कल्पेश याग्निक के मुश्किल वक्त में भास्कर समूह ने उनका साथ न दिया!

Sheetal P Singh : अब तक की पुलिस जाँच और मीडिया में हुई रिपोर्टस से पता चला है कि मृत्यु से करीब सप्ताह भर पहले इंदौर के आला पुलिस अफ़सर को कल्पेश ने एक शिकायत सौंपी थी जिसमें उन्हे यौन उत्पीड़न के एक मामले में फँसा दिये जाने का संदेह था! उक्त पुलिस अफ़सर ने यह बात भास्कर के मालिकों को बता दी थी! Continue reading

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कल्पेश याग्निक ने छत से कूद कर आत्महत्या की?

Sheetal P Singh

कल्पेश याग्निक ने आत्महत्या की है। उनके शरीर में मल्टीपल फ़्रैक्चर हुए हैं। वे संभवत: छत से कूद कर मरे हैं। हार्ट अटैक से सीढ़ियों पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त होने की खबर मैनेजमेंट ने फैलाई है जिसके प्रमुख सुधीर अग्रवाल ने बीस साल की अनवरत सेवा और आल एडीशन संपादक होने के बावजूद बीते करीब दस दिन से उन्हें मुलाक़ात का समय तक नहीं दिया! Continue reading

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वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिताजी लालता प्रसाद सिंह का निधन

स्वर्गीय लालता प्रसाद सिंह

अमर उजाला, इंडिया टुडे, चौथी दुनिया समेत कई अखबारों मैग्जीनों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिता जी लालता प्रसाद सिंह का मास्को में निधन हो गया. वे 92 वर्ष के थे. उनका काफी समय से इलाज चल रहा था और हर बार वह स्वस्थ होकर घर लौट आते थे. इस बार वह अस्वस्थ हुए तो अस्पताल से वापस नहीं लौट पाए. वह अपने पीछे दो पुत्र और एक पुत्री समेत नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. इन दिनों वह मास्को में अपने छोटे बेटे के यहां रह रहे थे.

शीतल पी. सिंह पिता जी की मृत्यु की खबर सुनते ही मास्को के लिए रवाना हो गए. कल पार्थिव शरीर के साथ वह लोग भारत आएंगे और संभव: परसों अपने गृह जिले सुल्तानपुर पहुंचेंगे. पिता लालता प्रसाद सिंह बेहद उदात्त चेतना के शख्स थे. वे हल्थ सर्विसेज में कार्यरत रहे. रिटायरमेंट के बाद वह सुल्तानपुर जिले के कादीपुर तहसील स्थित अपने गांव सराय कल्यान के निवास करते रहे. साथ ही साथ दिल्ली से लेकर मास्को तक अपने पुत्रों के यहां आते-जाते रहे. उनके निधन पर उनके पुत्र शीतल पी. सिंह और उनको जानने-चाहने वाले पत्रकार असरार खान ने फेसबुक पर जो लिखा वह इस प्रकार है–

Sheetal P Singh : पिता बहुत अस्वस्थ थे। कल शाम (22 सितंबर) उनकी आख़िरी शाम थी! बहुत जुझारू रहे। चार दशक मधुमेह के साथ निकाल गये। कई अस्पतालों को छकाया। छोटे भाई के यहाँ मास्को में थे बीते तीन महीने से। वापसी के दिन ब्रेन स्ट्रोक हुआ। मैं भी पता लगते ही आया। पिछले महीने मिलकर गया ही था।

Asrar Khan : प्रिय साथी शीतल सिंह और अभिन्न मित्र बीपी सिंह के पिता परम आदरणीय श्री लालता प्रसाद सिंह जी अब इस दुनिया में नहीं रहे… इस दुःखद समाचार को सहने की ताकत तो मुझमें नहीं है क्योंकि मेरे भी पिता की तरह थे और विचारों से इतना प्रगतिशील और आधुनिक थे कि सहज ही हम उन्हें मित्र और कामरेड भी समझते थे…. सच तो यह है कि एक साधारण व्यक्ति के रूप में वे एक महात्मा थे जो किसी भी महत्वाकांक्षा से परे विशाल ह्रदय वाले मानवता नैतिकता और उच्च आदर्शों एवं व्यवहार के प्रेरणाश्रोत थे… उनकी कमी कभी पूरी नहीं होगी… इन्हीं शब्दों के साथ मैं अतुलनीय व्यक्तित्व के धनी प्रिय पिता जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं…

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रवीश ने अपने ब्लाग और पोस्ट से चुनौती दी- साबित करो कि यह फोटोशाप नहीं है!

Sheetal P Singh : बूसी बसिया. कल गौरी लंकेश को इसाई बताकर खारिज किया गया था, सबूत में उनके दफ़नाये जाने को उत्तर भारत के कुपढ़ समाज के मूढ़ मष्तिष्क में ठोंसा गया और यह भी कहा गया कि वे केरल की संघ कार्यकर्ताओं की हत्या के पक्ष में लिख रही थीं!

इन अफ़वाहों को कल तथ्यों के जरिये जमींदोज किया गया। लगभग हर परिचित संघी दीवाल पर जाकर मैंने चुनौती दी कि क्या आप जानते हैं कि लिंगायत और तमाम अन्य (ग़ैर मुस्लिम / इसाई) शवों को दफ़नाते हैं? सबूत माँगा तो इसाई होने पर अफवाह का ट्वीट मिला। पत्रिके को पैट्रिक बता कर मूर्ख उत्तर भारतीय संघी समर्थकों का ऊपरी माला चाटा जा रहा था । रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी किसी अफवाहबाज ने माफ़ी नहीं माँगी!

केरल के संघी कार्यकर्ताओं की हत्या के समर्थन की अफवाह पर उनकी पत्रिका के एक रेखाचित्र को पेश किया गया! मैंने पूछा कि यह तो ओणम विवाद का रेखाचित्र है तो अफवाहबाज फ़रार! आज नये हथियार आगे किये गये हैं! रवीश कुमार के एक फ़र्ज़ी बयान को (जिसमें वे मोदी जी को गुंडा कह रहे हैं) उड़ाया गया जिसे ख़ुद रवीश ने अपने ब्लाग और पोस्ट से चुनौती दे दी कि साबित करो कि यह फोटोशाप नहीं है! इसके बाद इसी तर्ज़ के कुछ नये चुटकुले दरपेश हैं ! संघियों झूठ के पैर नहीं होते ! बूसी बसिया।

Avinish Mishra : समर शेष है। कोई समाज कब शिकारी बन जाता है? और कब कबिला से निकलकर चांद पर पहुँच जाता है. ये चंद लम्हों का खेल नहीं है.. मानव सभ्यता का ये विकास वर्षों के अनेक घटना/खोज/रिसर्च के बाद हुआ है। हम मानव बर्बरता से सभ्यता की ओर आएँ. इतना ही नहीं भारत सभ्यता और संस्कृति में पूरे विश्व धरोहर में सबसे आगे रहा।

जरा सोचिए! महमूद गजनी से लेकर अंग्रेज तक और गौरी से लेकर मुगल सल्तनत तक ना जाने कितने लूटेरे भारत आए. अपना सम्राज्य स्थापित किए. सभ्यता को कुछ हद तक नष्ट भी करने की पूरी कोशिश की. मगर हमारी सनातन सभ्यता जस की तस रही. वसुधैव कटुंबकम का ध्येय अटल रहा. मगर आजादी के 70 साल बाद बुद्ध और गांधी के इस देश को क्या हो गया है? एक साल पहले मैंने एक लेख लिखा था सियासत से ज्यादा अब मुझे आम आदमी से डर लगता है. ये बात आज भी प्रासंगिक है.

जरा सोचिए! एक भीड़ निहत्थे को मारती है और भीड़ का कुछ हिस्सा उस मौत पर जश्न मनाती है. अब सवाल ये की हम कहां जा रहे हैं? सभ्यता से बर्बरता की ओर? भीड़ को कौन लोंग शह दे रहे हैं? वही लोंग जो मौत पर जश्न मना रहे है. समाजवैज्ञानिक रॉस ने कहा था- “भीड़ के लिए जो एक पल नायक होता है वही दूसरे पल पीड़ित हो जाता है।” फ्रांस क्रांति के समय रॉब्सपियर ने भीड़ की सहायता से आतंक राज कायम कर लिया मगर वही भीड़ एक समय उसे गिलस्टीन पर चढ़ा दिया। इस भीड़ को पहचानिये.. इन लोगों को पहचानिये जो दूसरों की मौत पर जश्न मना रहे है? ये कौन लोंग है? क्या ये लोंग आपके अगल बगल में तो नहीं है? क्या ये आपके मरने के बाद जश्न नहीं मनाएँगे? सोचिए! दिनकर ने लिखा है..
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उसका भी अपराध।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और अविनीश मिश्रा की एफबी वॉल से.

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जब केजरी पार्टी ‘पीटी’ जा रही थी तो कांग्रेसी उपदेश देते थे, अब कांग्रेसी ‘मारे’ जा रहे तो आपिये आइना दिखाने लगे!

Sheetal P Singh : अनुभवी लोग… अहमद पटेल पर बन आई तो अब बहुतों को लोकतंत्र याद आ रहा है ………आना चाहिये पर शर्म भी आनी चाहिये कि जब बीते ढाई साल यह बुलडोज़र अकेले केजरीवाल पर चला तब अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेसी राज्यपाल के अधिकारों के व्याख्याकारों की भूमिका में क्यों थे? जब एक बेहतरीन अफ़सर राजेन्द्र कुमार को सीबीआई ने बेहूदगी करके सिर्फ इसलिये फँसा दिया कि वह केजरीवाल का प्रिंसिपल सेक्रेटरी था तब भी लोकतंत्र की हत्या हुई थी कि नहीं? जब दिल्ली के हर दूसरे आप विधायक को गिरफ़्तार कर करके पुलिस और मीडिया परेड कराई गई तब भी यमुना दिल्ली में ही बह रही थी! तब कांग्रेसी बीजेपी के साथ टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को अनुभवहीन साबित कर रहे थे! अब अनुभव काम आया?

मोदी जी व अमित शाह की जोड़ी इस देश के हर मानक को चकनाचूर करके एक तानाशाह राज्य के चिन्ह स्थापित कर रही है। इनकम टैक्स ई डी सीबीआई आदि नितांत बेशर्मी से स्तेमाल किये जा रहे हैं। फिलवक्त इनकम टैक्स ने कर्नाटक के उस मंत्री के यहाँ छापा मारा है जिसके यहाँ गुजरात के कांग्रेसी विधायकों को पोचिंग से बचाकर रक्खा गया है! इंदिरा / संजय की तानाशाही का भी एक दौर था! कांग्रेस को वहाँ तक पहुँचने में कई दशक लग गये थे ये डिजिटल पार्टी है सो बुलेट स्पीड से हर पड़ाव पार कर रही है।

पत्रकार से उद्यमी फिर आम आदमी पार्टी के नेता बने शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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दिल्ली में लाइट गई तो बिजली कंपनियां देंगी जनता को जुर्माना

Sheetal P Singh : दिल्ली में बिजली कंपनियों पर जुर्माना लगेगा! दिल्ली में दो घंटे तक लगातार बिजली कटौती की स्थिति में संबंधित बिजली कंपनी पर भुक्तभोगी उपभोक्ता के अकाउंट में दस रुपये प्रति किलोवॉट आवर (rs 10 KWH) जमा करने का जुरमाना लगेगा। यह नियम अब लागू हो रहा है। सारी बाधाएँ दूर हो गईं। केजरीवाल सरकार ने हाईकोर्ट से लेकर विभिन्न मंचों पर इस मुद्दे पर कड़ी लड़ाई लड़ कर जीत हासिल की।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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हिप्पोक्रेट मोदी भक्त अभिनेत्री काजोल की बीफ पार्टी पर चुप्पी क्यों साधे हैं?

Sheetal P Singh : काजोल के पति अजय देवगन तमाम संघी प्रोफ़ाइलों के heartthrob हैं। वे बालीवुड के उस क्लब से आते हैं जो मोदी जी / बीजेपी/संघ/हिंदुत्व / कश्मीर / नक्सल / जे एन यू आदि पर उनके मन की बात कहता / लिखता है। काजोल को मोदी सरकार ने प्रसार भारती बोर्ड की सदस्यता का उपहार दिया है।

अजय देवगन का नाम कुख्यात “पनामा पेपर्स ” में भी है जिस पर भारत में कोई कार्रवाई नहीं हुई पर तमाम यूरोपीय देशों सहित पाकिसतान में वहाँ के सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तगड़ा हल्ला बोला। नवाज शरीफ़ तक इसके लपेटे में आये हुए हैं। पनामा पेपर्स अवैध विदेशी खातों की एक फ़ेहरिस्त का नाम है!

