जब केजरी पार्टी ‘पीटी’ जा रही थी तो कांग्रेसी उपदेश देते थे, अब कांग्रेसी ‘मारे’ जा रहे तो आपिये आइना दिखाने लगे!

Sheetal P Singh : अनुभवी लोग… अहमद पटेल पर बन आई तो अब बहुतों को लोकतंत्र याद आ रहा है ………आना चाहिये पर शर्म भी आनी चाहिये कि जब बीते ढाई साल यह बुलडोज़र अकेले केजरीवाल पर चला तब अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेसी राज्यपाल के अधिकारों के व्याख्याकारों की भूमिका में क्यों थे? जब एक बेहतरीन अफ़सर राजेन्द्र कुमार को सीबीआई ने बेहूदगी करके सिर्फ इसलिये फँसा दिया कि वह केजरीवाल का प्रिंसिपल सेक्रेटरी था तब भी लोकतंत्र की हत्या हुई थी कि नहीं? जब दिल्ली के हर दूसरे आप विधायक को गिरफ़्तार कर करके पुलिस और मीडिया परेड कराई गई तब भी यमुना दिल्ली में ही बह रही थी! तब कांग्रेसी बीजेपी के साथ टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को अनुभवहीन साबित कर रहे थे! अब अनुभव काम आया?

मोदी जी व अमित शाह की जोड़ी इस देश के हर मानक को चकनाचूर करके एक तानाशाह राज्य के चिन्ह स्थापित कर रही है। इनकम टैक्स ई डी सीबीआई आदि नितांत बेशर्मी से स्तेमाल किये जा रहे हैं। फिलवक्त इनकम टैक्स ने कर्नाटक के उस मंत्री के यहाँ छापा मारा है जिसके यहाँ गुजरात के कांग्रेसी विधायकों को पोचिंग से बचाकर रक्खा गया है! इंदिरा / संजय की तानाशाही का भी एक दौर था! कांग्रेस को वहाँ तक पहुँचने में कई दशक लग गये थे ये डिजिटल पार्टी है सो बुलेट स्पीड से हर पड़ाव पार कर रही है।

पत्रकार से उद्यमी फिर आम आदमी पार्टी के नेता बने शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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सुभाष चंद्रा ने केजरीवाल पर मानहानि का मुकदमा ठोंका, कोर्ट ने नोटिस भेजा

Sheetal P Singh : सुभाष चन्द्रा ‘जी’ टेलिविज़न के विभिन्न अवतारों के मालिक हैं। इसके अलावा इनके तरह तरह के बिज़नेस हैं! पता चला कि उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र हरियाणा और कुछ अन्य जगहों पर इनकी कंपनियाँ बड़ी सड़कों के निर्माण का काम भी करती हैं जो आजकल की मंदी के दौर में दुधारू गाय है! वे ख़बरों के जरिये ब्लैकमेल के एक आरोपी भी हैं पर देश के उन समर्थ लोगों में हैं जिन्हे क़ानून पकड़ने से पहले परिभाषा बदल लिया करता है!

कहावत है कि पैसा मेहनत / ईमान / नैतिकता से नहीं कमाया जाता! सुभाष जी के पास बहुत पैसा है! फ़िलहाल केजरीवाल ने इन्हें वह कह दिया था जो मैं इस पोस्ट में नहीं कह रहा हूँ! आज उस अदालत ने जो इनको ब्लैकमेल के मामले में सीखचों के पीछे न ठेल पाई , इनकी मानहानि करने के आरोप में केजरीवाल को नोटिस कर दिया है। केजरीवाल हमारी आपकी तरफ़ से बहुत से ऐसे लोगों की मानहानि करते रहते हैं जिनको हम भी गरियाना चाहते हैं पर बचते हैं, जेल तक जा चुके हैं, फिर जा सकते हैं, डरते नहीं, ज़िद्दी हैं…. वे केजरीवाल जो हैं!

वरिष्ठ पत्रकार और ‘आप’ नेता शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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पंजाब और गोवा में ‘आप’ दिल्ली जैसा चमत्कार करने जा रही!

