कुमार कृष्णा-
सिर्फ चार सवाल-
1) भूमिहार जाति ने 1857 की लड़ाई में भाग क्यों नहीं लिया?
2) भूमिहार का शूद्र वर्ण में गिनती क्यों हुआ था?
3) भूमिहार किससे ब्राह्मिण (अयआचक) का दर्जा मांग रहे थे?
4) ब्राह्मण क्यूं भूमिहार की मांग का विरोध किये?

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ashutosh anand
May 3, 2023 at 1:48 pm
1865 तक भूमिहारो को military (सैन्य ) ब्राह्मण या मगही ब्राह्मण लिखा जाता था और बाभन भी ( फ्रांसिस बुकानन 1811 रिपोर्ट और रोबर्ट मौंटगोमेरी मार्टिन रिपोर्ट १८३८ का देखे ) . 1872 में उन्हें ब्राह्मण जनसख्या से अलग किया गया military (सैन्य ) इतिहास के कारन और बाभन नाम से दर्ज किया जाने लगा | 1911 में भूमिहार ब्राह्मण सभा ( बाभन ज़मींदारो की एक सभा ) के कारन बाभन नाम में भूमिहार brahman शब्द जुड़ा और १९११ के बाद जाती का नाम बाभन (भूमिहार ब्राह्मण ) लिखा जाने लगा अब बस भूमिहार ही बचा है इसलिए इतना उल्टा विकिपीडिया पे लिखा जा रहा है |
Anand
May 7, 2023 at 5:54 pm
The man who has vomited 4 questions has no sense of history and has definitely enmity with Bhumi Agrahar Brahman. He is not aware with genealogical history of Chankya and Pushymitra.
First, he should read a few ingenious researches on Indian history by Christopher Bayle and Anand Yang.
He must also go through British Report published as the Golden Book of India by Roper Lethbridge where in Bhumihar Brahmans have been called Ayachak Brahman.
He has mentioned 1857, the movement noted for massive revolt. This fellow should go through British records on Indian revolts.
After 1764, the Buxar battle, the first revolt was led by Raja of Chsmparsn, Yugal kishore, Fatah Sahi, king of Saran, etc by Bhumihars who are mentioned in Samual Charter Report only as Brahman kings.
This ignorant gentleman must read the autobiography of Warren Hastings where in
Hastings has called Military Brahmans led by Fatah Shah, Bhumihar Brahman as the greatest terror.
1857 : See records of Mangal Pandey,
Khusiyal Singh, Maigar Rai, Bheema Rai, etc.
Gajja Rai led revolt of 56th Nimachh Battalion.
Bhumihar Brahmans villages were targeted by British. Do you know the reason.
British supported them who supported them and wrote history in their favour.
Take a caste list of freedom fighters of Bihar from Bihar Archive.
Abstain from derogatory remarks.
Kamlendra
May 30, 2023 at 9:33 am
ब्रिटिश शासन के दौरान भूमिहार ब्राह्मण जो तब मुख्यतः मिलिट्री ब्राह्मण, बाभन, त्यागी, सरवरिया,आदि गौड़,अयाचक, भू देव एवम मगध ब्राह्मण कहे जाते थे..