ख़बर काजोल की एक “लंच पार्टी” की है जो भक्तों का ज़ायक़ा बिगाड़ देगी। काजोल और उनकी कई दोस्त जिस ख़ास डिश पर चीख रही हैं वह “बीफ” से बनी है। यह गौमांस या भैंसमांस में से एक होगा। “बीफ” दोनों के लिये प्रयुक्त होता है। काजोल ने ट्वीट कर कहा है कि यह “भैंस माँस” था।

इस ख़बर को यहाँ प्रस्तुत करने की वजह है संघी “hypocrisy”! क्या संघी भगतमंडल अजय देवगन और उनके राजनैतिक दोस्तों से इस सच के सामने आने पर विलग हो सकता है / घृणा कर सकता है जो एक मेवाती मुस्लिम पशुपालक की हत्या पर जश्न मनाता है? ताजी सूचना के मुताबिक काजोल ने फेसबुक लाइव पर से वीडियो को डिलीट कर दिया है. पूरी खबर यूं है, जो जनसत्ता डाट काम से साभार लेकर यहां प्रकाशित की जा रही है…

बॉलीवुड अभिनेत्री काजोल ने दोस्तों संग की बीफ पार्टी, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो

बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री काजोल ने रविवार को अपने फेसबुक पेज पर एक वीडियो पोस्ट किया है जो धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में काजोल अपने दोस्तों के साथ लंच पार्टी में नजर आ रही हैं। काजोल ने फेसबुक लाइव कर ये वीडिये बनाया है। वीडियो में काजोल बता रही हैं कि वो और उनकी सहेलियां उनके एक दोस्त के यहां लंच पर इकट्टा हुई हैं। काजोल अपने इस वीडियो में बता रही हैं कि उनके दोस्त रेयान ने लंच में कुछ बेहद खास बनाया है। इसके बाद काजोल का कैमरा सीधे प्लेट पर रखे बाउल की तरफ जाता है। बाउल में वही खास चीज रखी गई है जो काजोल के दोस्त ने बनाया है। बॉलीवुड अभिनेत्री के दोस्त रेयान उस बाउल में कुछ रसा सा डालते हैं। रेयान को ऐसा करता देख वहां मौजूद काजोल समेत उनकी सहेलियां काफी उत्साहित नजर आ रही हैं। काजोल एक बार फिर से कैमरे को बाउल में रखी उस डिश की तरफ से हटाकर अपने चेहरे पर लाती हैं। उसके बाद काजोल अपने दोस्त को कैमरे पर बुलाती हैं और उनसे कहती हैं कि आप सबको बताइए कि आपने ये कौन सी डिश बनाई है।

काजोल के इस सवाल का जो जवाब मिला वही इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने का कारण बन गया है। लोग काजोल के फेसबुक वॉल पर इस वीडियो को देख अपने-अपने तरह से प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। दरअसल जब काजोल ने अपने दोस्त से उस डिश के बारे में पूछा तो उनके दोस्त ने बताया कि ये बीफ है। वीडियो में जब काजोल के दोस्त बीफ की उस डिश के बारे में बता रहे थे तब काजोल काफी उत्साहित भी नजर आईं। काजोल ने वीडियो खत्म करते समय कहा कि चलिए अब मुझे अपने हाथ खाने की उस बाउल में बिजी करने हैं इसलिए अब मैं ये वीडियो बंद कर रही हूं।

जहां पूरे देश में इस वक्त बीफ को लेकर ऐसा माहौल बन गया है कि जिसका नाम भी उससे जुड़ता है वो विवादों में आ ही जाता है। साल 2015 में तो बीफ खाने के शक में अखलाक नाम के एक शख्स को लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला था।हालत ऐसी हो गई है कि बीफ खाने को लेकर कोई भी खुल कर बात करने से कतरा रहा है। ऐसे में काजोल के इस वीडियो ने सोशल मीडिया हलचल बढ़ा दिया है। लोग इस वीडियो को शेयर कर रहे हैं। कुछ ऐसे यूजर्स भी हैं जो वीडियो को शेयर करते हुए लिख रहे हैं- राष्ट्रवादी हीरो अजय देवगन जी की बीवी काजोल राष्ट्रवादी बीफ खाती हुई।

वहीं कुछ यूजर्स ऐसे भी हैं जो वीडियो को शेयर करते हुए सवाल पूछ रहे हैं कि क्या बीफ खाने वाली काजोल भी राष्ट्र विरोधी हैं। सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ता देख काजोल में अपने फेसबुक पेज से ये लाइव वीडियो हटा लिया है, लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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सुभाष चंद्रा ने केजरीवाल पर मानहानि का मुकदमा ठोंका, कोर्ट ने नोटिस भेजा

Sheetal P Singh : सुभाष चन्द्रा ‘जी’ टेलिविज़न के विभिन्न अवतारों के मालिक हैं। इसके अलावा इनके तरह तरह के बिज़नेस हैं! पता चला कि उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र हरियाणा और कुछ अन्य जगहों पर इनकी कंपनियाँ बड़ी सड़कों के निर्माण का काम भी करती हैं जो आजकल की मंदी के दौर में दुधारू गाय है! वे ख़बरों के जरिये ब्लैकमेल के एक आरोपी भी हैं पर देश के उन समर्थ लोगों में हैं जिन्हे क़ानून पकड़ने से पहले परिभाषा बदल लिया करता है!

कहावत है कि पैसा मेहनत / ईमान / नैतिकता से नहीं कमाया जाता! सुभाष जी के पास बहुत पैसा है! फ़िलहाल केजरीवाल ने इन्हें वह कह दिया था जो मैं इस पोस्ट में नहीं कह रहा हूँ! आज उस अदालत ने जो इनको ब्लैकमेल के मामले में सीखचों के पीछे न ठेल पाई , इनकी मानहानि करने के आरोप में केजरीवाल को नोटिस कर दिया है। केजरीवाल हमारी आपकी तरफ़ से बहुत से ऐसे लोगों की मानहानि करते रहते हैं जिनको हम भी गरियाना चाहते हैं पर बचते हैं, जेल तक जा चुके हैं, फिर जा सकते हैं, डरते नहीं, ज़िद्दी हैं…. वे केजरीवाल जो हैं!

वरिष्ठ पत्रकार और ‘आप’ नेता शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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पंजाब और गोवा में ‘आप’ दिल्ली जैसा चमत्कार करने जा रही!

Sheetal P Singh : पंजाब में सारा स्थानिक प्रिंट मीडिया और टीवी चैनल खुला “पेड न्यूज़” है। “आप” वालों की करीब तीस बड़ी सभाएँ रोज़ हो रही हैं। इनमें से चार पाँच विशाल और फैसलाकुन होती हैं। जवाब में कांग्रेस की दस के आसपास और अकाली बीजेपी की चार पाँच हो रही हैं।

कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर के अलावा किसी के लिये कोई कौतूहल नहीं है और बीजेपी अकाली युति की सभायें फ्लाप हो रही हैं पर स्थानिक मीडिया में यह अस्पष्ट है। कल अमृतसर में रविंदर सुलतानविंड ने इसे साफ़ किया। RTI activist और आप के असफल टिकटार्थी रविंदर का छोटा भाई एक स्थानीय दैनिक का रिपोर्टर है, ने बताया कि बिना “पैकेज” के मीडिया यहाँ किसी को कवर नहीं करता।

खैर, दिल्ली की तरह आप की लहर तैयार हो रही है पंजाब में, मीडिया की खुली आपराधिक होस्टिलिटी के बावजूद। सिवाय जालंधर और अमृतसर के लगभग हर जिले में अंधड़ तैयार है। आज यहाँ बारिश हो रही है पर यह भी आती हुई आँधी को रोक न पायेगी, कुछ देर का ब्रेक भले ही ले ले!

रही बात कैप्टन की तो लांबी में जमानत ज़ब्ती की ओर और पटियाला में बहुत कड़ी लड़ाई में ख़ुद अपनी सीट पर फँसे हुए हैं। मालवा (पंजाब) में ‘आप’ नेता भगवंत मान का जलवा है। मालवा में पंजाब की कुल ११७ में से ६५ सीटें हैं। मान यहाँ तूफ़ान हैं। उन पत्रकारों / चैनलों को एक बार फिर अपना थूका चाटने को मजबूर करती सनद जिन्होंने तथाकथित सर्वेक्षण में “आप” को कुल बारह सीट और तीसरा स्थान देकर श्वानभक्ति में अव्वल हासिल किया हुआ है।

गोवा में “आप” की सभाओं में जबरदस्त भीड़ हो रही है। गोवा में दो हज़ार लोग किसी सभा में आ जुटें तो वह सुपर हिट मानी जाती है। लेकिन ‘आप’ की सभाओं में जोरदार भीड़ है। गोवा में भी कुछ अप्रत्याशित हो रहा लगता है। कुल चालीस सीटों के लिये केन्द्रीय सरकार के इक्कीस मंत्रियों के प्रचार कार्यक्रम यह बताते हैं कि रक्षा मंत्री के गृहराज्य में भी भाजपा की घबराहट से हवा टाइट है।

पंजाब और गोवा में लगातार सक्रिय रहकर हवा का रुख भांप रहे वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी में जंगलराज : …उस ग़रीब की किस्मत पर अगले दिन थानेदार ने ‘अपहरणकर्ता’ लिख दिया!

Sheetal P Singh : यह एक सौ प्रतिशत सच्ची कथा है… सत्ताइस बरस के दलित / पिछड़े शासन के बावजूद किसी दलित / पिछड़े की यूपी में कितनी सुनवाई है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं…उ०प्र० के अवध क्षेत्र के एक गाँव में एक मल्लाह परिवार एक ठाकुर साहब की जायदाद पर (जंगल और नदी का तट) हाड़तोड़ मेहनत से कुछ बँटाई की खेती और कुछ जंगली उत्पाद (जलाऊ लकड़ी) आदि के संयोजन पर जीवित है। पति पत्नी और कुछ बच्चे!

ठाकुर साहब के जंगल में एक दो कमरे का पक्का घर और इस मल्लाह परिवार का झोपड़ा है। कुछ सैकड़ा जंगली और कुछ दर्जन इमारती दरख़्त और साथ बहती नदी। एक दुबे जी यहाँ लकड़ी के ठेकेदार के तौर पर नमूदार हुए। उनके बेरोजगार बेटे और उसके कुछ दोस्त पक्के घर में जम गये और जंगली लकड़ी कटवाने लगे। बियाबान देखकर उन्होंने एक कुटीर उद्योग भी डाल लिया। पड़ोस के जिले से एक “पकड़” कर लाये और साथ डाल लिया। पकड़ के बाप ने हाल ही में जमीन बेची थी सो दुबे जी के सपूत और उनके गैंग ने पचीस लाख की फिरौती तय कर ली।

मल्लाह परिवार इस ठेकेदार क्लब को भोजन सप्लाई करता और बचत से अपने बच्चों का पेट भरता। एक रात पुलिस आई। दुबे जी के सपूत को फोन आ चुका था वे तो फुर्र हो गये पर पुलिस मल्लाह को ले गई। ठोंका और किसी क़िस्म की घूस दे पाने में अक्षम बेगुनाह को तीसरे दिन अपहरणकर्ताओं के साथ मुलज़िम क़रार दे दिया। मजिस्ट्रेट सिर्फ पुलिस का लिखा पढ़ते हैं आदमी का माथा नहीं! सो पैंतालिस बरस नदी किनारे किसी तरह ज़िन्दा रहने के बाद पहली बार मल्लाह को पता लगा कि जेहल क्या होती है, मुक़दमा और वक़ील क्या होता है? वक़ील जमानत की फ़ीस लेता है। फ़ीस केस की धारा के हिसाब से होती है और हज़ूर लोगों के पास किसी मजलूम की फ़रियाद सुनने का बखत नहीं होता।

दुबे गैंग फ़रार है वह कोर्ट में सुविधानुसार समर्पण करेगा। उत्तर प्रदेश के करीब ३५ बरस से पत्रकार (मान्यताप्राप्त) ने जिले के कप्तान साहेब को चालान से पहले तथ्य बता दिये थे पर साहब को उस समय नींद आ रही थी। वे सो गये और उस ग़रीब की क़िस्मत पर अगले दिन थानेदार ने “अपहरणकर्ता” लिख दिया जिसने शायद पच्चीस हज़ार रुपये भी एक साथ आजतक अपने हाथ में न पकड़े हों! मल्लाह की बीबी जमानत के लिये वक़ील की फ़ीस भरने के लिये आस पड़ोस में हफ़्ते भर से चन्दा और रहम माँग रही है। मैं पोस्ट लिख रहा हूँ, नेता जी परिवार का झगड़ा सुलझा रहे हैं, बीजेपी राम जी की चिंता में है, मायावती मुसलमानों की चिंता में!

लेखक शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और मूलत: सुल्तानपुर के निवासी हैं. उनका यह लिखा उनकी एफबी वॉल से लिया गया है.

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केजरीवाल से डरी भाजपा यूपी के साथ गुजरात में भी विस चुनाव कराने के पक्ष में!

