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उत्तर प्रदेश

यूपी में जंगलराज : …उस ग़रीब की किस्मत पर अगले दिन थानेदार ने ‘अपहरणकर्ता’ लिख दिया!

Sheetal P Singh : यह एक सौ प्रतिशत सच्ची कथा है… सत्ताइस बरस के दलित / पिछड़े शासन के बावजूद किसी दलित / पिछड़े की यूपी में कितनी सुनवाई है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं…उ०प्र० के अवध क्षेत्र के एक गाँव में एक मल्लाह परिवार एक ठाकुर साहब की जायदाद पर (जंगल और नदी का तट) हाड़तोड़ मेहनत से कुछ बँटाई की खेती और कुछ जंगली उत्पाद (जलाऊ लकड़ी) आदि के संयोजन पर जीवित है। पति पत्नी और कुछ बच्चे!

<p>Sheetal P Singh : यह एक सौ प्रतिशत सच्ची कथा है... सत्ताइस बरस के दलित / पिछड़े शासन के बावजूद किसी दलित / पिछड़े की यूपी में कितनी सुनवाई है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं...उ०प्र० के अवध क्षेत्र के एक गाँव में एक मल्लाह परिवार एक ठाकुर साहब की जायदाद पर (जंगल और नदी का तट) हाड़तोड़ मेहनत से कुछ बँटाई की खेती और कुछ जंगली उत्पाद (जलाऊ लकड़ी) आदि के संयोजन पर जीवित है। पति पत्नी और कुछ बच्चे!</p>

Sheetal P Singh : यह एक सौ प्रतिशत सच्ची कथा है… सत्ताइस बरस के दलित / पिछड़े शासन के बावजूद किसी दलित / पिछड़े की यूपी में कितनी सुनवाई है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं…उ०प्र० के अवध क्षेत्र के एक गाँव में एक मल्लाह परिवार एक ठाकुर साहब की जायदाद पर (जंगल और नदी का तट) हाड़तोड़ मेहनत से कुछ बँटाई की खेती और कुछ जंगली उत्पाद (जलाऊ लकड़ी) आदि के संयोजन पर जीवित है। पति पत्नी और कुछ बच्चे!

ठाकुर साहब के जंगल में एक दो कमरे का पक्का घर और इस मल्लाह परिवार का झोपड़ा है। कुछ सैकड़ा जंगली और कुछ दर्जन इमारती दरख़्त और साथ बहती नदी। एक दुबे जी यहाँ लकड़ी के ठेकेदार के तौर पर नमूदार हुए। उनके बेरोजगार बेटे और उसके कुछ दोस्त पक्के घर में जम गये और जंगली लकड़ी कटवाने लगे। बियाबान देखकर उन्होंने एक कुटीर उद्योग भी डाल लिया। पड़ोस के जिले से एक “पकड़” कर लाये और साथ डाल लिया। पकड़ के बाप ने हाल ही में जमीन बेची थी सो दुबे जी के सपूत और उनके गैंग ने पचीस लाख की फिरौती तय कर ली।

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मल्लाह परिवार इस ठेकेदार क्लब को भोजन सप्लाई करता और बचत से अपने बच्चों का पेट भरता। एक रात पुलिस आई। दुबे जी के सपूत को फोन आ चुका था वे तो फुर्र हो गये पर पुलिस मल्लाह को ले गई। ठोंका और किसी क़िस्म की घूस दे पाने में अक्षम बेगुनाह को तीसरे दिन अपहरणकर्ताओं के साथ मुलज़िम क़रार दे दिया। मजिस्ट्रेट सिर्फ पुलिस का लिखा पढ़ते हैं आदमी का माथा नहीं! सो पैंतालिस बरस नदी किनारे किसी तरह ज़िन्दा रहने के बाद पहली बार मल्लाह को पता लगा कि जेहल क्या होती है, मुक़दमा और वक़ील क्या होता है? वक़ील जमानत की फ़ीस लेता है। फ़ीस केस की धारा के हिसाब से होती है और हज़ूर लोगों के पास किसी मजलूम की फ़रियाद सुनने का बखत नहीं होता।

दुबे गैंग फ़रार है वह कोर्ट में सुविधानुसार समर्पण करेगा। उत्तर प्रदेश के करीब ३५ बरस से पत्रकार (मान्यताप्राप्त) ने जिले के कप्तान साहेब को चालान से पहले तथ्य बता दिये थे पर साहब को उस समय नींद आ रही थी। वे सो गये और उस ग़रीब की क़िस्मत पर अगले दिन थानेदार ने “अपहरणकर्ता” लिख दिया जिसने शायद पच्चीस हज़ार रुपये भी एक साथ आजतक अपने हाथ में न पकड़े हों! मल्लाह की बीबी जमानत के लिये वक़ील की फ़ीस भरने के लिये आस पड़ोस में हफ़्ते भर से चन्दा और रहम माँग रही है। मैं पोस्ट लिख रहा हूँ, नेता जी परिवार का झगड़ा सुलझा रहे हैं, बीजेपी राम जी की चिंता में है, मायावती मुसलमानों की चिंता में!

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लेखक शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और मूलत: सुल्तानपुर के निवासी हैं. उनका यह लिखा उनकी एफबी वॉल से लिया गया है.

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