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पत्रकारिता में शौक से आये हो या इसे अपना करियर बनाना चाहते हो?

‘भ्रष्ट इंडिया कंपनी’ से मुक्ति का मार्ग ‘आजादी का दूसरा संघर्ष’ है…  छब्बीस जनवरी बीते एक माह गुजर गया है और पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव का अंतिम दौर चल रहा है। इस एक महीने के अंतराल में भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप को लेकर अनेक तरह के विचार हवा में तैरते रहे। यह पहला मौका है जब चुनाव में न तो राष्ट्रीय फलक पर और न क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर ही कोई मुद्दा चर्चा में है। इसके बरअक्स निचले स्तर के सामान्य चुनावी प्रचारकों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के बडे़ नेताओं, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री की भी, भाषा-शैली के घटते स्तर को लेकर हर जागरूक व्यक्ति चिंतित और शर्मसार नजर आ रहा है।

‘भ्रष्ट इंडिया कंपनी’ से मुक्ति का मार्ग ‘आजादी का दूसरा संघर्ष’ है…  छब्बीस जनवरी बीते एक माह गुजर गया है और पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव का अंतिम दौर चल रहा है। इस एक महीने के अंतराल में भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप को लेकर अनेक तरह के विचार हवा में तैरते रहे। यह पहला मौका है जब चुनाव में न तो राष्ट्रीय फलक पर और न क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर ही कोई मुद्दा चर्चा में है। इसके बरअक्स निचले स्तर के सामान्य चुनावी प्रचारकों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के बडे़ नेताओं, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री की भी, भाषा-शैली के घटते स्तर को लेकर हर जागरूक व्यक्ति चिंतित और शर्मसार नजर आ रहा है।

चुनाव जैसे महत्वपूर्ण और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अभिन्न ‘पवित्र कर्मकाण्ड’ की बेला में प्रत्याशियों व अन्य प्रचारकों द्वारा लोक-कल्याण की भावना से उद्भूत विचारों से ओत-प्रोत भावी योजनाओं तथा र्कायक्रमों का खाका मतदाताओं के सम्मुख प्रस्तुत करने की अपेक्षा दूसरे की निन्दा-आलोचना करने, तंज कसने, मिथ्या आरोप मढ़ने, सामने वाले को निर्ममतापूर्वक कुचल देने की हिंसक प्रवृत्ति से भरी हुई अभद्र भाषा तथा गाली-गलौज का प्रयोग सार्वजनिक रूप से करने से हमारे वैचारिक तथा नैतिक पतन की नई इबारत ही लिखी गई। देश व समाज की शक्ल-ओ-सूरत आगे कैसी बन जाने वाली है, यह पूरा घटनाक्रम इसकी स्पष्ट बानगी है।

वर्तमान भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिवेश पर एक साधारण व्यक्ति के लिए सटीक एवं तार्किक रूप से कुछ कह पाना तो कठिन है लेकिन फिर भी संभवतः इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता है कि ‘विचारधारा’ की दृष्टि से देश भर के राजनैतिक-सामाजिक परिदृश्य से वैचारिकता का अवसान हुए दशकों बीत चुके हैं। हम भलीभाँति जानते हैं कि देश में कभी थे एक से बढ़ कर एक निश्चित सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राष्ट्रीय सुदृढ़ता के पक्षधर और विचारवान लोग। लेकिन अब न वैसे नेता रहे और न अन्य शक्तिसम्पन्न प्रभुवर्ग में ही कोई। सर्वत्र नैराश्यपूर्ण घटाटोप अंधकार के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता।

यदि हमारे वर्तमान समाज में कुछ है तो वह है–एक तरफ अभावग्रस्त शोषितों-वंचितों का सिसकियों और बेचारगी से भरा हुआ करुण-क्रंदन वाला ‘भारत’। तो दूसरी ओर वैध-अवैध साधनों से समेटी गई अकूत दौलत के अंबारों से लदे ओर लूट के जश्नों में दिन-रात मस्त शोषक वर्ग का ‘इंडिया’। जिसे भरपूर लूट से प्राप्त राग-रंग के हर्षोल्लास के कानफोड़ू शोर में अपने अतिरिक्त किसी दूसरे की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही है।