Sheetal P Singh : ब्रेकिंग न्यूज़… डेटलाइन गुजरात… गुजरात में एक साल पहले पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों के साथ हो सकते हैं विधानसभा चुनाव। TV चैनलों के “ब्लैक आउट” और राष्ट्रीय प्रिंट मीडिया की घबराई रिपोर्ट्स के बावजूद केजरीवाल की सूरत के योगी चौक पर पहली रैली लगभग पूरी शांति से कामयाब हो गई। कुछ युवकों ने काले झंडे लहराये पर उन्हे बिलकुल भी स्थानीय समर्थन नहीं मिला। इसके पहले आप विधायक और गुजरात प्रभारी गुलाब यादव को मंच पर गिरफ्तार करके टीवी की ख़बर बनाने का अमित शाह का प्लान (आप नेता अंकित लाल के ट्वीट के अनुसार) भी धरा रह गया।

गुलाब यादव ने दिन में ही रैली के पाँच घंटे पहले सूरत पुलिस को खुद समर्पण कर इस स्कीम को फेल कर दिया। संयोग ही है कि गुजरात आप के अध्यक्ष कनु कलसारिया यादव हैं और गुजरात प्रभारी भी गुलाब यादव! हालाँकि गुजरात में यादव कुल तीन फ़ीसद ही हैं पर आप की गुजरात में ग़ैर ब्राह्मण छवि (सूरत बीजेपी के एक विधायक के आरोप के अनुसार) उसे एक नया राष्ट्रीय कलेवर दे सकती है। कनु कलसारिया गुजरात में सम्मानित नाम हैं।

गुजरात “आप” में बड़े रेडिकल क़िस्म के दलित और ग़ैर ब्राह्मण नेतागण हैं। ब्राह्मणों के एक संगठन ने इस कारण केजरीवाल का कड़ा विरोध भी किया। अहमदाबाद में काले झंडे दिखाने वाले इसी संगठन के थे। पाटीदार अनामत आंदोलन (पटेल समुदाय का) के साथ तो केजरीवाल ख़ास संबंध बनाते दिख रहे हैं। सूरत का योगी चौक (जहाँ सभा हुई) पाटीदारों का गढ़ है। यहाँ कोई भी नेता सभा करने से पहले सौ बार सोचता है। अमित शाह डर कर दो किलोमीटर दूर सभा करने गये थे पर केजरीवाल का यहाँ से गुजरात में श्रीगणेश करना (सफलतापूर्वक) बड़े दूर की कौड़ी है।

कांग्रेस के एक पार्षद महोदय के साथ कल दिन में बातचीत हो रही थी। उन्होंने माना कि “गुजरातियों में कारोबार में मंदी के कारण और तमाम कारणो से पाटीदार आंदोलन दलित आंदोलन और पिछड़ा वर्ग के आंदोलन में लोगों की भारी संख्या दर्ज हो रही है जिसे केजरीवाल कैस कर सकता है क्योंकि उनकी लीडरसिप के पास कोई प्रोग्राम ही नहीं है गुजरात में!”

भाजप (गुजराती भाजपा को भाजप ही कहते हैं) गुजरात में बहुत मज़बूत पार्टी है। २०१४ में इसे करीब ५९% वोट मिले थे। पर मोदी जी के दिल्ली पहुँचने के बाद इसके खिलाफ जन आक्रोश बहुत बड़े पैमाने पर ज़ाहिर हो रहा है। हालाँकि यूपी बिहार वालों / मराठियों और अन्य परप्रान्तियों में यह उतना गंभीर नहीं है।

सूरत शहर के दो भाजपा विधायकों (सूरत में सारे बारह के बारह विधायक भाजपा के हैं) से कल मुलाक़ात हुई। युवा मोर्चा के अध्यक्ष से भी और कुछ पार्षदों से भी। बातचीत में पता चला कि पार्टी इस संभावना की पड़ताल में लगी है कि गर यूपी के साथ साथ गुजरात में भी करीब एक बरस पहले विधानसभा चुनाव करा लें तो कैसा रहे? वजह है केजरीवाल। अब तीन महीने में तो केजरीवाल गुजरात में विकल्प बनने से रहे, कांग्रेस लुंज पुंज है ही! यह आइडिया भाजप में अंदर ही अंदर बहुत उच्च स्तर पर परवान चढ़ चुका है।

गुजरात दौरे पर गए दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की रिपोर्ट.

मूल खबर….

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संध्या बहसें टीवी चैनलों को फ़ील्ड रिपोर्टिंग से कहीं ज्यादा सस्ती पड़ती हैं

Sheetal P Singh : टीवी के जनरल कर्नल… दूरदराज़ क़स्बों छोटे मंझोले शहरों और बड़े शहरों के भीतर बसे क़स्बों के दर्शक टीवी को बड़ी श्रद्धा से देखते हैं और टी वी पूरी मक्कारी/योजना से उनकी इस अबोधता का शिकार करता है । वह इन अबोध लोगों को सूचना देने / मनोरंजित करने के दौरान तमाम घटिया माल इन खुली आँखों को परोस देता है जो भौतिक रूप में भी है और विचार के रूप में भी और खुली आँखों वाले ये अबोध उसे तालाब की भूखी मछलियों को फेंके गये चारे की तरह निगल जाते हैं!

आजकल न्यूज़ चैनलों पर रिटायर्ड फौजी अफ़सरों का बाज़ार गर्म है। कम लोग जानते होंगे कि टी वी चैनल अपने स्टूडियो में बुलाये मेहमानों को आने के पैसे देते हैं! इसी वजह से तमाम पाकिसतानी फौजी जनरल कर्नल भी बेइज़्ज़त होने के लिये वहाँ बैठे मिलते हैं। हमारे रिटायर्ड जनरलों का तो कहना ही क्या? बीजेपी जैसी विकराल पार्टियाँ अपनी लाइन के जनरलों को टीवी बहसों में विशेषज्ञ के रूप में स्थापित करने का योजनाबद्ध अभियान चलाती हैं। नतीजा यह है कि तमाम जनरल एक सी भाषा बोलते हैं जबकि सोशल मीडिया पर हम एक से बढ़कर एक क़ाबिल रिटायर्ड आफिसरों का लिखा पढ़ते हैं जो कभी टी वी डिबेट में नहीं होते!

टीवी पर परोसे गये इन जनरलों के रूप रंग हाव भाव से बीजेपी को भले फ़ायदा हो सेना की छवि को ज़बरदस्त नुक़सान हो रहा है। ज़्यादातर स्तरहीन हैं, चीख़ते चिल्लाते हैं, बेडौल शरीरों के स्वामी हैं और सुब्रह्मण्यम स्वामी के चेले लगते हैं! ये सब सरकसों में पाये जाने वाले मरघिल्ले शेरों की याद दिलाते हैं! संध्या बहसें टीवी चैनलों को फ़ील्ड रिपोर्टिंग से कहीं ज्यादा सस्ती पड़ती हैं। इसलिये सारे चैनलों ने इसे अपना लिया है। राज्यों के चैनल तो मेहमानों को कोई पैसा नहीं देते। उन्हे तो काफ़ी सस्ता पड़ता है! खैर जब तक पाकिसतान है कश्मीर सड़क पर है तब तक जनरलों कर्नलों की बनरघुडकियों के करतब देखते रहिये….

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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कारगिल जीतने वाले रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने तो कभी अपना अभिनंदन नहीं कराया

Arvind K Singh :  पिछले तीन दशक में कारगिल से बड़ी जंग तो कोई और हुई नहीं..उसमें बड़ी संख्या में जवानों की शहादत हुई। मैने भी उसे कवर किया था। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि उस दौर के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने इस मुद्दे पर अपना अभिनंदन समारोह कराया हो….अगर गलत हूं तो बताइएगा। फिर रक्षामंत्री जी आपने ऐसा क्या कर दिया। न फैसला आपका, न उसे लागू कराने गए आप…जो काम जिसने किया है उसको देश की जनता दिल से शुक्रिया कर रही है। आप तो इसे राजनीतिक रंग देने में लग गए हैं वह भी उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हो रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक के मसलेपर कड़ा फैसला लेने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री मोदी को ही मिलेगा किसी और को नहीं।

Om Thanvi : उत्तर प्रदेश के चुनाव माहौल में सर्जिकल कार्रवाई को भुनाने की भाजपा की कोशिश अप्रत्याशित नहीं है, पर अफ़सोसनाक ज़रूर है। भाजपा नेताओं द्वारा लखनऊ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर आदि शहरों में टाँगे गए बड़े-बड़े होर्डिंग और पोस्टर सर्जिकल कार्रवाई के विशुद्ध राजनीति इस्तेमाल के जीते-जागते प्रमाण हैं। इन पोस्टरों के हीरो सैनिक नहीं हैं, प्रधानमंत्री मोदी केंद्र में हैं जो राम के रूप में चित्रित हैं, नवाज़ शरीफ़ रावण हैं और केजरीवाल विभीषण।

आज लखनऊ और आगरा में रक्षामंत्री पर्रिकर के अभिनंदन में जो समारोह हुए, वहाँ भी हर होर्डिंग पर रक्षामंत्री के साथ गृहमंत्री राजनाथ सिंह (लखनऊ सांसद) और अन्य छोटे-बड़े भाजपा नेताओं के चेहरे और नाम सुशोभित थे। आगरा की गलियों तक में मोदी और पर्रिकर के ‘शौर्य प्रदर्शन’ के लिए “वंदन-अभिनंदन और शत्-शत् नमन” वाले पोस्टर सजे।  इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुज़फ़्फ़रनगर में “हम तुम्हें मारेंगे और ज़रूर मारेंगे” वाले होर्डिंग लगे हैं जिनमें मोदी के साथ अमित शाह को भी शामिल किया गया है। स्थानीय भाजपा नेता तो मौजूद हैं ही। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में यह सिलसिला दो रोज़ पहले शुरू हुआ है, मुंबई की एक भाजपा नेता ने तो सर्जिकल कार्रवाई की ख़बर के रोज़ ही पंजाब के मतदाताओं से समर्थन की अपील कर दी थी।

बेचारे राहुल गांधी अपनी भाषा में फँस गए, वरना उड़ी में बड़ी संख्या में हमारे सैनिक मारे गए, जवाब में सर्जिकल कार्रवाई हमने की और अब हफ़्ते भर के भीतर उसका चुनावी फ़ायदा उठाने की कार्रवाई भाजपा ने कर डाली। दलाली अच्छा शब्द नहीं, पर बेहतर भाषा में भी इसे आख़िर क्या कहा जाना चाहिए? फ़ौज़ी कार्रवाई की चुनावी ब्रांडिंग और मार्केटिंग! नहीं क्या?  हर राजनीतिक दल को भाजपा की इस मार्केटिंग को मुद्दा बना कर बेनक़ाब करना चाहिए। फ़ौज़ी कार्रवाई का राजनीतिक लाभ इंदिरा गांधी को मिला होगा और अटल बिहारी वाजपेयी को भी – लेकिन चुनाव में सैनिकों के शौर्य को अपना शौर्य बताकर वोट खींचने का काम पहली बार हो रहा है। सरेआम।

Sheetal P Singh : सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सेना के जिन वीरों ने अपने कंधे पर मोर्टार लादकर तीन किलोमीटर तक पाकिसतान की सीमा में पैदल मार्च किया, शत्रुओं के कैम्पों पर गोले दागकर उनका सफ़ाया किया, देसभगत पारटी ने देस के कोने कोने में उनके पोस्टर चपकाने का काम किया है। पहले चरण में यू पी उततराखंड पंजाब और गोवा में ये पोस्टर लगाये जा रहे हैं! आप भी आइये और वीरों के चित्र पर पुष्पगुच्छ चढ़ाइये।

Nadim S. Akhter : “खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा वाली कहावत भूल जाइए. अब बोलिए खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी. मतलब जान दे हमारे सैनिक और चुनावी फसल काटे मोदी जी. इसी की तो आशंका थी, यही तो हो रहा है. सैनिकों की जान के साथ भी राजनीति ! धिक्कार है ऐसी ओछी राजनीति पे. क्या मोदी जी के हनुमान इस पोस्टर पर ये नहीं लिख सकते थे कि —देश के लिए जान देने वाले सैनिकों को नमन —- गौर से देखिए. सैनिकों की जगह वे मोदी जी और पर्रिकर जी को शत-शत नमन कर रहे हैं. तभी तो कह रहा हूं-  खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी.”

पत्रकार द्अरविंद कुमार सिंह, ओम थानवी, शीतल पी. सिंह और नदीम एस अख्तर की एफबी वॉल से.

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जेटली जी अरनब गोस्वामी समेत मीडिया के सारे बड़ों को ENGAGE रखते हैं, निर्देशित करते हैं और काफ़ी हद तक कंट्रोल करते हैं!

