गंवई पत्रकारिता के इन दो शिखर पुरुषों बिजुरी मिसिर उर्फ बिज्झल बाबा और दशरथ मिसिर उर्फ घुट्ठन बाबा को प्रणाम बोलिए

Tarun Kumar Tarun : ये जो दो शख्स दिख रहे हैं, वे गंवई पत्रकारिता के शिखर पुरुष हैं। इनके नाम हैं- बिजुरी मिसिर उर्फ बिज्झल बाबा और दशरथ मिसिर उर्फ घुट्ठन बाबा!! जब आधुनिक सनसनीधर्मी टीवी पत्रकारिता हमारे गप्प-रसिक मरुआही गांव तक नहीं पहुंची थी तब वहां की गंवई पत्रकारिता का बोझ बिज्झल जी और घुट्ठन जी के कंधे पर रहा। यहां तक कि गांव में हर तरह की इलाकाई, प्रांतीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता के सूत्रधार भी यही दोनों भाई रहे। मजाल किसी का कोई उनकी सौ फीसदी कपोल काल्पनिक गप्प को सच खबर मानने से इनकार कर दे।

आह आकाशवाणी, वाह आकाशवाणी…

लिखने और फिर छपने के चस्का लगने के दिन थे.. उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर पर स्थित बलिया में हिंदी साहित्य की पढ़ाई करते वक्त कलम ना सिर्फ चल पड़ी थी..बल्कि उसे राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में जगह भी मिलने लगी थी..तब के गांव आज की तुलना में कहीं ज्यादा गांव थे..ललित निबंधकार विवेकी राय के शब्दों को उधार लूं तो देसज गांव…जिसमें उसका भूगोल ही नहीं, अपनी सोच और संस्कृति भी समाहित होती थी…तब के गांवों में रोजाना देसी चूल्हे से उठता धुआं भी उन दिनों के गांवों को प्रदूषित नहीं कर पाया था.

‘गांव कनेक्शन’ टीवी शो और अख़बार के लिए पत्रकारों की जरूरत

देश के उभरते ग्रामीण अख़बार ‘गांव कनेक्शन’ की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। आम आदमी की आवाज उठाने और गांव की बदलती कहानियों को लोगों के सामने लाने के लिए अख़बार ने अपने ढाई वर्ष के छोटे के कार्यकाल में पत्रकारिता के सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयनका और दो लाडली मीडिया ऑवार्ड जीते हैं। हाल ही में जर्मन मीडिया हाउस ‘डायचे विले’ ने दुनियाभर से 4800 नामांकनों में से ‘गांव कनेक्शन’ की वेबसाइट (www.gaonconnection.com) को 14 अंतराष्ट्रीय प्रविष्टियों में चुना है। यह भारत से इस कैटेगरी में एक मात्र नामांकन है।

बांध परियोजना के नाम पर गांव उजड़ेंगे, करोड़ों के वारे-न्यारे होंगे तभी विकास की धारा बहेगी

PUNYA

जिस दिन वोट पड़ेंगे उस दिन हम उजड़ जायेंगे। कोई नेता, कोई मंत्री, कोई अधिकारी इस गांव में झांकने तक नहीं आता। छह महीने पहले तक गांव में हर कोई आता था। छह महीने पहले चुनावी बूथ भी गांव में बना था। छह महीने पहले मिट्टी की दीवार पर लगा पंतप्रधान नरेन्द्र मोदी का पोस्टर तो अभी भी चस्पा है। लेकिन पीढ़ियों से जिस मिट्टी की गोद पर सैकड़ों परिवार पले बढे उनके पास सिर्फ 15 अक्टूबर तक का वक्त है। हमारी खेती छिन गयी। हमारा घर गया। बच्चो को लगता है घूमने जाना है तो वह अपनी कॉपी किताब तक को बांध रहे हैं। बुजुर्गो को लगता है उनकी सांस ही छिन गयी।