Sheetal P Singh : पंजाब में सारा स्थानिक प्रिंट मीडिया और टीवी चैनल खुला “पेड न्यूज़” है। “आप” वालों की करीब तीस बड़ी सभाएँ रोज़ हो रही हैं। इनमें से चार पाँच विशाल और फैसलाकुन होती हैं। जवाब में कांग्रेस की दस के आसपास और अकाली बीजेपी की चार पाँच हो रही हैं।

कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर के अलावा किसी के लिये कोई कौतूहल नहीं है और बीजेपी अकाली युति की सभायें फ्लाप हो रही हैं पर स्थानिक मीडिया में यह अस्पष्ट है। कल अमृतसर में रविंदर सुलतानविंड ने इसे साफ़ किया। RTI activist और आप के असफल टिकटार्थी रविंदर का छोटा भाई एक स्थानीय दैनिक का रिपोर्टर है, ने बताया कि बिना “पैकेज” के मीडिया यहाँ किसी को कवर नहीं करता।

खैर, दिल्ली की तरह आप की लहर तैयार हो रही है पंजाब में, मीडिया की खुली आपराधिक होस्टिलिटी के बावजूद। सिवाय जालंधर और अमृतसर के लगभग हर जिले में अंधड़ तैयार है। आज यहाँ बारिश हो रही है पर यह भी आती हुई आँधी को रोक न पायेगी, कुछ देर का ब्रेक भले ही ले ले!

रही बात कैप्टन की तो लांबी में जमानत ज़ब्ती की ओर और पटियाला में बहुत कड़ी लड़ाई में ख़ुद अपनी सीट पर फँसे हुए हैं। मालवा (पंजाब) में ‘आप’ नेता भगवंत मान का जलवा है। मालवा में पंजाब की कुल ११७ में से ६५ सीटें हैं। मान यहाँ तूफ़ान हैं। उन पत्रकारों / चैनलों को एक बार फिर अपना थूका चाटने को मजबूर करती सनद जिन्होंने तथाकथित सर्वेक्षण में “आप” को कुल बारह सीट और तीसरा स्थान देकर श्वानभक्ति में अव्वल हासिल किया हुआ है।

गोवा में “आप” की सभाओं में जबरदस्त भीड़ हो रही है। गोवा में दो हज़ार लोग किसी सभा में आ जुटें तो वह सुपर हिट मानी जाती है। लेकिन ‘आप’ की सभाओं में जोरदार भीड़ है। गोवा में भी कुछ अप्रत्याशित हो रहा लगता है। कुल चालीस सीटों के लिये केन्द्रीय सरकार के इक्कीस मंत्रियों के प्रचार कार्यक्रम यह बताते हैं कि रक्षा मंत्री के गृहराज्य में भी भाजपा की घबराहट से हवा टाइट है।

पंजाब और गोवा में लगातार सक्रिय रहकर हवा का रुख भांप रहे वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी में जंगलराज : …उस ग़रीब की किस्मत पर अगले दिन थानेदार ने ‘अपहरणकर्ता’ लिख दिया!

Sheetal P Singh : यह एक सौ प्रतिशत सच्ची कथा है… सत्ताइस बरस के दलित / पिछड़े शासन के बावजूद किसी दलित / पिछड़े की यूपी में कितनी सुनवाई है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं…उ०प्र० के अवध क्षेत्र के एक गाँव में एक मल्लाह परिवार एक ठाकुर साहब की जायदाद पर (जंगल और नदी का तट) हाड़तोड़ मेहनत से कुछ बँटाई की खेती और कुछ जंगली उत्पाद (जलाऊ लकड़ी) आदि के संयोजन पर जीवित है। पति पत्नी और कुछ बच्चे!