देश के आमजन के हिस्से सिर्फ और सिर्फ बीच-बीच में किसी सांपनाथ या उसी के भाई-बिरादर नागनाथ के पक्ष में मतदान कर अगले चुनाव तक तमाशाई बने रहने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं आता, सिवाय उस ‘इंडिया’ निवासी प्रभुवर्ग के अन्याय, शोषण, उत्पीड़न, घृणा, भ्रष्टाचार, अनैतिक, आपराधिक कुकर्मों से भरे क्रिया-कलापों को देखते-सुनते-भोगते रहने के। क्योंकि उसका जीवन-संघर्ष इतना तीव्र बना दिया गया है कि वह बस किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ भर कर लेने की विवशता से घिर गया है। उसके पास समय ही नहीं कि वह यह सोच भी सके कि गरीबी कोई ईश्वरीय देन या पिछले जन्म के कर्मों का प्रतिफल हर्गिज नहीं, बल्कि चंद सत्ताधीशों, पूँजीपतियों तथा उच्चाधिकारियों के नापाक गठजोड़ का नतीजा है।

संसार भर में बढ़ते उपभोक्तावाद ने विचार को तिजौरी में बंद कर दिया है। इसका ज्वलंत उदाहरण है देश में मुख्यधारा का मीडिया, जिस पर पूँजीपतिवर्ग कब्जा कर बुद्धिजीवी होने का दंभ पाले संपादकों-पत्रकारों को अपना टुकड़खोर बना कर मनमानी करवा रहा है। इसकी तस्दीक किसी भी चैनल व बड़े समाचार पत्र को देख कर की जा सकती है जिसमें से देश का बहुसंख्यक ग्रामीण, किसान, गरीब व मेहनतकश गायब है। हो भी क्यों नहीं; क्योंकि एक तो इस असंगठित क्षेत्र से उसे ‘बिजनैस’ नहीं मिलता और दूसरे, पत्रकारिता को ‘मिशन’ से इतर व्यवसाय बने अर्सा गुजर गया। अब सब कुर्सी या थैली की परिक्रमा कर उसे कामधेनु की तरह दुहने में ही हित-लाभ देख-समझ रहे हैं।

जहाँ तक किसी विचारधारा का प्रश्न है, अब राजनीति में न तो विचार ही रहे और न उनका कोई खास महत्व। एक व्यक्ति पल भर पहले किसी एक पार्टी में होता है और अगले ही क्षण किसी अन्य का दामन थाम लेने में उसे कोई लाज-शर्म का अनुभव नहीं हो पाता है। दलों के लिए भी घड़ी भर पहले जो महाभ्रष्ट और चोर-बेईमान था, वह अब उसका कंठहार बन जाता है। साम्यवाद हो या फिर चाहे कोई भी अन्य ‘वाद’ सबकी कलई खुल चुकी है।

राजनीति के शाही हम्माम में सभी नंग-धड़ंग हैं। यहाँ एक उदाहरण देना समीचीन होगा–जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक प्रभाष जोशी ने अपने एक नये-नये भर्ती हुए उप-संपादक को वामपंथी नेता ईएमएस. नंबूदरीपाद का साक्षात्कार लेने उनके पास भेजा। शुरुआती सामान्य वार्तालाप में ईएमएस. ने उनसे पूछा–’’पत्रकारिता में शौक से आये हो या इसे अपना करियर बनाना चाहते हो?’’ नौजवान पत्रकार से यह सुनने पर कि पत्रकारिता में ही भविष्य की राह तलाशनी है, ईएमएस. ने कहा–’’पत्रकारिता के पेशे में तुम्हें तब तक कामयाबी नहीं मिल पायेगी जब तक तुम भारत और कृष्ण को नहीं समझ लेते।’’ बस, वह साक्षात्कार शुरू होने से पहले यहीं पर समाप्त हो गया। आज हमारे बीच ऐसे विचारवान तथा अपनी जड़-जमीन से जुड़े कितने लोग बचे हैं?