ब्राह्मणो का भारत में युद्ध कौशल सिखाने का लम्बा इतिहास रहा है जिसमे पांडवो के गुरु रहे द्रोणाचार्य जिन्होंने मिलिट्री साइंस अर्थार्त धनुर्विद्या, युद्ध कौशल पांडवो को सिखाया था।
1857 में मंगल पांडेय द्वारा की कई पहली क्रांति को भी देश भली भांति जानता है। लेकिन जिस ब्राह्मण रेजिमेंट की आज बात हम कर रहे है उसे शायद ही कोई जानता हो।
ब्राह्मण केवल भारतीय सेना की दो वर्ग रेजिमेंटों में भर्ती होते हैं। भर्ती किया गया प्रकार शानदार काया का है; परेड में उनकी साफ-सफाई और चतुराई से उनकी नस्ल और नस्ल का गौरव झलकता है। वे अच्छे एथलीट, विशेषज्ञ पहलवान हैं, और ताकत के करतबों में उत्कृष्टता प्राप्त करते हैं; और साहस के लिए उनकी उच्च प्रतिष्ठा है।
पहली पूर्ण ब्राह्मण रेजिमेंट की शुरुआत वर्ष 1776 से हुई जिसको 30th बंगाल नेटिव इन्फेंट्री बटालियन के नाम से जाना जाता था। वहीं समय के साथ हुए बदलाव के साथ वर्ष 1901 में इसका नाम पहली बार 1st ब्राह्मण इन्फेंट्री पड़ा। 1Brahmans भारत की प्रोफेशनल सेनाओ में से एक थी जिसको उसकी आकर्षित वर्दी के लिए भी जाना जाता था।
1st Brahmans के साथ ही ब्रिटिश राज में 3rd Brahmans भी हुआ करती थी जोकि 1798 में गठित की गई थी। जिसे फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद दोनों रेजिमेंट भंग कर दिया गया था। यह पूर्वांचल के भूमिहार ब्राह्मण जो आज भी अपनी बहादुरी के कारण अपने नाम के साथ सिंह लिखते हैं, उनके लिए थी और उनकी संख्या इसमें 90% तक थी ।
.’इंडियंस इन द फर्स्ट वर्ल्ड वॉर’ के मुताबिक, 1857 के विद्रोह के बाद आर्मी में रिक्रूटमेंट की जो पॉलिसी बनाई गई वो एक कम्युनिटी को दूसरी कम्युनिटी से अलग करने के मकसद से बनाई गई थी। रेजिमेंट सिस्टम शुरू करने वाले अंग्रेजों ने यह पॉलिसी भी बनाई थी कि भर्ती एक ही जगह से न की जाए। इसके पीछे मकसद ये था कि किसी एक जगह से विद्रोह हो तो दूसरे को उसके खिलाफ खड़ा किया जा सके।
भारतीय सेना में 16 प्रतिशत ब्राह्मण हैं जो देश की रक्षा में अपना योगदान दे रहे …
Kamlendra
May 30, 2023 at 9:36 am
*भूमिहार समाज का देश के लिए योगदान*
पूरे झारखंड, बिहार व उत्तर प्रदेश में 72 लाख एकड़ ज़मीन भूमिहार समाज ने देश उत्थान हेतु दान कर दिया। इससे ये साबित होता है कि ये समाज कर्ण से भी बड़ा दानी है।
आज पूरे बिहार, उत्तर प्रदेश या झारखंड में जितनी भी भूमिहार बाहुल्य गाँव है वहाँ पर वर्तमान में जितनी भी दलित बस्तियाँ, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, मठ, मंदिर आज से लगभग 65 वर्ष पहले जिस ज़मीन पर बने है वो सब किसी न किसी भूमिहार के ही नाम का मिलेगा, आप चाहो तो कचहरी जाकर उनका खातियाँन या कुर्सिनामा निकलवा कर देख लो। ये बात उस समय की है जब 1951 में संत बिनोवा भावे ने भूदान नामक एक मुहिम चलाया था उस मुहिम के अन्तर्गत लोगो से ख़ासकर भूमिहार समाज आग्रह किया था की अगर *भूमिहार जमीदार* देश को आगे बड़ाना चाहता है तो दलित व अन्य पिछड़ो को बसने के लिए अपनी ज़मीन दान करो। स्कूल, अस्पताल, यूनिवर्सिटी, मठ, मंदिर के लिये भी अपनी ज़मीन दान करो क्योंकि सबसे बड़ी जमीदारी भूमिहार के पास थी और भूमिहार समाज ने उनके आग्रह को स्वीकार किया।
Kamlendra
May 30, 2023 at 9:41 am
क्रांतिकारियों का समर्थन करने वाली विद्रोही उच्च वर्गी जाति भूमिहार ब्राह्मण कि भर्ती प्रतिबंधित की गयी।