ठाकुर साहब के जंगल में एक दो कमरे का पक्का घर और इस मल्लाह परिवार का झोपड़ा है। कुछ सैकड़ा जंगली और कुछ दर्जन इमारती दरख़्त और साथ बहती नदी। एक दुबे जी यहाँ लकड़ी के ठेकेदार के तौर पर नमूदार हुए। उनके बेरोजगार बेटे और उसके कुछ दोस्त पक्के घर में जम गये और जंगली लकड़ी कटवाने लगे। बियाबान देखकर उन्होंने एक कुटीर उद्योग भी डाल लिया। पड़ोस के जिले से एक “पकड़” कर लाये और साथ डाल लिया। पकड़ के बाप ने हाल ही में जमीन बेची थी सो दुबे जी के सपूत और उनके गैंग ने पचीस लाख की फिरौती तय कर ली।

मल्लाह परिवार इस ठेकेदार क्लब को भोजन सप्लाई करता और बचत से अपने बच्चों का पेट भरता। एक रात पुलिस आई। दुबे जी के सपूत को फोन आ चुका था वे तो फुर्र हो गये पर पुलिस मल्लाह को ले गई। ठोंका और किसी क़िस्म की घूस दे पाने में अक्षम बेगुनाह को तीसरे दिन अपहरणकर्ताओं के साथ मुलज़िम क़रार दे दिया। मजिस्ट्रेट सिर्फ पुलिस का लिखा पढ़ते हैं आदमी का माथा नहीं! सो पैंतालिस बरस नदी किनारे किसी तरह ज़िन्दा रहने के बाद पहली बार मल्लाह को पता लगा कि जेहल क्या होती है, मुक़दमा और वक़ील क्या होता है? वक़ील जमानत की फ़ीस लेता है। फ़ीस केस की धारा के हिसाब से होती है और हज़ूर लोगों के पास किसी मजलूम की फ़रियाद सुनने का बखत नहीं होता।

दुबे गैंग फ़रार है वह कोर्ट में सुविधानुसार समर्पण करेगा। उत्तर प्रदेश के करीब ३५ बरस से पत्रकार (मान्यताप्राप्त) ने जिले के कप्तान साहेब को चालान से पहले तथ्य बता दिये थे पर साहब को उस समय नींद आ रही थी। वे सो गये और उस ग़रीब की क़िस्मत पर अगले दिन थानेदार ने “अपहरणकर्ता” लिख दिया जिसने शायद पच्चीस हज़ार रुपये भी एक साथ आजतक अपने हाथ में न पकड़े हों! मल्लाह की बीबी जमानत के लिये वक़ील की फ़ीस भरने के लिये आस पड़ोस में हफ़्ते भर से चन्दा और रहम माँग रही है। मैं पोस्ट लिख रहा हूँ, नेता जी परिवार का झगड़ा सुलझा रहे हैं, बीजेपी राम जी की चिंता में है, मायावती मुसलमानों की चिंता में!

लेखक शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और मूलत: सुल्तानपुर के निवासी हैं. उनका यह लिखा उनकी एफबी वॉल से लिया गया है.

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केजरीवाल से डरी भाजपा यूपी के साथ गुजरात में भी विस चुनाव कराने के पक्ष में!

Sheetal P Singh : ब्रेकिंग न्यूज़… डेटलाइन गुजरात… गुजरात में एक साल पहले पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों के साथ हो सकते हैं विधानसभा चुनाव। TV चैनलों के “ब्लैक आउट” और राष्ट्रीय प्रिंट मीडिया की घबराई रिपोर्ट्स के बावजूद केजरीवाल की सूरत के योगी चौक पर पहली रैली लगभग पूरी शांति से कामयाब हो गई। कुछ युवकों ने काले झंडे लहराये पर उन्हे बिलकुल भी स्थानीय समर्थन नहीं मिला। इसके पहले आप विधायक और गुजरात प्रभारी गुलाब यादव को मंच पर गिरफ्तार करके टीवी की ख़बर बनाने का अमित शाह का प्लान (आप नेता अंकित लाल के ट्वीट के अनुसार) भी धरा रह गया।

गुलाब यादव ने दिन में ही रैली के पाँच घंटे पहले सूरत पुलिस को खुद समर्पण कर इस स्कीम को फेल कर दिया। संयोग ही है कि गुजरात आप के अध्यक्ष कनु कलसारिया यादव हैं और गुजरात प्रभारी भी गुलाब यादव! हालाँकि गुजरात में यादव कुल तीन फ़ीसद ही हैं पर आप की गुजरात में ग़ैर ब्राह्मण छवि (सूरत बीजेपी के एक विधायक के आरोप के अनुसार) उसे एक नया राष्ट्रीय कलेवर दे सकती है। कनु कलसारिया गुजरात में सम्मानित नाम हैं।