दूसरा उदाहरण, विश्वप्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ (बर्ड वॉचर) सालिम अली ने भरतपुर पक्षी अभयारण्य (केवलादेव नेशनल पार्क) के निर्माण के साथ ही केरल की ‘साइलेंट वैली’ नेशनल पार्क के लिए खतरा बनी एक बांध परियोजना को रुकवाने पर काफी जोर दिया था। वे एक दिन प्राकृतिक सुषमा और वन संपदा से भरपूर इस घाटी को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से बचाने का अनुरोध लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिले। चौधरी साहब खेत की मिट्टी पर पड़ने वाली पानी की पहली बूँद का असर जानने वाले नेता थे।

अतः बांध निर्माण से पर्यावरण के संभावित खतरों का जो चित्र सालिम अली ने उनके सामने रखा, उसने उनकी आँखें नम कर दीं। इस प्रकार एक अकेले इंसान की बातों का भी महत्व समझ कर चौधरी चरण सिंह ने उस बांध परियोजना को रोक देने का आदेश दे दिया। आज सालिम अली साहब हमारे बीच नहीं हैं और चौधरी साहब भी नहीं हैं। हमारे बीच अब कौन बचा है, जो सोंधी माटी पर उगी फसलों के मध्य एक नए भारत की नींव रखने का संकल्प लेगा? कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख के बरफीले इलाकों में जीने वाले पक्षियों की ही नहीं बल्कि आम जन-जीवन की भी वकालत करेगा? अब तो राजनीतिक हवाओं का रुख हरियाली के चंद टापुओं की तरफ है बाकी के हिस्से तो सिर्फ झुलसाती रेगिस्तानी गर्म हवाओं ने ही आना है, जिसकी फिक्र किसी को नहीं।

एक अन्य उदाहरण डाॅ. भीमराव अंबेडकर का है, जिन्होंने बचपन में एक नौ वर्षीय कन्या से घरवालों द्वारा की गई पहली शादी वाली पत्नी के निधन के बाद फिर किसी दलित कन्या को अपनी जीवन-संगिनी बनाने की अपेक्षा इसके लिए एक सारस्वत ब्राह्मण युवती को चुना और अपना स्थाई निवास ‘राजगृह’ भी मुंबई के एक ब्राह्मण-बहुल मुहल्ले में बनाया। यहाँ सवाल उठता है कि जीवन-पर्यंत ब्राह्मणवाद से संघर्ष और दलितोद्धार के लिए समर्पित रहे अंबेडकर ने क्या सोच कर ये दोनों निर्णय लिए? उनके अपने निजी जीवन के इन दोनों फैसलों से दलित समुदाय या उनके पक्षधरों को क्या शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए?

निष्कर्षतः चूँकि भारतीय राजनीति आजादी के बाद अपने शुरुआती दौर से ही अनंत संभावनाओं तथा प्रभुवर्ग द्वारा सारी सुविधाओं और सुख के साधनों पर येन-केन-प्रकारेण कब्जा करने का खेल रही है; इसीलिए इसका चरित्र अभी भी वैसा ही बना हुआ है। इसी शक्ति-सम्पन्न वर्ग ने पहले से ही समाज को धर्म, संप्रदाय, जाति, बिरादरी आदि के विभिन्न खानों में विभाजित किया और अब तो अधिक छिन्न-भिन्न करने की ऐसी साजिश ‘सोशल इंजीनियरिंग’ जैसी संज्ञाओं द्वारा विभूषित की जाती है। इसके अलावा यह एक बड़ी विडंबना है कि उपभोक्तावाद ने वैश्विक स्तर पर जिस लूट-खसोट के महारोग को बहुत तीव्रता से बढ़ावा दिया, राजनीति उसका उपकरण बन कर शताब्दियों से ही शक्ति-सम्पन्न वर्ग द्वारा शोषित समाज का ही शोषण कर रही है।

इस भ्रष्ट इंडिया द्वारा फैलाये गये घटाटोप अंधकार से बाहर निकलने का समग्रता में एक उपाय ‘आजादी का दूसरा संघर्ष’ के तौर पर जेपी की समग्र क्रांति की तरह का एक सशक्त जनांदोलन हो सकता है, बशर्ते उसमें लालू, मुलायम, नीतीश जैसों की घुसपैठ को रोका जा सके।

श्यामसिंह रावत
वरिष्ठ पत्रकार
[email protected]

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