जब हल्ला बोल के खिलाफ एकजुट हुए थे दो बड़े अखबार!

विशेश्वर कुमार-

यह उस दौर दौरे की यादें हैं जब अखबार कारपोरेट या बिजनेस हाउस के रूप में नहीं जाने जाते थे। सरकार से बढ़कर जनसरोकार होता था। सरकारी खबरें छपती थीं, मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री के बयान पेज एक पर लीड छपते थे लेकिन बड़ी घटनाओं को छोटा या कमतर करके नहीं। सरकार व नेताओं की इमेज बनाने के लिए स्टोरी गढ़ने वाली पत्रकारिता नए दौर की विधा है।

हम जैसे पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों को जरूर याद होगा मुलायम सरकार का दो अखबारों के खिलाफ हल्ला बोल। ये अखबार हैं दैनिक जागरण और अमर उजाला। सबसे बड़े हिन्दी भाषी प्रदेश पर इन दो अखबारों की हुकूमत थी, आज भी ये अपनी बढ़त बनाए हुए हैं लेकिन पत्रकारिता के नए दौर में दबदबे वाली बात बेमानी है। खास यह कि तब न्यूज चैनलों का जन्म नहीं हुआ था और दूर दूर तक सोशल मीडिया का नाम कोई नहीं जानता था। यह बात अलग उत्तराखंड की मांग को लेकर पहाड़ पर चल रहे आंदोलन के दौरान की है।

यूपी बंटवारे के इतिहास में दर्ज है 1994 का सितंबर-अक्टूबर माह। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर पहाड़ पर जन आंदोलन तेज हो रहा था और तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार उसे हर हाल में दबाने में जुटी थी। मैं उस समय अमर उजाला में चीफ रिपोर्टर था। इससे पहले दैनिक जागरण मेरठ में काम करने के दौरान कई मौके पर गढ़वाल के पहाड़ी जिलों में रिपोर्टिंग के लिए गया था। उस समय पहाड़ी जिलों को पनिशमेंट पोस्टिंग के रूप में ही देखा जाता था। गरज कि पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के नाम पर केवल सरकारी कागज के पेट भरे जाते थे। 1-2 सितंबर 1994 को खटीमा और मसूरी में धरना प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों पर बर्बर गोलीकांड की घटनाएं हो चुकी थीं। इनमें कई लोग मारे जा चुके थे और पूरा पहाड़ जैसे धधक रहा था।

2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन का एलान हुआ था। पहाड़ों से बसों में भर भरकर रातों रात लोग दिल्ली पहुंच रहे थे। सरकार ने आंदोलनकारियों को दिल्ली जाने से हर हाल में रोकने का आदेश दिया था। मुजफ्फरनगर जिले के नारसन में पुलिस ने आधी रात को आंदोलनकारियों को रोकने का प्रयास किया लेकिन घेरा तोड़कर वे निकल गए। आगे रामपुर तिराहे पर पूरी छावनी तैनात थी। यहां जो कुछ हुआ वह शर्मशार करने वाला था। अचानक लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले दागे गए। इतना ही नहीं, निहत्थे आंदोलनकारियों जिनमें महिलाएं भी थीं पुलिस ने गोली चलायी। महिलाओं के साथ कथित छेड़छाड़ और दुष्कर्म की घटनाएं सामने आयीं। सीबीआई की जांच रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि हुई। खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा कांड में दो दर्जन से अधिक लोग मारे गए थे। दैनिक जागरण और अमर उजाला के पन्ने इन घटनाओं से रंगे होते थे। संपादकीय लेखों में भी पुलिस बर्बरता की निंदा हुई। सरकार चाहती थी कि कवरेज और फालोअप इस तरह हो कि घटनाएं दब जाएं, पहाड़ में आंदोलन की तपिश कुछ कम हो और लखनऊ तक उसतक आंच न पहुंचे। सरकार के हक में अखबार नरम नहीं पड़े।