गुजरात “आप” में बड़े रेडिकल क़िस्म के दलित और ग़ैर ब्राह्मण नेतागण हैं। ब्राह्मणों के एक संगठन ने इस कारण केजरीवाल का कड़ा विरोध भी किया। अहमदाबाद में काले झंडे दिखाने वाले इसी संगठन के थे। पाटीदार अनामत आंदोलन (पटेल समुदाय का) के साथ तो केजरीवाल ख़ास संबंध बनाते दिख रहे हैं। सूरत का योगी चौक (जहाँ सभा हुई) पाटीदारों का गढ़ है। यहाँ कोई भी नेता सभा करने से पहले सौ बार सोचता है। अमित शाह डर कर दो किलोमीटर दूर सभा करने गये थे पर केजरीवाल का यहाँ से गुजरात में श्रीगणेश करना (सफलतापूर्वक) बड़े दूर की कौड़ी है।

कांग्रेस के एक पार्षद महोदय के साथ कल दिन में बातचीत हो रही थी। उन्होंने माना कि “गुजरातियों में कारोबार में मंदी के कारण और तमाम कारणो से पाटीदार आंदोलन दलित आंदोलन और पिछड़ा वर्ग के आंदोलन में लोगों की भारी संख्या दर्ज हो रही है जिसे केजरीवाल कैस कर सकता है क्योंकि उनकी लीडरसिप के पास कोई प्रोग्राम ही नहीं है गुजरात में!”

भाजप (गुजराती भाजपा को भाजप ही कहते हैं) गुजरात में बहुत मज़बूत पार्टी है। २०१४ में इसे करीब ५९% वोट मिले थे। पर मोदी जी के दिल्ली पहुँचने के बाद इसके खिलाफ जन आक्रोश बहुत बड़े पैमाने पर ज़ाहिर हो रहा है। हालाँकि यूपी बिहार वालों / मराठियों और अन्य परप्रान्तियों में यह उतना गंभीर नहीं है।

सूरत शहर के दो भाजपा विधायकों (सूरत में सारे बारह के बारह विधायक भाजपा के हैं) से कल मुलाक़ात हुई। युवा मोर्चा के अध्यक्ष से भी और कुछ पार्षदों से भी। बातचीत में पता चला कि पार्टी इस संभावना की पड़ताल में लगी है कि गर यूपी के साथ साथ गुजरात में भी करीब एक बरस पहले विधानसभा चुनाव करा लें तो कैसा रहे? वजह है केजरीवाल। अब तीन महीने में तो केजरीवाल गुजरात में विकल्प बनने से रहे, कांग्रेस लुंज पुंज है ही! यह आइडिया भाजप में अंदर ही अंदर बहुत उच्च स्तर पर परवान चढ़ चुका है।

गुजरात दौरे पर गए दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की रिपोर्ट.

मूल खबर….

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संध्या बहसें टीवी चैनलों को फ़ील्ड रिपोर्टिंग से कहीं ज्यादा सस्ती पड़ती हैं

Sheetal P Singh : टीवी के जनरल कर्नल… दूरदराज़ क़स्बों छोटे मंझोले शहरों और बड़े शहरों के भीतर बसे क़स्बों के दर्शक टीवी को बड़ी श्रद्धा से देखते हैं और टी वी पूरी मक्कारी/योजना से उनकी इस अबोधता का शिकार करता है । वह इन अबोध लोगों को सूचना देने / मनोरंजित करने के दौरान तमाम घटिया माल इन खुली आँखों को परोस देता है जो भौतिक रूप में भी है और विचार के रूप में भी और खुली आँखों वाले ये अबोध उसे तालाब की भूखी मछलियों को फेंके गये चारे की तरह निगल जाते हैं!

