How can you रोक?

सुशांत झा-

‘How can you रोक?’ दरअसल हिंग्लिश का मैनपुरी अनुवाद है और वही भारत की वास्तविकता है। हमें धर्मेंद्र यादव को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने इतने साहस के साथ ‘हाऊ कैन यू रोक’ कहा। कई बार नेताओं के माध्यम से राष्ट्र की वास्तविकता बोलती है और ऐसा ही इस वाक्य में हुआ है।

भारत के लोग ऐसी ही अंग्रेजी जानते हैं और बमुश्किल एक प्रतिशत आबादी शिव नाडर स्कूल जैसे संस्थानों में पढ़ती है। हाल तो ये है कि पटना- दरभंगा के अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े बच्चों को भी दिल्ली-मुंबई वाले अपने टाइप नहीं मानते, क्योंकि उनके एक्सेंट से लेकर मैनर्स तक कमजोर होते हैं। कुछ-कुछ वैसा ही जैसे बिहार या पूर्वांचल वालों की हिंदी का हाल तक मौज लिया जाता था।

हाऊ कैन यू रोक और हिंग्लिश में थोड़ा ही अंतर है। ‘हाऊ कैन यू रोक’ अपने चरित्र में उपरिगामी है. जबकि दिल्ली-मुंबई वालों टाइप की हिंग्लिश अधोगामी है। मेरा दोस्त कहता है कि ‘मी तो बहुत थका हुआ हूं और माई फ्लैट इज खाली ऑन शनिवार और वी कैन डू माछ-भात की पार्टी’, तो इसे कूल समझा जाता है, लेकिन हाऊ कैन यू रोक को खराब समझा जाता है!

ये कॉलोनियल मानसिकता है। दूसरी बात, धर्मेंद्र जी यादव न होते, फर्ज कीजिए वे वरुण गांधी होते तो क्या लोग इस बात पर इतनी मौज लेते? मुझे संदेह है।

आई थिंक, भारत की 50-60 फीसदी आबादी ये अंग्रेजी आसानी से समझ लेगी। हमारे बहुत सारे ऑफिसों में ऐसी ही भाषा चलती है। आईटी वाले बंदे से बात करिए तो वो ऐसी अंग्रेजी सुनाएगा कि दिन बन जाएगा। लेकिन वो अपने काम में परफेक्ट है।

अमेरिका में आपसे कोई नहीं पूछता कि आप कितनी शुद्ध भाषा बोलते हैं। आपका काम मान लीजिए कूकिंग है, या सेल्स का है या मैथ पढ़ाना है, तो वही मायने रखता है। अंग्रेजी तो टूटी-फूटी सब बोल लेते हैं।

ये भारत में ही है कि सब को शुद्ध अंग्रेजी चाहिए। भले ही शुद्ध हिंदी या कन्नड़ न बोलने आए। दिल्ली में ही सैकड़ो जगहों पर अशुद्ध हिंदी के साइनबोर्ड होंगे, लेकिन बहुत सारे सज्जन देख कर निकल जाते हैं। कोई उस विभाग को मेल तक नहीं करता। लेकिन अशुद्ध अंग्रेजी से मानो महारानी एलिजाबेथ का दिल टूट जाता है!
लंबी गुलामी खुद से घृणा करना सिखा देती है। भारत में इसकी जड़े इतनी गहरी हैं कि उसका ठीक से आकलन तक नहीं हुआ है। लड़ाई और समाधान तो दूर की बात है। संभवत: गांधी पहले राजनेता थे जिन्होंने इसकी थोड़ी सी मैपिंग की थी।

इस देश के हजारो-हजार इंजिनीयर, आईटी वाले, डिप्लोमा वाले, हेल्थकेयर स्टाफ, नर्सिंग स्टाफा, कूकिंग स्टाफ, ड्राइवर ऐसी ही अंग्रेजी जानते हैं। अमेरिकन एक्सेंट वाली अंग्रेजी तो प्रणब मुखर्जी भी नहीं जानते थे।

तो धर्मेंद्र यादव को बधाई दीजिए और गर्व से बोलिए ‘हाऊ कैन यू हिम्मत तो मजाक हिम?’



 

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