योद्धा जाति -1857 की क्रांति के बाद, ब्रिटिश कालीन भारत के सैन्य अधिकारियों बनाई गयी उपाधि थी। उन्होने समस्त जातियों को “योद्धा” व “गैर-योद्धा” जातियों के रूप मे वर्गीकृत किया था। उनके अनुसार, सुगठित शरीर व बहादुर “योदधा वर्ण” लड़ाई के लिए अधिक उपयुक्त था, जबकि आराम पसंद जीवन शैली वाले “गैर-लड़ाकू वर्ण” के लोगों को ब्रिटिश सरकार लड़ाई हेतु अनुपयुक्त समझती थी। हालांकि, योद्धा जातियाँ को राजनीतिक रूप से उप-प्रधान, बौद्धिक रूप से हीन माना जाता था, जिसमें बड़े सैन्य कमान के लिए पहल या नेतृत्व के गुणों का अभाव था। अंग्रेजों के पास उन भारतीयों को भर्ती करने की नीति थी, जिनकी शिक्षा तक कम पहुंच है क्योंकि उन्हें नियंत्रित करना आसान था।
सैन्य इतिहास पर आधुनिक इतिहासकार जेफरी ग्रीनहंट के अनुसार, “योद्धा जाति सिद्धांत में एक सुरुचिपूर्ण समरूपता थी। जो भारतीय बुद्धिमान और शिक्षित थे, उन्हें कायर के रूप में परिभाषित किया गया था, जबकि बहादुर के रूप में परिभाषित किए गए लोग अशिक्षित और पिछड़े थे”। अमिय सामंत के अनुसार, योद्धा जाति को भावात्मक भावना से चुना गया था, क्योंकि इन समूहों में एक विशेषता के रूप में राष्ट्रवाद का अभाव था। ब्रिटिश प्रशिक्षित भारतीय सैनिक उन लोगों में से थे जिन्होंने 1857 में विद्रोह किया था और उसके बाद, बंगाल सेना के कैचमेंट क्षेत्र से आए सैनिकों की अपनी भर्ती में लेना छोड़ दिया या कम कर दिया और एक नई भर्ती नीति बनाई, जिसमें उन जातियों का पक्ष लिया गया जिनके सदस्य ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादार थे।
1857 की क्रांति क्रांति मे सिपाही मंगल पांडे के नेत्रत्व मे बंगाल नेटिव इंफेंटरी ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध बगावत कर दी थी। बंगाल सैनिक बिहार व उत्तर प्रदेश के राजपूत, भूमिहार आदि लड़ाकू जतियों से भर्ती होते थे। जबकि ब्रिटिश बफादार पस्तून, पंजाबी, कुमायूनी, गोरखा व गढ़वाली सैनिकों ने विद्रोह में भागीदारी नहीं की थी व ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से लड़े थे। तब से लड़ाकू जाति की भर्ती में इन लोगों को प्राथमिकता दी जाने लगी व क्रांतिकारियों का समर्थन करने वाली विद्रोही जातियों कि भर्ती प्रतिबंधित की गयी।
Dilip Kumar
April 14, 2025 at 7:18 am
“प्रारंभिक ब्रिटिश भारतीय जनगणना में भूमिहारों को शूद्र वर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया था” — एक झूठा और ऐतिहासिक तथ्यों से रहित कथन है। आइए इसे ऐतिहासिक संदर्भ में देखें:
ऐतिहासिक तथ्य:
ब्रिटिश जनगणना और जाति वर्गीकरण:
1871 से शुरू होकर, ब्रिटिश भारत में जनगणना में जातियों का वर्गीकरण प्रारंभ हुआ था।
जातियों को ‘वर्ण’ के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति, पेशे, और स्थानीय परंपराओं के अनुसार वर्गीकृत किया गया।
जनगणना रिपोर्टों में जातियों की स्थिति पर स्थानीय लोगों की धारणाएं और ब्रिटिश अधिकारियों की अपनी समझ अधिक प्रभावी रही।
भूमिहार ब्राह्मणों की स्थिति:
भूमिहार समुदाय को भूमिहार ब्राह्मण कहा जाता रहा है, विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल क्षेत्र में।
ब्रिटिश जनगणना में भूमिहारों ने स्वयं को ब्राह्मण वर्ण का हिस्सा माना, और कई क्षेत्रों में उन्हें इसी रूप में स्वीकृति मिली।
उदाहरण के लिए, 1901 की जनगणना में कई स्थानों पर भूमिहारों को ब्राह्मणों की उपश्रेणी में रखा गया था।
जातीय आंदोलन और पहचान:
19वीं सदी के उत्तरार्ध और 20वीं सदी की शुरुआत में भूमिहार समुदाय ने अपनी ब्राह्मण पहचान के लिए आंदोलन भी किए और कई संगठनों की स्थापना की (जैसे भूमिहार ब्राह्मण महासभा)।
इसलिए यह कहना कि “भूमिहारों को शूद्र वर्ण में रखा गया था” ऐतिहासिक रूप से गलत, भ्रामक और बिना प्रमाण का कथन है।
यदि कोई इस तरह की बात कह रहा है, तो वह या तो:
ऐतिहासिक संदर्भों को गलत समझ रहा है,
या फिर सामाजिक-राजनीतिक कारणों से जानबूझकर गलत प्रचार कर रहा है।