आजकल न्यूज़ चैनलों पर रिटायर्ड फौजी अफ़सरों का बाज़ार गर्म है। कम लोग जानते होंगे कि टी वी चैनल अपने स्टूडियो में बुलाये मेहमानों को आने के पैसे देते हैं! इसी वजह से तमाम पाकिसतानी फौजी जनरल कर्नल भी बेइज़्ज़त होने के लिये वहाँ बैठे मिलते हैं। हमारे रिटायर्ड जनरलों का तो कहना ही क्या? बीजेपी जैसी विकराल पार्टियाँ अपनी लाइन के जनरलों को टीवी बहसों में विशेषज्ञ के रूप में स्थापित करने का योजनाबद्ध अभियान चलाती हैं। नतीजा यह है कि तमाम जनरल एक सी भाषा बोलते हैं जबकि सोशल मीडिया पर हम एक से बढ़कर एक क़ाबिल रिटायर्ड आफिसरों का लिखा पढ़ते हैं जो कभी टी वी डिबेट में नहीं होते!

टीवी पर परोसे गये इन जनरलों के रूप रंग हाव भाव से बीजेपी को भले फ़ायदा हो सेना की छवि को ज़बरदस्त नुक़सान हो रहा है। ज़्यादातर स्तरहीन हैं, चीख़ते चिल्लाते हैं, बेडौल शरीरों के स्वामी हैं और सुब्रह्मण्यम स्वामी के चेले लगते हैं! ये सब सरकसों में पाये जाने वाले मरघिल्ले शेरों की याद दिलाते हैं! संध्या बहसें टीवी चैनलों को फ़ील्ड रिपोर्टिंग से कहीं ज्यादा सस्ती पड़ती हैं। इसलिये सारे चैनलों ने इसे अपना लिया है। राज्यों के चैनल तो मेहमानों को कोई पैसा नहीं देते। उन्हे तो काफ़ी सस्ता पड़ता है! खैर जब तक पाकिसतान है कश्मीर सड़क पर है तब तक जनरलों कर्नलों की बनरघुडकियों के करतब देखते रहिये….

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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मंचीय सौदागर इमरान प्रतापगढ़ी से वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह का सवाल…

Sheetal P Singh : प्रशान्त भूषण बनाम इमरान प्रतापगढ़ी… मैसेज आया है कि कौम के विक्टिमहुड के बेहद सफल मंचीय सौदागर इमरान प्रतापगढ़ी ने “प्रशांत भूषण” पर कोई तंज लिख मारा है! वजह बताई है कि “उन्होंने सिवान के शहाबुद्दीन नाम के अपराधी की जमानत का सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया” और आरोप को तर्ज़ पहनाई है कि पड़ोस के “दादरी” का मामला नहीं उठाया!

इमरान प्रतापगढ़ी समेत आठ और दानिशवरों ने कौम के नाम पर अखिलेश सरकार से “यश भारती” झटका है! किसने किसने बिसाड़ा के मामले पर लौटा दिया? प्रशान्त भूषण से हज़ार मतभेदों के बावजूद मैं पाता हूँ कि समाजी मामलात पर उनके दख़ल का किरदार मेरे जैसों और इमरान जैसों से मीलों ऊँचा और पाक है! किसी मामले में होने और हजारों मामलों में न हो पाने के बहुत से जाती और दूसरे मसले होते हैं। आदमी के हाथ पैर दो ही होते हैं! हर चीज़ बाज़ार बना दोगे तो “मोदी” हो जाओगे!

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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कारगिल जीतने वाले रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने तो कभी अपना अभिनंदन नहीं कराया

Arvind K Singh :  पिछले तीन दशक में कारगिल से बड़ी जंग तो कोई और हुई नहीं..उसमें बड़ी संख्या में जवानों की शहादत हुई। मैने भी उसे कवर किया था। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि उस दौर के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने इस मुद्दे पर अपना अभिनंदन समारोह कराया हो….अगर गलत हूं तो बताइएगा। फिर रक्षामंत्री जी आपने ऐसा क्या कर दिया। न फैसला आपका, न उसे लागू कराने गए आप…जो काम जिसने किया है उसको देश की जनता दिल से शुक्रिया कर रही है। आप तो इसे राजनीतिक रंग देने में लग गए हैं वह भी उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हो रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक के मसलेपर कड़ा फैसला लेने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री मोदी को ही मिलेगा किसी और को नहीं।

