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अखिलेश यादव की कहानी से याद आये राजीव गांधी!

अनेहस शाश्वत
23 जून, 1980 की सुबह रेडियो पर एक समाचार आया और सन्नाटा छा गया। समाचार यह था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र और उनके सम्भावित उत्तराधिकारी कांग्रेस नेता संजय गांधी का दुर्घटना में निधन हो गया। इस दारुण दुख के आघात से उबरी इन्दिरा गांधी ने सिर्फ इतना कहा कि-‘‘मेरे साथ इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है।’’ लेकिन किन्हीं भी परिस्थितियों में न डिगने वाली भारतीय मानसिकता की इन्दिरा गांधी ने तत्काल अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी चुनकर प्रषिक्षण देना शुरू किया। अभी यह प्रशिक्षण चल ही रहा था कि दूसरी दुर्घटना घटी और 31 अक्टूबर, 1984 को इन्दिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। चूंकि सारी गोटें इन्दिरा गांधी बिछा चुकी थीं और उनके सिपहसालार भी जांनते थे कि उनका भविष्य वंशवादी शासन में ही सुरक्षित है। इसलिए तत्काल राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गयी।

अनेहस शाश्वत
23 जून, 1980 की सुबह रेडियो पर एक समाचार आया और सन्नाटा छा गया। समाचार यह था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र और उनके सम्भावित उत्तराधिकारी कांग्रेस नेता संजय गांधी का दुर्घटना में निधन हो गया। इस दारुण दुख के आघात से उबरी इन्दिरा गांधी ने सिर्फ इतना कहा कि-‘‘मेरे साथ इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है।’’ लेकिन किन्हीं भी परिस्थितियों में न डिगने वाली भारतीय मानसिकता की इन्दिरा गांधी ने तत्काल अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी चुनकर प्रषिक्षण देना शुरू किया। अभी यह प्रशिक्षण चल ही रहा था कि दूसरी दुर्घटना घटी और 31 अक्टूबर, 1984 को इन्दिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। चूंकि सारी गोटें इन्दिरा गांधी बिछा चुकी थीं और उनके सिपहसालार भी जांनते थे कि उनका भविष्य वंशवादी शासन में ही सुरक्षित है। इसलिए तत्काल राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गयी।

कुछ ही दिन बाद हुए अगले आम चुनाव में सहानुभूति की लहर के फलस्वरूप प्रचन्ड बहुत की सरकार के मुखिया राजीव गांधी हुए। हंसमुख, ऊर्जावान और नये विचारों से भरे हुए राजीव गांधी ने कई नयी शुरुआत की। जिनका फल हम आज भी खा रहे हैं। राजनीति में नई संस्कृति लाने के विचार से प्रेरित राजीव गांधी ने स्वीकारोक्ति की कि दिल्ली से जो रुपया चलता है वह गांव तक पहुंचते-पहुंचते मात्र 15 पैसे रह जाता है और भी तमाम कदम उन्होंने उठाये। राजीव की ऐसी बेबाक बयानी और नई राजनीतिक संस्कृति लाने की आहट से पुराने जमे-जमाये घाघ कांग्रेसी सक्रिय हो गये। बहुत डिटेल में जाने की जरूरत नहीं क्योंकि यह सब हाल ही का इतिहास है। ज्यादातर लोग जानते हैं। इन घाघ नेताओं के सक्रिय होने का नतीजा यह हुआ कि राजीव गांधी खासी बदनामी झेलकर सत्ता से बेदखल हुए बाद में किस्मत ने भी दगा किया और वे एक दर्दनाक मौत का शिकार हुए। इस तरह सम्भावनाओं से भरे एक राजनैतिक जीवन का अंत हो गया। जो शायद पूरा समय पाता तो हो सकता है कुछ बहुत अच्छा देखने को मिलता।