नाराज मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उसी अक्टूबर 1994 में अमर उजाला व दैनिक जागरण के खिलाफ हल्लाबोल का सार्वजनिक एलान कर दिया। कार्यकर्ता अखबारों की प्रतियां जलाने लगे, दोनों अखबारों का सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया गया। तब अखबारों के अर्थशास्त्र में सरकारी विज्ञापन का बड़ा सहारा होता था। कारपोरेट विज्ञापन तो दिल्ली जैसी विराटनगरी से छपने वाले इलिट अंग्रेजी अखबारों के हिस्से में चले जाते थे जबकि उनकी पहुंच बहुत सीमित थी। शायद हिन्दी अखबार बाजार के हिसाब से कमतर माने जा रहे थे, छवि गढ़ी गई थी कि ये नाली खड़ंजे की पत्रकारिता करते हैं। सच्चाई यह कि हिन्दी अखबारों की धमक से शासन प्रशासन की बड़ी-बड़ी कुरसी हिल जाती थी। हल्ला बोल हुआ तो दोनों अखबार झुके नहीं बल्कि व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा भूल एकजुट हो गए। ठीक है सरकारी विज्ञापन नहीं मिलेगा, न सही। निर्णय हुआ जनसरोकार वाली सरकारी खबरें नहीं रोकी जाएंगी लेकिन पहले पेज पर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह का फोटो और नाम नहीं छपेगा। विज्ञापन बंद हो गया था, अखबारों के कुछ पेज कम हो गए। मुख्यमंत्री की जनसभाओं के फोटो अंदर पेज पर छापे जाते थे, खबरों में मुलायम सिंह का नाम नहीं जाता था, सिर्फ मुख्यमंत्री ने कहा…। प्रदेश सरकार के पास सीबीआई, आयकर और ईडी तो थे नहीं सो श्रम विभाग को लगाया गया कि अखबारों को डराओ, उनपर कानूनी शिकंजा कसो। अखबारों के दफ्तरों पर श्रमायुक्त के विशेष दस्तों ने छापेमारी की। घुसते ही गेट बंद कर हाजिरी रजिस्टर जब्त किए गए, कर्मचारियों की गिनती हुई, पूछा गया-कितने का पीएफ जाता है, कितने का नहीं। बाथरूम तक की जांच हुई, पता नहीं किस श्रम कानून में बाथरूम का निरीक्षण लिखा था। छह-आठ घंटे तक अखबारों में काम करने वाले बंधक बने रहे, श्रम कानून के तहत रिपोर्ट लिखाने की धमकी दी गयी। सरकारी दमन का क्रम महीनों चला पर अखबार डरे नहीं, झुके नहीं।

सरकारी विज्ञापन बंद होने से अखबारों पर खासा असर पड़ा था। वेतन नहीं रूका पर उस दीपावली पर अमर उजाला में बोनस आधा ही मिला था, छह माह बाद उसकी भरपायी हुई। लेकिन हमसभी रिपोर्टर खुश थे कि जनता में अखबार और खबरों की साख बढ़ गयी थी। सरकार के आगे न झुकने वाले अखबार हमेशा जनता के करीब होते हैं। खटीमा, मसूरी व रामपुर तिराहा कांड उत्तर प्रदेश के विभाजन में मिल का पत्थर साबित हुआ। यह अलग मुद्दा है कि आज भी रामपुर तिराहा कांड के पीड़ितों को न्याय का इंतजार है। सन 2000 में उत्तराखंड राज्य बना पर आजतक सपा वहां जड़ें नहीं जमा सकी।

दमन-उत्पीड़न के खिलाफ जब जब अखबार-पत्रकार एकजुट हुए हैं सरकारों को झुकना पड़ा है। स्व. राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रेस मानहानि विधेयक के खिलाफ देशभर के अखबार एक हो गए थे और हड़ताल तक रखी। नए दौर की पत्रकारिता में यह एका कल्पना से परे है। रिपोर्टिंग का काम खासा जोखिमभरा हो चला है। कब-कहां किस थाने में कौन एफआईआर कर देगा, कौन नेता या अफसर भरी सड़क पर धुन डालेगा और थाना-पुलिस कोर्ट कचहरी में घर गिरस्ती बरबाद हो जाएगी कहना समझना कठिन है। दैनिक भास्कर और भारत समाचार न्यूज चैनल के खिलाफ आयकर छापों के संदर्भ में सिर्फ इतना ही कि हमें इतिहास के फटे पुराने पन्नों को एक बार फिर से नमन करना चाहिए।

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One comment on “जब हल्ला बोल के खिलाफ एकजुट हुए थे दो बड़े अखबार!”

  • ये कौन बताएगा उसके बाद दैनिक जागरण मालिक राज्यसभा सीट के लिए और लखनऊ के पत्रकार घरो के लिए बिक गए थे?

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