बिलकिस बानो के दोषियों के धर्म की बात नहीं की अखबारों ने

ईवीएम की गड़बड़ी और शिकायत से संबंधित नियम 49एमए जानने लायक है

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को गुजरात सरकार को आदेश दिया कि वह बिलकिस बानो को 50 लाख रुपये मुआवजा, नौकरी व घर मुहैया कराए। बिलकिस 2002 के गुजरात दंगों के दौरान सामूहिक दुष्कर्म की शिकार हुई थीं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को गुजरात सरकार ने सूचित किया कि इस मामले में चूक करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। पेंशन लाभ रोक दिए गए हैं और बांबे हाई कोर्ट ने जिस आइपीएस अफसर को दोषी माना है, उसे दो रैंक डिमोट किया गया है।

दरअसल, बिलकिस ने पूर्व में राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित पांच लाख रुपये का मुआवजा लेने से इन्कार कर दिया था और दृष्टांत बनने लायक मुआवजा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। इस पर शीर्ष कोर्ट ने 29 मार्च को राज्य सरकार से कहा था कि वह चूक करने वाले सभी अफसरों पर दो हफ्ते में अनुशासनात्मक कार्रवाई करे। पिछली सुनवाई में बिलकिस की वकील शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। इनमें से एक आईपीएस अफसर इसी साल रिटायर होने वाले हैं और चार अन्य जो रिटायर हो चुके हैं, उनकी पेंशन व अन्य सेवानिवृत्ति लाभ रोकने की कार्रवाई नहीं की गई है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, तीन मार्च 2002 को अहमदाबाद के समीप रनधिकपुर गांव में भीड़ ने पांच माह की गर्भवती बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया था और परिवार के सदस्यों पर हमला किया था। अहमदाबाद में सुनवाई शुरू हुई। बिलकिस द्वारा गवाहों और सीबीआई के सुबूतों को नुकसान पहुंचाने की आशंका जताने के बाद शीर्ष कोर्ट ने अगस्त 2004 में यह मामला मुंबई स्थानांतरित कर दिया। विशेष कोर्ट ने 21 जनवरी 2008 को 11 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई व पुलिसकर्मी और डॉक्टरों सहित सात लोगों को बरी कर दिया। हाई कोर्ट ने चार मई 2017 को पांच पुलिसकर्मी और दो डॉक्टरों सहित सात को दोषी ठहराया। 10 जुलाई 2017 को दो डॉक्टरों और चार पुलिसकर्मियों की अपील खारिज कर दी गई थी, जबकि एक अधिकारी ने अपील नहीं की थी (दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर प्रकाशित प्रेट की खबर)।

नवभारत टाइम्स की खबर

यह खबर कितनी महत्वपूर्ण और अनूठी है यह बताने की जरूरत नहीं है। खासकर इसलिए कि आतंक फैलाने की आरोपी, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सत्तारूढ़ दल यानी भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार बनाए जाने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने धर्म के आधार पर हिन्दुओं का बचाव किया है। अमित शाह के हवाले से लिखा गया है, “…. हिंदू टेरर के नाम से एक फर्जी केस बनाया गया था, दुनिया में देश की संस्कृति को बदनाम किया गया, कोर्ट में केस चला तो इसे फर्जी पाया गया।” तथ्यात्मक रूप से यह गलत है फिर भी शाह यहीं नहीं रुके।

आगे कहा, “ …. सवाल ये भी है कि स्वामी असीमानंद और बाकी लोगों को आरोपी बनाकर फर्जी केस बनाया तो समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट करने वाले लोग कहां है, जो लोग पहले पकड़े गए थे, उन्हें क्यों छोड़ा।” इस मामले में तथ्य यह है कि अदालत ने जांच एजेंसी के काम पर असंतोष जताया है पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह कह चुके हैं कि सरकार ऊंची अदालत में अपील नहीं करेगी जबकि बिलकिस बानो के मामले में खबर है कि बांबे हाईकोर्ट ने (जब मामला राज्य के बाहर स्थानांतरित हुआ) ने कार्रवाई करने वाले पुलिस अफसरों को सबूत मिटाने और दूसरे मामलों में दोषी पाया, राज्य सरकार ने इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रिटायर हो चुके और रिटायर होने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है।