Sheetal P Singh : जेटली जी बनाम केजरीवाल। “जेटली” जी से मुक़ाबिल होना बहुत बड़े ताने बाने की माँग करता है! सुधांशु मित्तल / विजय गोयल ग्रुप एक ज़माने से जेटली जी की कृपा से राजनीति में (बीजेपी की ) होते हुए राजनीति से बाहर है। ललित मोदी ने मुझे दिये इंटरव्यू में क्रिकेट जगत के घोटाले के सारे मामले ( उनसे संबंधित) के पीछे जेटली के होने को बताया था।

दिल्ली में कीर्ति आज़ाद बिशन सिंह बेदी आदि अनवरत डी डी सी ए के मामलों में भारी भ्रष्टाचार की शिकायतें करते रहे हैं जहाँ जेटली जी को लाभार्थी बताया जाता है। राजनाथ सिंह के पुत्र के बारे में मोदी जी की सरकार बनते ही जो अफ़वाह फैलीं थीं उसके स्त्रोत जेटली थे । ऐसा राजनाथ जी ने अपने हर अंतरंग से कहा। सुषमा स्वराज के वध के लिये “ललित गेट” जेटली जी की उत्पत्ति था ऐसा लीक महासचिव स्तर तक बीजेपी में आम था/है।

 

जेटली जी अरनब गोस्वामी समेत मीडिया के सारे बड़ों को engage रखते हैं, निर्देशित करते हैं और काफ़ी हद तक कंट्रोल करते हैं, यह स्वीकृत तथ्य है। हालाँकि वे राज्यसभा के रास्ते संसद में रहे पर हमेशा अव्वल पदों पर रहे और देश में न्यायपालिका का ध्वंस करने के लिये लोग उन्हे हंसराज भारद्वाज से बड़ा गुनहगार मानते हैं (दोनों ही तमाम मीडियाकर हाईकोर्ट जजों के चयन के ज़िम्मेदार रहे हैं)।

जेटली ने फ़िलहाल मुरथल के ढाबे के गोभी/आलू के पराँठों का शौक़ त्याग दिया है क्योंकि उन्होंने बैरियाट्रिक सर्जरी करा ली है! वे करीब छ: फ़ुट लम्बे हैं जबकि केजरीवाल कुल पांच फ़ुट चार इंच हैं पर मुक़ाबला शुरू हो चुका है..

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें>

 

सीबीआई का कांग्रेस से भी भयंकर दुरुपयोग कर रही है मोदी सरकार, जानिए पूरा सच…

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PB / YY और जनलोकपाल

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वाशिंगटन पोस्ट की महिला पत्रकार का खुलासा- मोदी सरकार ने विदेशी मीडिया को पटाने के लिए पीआर कंपनियों को पीछे लगाया

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इंग्लैंड में मोदी : भारतीय मीडिया कुछ तो छुपा रहा है…

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आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को दूसरे पत्रकार ने ‘CERTIFIED MODIFIED JOURNO’ करार दिया!

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एएनआई की मूर्खतापूर्ण रिपोर्टिंग की सोशल मीडिया पर जगहंसाई

Sheetal P Singh : गदहपचीसी! जब पत्रकार / पत्र / एजेंसी भक्तिभाव में लीन हो जाती है तो ऐसी रचनायें जन्म लेती हैं। राजेन्द्र कुमार के बैंक एकाउंट्स में लेन देन के २८ लाख रुपयों को समाचार एजेंसी ने “सी बी आई की खोज” बताया! हम बेवक़ूफ़ थे जो बैंक के ज़रिये संचालन को “व्हाइट मनी” समझते थे जिसका रिकार्ड होता है!

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सीबीआई का कांग्रेस से भी भयंकर दुरुपयोग कर रही है मोदी सरकार, जानिए पूरा सच…

Sheetal P Singh : सब “डिफ़ेन्स” में आ गये हैं। सीबीआई की प्रवक्ता भी लगभग राजनैतिक बयान पेश कर गईं जिसे भाजपाई पत्रकारों ने फट से रीट्वीट किया। शिवसेना, भाजपा, केन्द्रीय सरकार, सी बी आई, प्रशान्त भूषण एक तरफ़ हैं। मुलायम सिंह, मायावती, जयललिता तटस्थ हैं। कांग्रेस सदन में मुख़ालिफ़ है पर सड़क पर स्तब्ध है! सीपीएम, जदयू, ममता बनर्जी “आप” के साथ हैं! नया अनुभव है। पहले तीस्ता सीतलवाड पर सीबीआई ने हमला करने की कोशिश की पर कोर्ट आड़े आ गई।

फिर “यादव सिंह” मामले में सीबीआई जाँच के “लीक” ने रामगोपाल यादव को अमित शाह के शरणागत किया और ताज़ी ताज़ी रिश्तेदारी भी मुलायम सिंह यादव को बिहार में राजनैतिक आत्महत्या से रोक न पाई। अगला हमला वीरभद्र सिंह पर हुआ। लोग चौंके कि क्यों हिमाचलों के मुख्यमंत्री पर तेज़ है सीबीआई? पर एक तो वे बदनाम थे दूसरे सुदूर पहाड़ी राज्य, लोगों को सच का पता न चला। दरअसल वीरभद्र सिंह की बड़ी बेटी गुजरात हाईकोर्ट की जज रही हैं। उन्होंने अमित शाह को जमानत नहीं दी थी। इसका बदला लेने के लिये सिंह साहब की बेटी की शादी के दिन सीबीआई ने मुख्यमंत्री के घर छापा मारा।

दरअसल देश को उस समय इसका विरोध करना था पर कांग्रेस तक ने कुछ न किया। नतीजा यह है कि 2002 के एक मामले में 2015 में केजरीवाल के दफ़्तर में सीबीआई घुस गई। पर केजरीवाल और वीरभद्र सिंह में ज़मीन आसमान का फ़रक है। अटल जी की इशटाइल में कहें तो “ये अच्छी बात नंई ऐ”!

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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CBI रेड अब सारे आरोपों और असफलताओं से निकाल देगा केजरीवाल को! (पढ़ें सोशल मीडिया पर पक्ष-प्रतिपक्ष में टिप्पणियां)

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अगले लोकसभा चुनाव तक मोदी की मार खा खा के केजरी देशव्यापी हैसियत हासिल कर लेंगे

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ये कैसा सीएम जो पीएम को कायर बोले!

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विफल हो रहे केजरीवाल को सीबीआई रेड करवा के अभयदान दे दिया!

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केजरीवाल जी! आपको इस समय योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की याद बहुत आ रही होगी

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इंग्लैंड में मोदी : भारतीय मीडिया कुछ तो छुपा रहा है…

वैसे तो मोदी जी की विदेश यात्रायें आपका सुख चैन खबर बाखबर सब नियंत्रित कर लेती हैं, आप चाह कर भी मोदीमय होने से बच ही नहीं सकते। सारे चैनल उनका ही मुखड़ा दिखाते मिलते हैं और सारे अख़बार उन्हीं पर न्योछावर। सोशल मीडिया पर भी वही छाये रहते हैं पक्ष हो या विपक्ष! पर इस बार यह सब होते हुए भी कुछ और भी है जिसकी परदेदारी तो है पर वह परदे में समा नहीं रहा! इस बार लंदन में मोदी का भारी विरोध हुआ और अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में और सोशल मीडिया में उसने खासी हलचल पैदा की।

यह तब हुआ जब डोमेस्टिक पिच पर वे बुरी तरह से बिहार हार कर लंदन पहुँचे थे तो यहाँ भी एक बड़ा समाज उनके विरोध की परदा फाड़ कर आती ख़बरों में रुचि दिखा रहा था।

मोदी जी के विरोध में इस बार सबसे बड़ी संख्या नेपालियों की है फिर सिक्ख मुसलमान वामपंथी लिबरल लोग हैं। नेपाल में ज़रूरी वस्तुओं के ब्लाकेड ने बड़ी बेचैनी पैदा कर रक्खी है। उसकी प्रतिध्वनि वहाँ सुनाई पड़ी। गार्डियन के नेतृत्व में लंदन में बसे साउथ एशियन इंटेल्कचुअल्स का बड़ा हिस्सा मोदी के २००२ में गुजरात दंगों को लेकर अनवरत आलोचक की भूमिका में है। इस बार उसे देश में लेखकों कलाकारों विज्ञानियों के पुरस्कार लौटाओ आन्दोलन की ऊष्मा भी मिल गई। नतीजे में करीब २५० लेखकों पत्रकारों कलाकारों सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक ख़त जारी कर विरोध को पंख दे दिये।

मोदी के पास ब्रिटिश सरकार को ललचवाने का काफ़ी कुछ था। रफायेल के मामले में फ़्रांस से पिछड़ गये ब्रिटिशर्स इस बार कोई चूक नहीं करने वाले थे। संयुक्त संसद में भाषण, रानी के साथ लंच और कैमरून के आउट हाउस में डिनर रख कर अंग्रेज़ पूरी बिसात बिछा चुके हैं।

स्मार्ट सिटीज के पैकेज के बड़े हिस्से को हड़पने को आतुर अंग्रेज़ डिफ़ेन्स में भी नज़र गाड़े हुए हैं जिसमें अमरीका इज़रायल और फ़्रांस बड़ा हाथ मार रहे हैं। लंदन विज़िट में टाटा ग्रुप मोदी का अगुआ रहा। जैगुआर कारख़ाने में मोदी का विज़िट तय है ही। टाटा ने इस डील में बहुत हाथ जलाया पर अब यह कंपनी चल पड़ी है। दोनों प्रधानों ने इसका नाम लिया।

“वेंबले”! फ़ुटबॉल के इस मैदान में खचाखच भीड़ को मेसमेराइज करने के कार्यक्रम से मोदी अपने लंदन भ्रमण का समापन करेंगे। हमारे चैनल कई दिनों से इस मैदान को इतने एंगल से दर्शकों को परोस चुके हैं कि चप्पा चप्पा लोगों को पता है।

इंग्लैंड के करीब १५ लाख भारतीयों के उस तबके के लिये यह एक अलग इवेंट है जो टूरिस्ट मोड में यू के में रहता है और अंग्रेज़ों के लिये कौतूहल जिनके नेताओं की ज़िन्दगी में इतनी बड़ी भीड़ एक जगह भाषण सुनने के लिये मिलना किसी अजूबे से कम नहीं।

लेखक शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे चौथी दुनिया की लांचिंग टीम के हिस्सा रहे हैं. अमर उजाला से पत्रकारीय करियर शुरू करने के बाद इंडिया टुडे में भी काम किया. इन दिनों वे बतौर सोशल मीडिया जर्नलिस्ट एक्टिव हैं. शीतल पी. सिंह से संपर्क singh.p.sheetal@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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एबीपी न्यूज़ पर संबित पात्रा के साथ राकेश सिन्हा ने तो मुनव्वर राना और अतुल अंजान को लगभग नोंच डाला था!

Sheetal P Singh : प्रो. राकेश सिन्हा ने आज RSS के ९० साल के होने और उसके राजनीतिक मंच के दिल्ली के तख़्त पर आसीत रहने के दिन गर्वोक्ति ज़ाहिर की है कि अब उनकी विचारधारा ही चलेगी और दिनोंदिन और बढ़ेगी, दुनिया इसे मान रही है, विश्व गुरू, आदि अनादि! टीवी की संध्या बहसों में वे पिछले कुछ वर्षों में संघ के विचारक के तौर पर स्थापित हैं, वामपंथ सेक्युलरिज़्म और भौतिकवाद को गया गुज़रा, इतिहास के “कूरेदान” में पड़ा मान कर ख़ारिज कर दिया करते हैं! हाल ही में एबीपी न्यूज़ पर मुनव्वर राना और अतुल कुमार अंजान को तो संबित पात्रा के साथ उन्होंने लगभग नोंच डाला था, कई बार लगा हाथापाई अब हुई तब हुई।

इनकी विचारधारा है क्या ? देश की करीब ८०% आबादी हिन्दू है और बाकी में सभी क़िस्म के अल्पसंख्यक। इन ८०% को २०% के संभावित ख़तरे और अतीत के कुछ वास्तविक और कुछ कृत्रिम मामलों के बदले के लिये भड़काकर सत्ता हथियाना! इसमें ऐसा विशेष क्या है जिससे कोई गौरवान्वित हो? दुर्योग से हिन्दू समाज की संरचना ने इनको विरासत से जाति के नाम पर इकट्ठा संगठन दे दिया जिसमें इन्होंने समर्थ घोड़ों पर सवारी गाँठ ली और स्वयं को विजयी घोषित कर लिया!

महाशय इस महादेश में कमज़ोर को सामर्थ्य देने का काम एक महती काम रहा है न कि ताक़तवर को और ताक़तवर बनाने के लिये शिलाजीत बेचना, जो कोई भी कर सकता है मसलन शिव सेना जैसे हिंसा और भयभीत करने वाले दल भी क्षेत्र विशेष में राजनैतिक रूप से सफल होते रहते हैं। तमाम अपराधी भी अपने प्रभाव क्षेत्रों में दशकों राजनैतिक मुखिया बने रहते हैं! कठिन काम गांधी जी ने किया आंबेडकर जी ने किया लोहिया जी ने किया कांशीराम जी ने किया वामपंथ ने किया, वे निर्बल की आवाज़ बने और सबल का सामना किया।

आप की सत्ता और कांग्रेस की सत्ता में फ़रक करना मुश्किल है सिवाय इसके कि जितनी मंहगाई वे दस साल में बढाते हैं उतनी आप एक साल में। वे मुसलमानों को लालीपाप दिखाते हैं आप बहुमत हिन्दुओं को। वे मीडिया में ३०% क़ब्ज़ा करते हैं आप १००%। उनके ज़माने में भी ब्राह्मणों के बहुमत नेतृत्व में नौकरशाही दिल्ली की सरकार पर क़ाबिज़ रहती है आपके भी! वे आलोचना होने पर थोड़ा बहुत शर्माते भी हैं आप तो ढीठ हैं आलोचक पर ही सवार हो जाते हैं! बारडर पर वे भी सैनिक मरवाते हैं आप भी, कुछ ज़्यादा ही!

