एक था केजरीवाल… एक थी आम आदमी पार्टी…

Sheetal P Singh : आम आदमी पार्टी…  वे चौराहे पर हैं और उनकी याददाश्त जा चुकी है। चौराहे पर कोई साइनबोर्ड नहीं है न किसी क़िस्म का मील का पत्थर! भारतीय मध्यम वर्ग के २०११-२०१७ के दौरान जगमगाये और बुझ रहे दियों के मानिंद दिवास्वप्न हैं। उनकी समस्यायें अनंत हैं पर उनमें संभावनायें भी कम नहीं पर निश्चित ही वे एक ऐसी बारात हैं जिनमें कोई बूढ़ा नहीं जो बिना साइनबोर्ड के चौराहे पर फँस जाने पर रास्ता सुझा सके। उन्होंने ऐतिहासिक काम हाथ में लिये पर उनके सारे काम अधूरे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य में उनके आउट आफ बाक्स फ़ैसलों से वामपंथी तक एकबारगी चकरा गये पर उनके पास फालोअप न था और ब्यूरोक्रेसी वे पहले ही मोदी के हाथ LG को हार चुके थे।

वे किसी से भी पंगा ले लेते हैं बड़े दुस्साहसी हैं। बड़े अंबानी पर FIR कर दी और छोटे की बिजली कंपनी के पसीने छुड़ा दिये। हम जैसे सारी दुनिया में फैले उनके हजारों शुभचिंतक किंकरतव्यविमूढ़ हैं क्योंकि उनसे संवाद का कोई रास्ता उपलब्ध नहीं है। उन्होंने ऐसा तंत्र बना लिया है जिसमें जनतंत्र के अलावा सबकुछ पहुँच गया है और अब तो वे ख़ुद कबूल रहे हैं कि “षड्यंत्र” तक हो रहा है। कंपनियों और राजनैतिक दलों में फ़र्क़ होता है, होना चाहिये, शायद यह सबक उन तक नहीं पहुँचा। वे करिश्माई हैं ऐसा सोचने के बहुत से कारण हैं पर इधर काफ़ी दिनों से उनसे कोई करिश्मा न हुआ। हमदर्द हूँ तो बीते कई दिनों से कई लोग मुझसे भी तमाम सवाल कर रहे थे। मैं उनके अन्दरूनी फ़ैसलों का privy नहीं हूँ, जो लिखा वह मेरा नितांत निजी आकलन है! फिर भी फिलवक्त वे जैसे भी हैं बड़े ज़रूरी हैं क्योंकि चारों तरफ़ कहीं कुछ नहीं है!

Asrar Khan : कुछ ही दिनों में ढहती हुई इमारत आम आदमी पार्टी के सरदार केजरीवाल को अभी कुमार विश्वास की जरूरत है… क्योंकि कुमार विश्वास बहुत अच्छा गाते हैं और बहुत ही अच्छी भाषा शैली में भाषण भी देते हैं… अच्छे मास लीडर की तरह राहगीरों को भी अपनी सभा में खींच लेते हैं.. लेकिन जिस दिन केजरीवाल को कोई इनसे भी बड़ा गवैय्या मिल जाएगा उस दिन इनकी भी धुनाई बाउंसरों से कराई जाएगी… और तब ‘फूट डालो राज करो’ फार्मूले के सबसे आधुनिक खलीफा योगेन्द्र भी इनके आगे घास नहीं डालेंगे…

Nitin Thakur : लोग किसी को जितनी जल्दी कंधे पर चढ़ाते हैं उतनी ही जल्दी उतार फेंकते हैं। अरविंद केजरीवाल के साथ ठीक वही हो रहा है। ये बात सब जानते हैं कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, सो एक सामान्य मुख्यमंत्री जितनी ताकत दिल्ली के मुख्यमंत्री को नहीं मिलती। ये भी अधिकांश को पता होगा कि खुद शीला दीक्षित सीएम थीं तो दिल्ली पुलिस की हीलाहवाली से परेशान होकर सोनिया गांधी से शिकायत करने जाती रहती थीं। ये बात बीजेपी के समर्थक मेरे परिचित भी मानते हैं कि केजरीवाल की छवि में डेंट लगाने के लिए AAP के विधायकों को हर चिंदी मामले में जेल की हवा खिलाई जा रही है, जो अभूतपूर्व है। ये सब पता होकर भी दिल्ली के लोगों का केजरीवाल से मोहभंग होने लगा है। वहीं बीजेपी ने अपनी साइबर सेना को केजरीवाल की छवि पहले ‘भगौड़ा’ और फिर’ ‘बहानेबाज़’ की बनाने का नया टास्क असाइन किया है। प्रिंट और वेब मीडिया में एक खास रुझानवाला तबका भी अरविंद के खास एंगल वाले फोटो ही खबर में लगाता दिख जाएगा। इन तस्वीरों में कहीं अरविंद आक्रामक से दिखेंगे तो कहीं खांसते या उबासी लेते।

ये वही मीडिया है जिन्हें पीएमओ से प्रधानमंत्री की छंटी हुई तस्वीर लगाने को मिलती है ताकि वो हमेशा स्मार्ट और चुस्त-दुरुस्त नज़र आएं। नाम छोटा करके ‘कजरी’ या ‘केजरी’ बोलना-लिखना सुविधा का कम, अपमान करने की नीयत का मामला ज़्यादा लगता है। कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ही जानती हैं कि जनता के धैर्य की एक सीमा होती है। 49 दिन की केजरीवाल सरकार गिरने के बाद बीजेपी ने लोगों को दो बातें समझाने की पूरी कोशिश की थी। नंबर एक तो ये कि इनके बस का स्थायी सरकार देना नहीं है। नंबर दो ये कि AAP मौकापरस्त है क्योंकि जिस कांग्रेस के खिलाफ वो चुनाव लड़ी, बाद में उसी के बाहरी समर्थन से सरकार बना ली। बीजेपी ने ये कभी नहीं बताया कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में AAP को कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की चुनौती उन्होंने ही दी थी। वो तो मोदी लहर में भी दिल्ली ने बीजेपी पर भरोसा जताया नहीं और केजरीवाल टीम के आक्रामक प्रचार ने अपना मैसेज ठीक से पहुंचा दिया। अब फिर से बीजेपी वही खेल खेलने में लगी है। अमित शाह ने परसों कह ही दिया कि एमसीडी के बाद अब उनकी नज़र दिल्ली की सरकार पर है। ऐसे में कोई शक नहीं कि केजरीवाल की परीक्षा और कड़ी होने जा रही है। खुद वो भी पार्टी को जैसे चला रहे हैं उसे काबिले तारीफ नहीं कहा जा सकता पर फिक्र उस जनता की ज़्यादा हो रही है जो कांग्रेस और बीजेपी के थके हुए विकल्पों के बाद नए लोगों पर भरोसा कर रही थी। ऐसा ना हो कि पुराने घाघ अपनी चालों में कामयाब हो जाएं और लोगों को बरगलाकर फिर सत्ता पर काबिज़ हो जाएँ।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, असरार खान और नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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