Om Thanvi : उत्तर प्रदेश के चुनाव माहौल में सर्जिकल कार्रवाई को भुनाने की भाजपा की कोशिश अप्रत्याशित नहीं है, पर अफ़सोसनाक ज़रूर है। भाजपा नेताओं द्वारा लखनऊ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर आदि शहरों में टाँगे गए बड़े-बड़े होर्डिंग और पोस्टर सर्जिकल कार्रवाई के विशुद्ध राजनीति इस्तेमाल के जीते-जागते प्रमाण हैं। इन पोस्टरों के हीरो सैनिक नहीं हैं, प्रधानमंत्री मोदी केंद्र में हैं जो राम के रूप में चित्रित हैं, नवाज़ शरीफ़ रावण हैं और केजरीवाल विभीषण।

आज लखनऊ और आगरा में रक्षामंत्री पर्रिकर के अभिनंदन में जो समारोह हुए, वहाँ भी हर होर्डिंग पर रक्षामंत्री के साथ गृहमंत्री राजनाथ सिंह (लखनऊ सांसद) और अन्य छोटे-बड़े भाजपा नेताओं के चेहरे और नाम सुशोभित थे। आगरा की गलियों तक में मोदी और पर्रिकर के ‘शौर्य प्रदर्शन’ के लिए “वंदन-अभिनंदन और शत्-शत् नमन” वाले पोस्टर सजे।  इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुज़फ़्फ़रनगर में “हम तुम्हें मारेंगे और ज़रूर मारेंगे” वाले होर्डिंग लगे हैं जिनमें मोदी के साथ अमित शाह को भी शामिल किया गया है। स्थानीय भाजपा नेता तो मौजूद हैं ही। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में यह सिलसिला दो रोज़ पहले शुरू हुआ है, मुंबई की एक भाजपा नेता ने तो सर्जिकल कार्रवाई की ख़बर के रोज़ ही पंजाब के मतदाताओं से समर्थन की अपील कर दी थी।

बेचारे राहुल गांधी अपनी भाषा में फँस गए, वरना उड़ी में बड़ी संख्या में हमारे सैनिक मारे गए, जवाब में सर्जिकल कार्रवाई हमने की और अब हफ़्ते भर के भीतर उसका चुनावी फ़ायदा उठाने की कार्रवाई भाजपा ने कर डाली। दलाली अच्छा शब्द नहीं, पर बेहतर भाषा में भी इसे आख़िर क्या कहा जाना चाहिए? फ़ौज़ी कार्रवाई की चुनावी ब्रांडिंग और मार्केटिंग! नहीं क्या?  हर राजनीतिक दल को भाजपा की इस मार्केटिंग को मुद्दा बना कर बेनक़ाब करना चाहिए। फ़ौज़ी कार्रवाई का राजनीतिक लाभ इंदिरा गांधी को मिला होगा और अटल बिहारी वाजपेयी को भी – लेकिन चुनाव में सैनिकों के शौर्य को अपना शौर्य बताकर वोट खींचने का काम पहली बार हो रहा है। सरेआम।

Sheetal P Singh : सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सेना के जिन वीरों ने अपने कंधे पर मोर्टार लादकर तीन किलोमीटर तक पाकिसतान की सीमा में पैदल मार्च किया, शत्रुओं के कैम्पों पर गोले दागकर उनका सफ़ाया किया, देसभगत पारटी ने देस के कोने कोने में उनके पोस्टर चपकाने का काम किया है। पहले चरण में यू पी उततराखंड पंजाब और गोवा में ये पोस्टर लगाये जा रहे हैं! आप भी आइये और वीरों के चित्र पर पुष्पगुच्छ चढ़ाइये।

Nadim S. Akhter : “खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा वाली कहावत भूल जाइए. अब बोलिए खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी. मतलब जान दे हमारे सैनिक और चुनावी फसल काटे मोदी जी. इसी की तो आशंका थी, यही तो हो रहा है. सैनिकों की जान के साथ भी राजनीति ! धिक्कार है ऐसी ओछी राजनीति पे. क्या मोदी जी के हनुमान इस पोस्टर पर ये नहीं लिख सकते थे कि —देश के लिए जान देने वाले सैनिकों को नमन —- गौर से देखिए. सैनिकों की जगह वे मोदी जी और पर्रिकर जी को शत-शत नमन कर रहे हैं. तभी तो कह रहा हूं-  खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी.”