एक काम उनसे ज़्यादा करते हैं कि समाज में अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ज़्यादा बढ़ा देते हैं जो मंहगाई बेकारी लूट पर बढ़ते असंतोष पर परदे के काम आ जाता है, बाकी त जो है सो हइयै है। दलित और पददलित किये जाते हैं पिछरे और पछारे जाते हैं। गाय गंगा गीता का गीत नेपथ्य में बजता रहता है और कभी कभी भाल्यूम बढ़ा दिया जाता है! हाँ आप टीवी पर उनसे कहीं ज़्यादा चिल्लाते हैं! और आपके पीएम उनके पीएम से सौ गुना ज़्यादा बार कपरा बदलते हैं! बाकी आप बोलते ही हैं लिखते तो कुछ हैं नहीं सिवाय प पू गोलवलकर पर किताब के तो आपको पकरा तो जा नहीं सकता?

जियत रहा बाबू रकेस सिन्हा
वन्दे मातरम

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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लालू के बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी की चुनावी सीट घोषित, मीसा भारती नहीं लड़ेंगी

लालू यादव से बातचीत के दौरान ब्रेक के वक्त वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह (बाएं से प्रथम) और अन्य वरिष्ठ मीडियाकर्मी.

लालू यादव ने अपने दो पुत्रों तेजप्रताप और तेजस्वी यादव को चुनाव लड़ाने की घोषणा कर दी है. ये दोनों क्रमश: महुआ और राघोपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे. बेटी मीसा भारती चुनाव नहीं लड़ेंगी. वो अपना पूरा वक्त चुनाव प्रचार में देंगी. यह खुलासा लालू यादव ने वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह से एक विशेष बातचीत के दौरान किया. 

 लालू यादव ने शीतल पी. सिंह से बातचीत के दौरान बताया कि बिहार चुनाव इस देश को दिशा देने वाला साबित होगा. सदियों से वंचित तबके के लोग बिहार में न सिर्फ सत्ता में आएंगे बल्कि सांप्रदायिक और देश-समाज बांटने वाली ताकतों को धूल चटाएंगे. अपने परिवार के सदस्यों को चुनाव लड़ाए जाने के सवाल पर लालू यादव ने कहा कि उनके दो पुत्र चुनाव लड़ेंगे. कौन-कौन लड़ेंगे और किन-किन सीटों पर लड़ेंगे? इस सवाल पर लालू ने बताया कि तेजप्रताप और तेजस्वी यादव चुनाव लड़ेंगे. इनके लिए महुआ व राघोपुर सीट तय किया जा चुका है. बेटी मीसा भारती को चुनाव लड़ाए जाने के सवाल पर लालू यादव ने कहा कि वो चुनाव नहीं लड़ेंगी. हां, वे चुनाव प्रचार में शिरकत करेंगी और अपने सभी लोगों को जिताने के लिए सभाओं को संबोधित करेंगी.

उल्लेखनीय है कि महुआ विधानसभा से राजद के जागेश्वर राय के नाम की चर्चा थी. लेकिन जब उन्हें पता चला कि लालू पुत्र तेजप्रताप यहां से चुनाव लड़ेंगे तो उन्होंने बागी तेवर अपना लिए. जागेश्वर राय के समर्थन में सभी 36 पंचायतों के अध्यक्षों ने राजद से अपना सामूहिक इस्‍तीफा दे दिया था. जागेश्‍वर राय ने राजद पर हमला बोलते हुए यहां तक कहा था कि लालू के पुत्र मोह के कारण राजद बर्बाद हो रहा है.

दरअसल लालू ने बहुत सोच समझ कर अपने बेटों के लिए महुआ और राघोपुर विधानसभा क्षेत्र चुना है. दोनों विधानसभा क्षेत्र यादव बहुल है. वहां राजद का ‘माई’ समीकरण अधिक मजबूत है. हालांकि पिछली बार दोनों जगहों पर उसे हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन इस बार स्थितियां बिलकुल अलग हैं. राघोपुर राबड़ी देवी का चुनाव क्षेत्र है. पिछली बार राबड़ी खुद यहां से चुनाव हार गई थीं, तब जदयू और भाजपा के बीच गठबंधन था. पिछली बार जदयू के सतीश कुमार ने नीतीश लहर पर सवार होकर जीत हासिल की थी. अबकी बार राजद और जदयू साथ हैं. महुआ विधानसभा क्षेत्र भी यादव बहुल क्षेत्र है. पिछली बार यहां से जदयू के रवीन्द्र राय ने राजद के जगेश्वर राय को हराया था.

ये वहीं जगेश्वर राय हैं, जिनके समर्थकों ने हाल ही में महुआ में एक कार्यक्रम के दौरान लालू प्रसाद द्वारा अपने पुत्र तेजप्रताप को उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा करने पर विरोध जताया था. इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में तेजस्वी और तेजप्रताप के मैदान में उतरने से राजद कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह है. वैसे विरोधी खेमा भी लालू के खिलाफ गोलबंद है. भाजपा इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में यादव जाति के कद्दावर उम्मीदवारों की खोज में जुटी है. देखना है कि तेजप्रताप और तेजस्वी अपने पिता के उत्तराधिकार को हासिल करने के वास्ते जंग जीतने में सफल हो पाते हैं या नहीं.

बिहार दौरे पर गए शीतल पी. सिंह द्वारा पटना में लालू यादव से हुई बातचीत पर आधारित. संपर्क: +91 9810409181

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चंद्रशेखर आजाद के जन्मदिन पर भगत सिंह की फोटो लगाकर बधाई देने वाले दो महामूर्ख भाजपाई रमन सिंह और कांग्रेसी अजय माकन!

Sheetal P Singh : कई समानतायें और संबंध हैं BJP और Congress में। दोनों के दो बड़े धुरंधर चन्द्रशेखर आज़ाद के जन्मदिन पर शहीदे आजम भगत सिंह का चित्र लगाकर ट्विटर बधाई भेजने वाले महामूर्खों में आज दर्ज हो गये। यह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन का कारनामा रहा। दर्ज किया जाय।

Kishlay Sharma : When Modi took the seat as PM, in one of the early speeches he said that Bhagat Singh was sent to Andaman (Kalapani) by Britishers …. That single scentence was enough to know how well read and how true a Nationalist Modi was. And then yesterday when I posted picture of Jharkhand Education Minister Neera Yadav paying a “Shraddhanjali” to Dr. APJ Abdul Kalam who is still very much alive and kicking, active in public life as well, one got to know the real depth of education minister’s qualification and her suitability to the chair of education minister..God Bless Kids of Jharkhand now. Now you see CM of Chhattisgarh Dr.Raman Singh (BJP) and Ajay Maken ( Ex Cabinet Minister of India and presently Head of Congress ,Delhi Unit) ..both wishing Chandrashekhar Azad a happy birthday today while posting picture of Bhagat Singh. Only C**t*@s will believe that these 2 dickheads who can not make out a Bhagat from Azad would have ever read the great life of any of these 2 legends of Indian freedom struggle,their thoughts,their actions and their supreme sacrifices for the cause of a free India. Nation is in the hands of people who are less intelligent than you..yes i am talking about YOU !! And they show as if they know it all …huh

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और किशलय शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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मोदी समर्थक क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है

Sheetal P Singh : BJP के हाथियों के दंगल में पैदल सेना की बड़ी दुर्गति है. बीजेपी की पैदल सेना मुख्यत:दरिद्र सवर्णो की रुग्णशाला से आती है। रुग्णशाला का मतलब यहाँ उन प्रतिभागियों से है जो आर्थिक शैक्षिक शारीरिक मोर्चों पर दोयम दर्जा रखते हैं पर मनु महाराज की अनुकम्पा से उन्हे अपने से बुरे हाल में सड़ रहे ग़रीब नसीब हैं, जिन्हें देखकर उन्हे ख़ुद के “बड़े” होने का एक झूठा अहसास तरावट देता रहता है. तो यह पैदल सेना अपनी दो हज़ार से बीस हज़ार के मध्य झूलती सामुदायिक विपन्नता के दौर में अरबों ख़रबों के वारे न्यारे करने वाले फ़ैसलों /विवादों के पैरवीकारों के रूप में अपने आप को पाकर समझ ही नहीं पाती कि बैटिंग किधर करनी है. इंतज़ार करती है कि कुछ ऊपर से ज्ञान छिड़का जाय तो वह भी लोकल बघारे.

मसलन आप सोशल मीडिया के गट्ठर के गट्ठर अकाउंट देख आइये. एक भी शायद ही मिले जिसने KG6 basin प्रसंग पर ख़ुद से कुछ लिखा हो? आयरन ओर के गोरखधंधे पर एक हर्फ़ दरज कराया हो? अडानी के बारे में कुछ गहरी जानकारी प्रकट की हो? अब यकायक उसे ललित मोदी/सुषमा स्वराज की मानवीय रिश्तेदारी पर डिफ़ेंस खड़ा करना है. काफ़ी मीमांसा के बाद मैंने पाया कि कम से कम सोशल मीडिया में मौजूद मोदी/बीजेपी समर्थकों का ९९% आज के क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज़ के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है. वह दरअसल मुसलमानों से लड़ रहा है, ईसाइयों से लड़ रहा है, औरतों को क़ाबू (उसकी समझ में मर्यादा) में रखने में लगा है, कश्मीर में तैनाती चाहता है, लाहौर पे क़ब्ज़ा, चीन को सबक़ और विश्व गुरू/हिन्दू /संस्कृत …

सब गड्ड मड्ड. वो बहस नहीं कर सकता. ख़ाली डब्बा है. सो गालियों में जीता है. इसी वजह से इसकी सारी सर्किल मर्दों की है. कुछ नकली महिला प्रोफ़ाइल्स छोड़कर. मैं दस साल बाद का दृश्य अपने हिसाब से जैसा देख पा रहा हूँ कि “खेती सेठों की हो चुकी होगी और बेरोज़गारों के झुंड तमाम तरह की लम्पट सेनायें बनाकर एक दूसरे से निबटने/निबटाने में लगे होंगे. सरकारी फौजफाटा/पुलिस अपनी लूटपाट अराजकता में. सांप्रदायिक बँटवारा नई चुनौतियों को पेश कर रहा होगा. बुज़ुर्ग औरतें बच्चे और बीमार सबसे ज़्यादा वलनरेबल होंगे. है तो बहुत बुरा सा स्वप्न पर… 

शीतल पी सिंह के एफबी वॉल से

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दिल्ली पुलिस की अफरातफरी और राजनीति का गंदा खेल : वक्त बताएगा किसने क्या खोया और क्या पाया…

Om Thanvi : किसी एफआइआर पर पुलिस मंत्री क्या पार्षद के खिलाफ भी इतनी अफरातफरी में हरकत में नहीं आती। तोमर पर लगे आरोप नए नहीं हैं, अदालत में मामला पहले से है। अगर उन्होंने फर्जीवाड़ा किया है तो निश्चय ही सजा मिलनी चाहिए, मंत्री पद से छुट्टी तो होनी ही चाहिए। वैसे आप सरकार भी इसकी दोषी तो है कि अब तक न भीतरी लोकपाल नियुक्त किया है न बाहरी। तोमर की ‘असली’ डिग्रियां पेश करने का वादा भी अब तक पूरा नहीं किया गया है। लेकिन इसके बावजूद दिल्ली पुलिस की आज की नाटकीय गतिविधि संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल आती। सवाल यह है कि कल कोई एफआइआर शिक्षामंत्री स्मृति ईरानी पर डिग्री (यों) वाले उनके फर्जी हलफनामों के लिए दर्ज होती है तो क्या पुलिस इसी जोशोखरोश में पेश आएगी?