इन्दिरा गांधी की कार्यशैली से नाराज और विश्वनाथ प्रताप सिंह के मण्डल अभियान से शीर्ष पर पहुंचे कई नेताओं में से मुलायम सिंह भी एक हैं। शीर्ष पर पहुंचने के बाद मुलायम सिंह में वे सारे गुण विकसित हो गये जिनके लिए मुलायम और उन सरीखे दूसरे नेता इन्दिरा गांधी की बुराई करते थे। वंशवाद भी ऐसा ही एक गुण है। सत्ता पाने और उसे बनाये रखने के लिए मुलायम सिंह ने भी वे सारे करम-धतकरम किये जो आम राजनीतिज्ञ करता है। और इन्दिरा गांधी की तरह सत्ता अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप दी। यहां तक तो सब ठीक रहा। लेकिन अखिलेश ने भी वही गलती कर दी। जो कभी राजीव गांधी ने की थी। उन्होंने राजनीति में नये विचार और संस्कार का समावेश करने की कोशिश की और एक हद तक सफल भी रहे।

लेकिन आज के इस दौर में जब अलग चाल, चरित्र और चेहरे का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा तक सारे करम-धतकरम करने पर उतारू है, अखिलेश की यह सदाशयता कितने दिन चलती? पुराने राजनैतिक ढंग में रचे-बसे सपाई जो इत्तफाक से उनके परिजन भी हैं, सक्रिय हो गये। तर्क दिया गया कि केवल आदर्शों और काम के सहारे चुनाव नहीं जीता जाता। उसमें वे सब शतरंजी गोटें भी बिछानी पड़ती हैं, जिससे अखिलेश यादव अनभिज्ञ हैं या जानबूझकर परहेज करते हैं। जाहिर सी बात है रार छिड़नी ही थी और जमकर छिड़ी। दोनो ओर से आरोप-प्रत्यारोप और घात-प्रतिघात का दौर षुरू हुआ। अन्ततः पुराने सपाई सफल हुए और मुलायम सिंह के आशीर्वाद से सक्रिय भी हो गये।

इस लड़ाई में विपक्षियों ने भी छौंक लगाना शुरू किया और तमाम अरोप जड़ दिये। विपक्षियों के वे सारे आरोप निराधार भी नहीं हैं सत्ता के शीर्ष पर बैठे अखिलेश यादव दूध के धुले हों, यह सम्भव भी नहीं है। लेकिन कम से कम एक नई शुरुआत तो अखिलेश ने की ही और एक नई राजनैतिक संस्कृति लाने का प्रयास भी किया। अब रहा सवाल चुनाव जीतने की तिकड़मों का तो पिछला चुनाव जो समाजवादी पार्टी हार गयी थी तब भी तो प्रबन्धन इन्हीं सिपहसालारों की हाथ में था, जो अब मुलायम के आषीर्वाद से फिर सक्रिय हो गये हैं।

ऐसे में अगर अखिलेश को पूरी छूट दी जाती तो शायद कुछ अच्छा देखने को मिलता। आखिर बिहार जैसे जंगल राज्य में नीतीश ने ऐसा कारनामा करके दिखाया ही जैसा अखिलेश अब उत्तर प्रदेष में करना चाहते हैं। हालांकि नई पारी में लालू यादव नीतीश के प्रयास को फिर से मटियामेट करने पर उतारू हैं, ऐसा दिख रहा है। इन परिस्थितियों में एक बात कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि कांग्रेस की नीतियों से असंतुष्ट मुलायम, लालू सरीखा जो नेतृत्व विभिन्न राज्यों में उभरा उसके अगर ऐसे ही कारनामे रहे तो भाजपा को उनका सफाया करते देर नहीं लगेगी। सच यह भी है कि कांग्रेस फिर भी खासी उदार है भाजपा से उदारता की यह उम्मीद ये क्षेत्रीय-क्षत्रप नहीं करें, वही उनके हित में होगा।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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