ऐसी हालत में पूरी खबर नहीं छापने और खबर को महत्व नहीं देने का मतलब आप समझते हैं। वह भी तब जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, “…. कांग्रेस की साजिश उजागर हुई है। देश ने उन्हें सबक सिखाने का मन बना लिया है। उन्होंने जिन्हें आतंकवादी कहा है, वे अब जग चुके हैं। हिंदुओं के साथ आतंकवाद जोड़ दिया, इसलिए (राहुल गांधी) जहां हिंदू ज्यादा हैं, वहां चुनाव नहीं लड़ सकते। इसलिए ऐसी जगह भागे हैं, जहां हिंदु कम हैं। 5,000 साल पुरानी सभ्यता पर कांग्रेस ने कलंक लगाने का काम किया है।” यहां गौरतलब है कि बिलकिस बानो से बलात्कार और बलात्कारियों को बचाने के दोषी कौन हैं? मेरे ख्याल से ज्यादातर एक ही धर्म के लोग हैं और यह सबूत है कि इस धर्म के लोग ऐसा कर सकते हैं। निचली अदालत में यह पकड़ में नहीं आया था। ऐसे में निचली अदालत के फैसलों पर प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के बयान और उसे गलत साबित करने का मौका अखबारों ने इस तरह क्यों जाने दिया? क्या यह साधारण चूक है?

आइए, देखें यह खबर किस अखबार में कितनी छपी है। दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान और नवोदय टाइम्स में यह खबर छोटी डबल कॉलम है। क्या है वह आप अपने अखबार में देखिए। मैं उसकी बात करता हूं जहां यह नहीं है। नवभारत टाइम्स में आज पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है। यह खबर चार लाइन की है कि जो दरअसल सूचना है कि यह खबर अंदर पेज 11 पर है। लेकिन अंदर भी यह खबर सिंगल कॉलम में ही है। तीन लाइन का शीर्षक और 15 लाइन की खबर। इस खबर में भी चार लाइन की यह सूचना है , “सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को गुजरात सरकार ने बताया कि मामले में दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ ऐक्शन लिया जा चुका है।”

अमर उजाला में सिंगल कॉलम में सूचना है कि यह खबर अंदर के पन्ने पर है। अंदर यह खबर दो लाइन के शीर्षक के साथ टाप पर है। दैनिक जागरण में यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में हैं। राजस्थान पत्रिका में यह खबर दो कॉलम में है। इसके साथ दोषी पुलिस अफसरों पर भी कार्रवाई शीर्षक से सिंगल कॉलम की एक खबर है। इसमें बताया गया है कि बांबे हाईकोर्ट द्वारा सबूत मिटाने के दोषी ठहराए गए आईपीएस आरएस भगोरा को दो रैंक पदावनत किया गया है और भगोरा 31 मई को रिटायर होने वाला है। अखबार ने यह भी बताया है कि शीर्ष अदालत ने गुजरात सरकार को दो सप्ताह में अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। यानी यह कार्रवाई भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर की गई है। अंग्रेजी अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में दो कॉलम में और हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम में है। द टेलीग्राफ ने इसे लीड बनाया है और प्रमुखता से बताया है कि गुजरात में यह घटना नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुई थी।

टेलीग्राफ का पहला पन्ना

ईवीएम की गड़बड़ी और नियम 49एमए
टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर एक और खबर प्रमुखता से छापी है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने भी इसे खासा महत्व दिया है। खबर है, मतदान के दौरान ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत। ईवीएम में गड़बड़ी की यह शिकायत अपने असली रूप में द टेलीग्राफ में है। इससे पहले ऐसी ही शिकायत सोशल मीडिया पर एक अनाम चुनाव अधिकारी के हवाले से एक पोस्ट के रूप में आई थी। पत्रकार साथी नितिन ठाकुर ने इसे पोस्ट किया था। शिकायत इस प्रकार है, “इस बार भी चुनाव में ड्यूटी लगी है। ट्रेनिंग में वोटर वेरिफाइड बैलेट पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीबीपीएटी) से परिचय कराया गया जिसके बारे में आप जानते ही होंगे। सवाल-जवाब के क्रम में कहा गया कि ये फुल प्रूफ मशीन है जिसमें कोई खराबी आ ही नहीं सकती।