संशय तो इसमें भी है कि एफआइआर दर्ज भी हो पाएगी कि नहीं। दिल्ली पुलिस – जो केंद्र और उसके बंदे एलजी के प्रति ज्यादा वफादार है – का अतिउत्साह साफ जाहिर है और उसे अपनी घटती विश्वसनीयता की फिक्र करनी चाहिए। लेकिन वह भी क्या करे जब संविधान की गलियां उलटे-सीधे कामों के लिए केन्द्र सरकार से लेकर उपराज्यपाल खुद ढूंढ़ते फिरते हैं। मजा देखिए कि दिल्ली सरकार को भ्रष्टाचार से लड़ना है, पर नजीब जंग ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में अपना बंदा छोड़ दिया है – चुनी हुई सरकार की मंशा की परवाह किए बगैर। भाजपा के लिए कहना आसान होगा कि उनकी इन घटनाओं में कोई भूमिका नहीं है। पर उनका भरोसा कितने लोग करेंगे? पिछले महीने यह अधिसूचना जारी कर केंद्र सरकार ने आग में घी डाला था कि दिल्ली का प्रशासन और सेवाएं जनता के हाथ अर्थात चुनी हुई सरकार के पास नहीं हैं, केंद्र द्वारा मनोनीत उपराज्यपाल के पास हैं। कुल मिलाकर राजनीति का बड़ा गंदा खेल खेला जा रहा है, इसमें किसने खोया किसने पाया इसका हिसाब वक्त ही देगा।

Sheetal P Singh : तोमर और हम… हम जिस समाज से हैं वहाँ किसी कमज़ोर व्यक्ति (स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़े या अल्प/अर्ध शिक्षित या अशिक्षित) के पास अपने ख़िलाफ़ हुए / हो रहे / हो सकने वाले गुनाह के मामले में न्याय पाने की गुंजाइश बहुत कम होती है! शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में एक स्थानीय पत्रकार को एक मंत्री और पुलिस के कारकुनों ने ज़िन्दा जला दिया। अभी सिर्फ FIR हुई है और न्याय बहाने ढूँढ रहा है! राजस्थान में एक मंत्री गंभीर अपराधों में अदालत और पुलिस को वांछित है, मिल ही नहीं रहा है! मध्य प्रदेश के बरसों चले “व्यापम” घोटाले की हाई कोर्ट जाँच करवा रहा है SIT बनी हुई है पर उपर के छोर राजभवन और मुख्यमंत्री आवास की ओर सिर्फ इशारा करते हैं पहुँच नहीं पा रहे हैं! क़रीब ४१ लोग इस क़वायद में संदिग्ध रूप से दुनिया कूच कर गये!

२००२ में गुजरात में दुनिया के टीवी चैनलों/अख़बारों के सामने हज़ारों लोग तलवारों से भालों से कटे / गोदे जलाये फूंके मृत/घायल दर्ज हुए। कुछ लोग पकड़े गये, जो बड़े थे बाहर हैं, कुछ साधारण सज़ा पा गये पर असाधारण” तक क़ानून ही नहीं पहुँच पाया, फ़ेल कर गया! १९८४ में दिल्ली के हज़ारों सिक्ख फूँक दिये गये, टाइटलर और सज्जन कुमार बेगुनाह बने रहे! बिहार के दुर्दम नरसंहारों के आरोपियों को क़ानून ने मासूम माना, मरने वाले दलित वलित थे! पर हम चाहते हैं कि “तोमर” को पुलिस पीटे / घसीटे कमर से रस्सी बाँध हथकड़ी लगाये टीवी क्लिप दे, सलमान को घंटों में आज़ाद करने वाले हाईकोर्ट तोमर मामले में सुनवाई की अगली तारीख़ दे दें, पुलिस रस्सी का साँप बना ले और हम दुनिया के सामने “न्याय” साबित कर दें! बहुत सारी पोस्ट्स कुछ ऐसी ही ध्वनि पैदा करती लगीं! या हम क़रीब तीस फ़ीसद धूर्त मक्कार बड़ी जात/बड़े पद/बड़े घर वाले पचपन फ़ीसद झुग्गी, कच्ची बस्ती, अकलियत और कुछ संवेदनशील लोगों के बेहतरी के सपने पालने के गुनाह की सज़ा आयद कर रहे हैं!

वरिष्ठ पत्रकार द्वय ओम थानवी और शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को दूसरे पत्रकार ने ‘Certified Modified journo’ करार दिया!

(वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह)

शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में चौथी दुनिया की लांचिंग टीम के हिस्सा थे. इंडिया टुडे में भी काम कर चुके हैं. अमर उजाला से अखबारी करियर शुरू करने से पहले शीतल सोशल और पोलिटिकल एक्टिविस्ट हुआ करते थे. देश समाज बदलने का जज्बा लिए ग्रासरूट लेवल यानि गरीबी के ग्राउंड जीरो पर काम किया करते थे. बाद में बिजनेस में आए और अपने उद्यम से आर्थिक रूप से समृद्ध हो गए. लेकिन इस भागमभाग में मीडिया कहीं पीछे छूट गया. अब फेसबुक और ट्विटर ने उन्हें फिर से लिखने कहने बोलने का माध्यम दे दिया है.

शीतल पी सिंह ने अपने फेसबुक वॉल पर आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को Certified Modified journo करार दिया है. सुमित अवस्थी ने एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने पीएम के डायरेक्ट आए मैसेज को दिखाया है और पीएम के एक साल पूरा होने पर उनकी तारीफ की है. दरअसल सुमित अवस्थी उसी आईबीएन7 के संपादक हैं जिसके मालिक मुकेश अंबानी हैं. मुकेश अंबानी ने लोकसभा चुनाव से पहले ही सबको कह दिया था कि इस बार मोदी का भरपूर सपोर्ट करना है. देखते ही देखते आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन से मोदी को लेकर क्रिटिकल रुख रखने वालों को भगा दिया गया और मोदी भक्त पत्रकारों की जमात को जोड़ा जाने लगा.

नतीजा ये कि अब इन चैनलों में कोई बहस नहीं होती, एकतरफा दुष्प्रचार किया जाता है. मोदी और अंबानी को महफूज रखते हुए बाकी सभी पर ये चैनल हमलावर रहते हैं. इस पूरे गेम को महीन नियंत्रण संचालन सुमित अवस्थी और अन्य इन्हीं जैसों द्वारा किया जाता है. इसके बाद से पूरे मार्केट में आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन के संपादकों-पत्रकारों की हैसियत पर बट्टा लग गया है. देखिए सुमित अवस्थी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट और शीतल पी सिंह का स्टेटस.

Sheetal P Singh : Certified Modified journo exhilarating by his achievement…

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अंबानी के रिलायंस और नमो की सरकार के खिलाफ बोलने से क्यों कतरा रहे हैं बड़े मीडिया घराने

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ये पत्रकारिता है और “चौधरी” पत्रकार हैं!

Sheetal P Singh : क़रीब दो तीन बरस पहले जी न्यूज़ ने हफ़्तों कोयला घोटाले और उसमें जिन्दल ग्रुप की मिली भगत पर नान स्टाप कवरेज दी थी। आपको मालूम ही है कि बाद में एक स्टिंग सामने आया था जिससे पता चला था कि सुधीर चौधरी समेत जी न्यूज़ के आला अधिकारी और जी के मालिक सुभाष चन्द्रा नवीन जिन्दल से समाचार रोकने के लिये १०० करोड़ की राशि माँग रहे थे। उसमें मुक़दमा दर्ज हुआ। चौधरी लम्बे समय जेल में रहे, सुभाष चन्द्रा अग्रिम ज़मानत पर बचे और मुक़दमा जारी है।

चौधरी इसके पहले एक Orchestrated sting में एक शिक्षिका को वेश्यावृत्ति की किंगपिन बतलाने की फ़र्ज़ी कोशिश के अपराध के मुख्य नियंता पाये गये थे पर वह चैनल कोई दूसरा था। अब उसी तरह का अभियान दौसा के किसान गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या पर उन्होंने ले लिया लगता है। बीजेपी ने सुभाष चन्द्रा को उ०प्र० से राज्यसभा देने का वादा किया हुआ है। यह नहीं पता कि उसमें कोई प्रतिद्वन्द्वी आ गया या कुछ उससे ज़्यादा की इच्छा या महज़ TRP पर अभियान असामान्य है।

इस अभियान में मरहूम गजेन्द्र के परिवारजन व रिश्तेदारों को जी न्यूज़ के रिपोर्टर coax करके मनमाफिक शब्द/वाक्य हासिल करने की कोशिश करते लगते हैं। थीम यह है कि गजेन्द्र के फ़सली नुक़सान से प्रभावित होने की बात को गोल कर दिया जाय, बताया जाय कि वह साफ़ा बाँध कर ही बहुत कमा लेते थे, सो फ़सल के ख़राब होने का कोई असर न था। दूसरे उन्हे सिसोदिया ने फ़ोन कर बुलाया था और वे सिसोदिया के संपर्क में थे और अन्त में इस घटना की ज़िम्मेदारी केजरीवाल की है। न राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री का नाम न मोदी के ज़मीन हड़प क़ानून की बात न ओलावृष्टि से फ़सल की बर्बादी! ये पत्रकारिता है और “चौधरी” पत्रकार हैं!

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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गजेंद्र खुदकुशी प्रकरण : मजिस्ट्रेटी जांच में सहयोग से दिल्ली पुलिस ने किया इनकार

Sheetal P Singh : दिल्ली पुलिस ने दिल्ली में कल हुई दौसा के किसान की आत्महत्या के मामले में घोषित की गई मजिस्ट्रेटी जाँच में सहयोग से इनकार कर दिया है। दरअसल दिल्ली राज्य में पुलिस ही केजरीवाल सरकार का मुख्य विपक्ष है। कांग्रेस काग़ज़ पर और बीजेपी चैनलों पर। ये पुलिस ही है जिससे दिल्ली राज्य के इंच-इंच पर “आप” का मुक़ाबला है।

दिल्ली में अवैध शराब, अवैध पार्किंग, अवैध बाज़ार, वेश्यावृत्ति, ट्रैफ़िक वसूली, ड्रग्स, संगठित अपराध और विवादित प्रापर्टीज़ से कोई तीन से पाँच हज़ार करोड़ प्रति वर्ष की उगाही है जो पूरे तंत्र में पद और क़द के हिसाब से बँटती है। ”आप” हालाँकि इनका बहुत कुछ तो नहीं बिगाड़ सकती पर डिस्टर्ब कर रही है। एसीबी ने थानेदारों पर हाथ डालना शुरू कर दिया है।

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एक क्राइम ब्रांच (दिल्ली) के राष्ट्रपति पुरस्कारों से विभूषित एसीपी की दो तीन बरस पहले हत्या हो गई थी। हत्यारे ने बयान दिया कि मरहूम कोई हज़ार करोड़ की प्रापर्टीज़ के मालिक थे।

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TV देखते हुए लग रहा है कि स्त्रियों, आदिवासियों, दलितों और धार्मिक अल्प संख्यकों के अलावा आम आदमी पार्टी की भी इस देश के TV मीडिया की अदालत में कोई सुनवाई नहीं! अपराध तय हैं और चार्जशीट का पाठ अनवरत जारी है! किसी को इनका वक़ील होने का हक़ नहीं, उसे तुरंत देशद्रोही माना जायेगा! मीडिया / मोदिया ने हज़ारों किसानों की आत्महत्या के बदस्तूर जारी रहने के कारण को गजेन्द्र की क़ुरबानी के बावजूद बहस से बाहर कर दिया! बहस इस पर है कि दिल्ली पुलिस ग़लत है या केजरीवाल! जबकि इन दोनों का उन हज़ारों किसानों के भाग्य से कोई संबंध नहीं जिन्होंने कांग्रेस /बीजेपी की नीतियों से मार खाकर मौत को गले लगाया और रोज़ लगा रहे हैं।

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Zee news कल से कुमार विश्वास के एक कमेंट का टुकड़ा edit करके अर्थ का अनर्थ कर रहा है। पूरा वीडियो यूट्यूब पर मौजूद है। उसे देखें और सुपारी मीडिया का अपराधी चरित्र समझें।

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IBN7 पर संजय सिंह ने संबित पात्रा को चुनौती दी “गजेन्द्र सिंह की काल डिटेल्स पुलिस के पास है जिसमें सिसोदिया से बातचीत की एक भी काल नहीं है।” दिन भर टी वी चैनलों पर झूठ चला है पर अब कोई भी यह सच चलाने को तैयार नहीं है?

