किसी नौकरी के लिए 4 बार बैठा जाए तब भी नौकरी नहीं लगती तब कोई नहीं बोलता। हालांकि बोला इसलिए नहीं जाता क्योंकि वह परीक्षा होती है किसी सन्मान की, किसी ओहदे की। जब भारत वर्ष के किसी कोने से कोई बच्चा किसी सरकारी नौकरी में सम्मिलित होता है और वह नौकरी आई ए एस के ओहदे की होती है तो यही वो मीडिया है जो उस छात्र के हौसले के पुल बांधने में नहीं थकता।
    लेकिन बड़े भाई परमेन्द्र जी ये भी कहना चाहूंगा कि किसी सरकारी नौकरी में किसी ऊंचे ओहदे पर जाने के लिए कोई सिफारिश नहीं लगती, वहां परीक्षा पास करके जाना पड़ता है। लेकिन इस पत्रकारिता में लोग उन्हीं को अंदर का रास्ता दिखाते हैं जो उनके संपर्क के हो जाते हैं उनके संपर्क के होते हैं।
    हाँ, यह भी सत्य है कि किसी जगह जाने के लिए समय चाहिए लेकिन परमेन्द्र जी सिर्फ पत्रकारिता ही वह स्थान है, किसी भी प्रोफेशन में जहां लोगो को नौकरी देने के लिए बुलाया जाता है।
    देखिये मुझे ज्यादा तो नहीं पता लेकिन बड़े भैय्या इस पत्रकारिता में जब कुछ खास लोग किसी चैनल में या प्रिंट मीडिया में एक ही परिवार के व्यक्ति जाने का हुनर रख सकते हैं तो आम छात्र क्यों नहीं।
    वैसे आपको मेरी बातों पर भरोसा होने का कोई सवाल ही नहीं होता तो आप किसी सिद्धांत पर मत जाएं ज़रा ये भी पता करें कि कितने व्यक्ति साल दर साल पत्रकारिता में घुसने के पहले ही किसी और जगह का रास्ता नाप लेते हैं।

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