पत्रकार द्अरविंद कुमार सिंह, ओम थानवी, शीतल पी. सिंह और नदीम एस अख्तर की एफबी वॉल से.

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इंग्लैंड में मोदी : भारतीय मीडिया कुछ तो छुपा रहा है…

वैसे तो मोदी जी की विदेश यात्रायें आपका सुख चैन खबर बाखबर सब नियंत्रित कर लेती हैं, आप चाह कर भी मोदीमय होने से बच ही नहीं सकते। सारे चैनल उनका ही मुखड़ा दिखाते मिलते हैं और सारे अख़बार उन्हीं पर न्योछावर। सोशल मीडिया पर भी वही छाये रहते हैं पक्ष हो या विपक्ष! पर इस बार यह सब होते हुए भी कुछ और भी है जिसकी परदेदारी तो है पर वह परदे में समा नहीं रहा! इस बार लंदन में मोदी का भारी विरोध हुआ और अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में और सोशल मीडिया में उसने खासी हलचल पैदा की।

यह तब हुआ जब डोमेस्टिक पिच पर वे बुरी तरह से बिहार हार कर लंदन पहुँचे थे तो यहाँ भी एक बड़ा समाज उनके विरोध की परदा फाड़ कर आती ख़बरों में रुचि दिखा रहा था।

मोदी जी के विरोध में इस बार सबसे बड़ी संख्या नेपालियों की है फिर सिक्ख मुसलमान वामपंथी लिबरल लोग हैं। नेपाल में ज़रूरी वस्तुओं के ब्लाकेड ने बड़ी बेचैनी पैदा कर रक्खी है। उसकी प्रतिध्वनि वहाँ सुनाई पड़ी। गार्डियन के नेतृत्व में लंदन में बसे साउथ एशियन इंटेल्कचुअल्स का बड़ा हिस्सा मोदी के २००२ में गुजरात दंगों को लेकर अनवरत आलोचक की भूमिका में है। इस बार उसे देश में लेखकों कलाकारों विज्ञानियों के पुरस्कार लौटाओ आन्दोलन की ऊष्मा भी मिल गई। नतीजे में करीब २५० लेखकों पत्रकारों कलाकारों सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक ख़त जारी कर विरोध को पंख दे दिये।

मोदी के पास ब्रिटिश सरकार को ललचवाने का काफ़ी कुछ था। रफायेल के मामले में फ़्रांस से पिछड़ गये ब्रिटिशर्स इस बार कोई चूक नहीं करने वाले थे। संयुक्त संसद में भाषण, रानी के साथ लंच और कैमरून के आउट हाउस में डिनर रख कर अंग्रेज़ पूरी बिसात बिछा चुके हैं।

स्मार्ट सिटीज के पैकेज के बड़े हिस्से को हड़पने को आतुर अंग्रेज़ डिफ़ेन्स में भी नज़र गाड़े हुए हैं जिसमें अमरीका इज़रायल और फ़्रांस बड़ा हाथ मार रहे हैं। लंदन विज़िट में टाटा ग्रुप मोदी का अगुआ रहा। जैगुआर कारख़ाने में मोदी का विज़िट तय है ही। टाटा ने इस डील में बहुत हाथ जलाया पर अब यह कंपनी चल पड़ी है। दोनों प्रधानों ने इसका नाम लिया।

“वेंबले”! फ़ुटबॉल के इस मैदान में खचाखच भीड़ को मेसमेराइज करने के कार्यक्रम से मोदी अपने लंदन भ्रमण का समापन करेंगे। हमारे चैनल कई दिनों से इस मैदान को इतने एंगल से दर्शकों को परोस चुके हैं कि चप्पा चप्पा लोगों को पता है।

इंग्लैंड के करीब १५ लाख भारतीयों के उस तबके के लिये यह एक अलग इवेंट है जो टूरिस्ट मोड में यू के में रहता है और अंग्रेज़ों के लिये कौतूहल जिनके नेताओं की ज़िन्दगी में इतनी बड़ी भीड़ एक जगह भाषण सुनने के लिये मिलना किसी अजूबे से कम नहीं।