अगर प्रिंट वगैरह की गलती हो तो वो हमारी गलती होगी कि हमने मशीन ठीक से नहीं रखी, वरना मशीन में सिर्फ एक ही खराबी आ सकती है कि उसका चार्ज खत्म हो जाए। अगर कोई वोटर ये कंप्लेन्ट करता है कि उसने जो बटन प्रैस किया पर्ची पर उस नाम की जगह कुछ और दिखा तो हमें उस वोटर को हड़काने के लिए कहा गया है। कहा गया कि उसे बताइए झूठा आऱोप लगाने के जुर्म में उसे जेल हो सकती है और जुर्माना भी होगा, पर (सवाल है कि) अगर वोटर अपनी बात पर टिका रहे तो क्या करे तो जवाब (मिला कि) ‘अपने स्तर पर हैंडल करो’ ऐसा कहा गया। मुझे ये बात जम नहीं रही ये कैसा वैरिफिकेशन है जो जबरन वैरिफाई करने को कह रहे हैं। चुनाव यहां 11 को हैं उसके बाद ही पता चलेगा कि स्थिति क्या रही पर वोटर के एक्यूज़ेशन (आरोप) को वैरिफाई करने का कोई तरीका ही नहीं है, ये बात गलत लग रही है। यहां तक कि चैलेंज्ड वोट के केस भी प्रिसाइडिंग अफसर की डायरी में नोट होते हैं, ऐसे केस के लिए कोई पेपरवर्क भी नहीं है।

हिन्दी अखबारों ने इसे तो खबर नहीं ही बनाया। कल की शिकायत भी आज पहले पन्ने पर नहीं दिखी। किसी एक में छोटी-मोटी रही हो तो नहीं कह सकता जबकि टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, वोट के बारे में शिकायत करना जोखिम भरा है। बैंगलोर डेटलाइन से पहले पन्ने की इस प्रमुख खबर में बताया गया है कि मतदान से संबंघित एक नियम 49एमए वैसे तो 2013 से अस्तित्व में है पर इसके बारे में बहुत कम लोगों ने सुना होगा। वैसे ही जैसे मतदाता एबिन बाबू के बारे में उनके करीबियों के अलावा बहुत कम लोगों को जानकारी होगी। इस नियम के अनुसार अगर कोई मतदाता शिकायत करे कि उसने वोट किसी को दिया और पर्ची किसी और की बनी तो उसे टेस्ट वोट करने का विकल्प इसका खामियाजा बताने के बाद दिया जा सकता है। और शिकायत करने का असर यह होगा कि साबित न होने पर (टेस्ट वोट से ही) उसे गिरफ्तार करके मुकदमा चलाया जा सकता है और दोषी पाए जाने पर छह महीने की जेल और 1000 रुपए का जुर्माना हो सकता है।

केरल की राजधानी में जहां शशि थरूर अपनी सीट बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं वहां के मतदाता 21 साल एबिन बाबू को इस कानून की जानकारी बड़ी महंगी पड़ी। केरल के तिरुवनंतपुरम में ही एक अन्य बूथ पर प्रीजा शिजु ने इस मामले में जोखिम न लेने का निर्णय किया और बच गईं। हालांकि उनकी शिकायत भी यही थी। एबिन के मामले में टेस्ट वोट उनके खिलाफ गया औऱ उन्हें गिरफ्तार कर जमानत पर छोड़ा गया। प्रीजा की हिचक के आलोक में राजनीतिक दलों ने पूछा है कि क्या यह नियम अंततः मतदाताओं को डराने वाला नहीं बन जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट।

पत्रकार के सवाल पर अखिलेश यादव ने आपा खोया

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