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झारखंड

कोर्ट ने कुरान बांटने वाली शर्त को फैसले से हटाया

जमानत के लिए पवित्र कुरान बांटने की शर्त का विरोध होने पर रांची की एक अदालत ने अपने फैसले में बदलाव करते हुए कुरान बांटने वाली शर्त को फैसले से हटा दिया है।अदालत ने कथित आक्रामक फेसबुक पोस्ट को लेकर गिरफ्तार की गई एक कॉलेज छात्रा को कुरान की प्रतियां दान करने की शर्त पर जमानत देने के अपने आदेश में बुधवार को संशोधन किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीष कुमार सिंह ने रिचा भारती को सशर्त जमानत दी थी और कहा था कि वह कुरान की एक प्रति पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में स्थानीय अंजुमन कमेटी और चार अन्य प्रति शहर के विभिन्न पुस्तकालयों को दान करे।

अदालत के इस आदेश की सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हुई ।बुधवार को अदालत ने अपने आदेश में संशोधन किया और छात्रा को सात हजार रुपये की जमानत राशि और इतनी ही राशि के दो मुचलकों पर नियमित जमानत दे दी। न्यायिक मजिस्ट्रेट मनीष कुमार सिंह ने जमानत की शर्त के रूप में कहा कि एक जमानती रांची से और दूसरा जमानती याचिकाकर्ता का रिश्तेदार होना चाहिए।
सोशल मीडिया पर एक धर्म विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार हुई एक छात्रा को रांची की कोर्ट ने सशर्त जमानत दी थी। शर्त थी कि आरोपी को पवित्र कुरान की पांच प्रतियां बांटनी होंगी।

आरोपी ऋचा भारती ने ऐसी सजा के बाद विरोध जताते हुए कहा था कि वह कुरान नहीं बांटना चाहती हैं। मामले पर अच्छा-खासा विवाद होने के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में संशोधन करते हुए कुरान बाटंने की शर्त को हटा लिया है।
गौरतलब है कि फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी की शिकायत के बाद पुलिस ने ऋचा भारती को गिरफ्तार कर लिया था और उन्हें जेल भेज दिया गया था। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद शनिवार को लोगों ने थाने के बाहर धरना-प्रदर्शन किया था। मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने ऋचा को सशर्त जमानत दे दी थी।इस मामले के जांच अधिकारी यानी पिथोरिया थाने के ऑफिसर-इन-चार्ज ने याचिका में कहा था कि कुरान बांटने की शर्त को लागू करवाने में समस्या है इसलिए इसे हटा दिया जाए। जांच अधिकारी की याचिका को सरकार की ओर से सहायक लोक अभियोजक ने फॉरवर्ड करते हुए कोर्ट से अपील की थी कि वह अपने इस फैसले में संशोधन करे।

धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में कोर्ट केस का सामना कर रही एक युवती के सामने कुरान बांटने की शर्त रखने के मैजिस्ट्रेट के फैसले पर कानूनी जानकार बंट गए हैं। एक ओर कहा जा रहा है कि मैजिस्ट्रेट ने सौहार्द बढ़ाने के लिए ऐसा किया है जबकि दूसरी ओर कहा जा रहा है कि मैजिस्ट्रेट को सीआरपीसी के प्रावधान के हिसाब से ही शर्त लगानी होती है।

सीआरपीसी के प्रावधान के तहत इस तरह की जमानत की शर्त नहीं लगाई जा सकती है। अगर मामला जमानती हो तो मैजिस्ट्रेट सिर्फ बेल बॉन्ड भरवाकर जमानत देता है। अगर मामला गैर जमानती हो और तब जमानत दी जा रही हो तो फिर मैजिस्ट्रेट को सीआरपीसी के प्रावधान के हिसाब से ही शर्त लगानी होती है। मसलन जमानत पर छूटने के बाद आरोपी शिकायती को धमकी नहीं देगा या उससे संपर्क की कोशिश नहीं करेगा, गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेगा, सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा। कोर्ट को बिना बताए शहर या देश नहीं छोड़ेगा आदि लेकिन कुरान बांटने की शर्त सीआरपीसी के प्रावधान के बाहर की बात है।
विधि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मैजिस्ट्रेट इस तरह की शर्त नहीं लगा सकता। सिर्फ उच्चतम न्यायालय और हाई कोर्ट को असीम अधिकार मिले हुए हैं और कई बार उच्चतम न्यायालय और हाई कोर्ट अपने फैसले में कम्युनिटी सर्विस आदि का आदेश देते हैं। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एक डॉक्टर को 100 पेड़ लगाने का आदेश दिया, लेकिन ये आदेश पर्यावरण और कम्युनिटी सर्विस के लिए है।

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