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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‘आप’ की आंतरिक लड़ाई का असली सच जानिए

Sheetal P Singh : ‘आप’ की जो आज ख़बर है वह पिछले क़रीब छ: माह से खदबदाती हाँड़ी का विस्तार भर है, सिर्फ़ उसका कैनवास बड़ा हो गया है। वजह: भूषण परिवार ने इस पार्टी के पैदा होते समय तन मन और “धन” लगाया था पर प्रशांत भूषण की रेडिकल पृष्ठभूमि(ख़ासकर कश्मीर में plebiscite पर उनके stand) से केजरीवाल ने अनवरत सचेत रुख़ से ख़ुद और पार्टी को बचा के रक्खा। बीजेपी/संघ ने हर मुमकिन कोशिश की पर केजरीवाल बच के निकल गये पर वे भूषण परिवार के उतने क़रीब भी न रहे जितना तन मन धन के कारण भूषण’s चाहते थे। उन्होंने योगेन्द्र यादव को समानान्तर स्थापित करने का प्रयास आगे बढ़ाया। लोकसभा में बड़ी हार से उन्हे मौक़ा भी मिल चुका था पर हरियाणा में योगेन्द्र यादव भी न सिर्फ़ फ़ेल रहे थे बल्कि नवीन जयहिंद (हरियाणा के एक अन्य नेता) से उलझ कर रह गये थे।

आपको याद होगा कि कुछ माह पहले सिसोदिया की योगेन्द्र को लिखी एक चिट्ठी मीडिया में लीक हो गई थी। उसमें लिखा था कि देश भर में चार सौ से ज़्यादा लोकसभा सीटें लड़ने का विचार भूषण / योगेन्द्र आदि का ही था। बनारस के बाद केजरीवाल ने अपनी पूरी सामर्थ्य दिल्ली में केंद्रित कर ली और हरियाणा विधानसभा नहीं लड़ी। योगेन्द्र ने मीडिया में इसका प्रतिवाद किया। केजरीवाल चुप रहे, वे दिल्ली चुनाव तक फ़ोकस भटकाने के ख़िलाफ़ थे। चुनाव के दौरान शांतिभूषण ने किरन बेदी के पक्ष में बयान देकर नई समस्या पैदा की पर केजरीवाल फिर टाल गये। प्रशान्त भूषण दिल्ली चुनाव से ओझल से रहे पर उनके यहां से प्रत्याशियों के बारे में अन्दरूनी जाँच रिपोर्ट्स के चटपटे (embarrassing) टुकड़े बीजेपी समर्थित मीडिया में जगह पाते रहे।

चुनाव नतीजों के तत्काल बाद योगेन्द्र यादव चैनलों / अख़बारों में फिर देशभर में चुनाव लड़ने के बयान देने लगे जबकि ऐसा कहीं तय नहीं हुआ था। खीझकर केजरीवाल ने शपथग्रहण समारोह में पूरे पाँचसाल दिल्ली में लगाने का ऐलान किया। अब शांतिभूषण उ०प्र० में और प्रशांत भूषण केन्द्रीय कार्यकारिणी में केजरीवाल से राष्ट्रीय संयोजक का पद योगेन्द्र को सौंपने की माँग कर रहे हैं जिसे किसी दूसरे का समर्थन प्राप्त नहीं है उल्टे लोग इनके कारनामों से चिढ़ कर इन्हें PAC से ड्राप करने को कह रहे हैं।

इसी की काट में भूषण कैम्प ने एडमिरल रामदास, जो पार्टी के ombudsman हैं, का एकपक्षीय पत्र मीडिया को सौंप दिया है जिसका स्पष्टीकरण मुझ जैसे sympathiser तक से माँगने वालों की बड़ी संख्या है तो पार्टी के सक्रिय नेतृत्व का क्या हाल होगा समझा जा सकता है। केजरीवाल दिल्ली में consolidation (पार्टी घोषणापत्र के वायदों के संदर्भ में) से पहले देश भर में लंगर खोल देने के पक्ष में नहीं हैं पर भूषण कैम्प तुरंत देश पर क़ाबिज़ हो जाने की गफ़लत में लगता है। यह रस्साकशी कहाँ पहुँचती है, जल्द ही ज़ाहिर होगा।

हां, ये जानना तकलीफ़देह है कि “शान्तिभूषण आशीष खेतान से इस संभावना पर बात कर रहे थे कि केजरीवाल यदि दिल्ली चुनाव हारकर नेता विपक्ष बनते हैं तो उन्हे आप के संयोजक पद से बदल पाना सरल होगा!”

बाद में शान्तिभूषण ने किरन बेदी की बीच चुनाव तारीफ़ की। कुछ तो है जिसकी पर्देदारी है! इसको इस तरह से भी देखा जा सकता है कि समर्थ गुट ने सफलता पाने तक धैर्य रक्खा और सही वक़्त पर फैसलाकुन प्रतिक्रिया दी। हाँ यह सही है कि गर ऐसा सब न होता तो ज़्यादा अच्छा होता। एक और बात। योगेन्द्र और प्रशान्त को हरियाणा या किसी और राज्य को चुनकर अपने को प्रूव करना चाहिये। वे केजरीवाल की कमाई में बड़ा वाला हिस्सा माँगेंगे या तकनीकी तर्क देकर हक़ जतायेंगे तो बात कैसे बनेगी? आख़िर में तो सब कुछ किसके हाथ में क्या ” से ही तय होता है, टी वी/अख़बारों से सिर्फ़ झगड़ा किया जा सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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ये हार बहुत भीषण है म्हराज!

Sheetal P Singh : पिछले दो दिनों में दिल्ली के सारे अख़बारों में पहले पेज पर छापे गये मोदी जी + बेदी जी के विज्ञापन का कुल बिल है क़रीब चौबीस करोड़ रुपये। आउटडोर विज्ञापन एजेंसियों को होर्डिंग / पोस्टर / पैम्फलेट / बैनर / स्टेशनरी / अन्य चुनावी सामग्री के बिल इससे अलग हैं। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा प्रधानमंत्री और अन्य हैवीवेट सभाओं के (कुल दो सौ के क़रीब)इंतज़ाम तथा टेलिविज़न / रेडियो विज्ञापन और क़रीब दो लाख के क़रीब आयातित कार्यकर्ताओं के रख रखाव का ख़र्च श्रद्धानुसार जोड़ लें। आम आदमी पार्टी के पास कुल चुनाव चंदा क़रीब चौदह करोड़ आया। बीस करोड़ का लक्ष्य था। कुछ उधार रह गया होगा। औसतन दोनों दलों के ख़र्च में कोई दस गुने का अंतर है और नतीजे (exit poll) बता रहे हैं कि तिस पर भी “आप” दो गुने से ज़्यादा सीटें जीतने जा रही है! ये हार बहुत भीषण है म्हराज! ध्यान दें, ”आप” बनारस में पहले ही एक माफ़िया के समर्थन की कोशिश ठुकरा चुकी थी, आज उसने “बुख़ारी” के चालाकी भरे समर्थन को लात मार कर बीजेपी की चालबाज़ी की हवा निकाल दी।

Om Thanvi : तमाम एग्जिट पोल नतीजों के समान रुख से उन लोगों के मुंह बंद हुए (जो बचे उनके असल नतीजे के रोज हो जाएंगे) जो लोगों के चेहरों को नहीं पढ़ना चाहते, न हवा में तैरती गंध भांप पाते हैं। आज कई चैनलों पर जाना हुआ, कई पत्रकार मित्रों से मुलाकात हुई; यह सुनना अच्छा लगा कि जनता के बदलते मानस का हमें बेहतर अंदाजा हुआ और उसे उसी भाव में निरंतर हमने कहा भी। इस जोखिम के बावजूद कि पक्षपात और बिकाऊ हो जाने जैसे आरोप झेलने होंगे। सच्चाई यह है कि इस समर में केंद्र की विराट ताकत की हार, दिग्गज नेताओं की फौज के पराभव, पूंजीपतियों की थैलियों की निरर्थकता और जाति-धर्म आदि जैसे अनेक ध्रुवों के मिथक टूटने की सम्भावना कदम-कदम पर जाहिर थी। बहरहाल, ‘आप’ पार्टी के समर्थन में उमड़ा जन-सैलाब दिल्ली प्रदेश में ही नहीं, केंद्र की राजनीति के लिए भी नया आगाज है – यह बदलाव राजनीति के समूचे ढर्रे को प्रभावित करेगा। कुछ ज्यादा कह दिया क्या? इंतजार कीजिए और देखते रहिए। देश की राजनीति का रंग और तेवर अब बदलना ही चाहिए। क्या कांग्रेस, भाजपा और अन्य दल नए संदेश और निहितार्थ समझ रहे हैं? और मोदीजी, आपके लिए डॉ लोहिया का संदेश — सुधरो या टूटो। इससे पहले कि संघ – और प्रकारांतर से पार्टी – अपनी ताकत फिर दिखाने लगे। ‘गुड गवर्नेन्स’ का झांसा नारे की शक्ल में बहुत ज्यादा खिंचेगा नहीं, जब लोग दिल्ली के छोटे-से शासन तंत्र से उसे जोड़कर देखने लगेंगे। ये केजरीवाल, जो सुबह हजामत करवाकर बैठा है, बड़ी जालिम चीज है!

Sanjaya Kumar Singh : एक्जिट पॉल के नतीजे देखने के बाद मुझे भाजपा के विज्ञापन याद आ रहे हैं। मैने सब लिख रखे हैं आज ये देखिए, “मैं किरण बेदी। दिल्ली में जब विकास की बात चली तो हमारे लोकप्रिय जननायक श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसकी कमान मेरे हाथों में दी और कहा, दिल्ली से आप पिछले 40 सालों से जुड़ी हैं अब थोड़ी सेवा और करनी है। मेरा ये मानना है कि दिल्ली में विकास का ये काम हम मिलजुल कर ही कर सकते हैं। इसलिए इस बार हमें भाजपा को पूर्ण बहुमत से जीताना है। मेरा दिल्ली वालों से वादा है कि हम आपको एक सुरक्षित और भ्रष्टाचार मुक्त राजधानी देंगे।” चलो चलें मोदी के साथ, अबकी बार मोदी सरकार और घर-घर में मोदी के बाद इस विज्ञापन में खुद किरण बेदी कहती हैं, “विकास का ये काम मिल-जुल कर ही कर सकते हैं।” सवाल ये उठता है कि मिल-जुल कर ही विकास करना था तो दिल्ली भाजपा के पुराने, अनुभवी नेताओं के साथ मिलजुल कर जीतने की कोशिश क्यों नहीं की गई। और मिल-जुल कर ही करना था तो दिल्ली में मोदी जी को किरण या क्रेन सेतु की जरूरत क्यों पड़ी। ना पार्टी ने स्पष्ट किया ना मतदाताओं को समझ में आया। मतदान के बाद किरण बेदी ने भाजपा के प्रति जो कृतज्ञता दिखाई उससे भी लगा कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए नहीं, किरण बेदी को बनाने के लिए ज्यादा जोर लगा रही थी। वरना क्या कारण है कि मास्टर स्ट्रोक इस तरह फिस्स हो गया। देखिए, चुनाव परिणाम अगर एक्जिट पॉल जैसे ही रहे तो भाजपा शायद इसपर विचार करे और कुछ समझ में आए। मै समझ रहा था कि भाजपा अगर दिल्ली में हार भी गई तो किरण बेदी का राज्यपाल बनना तय है। पर किरण बेदी 40 साल दिल्ली में ही रही हैं, बाहर तो वो टिक ही नहीं पाईं – चंडीगढ़ भी नहीं। गवरनर कहां की बनाई जाएंगी। कोई अनुमान?

Jaishankar Gupta : हमने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनाव के समय भी तमाम ओपीनियन और एक्जिट पोल्स को खारिज करते सार्वजनिक तौर पर, एक टीवी चैनल पर वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों के साथ चुनावी चर्चा में कहा था कि आप को 30 से कम सीटें नहीं मिलेंगी। तब कोई मानने को तैयार न था। इस बार भी शुरू से हमारा मानना रहा है कि आप को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा, लेकिन केजरीवाल के बारे में प्रधानमंत्री मोदी जी और उनकी पार्टी के बौने हो गए बडे नेताओं के मुंह से ‘सुभाषित’ झरने लगे, बौखलाहट में भाजपा की चुनावी राजनीति के चाणक्य और खासतौर से लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के सूत्रधार स्वनामधन्य अमित शाह जी ने मतदान से दो दिन पहले अपना रणनीतिक ज्ञान बांटा कि विदेश में जमा कालाधन लाकर र भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रु. जमा करने का वादा चुनावी जुमला भर था और यह भी कि दिल्ली का यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर रेफरेंडम नहीं माना जाना चाहिए, उसके बाद हमने कहना शुरू किया कि ‘आप’ को 40 से अधिक सीटें मिल सकती हैं। पता नहीं सीटों का आंकडा कहां जाकर फीट बैठेगा। दस फरवरी को सब पता चल जाएगा।

Mukesh Kumar : सारे एक्जिट पोल आम आदमी पार्टी की जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। हालाँकि अंतिम परिणाम आने बाक़ी हैं लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दस लाख का सूट पहनकर अपनी हार स्वीकार करने की तैयारी नहीं कर लेनी चाहिए। उन्होंने अपने विज्ञापनों में कहा था कि जो देश सोच रहा है वह दिल्ली सोचती है, तो देश ने दिल्ली के ज़रिए संदेश दे दिया है कि उन्हें न तो उनका अंदाज़ रास आ रहा है और न ही उनकी सरकार का चाल-चलन। अपने परिवार के कुकर्मों पर चुप्पी साधे रहने और कुछ न करने का उनका अंदाज भी उनके पाप के घड़े को भर रहा है। क्या वे चेतेंगे? उनके महारणनीतिकार और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह समाज को तोड़-फोड़ कर जिस तरह की राजनीतिक बिसात बिछाकर विजय हासिल करने का नुस्खा आजमाते रहे हैं, उनके लिए भी इस हार में संदेश छिपा है। ओबामा की मत सुनिए मगर दिल्ली और देश की आवाज़ तो सुन लीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, ओम थानवी, संजय कुमार सिंह, जयशंकर गुप्त और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली विस चुनाव में न्यूज चैनल खुल्लमखुल्ला ‘आप’ और ‘भाजपा’ के बीच बंट गए हैं

