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गीतांजलि श्री को बुकर मिला, लेकिन प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री से बधाई तक न दी गई : रवीश कुमार

रवीश कुमार-

गीतांजलि श्री के परिवार की जड़ें गोड़उर गाँव में जमी हैं। यह गाँव यूपी के ग़ाज़ीपुर ज़िले के मुहम्मदाबाद तहसील में पड़ता है। मैनपुरी में उनके पिताजी पदस्थापित थे। उत्तर प्रदेश से किसी को इतना बड़ा सम्मान मिला, और इस प्रदेश में कोई हलचल तक नहीं हुई।

गीतांजलि श्री को बुकर मिला, क्या यह इतनी छोटी सी बात है कि प्रधानमंत्री से बधाई तक न दी गई। हाल में उन्होंने कहा कि वे पत्थर पर लकीर खींचते हैं। मक्खन पर नहीं। दरअसल गोदी मीडिया उनके लिए मक्खन तैयार कर देता है जिस पर वे आसानी से सवालों से बचते हुए लकीर खींच देते हैं। लेकिन हिन्दी के गौरव की फ़र्ज़ी राजनीति करने वालों कई लोगों से आज बधाई तक न दी गई। अच्छा है। ग़ाज़ीपुर के लोग भी ख़ुश होंगे, उस ख़ुशी में मुख्यमंत्री की बधाई शामिल नहीं है। यह बताना ज़रूरी है। यूपी के लिए यह कितनी बड़ी ख़बर है। लेकिन इस ख़बर को यूपी के युवा सपनों तक नहीं पहुँचने दिया गया।

इन सभी के बाद भी हिन्दी का गौरव बढ़ा है। आप सभी के लिए गौरव की बात है। राजकमल प्रकाशन, अशोक माहेश्वरी, सत्यानंद निरुपम, धर्मेंद्र, अलिंद सबको बधाई। इतने लंबे समय तक बाज़ार की चिंता किए बग़ैर एक लेखक की रचना से जुड़े रहना आसान नहीं होता होगा।

मेरे जैसे कितने लोगों ने लिखा है कि वे गीतांजलि श्री को पहले से नहीं जानते। यह शर्म की बात है और यह भी कि लोकप्रियता और बेल्ट सेलर के तमाम सुखों से दूर रह कर भी गीतांजलि लिखती रहीं और राजकमल छापता रहा। गीतांजलि श्री को दो महीना पहले जाना, यह कोई गर्व से बताने वाली बात नहीं है, लेकिन आज चंद घंटों में उन्हें जानने का मौक़ा मिला, यह बताने वाली बात तो है।

देखिए, यह वो पुरस्कार है जिसके लिए यूपी के मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री तक ने बधाई नहीं दी लेकिन जागरण को पता है कि यह ख़बर कितनी बड़ी है। इसलिए गीतांजलि श्री की ख़बर पहले पन्ने पर है। किसी और पन्ने पर इंटरव्यू है और संपादकीय पन्ने पर भी उनका लेख हैं।

विश्वदीपक-

अभी तक सिर्फ राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने गीतांजलि श्री को अंतर्राष्ट्रीय बुकर जीतने की शुभकामनाएं दी है. सत्ता धारी दल से अब तक तो किसी को नहीं देखा. संभवत: उनके लिए मायने भी नहीं रखता. हिंदी की उपयोगिता या मान सत्ता धारी लिए वहीं तक है, जहां तक वह राजनीतिक मकसद (सत्ता) हासिल करने का जरिया बन सके. जहां हिंदी में वह विचार या साहित्य आया जो सत्ता धारी दल की योजना को सूट नहीं करता, भारतीय प्रायद्वीप की सबसे बड़ी भाषा उनके लिए अछूत हो जाती है. समझ सकते हैं कि हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान का त्रियुग्म ऐसे ही नहीं रचा गया था.

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1 Comment

1 Comment

  1. महेन्द्र 'मनुज'

    May 28, 2022 at 7:35 pm

    आभार रवीश जी , हिन्दी को सम्मान देने में हिन्दी चबाने वाले राजनेता निस्सन्देह कृपणता दिखा रहे हैं , लेकिन प्राईम टाईम में आपने कोई कमी नहीं छोड़ी। गीतांजलि श्री /रेत समाधि के लिये जिनके पास दो शब्द भी हैं , वे सराहना के पात्र हैं।

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