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मध्य प्रदेश

जानकारी नहीं देने पर दो अफसरों पर 25-25 हजार रुपए का जुर्माना

शहडोल के एक मामले में चार साल में 23 सुनवाइयां हुईं, राज्य सूचना आयोग की तीखी टिप्पणियां… कहा- केस को फुटवॉल बनाकर आयोग को खेल का मैदान बना दिया और एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहे अफसर।

भोपाल। राज्य सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने एक मामले में दो अफसरों पर 25-25 हजार रुपए का दंड लगाया है। इसी मामले में एक तीसरे अफसर के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। सूचना के अधिकार का यह मामला शहडोल का है। द्वितीय अपील में आने के बाद राज्य सूचना आयोग में इस प्रकरण में चार साल में 20 से ज्यादा सुनवाइयां हुईं। आयोग ने अपने फैसले में सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की जमीनी हालत पर तीखी टिप्पणियां की हैं। ये दोनों अधिकारी हैं केआर बड़ोले और बीके पांडे। कलेक्टर कार्यालय अधीक्षक और सहायक लोक सूचना अधिकारी केएम चौधरी को भी इस मामले में दोषी पाकर उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए कलेक्टर को निर्देशित किया गया है।

आयुक्त ने फैसले में कहा है कि कलेक्टर ऑफिस से एक बहुत ही सामान्य सी जानकारी मांगी गई थी, जिसे लोक सूचना अधिकारी ने तीस दिन की समय सीमा में नहीं दिया और न ही जानकारी नहीं देने का कोई कारण बताया। बाद में प्रथम अपीलीय अधिकारी कलेक्टर नीरज दुबे ने भी जानकारी देने योग्य पाकर अनुकूल आदेश दिए। सभी तथ्यों और संबंधित अधिकारियों के लिखित कथनों पर विचार के आधार पर आयुक्त ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि यह लोक सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के प्रावधानों को मिट्‌टी में मिलाने के कुत्सित प्रयासाें का एक विलक्षण मामला है। पूरी फाइल के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि दोनों तत्कालीन लोक सूचना अधिकारियों ने किस तरह इसे एक फुटबॉल की गेंद बना दिया और राज्य सूचना आयोग को खेल का मैदान।

फैसले में कहा गया है कि दोनों तत्कालीन लोक सूचना अधिकारियों और उनके सहायक के जवाब और एक दूसरे पर निम्नस्तरीय दोषारोपण अत्यंत हास्यास्पद हैं। वे इस प्रकरण में जानकारी न देने के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी केआर बड़ोले ने अपने सहायक लोक सूचना अधिकारी और कलेक्टर कार्यालय अधीक्षक केएम चौधरी को प्रकरण की जानकारी नहीं देने का कुसूरवार माना है। केएम चौधरी ने दोनों अधिकारियों पर अपनी गलती छिपाने का तर्क देते हुए अपने एक जवाब में शाखा प्रभारी तक को लपेट लिया और सहायक ग्रेड-3 को भी आयोग के समक्ष घसीटा। सब एक दूसरे की तरफ गेंद उछालते नजर आए हैं। आयोग ने इस मामले में घोर अनुशासनहीनता का भी परिचायक माना।

इस मामले में दोनों तत्कालीन लोक सूचना अधिकारियों केआर बड़ोले और बीके पांडे का आचरण गैरजिम्मेदाराना पाया गया । 07.02.2011 के आवेदन पर हर हाल में जानकारी या समुचित उत्तर अपीलार्थी को 30 दिन के भीतर दे दिया जाना चाहिए था, जो कि तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी केआर बड़ोले ने नहीं किया। वे इसका दोष अपने अधीनस्थ केएम चौधरी के िसर मढ़ रहे हैं। बड़ोले के बाद बने तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी बीके पांडे ने 13.04.2011 को सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8 के हवाले से आवेदन ही रद्द कर दिया। आयोग के समक्ष इसे उन्होंने अपने जवाब में “शीघ्रता से किया गया निराकरण’ कहा। अक्टूबर 2011 में प्रथम अपीलीय अधिकारी नीरज दुबे के आदेश के बावजूद किसी की दिलचस्पी मूल आवेदन पर जानकारी देने में नहीं रही। दोनों दोषी अधिकारियों पर पृथक-पृथक 25-25 हजार रुपए की शास्ति अधिरोपित की गई। इसके अलावा सहायक लोक सूचना अधिकारी केएम चौधरी, जो कि कलेक्टर कार्यालय में अधीक्षक जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत थे, इस प्रकरण में बराबर दोषी हैं। लोक सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 20 (2) के तहत उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की अनुशंसा वर्तमान कलेक्टर और प्रथम अपीलीय अधिकारी को की गई है।

क्या है मामला: शहडोल निवासी सुभाष लाल ने 7 फरवरी 2011 को कलेक्टर ऑफिस में हुई किसी शिकायत और उस पर हुई कार्रवाई से संबंधित जानकारियां मांगी थीं। तत्कालीन एक लोक सूचना अधिकारी ने कोई जानकारी नहीं दी और आयोग को जवाब दिया कि उनके सहायक ने यह केस उनके सामने पेश ही नहीं किया था। दूसरे अधिकारी ने दो महीने बाद आवेदन ही रद्द कर दिया। लेकिन प्रथम अपीलीय अधिकारी ने आवेदक के पक्ष में फैसला दिया और जानकारी देने के आदेश दिए। इसके बावजूद जब जाानकारी नहीं मिली तो यह मामला दूसरी अपील में आयोग के सामने जून 2012 में पेश हुआ। इस पर सुनवाई 2014 में शुरू हुईं और चार साल दो महीने में 23 सुनवाइयां हुईं। आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने इसकी अंतिम सुनवाई में कहा कि सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधान बहुत स्पष्ट हैं। इसमें लोक सूचना अधिकारी से लेकर आयोग तक की जिम्मेदारियां बहुत संक्षिप्त और स्पष्ट हैं। इसलिए किसी भी प्रकरण के निराकरण में इतनी लंबी सुनवाइयों की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। लेकिन निचले स्तर पर प्रशासनिक अमला इस एक्ट के प्रति डेढ़ दशक बाद भी जागरूक नहीं है।

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