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गंवई पत्रकारिता के इन दो शिखर पुरुषों बिजुरी मिसिर उर्फ बिज्झल बाबा और दशरथ मिसिर उर्फ घुट्ठन बाबा को प्रणाम बोलिए

Tarun Kumar Tarun : ये जो दो शख्स दिख रहे हैं, वे गंवई पत्रकारिता के शिखर पुरुष हैं। इनके नाम हैं- बिजुरी मिसिर उर्फ बिज्झल बाबा और दशरथ मिसिर उर्फ घुट्ठन बाबा!! जब आधुनिक सनसनीधर्मी टीवी पत्रकारिता हमारे गप्प-रसिक मरुआही गांव तक नहीं पहुंची थी तब वहां की गंवई पत्रकारिता का बोझ बिज्झल जी और घुट्ठन जी के कंधे पर रहा। यहां तक कि गांव में हर तरह की इलाकाई, प्रांतीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता के सूत्रधार भी यही दोनों भाई रहे। मजाल किसी का कोई उनकी सौ फीसदी कपोल काल्पनिक गप्प को सच खबर मानने से इनकार कर दे।

घुट्ठन बाबा से ही बचपन में सुना था कि जब जहाज गांव के ऊपर से गुजरता है तो यात्री संडासी कर्म से मुक्त होने लगते हैं। बिज्झल बाबा और घुट्ठन बाबा ने ही बताया था कि प्रधानमंत्री का कच्छा धोने का जिम्मा मुख्यमंत्री का होता है/ कि हिरोइन टायलट नहीं जाती हैं/ मुहम्मद रफी ने लता को डुएट गाते वक्त कनखी मार दी थी/ कि राष्ट्रपति को रिजर्व बैंक से कभी भी दो चार सूटकेस रुपया निकालने की छूट होती / कि मरने के बाद लता मंगेशकर का गला भारत सरकार जब्त कर लेगी/ कि प्रधानमंत्री को खाने में रोज मोहनभोग और पुआ दिया जाता है/ कि जहां नोट छपता है वहां सभी को सिर्फ कच्छा पहनकर ड्यूटी करनी पड़ती है / कि राष्ट्रपति को तीन खून माफ होता है आदि आदि।

इंदिरा हत्याकांड, सिख विरोधी दंगों, बाबरी ध्वंसन, भागलपुर दंगा आदि पर उनकी आंचलिक रिपोर्टिंग के सामने बीबीसी, वायस आफ जर्मनी, आकाशवाणी भी फीके पड़ गये। पढ़े लिखे शहराती युवक बीच में टोकाटोकी करते तो अपने सर के सफेद बाल दिखाकर उसे चुप करना भी नहीं भूलते। वे खुद खबर कहां से जुटाते, किसी को पता नहीं। उन्हें किसी ने न अखबार पढ़ते देखा न रेडियो सुनते देखा ! महापुरुषों की जो कहानियां साहित्य व इतिहास में नहीं मिलतीं, वे उनके पास हुआ करतीं। जबकि पढ़ाई में अव्वल फिसड्डी रहे। जोगिन, भूत प्रेत, चुड़ैल, गोली बंदूक, जमीन विवाद, टीबी, दमा, खुजली आदि से जुड़ी सभी गंवई खबरों पर इनका कापीराइट होता।

किसका दामाद फंटूस निकल गया, कौन गबरे, ढाबे या राहर के खेत में किससे अंखियां लड़ा रहा है या कौन बुढ़ापे में भी जवानी का सुख ले रहा है या कौन औरत मरदमराई हो गई है या कौन औरत पति के सीने पर चढ़कर मूंग दल रही है, इन तमाम खबरों की खोजी पत्रकारिता के स्रोत यही रहे। दो चार दिनों के भीतर जमीन को लेकर जिनके बीच गोलियां चलने वाली है, या कहां नौ हाथ का चौंकिया सांप देखा गया, इन तमाम रोमांचक खबरों को ब्रेक इनकी पत्रकारिता ही करती थी। मतलब तब के इंडिया टीवी या न्यूज नेशन आदि वे ही थे! आजकल के लौंडे अब इनकी पत्रकारिता की कीमत नहीं समझते पर हमारी यादों में तो उसका रोमांच आज भी जिंदा है।

बिज्झल बाबा सालों से सुगर की चपेट में हैं, श्राद्ध की जलेबी, रसगुल्ला और बूंदिया को ब्राह्मण फर्ज मानकर त्यागने को तैयार नहीं हैं। यहां तक कि डाक्टर को भी समझा आए कि चाशनी में डूबने के बाद बूंदिया और जलेबी की मधुमेह फैलाने की ताकत जीरो हो जाती है। घुट्ठन बाबा बिहार में शराब और ताड़ी पर प्रतिबंध से हलकान, परेशान हैं। उनका ज्यादा वक्त शराब ताड़ी के कड़क विकल्पों पर शोध और भांग-गांजा के झुरमुटों की तलाश में बीतता है। इन तमाम जटिलताओं के बीच उनकी गंवई पत्रकारिता आज भी जिंदा है। आप सब उनकी उम्रदराजी की कामना कीजिए! (फोटो क्रेडिट : सोनू कुमार सिंह, मरुआही)

पत्रकार तरुण कुमार ‘तरुण’ के फेसबुक वॉल से.

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