Dayanand Pandey : दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार टीवी चैनल खुल्लमखुल्ला अरविंद केजरीवाल की आप और भाजपा के बीच बंट गए हैं। एनडीटीवी पूरी ताकत से भाजपा की जड़ खोदने और नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोकने में लग गया है। न्यूज 24 है ही कांग्रेसी। उसका कहना ही क्या! इंडिया टीवी तो है ही भगवा चैनल सो वह पूरी ताकत से भाजपा के नरेंद्र मोदी का विजय रथ आगे बढ़ा रहा है। ज़ी न्यूज, आईबीएन सेवेन, एबीपी न्यूज वगैरह दिखा तो रहे हैं निष्पक्ष अपने को लेकिन मोदी के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाने में एक दूसरे से आगे हुए जाते हैं। सो दिल्ली चुनाव की सही तस्वीर इन के सहारे जानना टेढ़ी खीर है। जाने दिल्ली की जनता क्या रुख अख्तियार करती है।

Sheetal P Singh : नरेन्द्र मोदी सचमुच में एक क़ाबिल राजनेता हैं बड़ी सफ़ाई से उन्होंने दिल्ली चुनाव को केजरीवाल बनाम मोदी को नेपथ्य में डाल केजरीवाल बनाम किरन बेदी कर दिया ! बीते कुछ दिनों की मीडिया कवरेज इसकी गवाह है ! किरन बेदी कोई बीस दिन पहले तक इंडिया टुडे ग्रुप के टी वी चैनलों पर चुनाव के दौरान होने वाली बहसों में panelist का contract डिस्कस कर रहीं थीं यानि कहीं से लूप में नहीं थीं और आज दिल्ली BJP की पूरी लीडरशिप परेड में है। केजरीवाल की जीत का माहौल बनते ही तलवारें म्यान से बाहर निकल आंईं हैं । शांतिभूषण ने किरन बेदी को उस समय ईमानदारी की सनद देना तय किया जब तीस हज़ारी में दिल्ली के वक़ील उनका पुतला फूँकने के लिये इकट्ठा हो रहे थे । कल जस्टिस हेगड़े ने बीजेपी/राजनीति में आने की अफ़वाहों पर पूर्णविराम लगाकर ऐसी ही एक कोशिश धराशायी की थी । अन्ना से किरन बेदी का समर्थन कराने की कोशिशें फलीभूत न होने से भी आप” का भूषण कैम्प समय से पहले किरन बेदी की सुरक्षा में उतर पड़ा। आश्चर्यजनक रूप से कवि कुमार विश्वास भले ही केजरीवाल के साथ न दिखे हों पर मनीष और दूसरे दोस्तों के लिये वे लगातार संभायें कर रहे हैं, मीडिया बहुत समय से उन्हे मोदी कैम्प में भेज रहा है। इस नये विकास से लगता है कि जितने लोग विरोध में होने की वजह से केजरीवाल को दिल्ली जीतते नहीं देखना चाहते उससे कुछ ही कम “आप” की ऊपरी लेयर में हैं जो मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल की सामर्थ्य/राजनैतिक क़द बढ़ने के स्वप्न से घबराये हुए हैं!

Deepak Sharma : ये राजनीति है. दंगल नही. दंगल में आखिरी वक़्त पर चन्दगी राम के खिलाफ दारा सिंह को उतारकर कुश्ती जमाई जा सकती है. पर राजनीति में आखिरी वक़्त पर प्रत्याशी बदलना भारी पड़ सकता है. वैसे भी किरण बेदी प्रत्याशी है दारा सिंह नही. सवाल अब बस इतना है कि अगर किरण बेदी की कप्तानी में बीजेपी हार गयी तो क्या होगा ? इस हार का ठीकरा किस पर फूटेगा ? इस हार से हारेगा कौन ? 15 दिन की किरण बेदी को दोष दिया नही जा सकता. हर्षवर्धन पहले से ही हाशिये पर हैं. सतीश उपाध्याय का अध्याय ही समाप्त है. मुखी सुखी को जानता कौन है . तो क्या बारी अब वजीर की है? वजीर जिसने आखिरी वक़्त पर कजरी के खिलाफ किरण को उतारा. वजीर जिसने 48 घंटे में किरण को पार्टी में शामिल करवाया और 72 घंटो में मुख्यमंत्री की उमीद्वारी दे डाली. वजीर जिसने राजा से कजरी को कचरने की सुपारी ली है. मित्रों, अगर बीजेपी दिल्ली में हारी तो ये सच है कि केजरीवाल वजीर को मात देंगे और राजा को पहली बार शह. इस शह से बचने का अब एक ही रास्ता है. बाजी अब खुद राजा को लड़नी होगी. मोदीजी अब मिस बेदी का मुखौटा उतार दीजिये. आर पार खुद लड़िये केजरीवाल से. रोज़ रैली करिए गली गली. छोडिये ओबामा को. पहले इस टोपी से बचिए. आपने कभी टोपी नही पहनी .पर कहीं अब पहनने की नौबत न आ जाय. तो मोर्चा खुद संभालिये.क्यूंकि आपका वजीर फेल हो रहा है. इसलिए खुद ही कुछ करिए. जल्दी करिए . कहीं बनारस का स्कोर 1-1 न हो जाए.

वरिष्ठ पत्रकार त्रयी दयानंद पांडेय, शीतल पी. सिंह और दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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लोग बार-बार फंस जाते हैं पर जान ही जाते हैं कि खांग्रेसी और हिन्दू पार्टी में कोई अंतर नहीं है

Sheetal P Singh : नई सरकार की असलियत सामने है… अब सरकार कभी भी किसी की भी जमीन कब्जा कर लेगी। ज़मीन अधिग्रहण पर आये अध्यादेश ने इसको पूरी तरह बेनक़ाब कर दिया है। हम जानते थे पर लोगों को समझाने में असफल थे क्योंकि सारे 24×7 चैनल, सारे अख़बार, सारी पत्र पत्रकायें, रेडियो FM और पेड सोशल मीडिया ने विचार विमर्श के सारे प्लेटफार्मों पर इकतरफ़ा क़ब्ज़ा किया हुआ था, क़ब्ज़ा आज भी है पर इक्का दुक्का आलोचना और विवेक झूठ और सिर्फ़ झूठ की मार्केटिंग से बजबजाती सच्चाइयों पर पर्दा हटाने में धीरे धीरे ही सही पर नज़र आना शुरू कर चुका है।

साबित हो गया है कि सीमाओं की रक्षा में रैम्बो की तरह पेश किये गये मोदी का सीना ५६ इंच नहीं बल्कि नवाज़ शरीफ़ या जियांग जेमिन जितना ही है। बार्डर पर मारे गये एक सैनिक के बदले उधर के दस सिर काट लाने के दावे की धज्जियाँ समर्थक चैनलों पर औंधी पड़ी हुई हैं और बयानवीर सुषमा स्वराज नेपथ्य में। मंहगाई किसी चीज़ की कम नहीं हुई न बिजली के दाम। तेल में सांकेतिक कमी के बारे में भक्तों के अलावा ज़्यादातर शहरी जान गये हैं कि यह भी “विकास अली” का किया धरा नहीं है, क्रूड में आई बेतहाशा गिरावट का अंश भर है।

आस्ट्रेलिया और अमरीकी दौरे से फुलाये गये बैलून की हवा भी निकली जा रही है क्योंकि लगातार दो तिमाही में अर्थव्यवस्था मनमोहन काल से बदतर हाल में है, न export बढ़ा न manufacturing न GDP, बढ़े सिर्फ़ अंबानी अडानी। FDI बाहर से ही ताक झाँक कर रहे हैं bold steps का! RSS इसे समझ रहा है। लोकसभा के तत्काल बाद के विधानसभाई चुनाओं में ब्रांड मोदी क़रीब बाइस तेइस परसेंट का गोता लगा चुका है। अगर केजरीवाल ने अश्वमेध का घोड़ा दिल्ली में पकड़ लिया तो पिछली सदी भर से देखें जा रहे “हिन्दू राष्ट्र” के स्वप्न का क्या होगा? “धोख” हमेशा कारगर नहीं होता । लोग बार-बार फँस जाते हैं पर जान ही जाते हैं कि खांग्रेसी और हिन्दू पार्टी में कोई फ़र्क़ नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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बड़ा संपादक-पत्रकार बनने की शेखर गुप्‍ता और राजदीप सरदेसाई वाली स्टाइल ये है…

Abhishek Srivastava : आइए, एक उदाहरण देखें कि हमारा सभ्‍य समाज आज कैसे गढ़ा जा रहा है। मेरी पसंदीदा पत्रिका The Caravan Magazine में पत्रकार शेखर गुप्‍ता पर एक कवर स्‍टोरी आई है- “CAPITAL REPORTER”. गुप्‍ता की निजी से लेकर सार्वजनिक जिंदगी, उनकी कामयाबियों और सरमायेदारियों की तमाम कहानियां खुद उनके मुंह और दूसरों के मार्फत इसमें प्रकाशित हैं। इसके बाद scroll.in पर शिवम विज ने दो हिस्‍से में उनका लंबा साक्षात्‍कार भी लिया। बिल्‍कुल बेलौस, दो टूक, कनफ्यूज़न-रहित बातचीत। खुलासों के बावजूद शख्सियत का जश्‍न जैसा कुछ!!!

दूसरा दृष्‍टान्‍त लेते हैं। अभी दो दिन पहले राजदीप सरदेसाई आजतक के ‘एजेंडे’ में अरुण जेटली से रूबरू थे। अमृता धवन ने जेटली से अडानी-मोदी संबंध पर एक सवाल किया जिस पर जेटली उखड़ गए। राजदीप ने टोकते हुए कहा कि पिछले दस साल में अडानी की संपत्ति में बहुत इजाफा हुआ है। इस पर हाजिरजवाब जेटली तड़ से बोले, ”राजदीप, वो तो तुमने भी बहुत पैसा कमाया है।” इस पर राजदीप ने लिटरली दांत चियार दिया। दस सेकंड बाद शायद उन्‍हें लगा कि इसका प्रतिवाद करना चाहिए और वे बोले कि अडानी से उनकी तुलना ना की जाए, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

दरअसल, कारवां की प्रोफाइल ने शेखर गुप्‍ता का पोस्‍टमॉर्टम करने के बहाने कुछ बातें स्‍थापित कर दी हैं जो अब तक खुद कहने में ‘कामयाब’ संपादकों को शायद संकोच होता था। पहली बात, कि एक पत्रकार economically liberal और socially liberal एक साथ एक ही समय में हो सकता है (बकौल गुप्‍ता) यानी पत्रकार को पैसे बनाने से गुरेज़ नहीं होना चाहिए बशर्ते वह कर चुकाता हो। दूसरे, हर कोई (सोर्स भी) एक पत्रकार का ‘मित्र’ है। उसका काम इन मित्रों के संभावित समूहों के बीच संतुलन साधना है। तीसरा, पत्रकार का unapologetic होना उसके ग्‍लैमर को बढ़ाता है। उसे अपने किसी भी किए-अनकिए को लेकर खेद/पश्‍चात्‍ताप नहीं होना चाहिए। चौथा, ये तीनों काम करते हुए भी वह जो कर रहा है वह अनिवार्यत: पत्रकारिता ही है और इसका जश्‍न मनाया जाना चाहिए। आर्थिक सुधार के बाद के दौर में बड़ा संपादक-पत्रकार बनने के ये कुछ गुण हैं, जिसका उत्‍कर्ष शेखर गुप्‍ता या राजदीप सरदेसाई हो सकते हैं।

इन स्‍थापनाओं में ‘मूल्‍यबोध’ कहां है? पत्रकार की ‘पॉलिटिक्‍स’ क्‍या है? ये सवाल हवा में ऐसे उड़ा दिए गए हैं गोया इनकी बात करना पिछड़ापन हो। ज़रा पूछ कर देखिए, शेखर गुप्‍ता के लोकेशन से इसका जवाब शायद यह मिले कि तुम काबिल हो तो पैसे क्‍यों नहीं कमाते? गरीब रहने में क्‍या मज़ा है? चूंकि यही लोकेशन अब मुख्‍यधारा में स्‍थापित है या हो रही है, लिहाजा पत्रकारिता के आदर्श शेखर गुप्‍ता ही होंगे। ठीक वैसे ही जैसे साहित्‍य के आदर्श अशोक वाजपेयी होंगे। शेखर गुप्‍ता, अम्‍बानी और राडिया से लटपट करते रहें या अशोक वाजपेयी रमन सिंह से, फिर भी वे अनुकरणीय बने रहेंगे क्‍योंकि पोस्‍ट-रिफॉर्म भारत में यह बात तय की जा चुकी है कि आप सामाजिक बदलावकारी छवि बनाए रखते हुए पैसे बना सकते हैं चूंकि आप ईमानदार करदाता हैं। इसे कहते हैं चित भी मेरी, पट भी मेरी, सिक्‍का तो मेरा हइये है। आप इनकी आलोचना कर के देखिए, आपको कूढ़मगज, कनजर्वेटिव, अलोकतांत्रिक, कुंठित, असफल, कुढ़ने वाला, सनातन निंदक करार दिया जाएगा क्‍योंकि ”आपके अंगूर खट्टे हैं।”

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों आजाद पत्रकार के बतौर सोशल मीडिया और वेब माध्यमों पर सक्रिय होकर जनपक्षधर पत्रकारिता कर रहे हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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