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साहित्य

आत्ममुग्ध और प्रचार प्रिय लेखकों के लिए एक ज़रूरी बात

Subhash Rai-

आप कितने लोगों को बतायेंगे कि आप लेखक हैं, कवि हैं। कितने व्हाट्स एप ग्रुप पर डालेंगे, कितने लोगों को इनबॉक्स शेयर करेंगे। कितनी बार बतायेंगे कि आप ने बहुत क्रांतिकारी कविताएँ लिखी हैं, कि आप ने सैकड़ों मंचों पर काव्यपाठ किया है, कि आप की रचनाएँ पाठ्यक्रम में शामिल हो गयी हैं, कि आप सौ मूर्धन्य लेखकों के क्लब में शामिल हैं, कि आप की किताब ब्लाॅक बस्टर रही, कि आप के दस संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

आप लाइक्स की उम्मीद में कितने लाइक्स देंगे, कितनी बधाइयां, शुभकामनाएँ, कितनी शोकांजलियां, श्रद्धांजलियां लिखेंगे। प्रशंसा की प्रत्याशा में कितनी प्रशंसाएं लिखेंगे। अपनी किताबों की कितनी समीक्षाएं लिखवायेंगे, कितनी जगह छपवायेंगे। आप कितने वेश बदलेंगे खुद को बनावटी काव्य गरिमा से ढंकने के लिए। कितनी तस्वीरें शेयर करेंगे अपनी सक्रियता की।

आप और कितने पागल होंगे अपनी पहचान के लिए। कितना भागेंगे इधर -उधर। कितने सम्मान प्रायोजित करेंगे। महान जनों की अपने बारे में कही गयी कितनी उक्तियों को प्रचारित करेंगे। यह सब कुछ भी काम आने वाला नहीं है। आप थक जायेंगे, बात बनेगी नहीं। अपनी कविता को बोलने दीजिये, उसे कहने दीजिये, उसे जाने दीजिये। उसमें सामर्थ्य होगी तो वह जहां जायेगी, आप को भी ले जायेगी। बस इतनी सी बात समझ में क्यों नहीं आती।

लेखक सुभाष राय कई अखबारों के प्रधान संपादक रहे हैं.

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