लेखक शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे चौथी दुनिया की लांचिंग टीम के हिस्सा रहे हैं. अमर उजाला से पत्रकारीय करियर शुरू करने के बाद इंडिया टुडे में भी काम किया. इन दिनों वे बतौर सोशल मीडिया जर्नलिस्ट एक्टिव हैं. शीतल पी. सिंह से संपर्क singh.p.sheetal@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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एबीपी न्यूज़ पर संबित पात्रा के साथ राकेश सिन्हा ने तो मुनव्वर राना और अतुल अंजान को लगभग नोंच डाला था!

Sheetal P Singh : प्रो. राकेश सिन्हा ने आज RSS के ९० साल के होने और उसके राजनीतिक मंच के दिल्ली के तख़्त पर आसीत रहने के दिन गर्वोक्ति ज़ाहिर की है कि अब उनकी विचारधारा ही चलेगी और दिनोंदिन और बढ़ेगी, दुनिया इसे मान रही है, विश्व गुरू, आदि अनादि! टीवी की संध्या बहसों में वे पिछले कुछ वर्षों में संघ के विचारक के तौर पर स्थापित हैं, वामपंथ सेक्युलरिज़्म और भौतिकवाद को गया गुज़रा, इतिहास के “कूरेदान” में पड़ा मान कर ख़ारिज कर दिया करते हैं! हाल ही में एबीपी न्यूज़ पर मुनव्वर राना और अतुल कुमार अंजान को तो संबित पात्रा के साथ उन्होंने लगभग नोंच डाला था, कई बार लगा हाथापाई अब हुई तब हुई।

इनकी विचारधारा है क्या ? देश की करीब ८०% आबादी हिन्दू है और बाकी में सभी क़िस्म के अल्पसंख्यक। इन ८०% को २०% के संभावित ख़तरे और अतीत के कुछ वास्तविक और कुछ कृत्रिम मामलों के बदले के लिये भड़काकर सत्ता हथियाना! इसमें ऐसा विशेष क्या है जिससे कोई गौरवान्वित हो? दुर्योग से हिन्दू समाज की संरचना ने इनको विरासत से जाति के नाम पर इकट्ठा संगठन दे दिया जिसमें इन्होंने समर्थ घोड़ों पर सवारी गाँठ ली और स्वयं को विजयी घोषित कर लिया!

महाशय इस महादेश में कमज़ोर को सामर्थ्य देने का काम एक महती काम रहा है न कि ताक़तवर को और ताक़तवर बनाने के लिये शिलाजीत बेचना, जो कोई भी कर सकता है मसलन शिव सेना जैसे हिंसा और भयभीत करने वाले दल भी क्षेत्र विशेष में राजनैतिक रूप से सफल होते रहते हैं। तमाम अपराधी भी अपने प्रभाव क्षेत्रों में दशकों राजनैतिक मुखिया बने रहते हैं! कठिन काम गांधी जी ने किया आंबेडकर जी ने किया लोहिया जी ने किया कांशीराम जी ने किया वामपंथ ने किया, वे निर्बल की आवाज़ बने और सबल का सामना किया।

आप की सत्ता और कांग्रेस की सत्ता में फ़रक करना मुश्किल है सिवाय इसके कि जितनी मंहगाई वे दस साल में बढाते हैं उतनी आप एक साल में। वे मुसलमानों को लालीपाप दिखाते हैं आप बहुमत हिन्दुओं को। वे मीडिया में ३०% क़ब्ज़ा करते हैं आप १००%। उनके ज़माने में भी ब्राह्मणों के बहुमत नेतृत्व में नौकरशाही दिल्ली की सरकार पर क़ाबिज़ रहती है आपके भी! वे आलोचना होने पर थोड़ा बहुत शर्माते भी हैं आप तो ढीठ हैं आलोचक पर ही सवार हो जाते हैं! बारडर पर वे भी सैनिक मरवाते हैं आप भी, कुछ ज़्यादा ही!

एक काम उनसे ज़्यादा करते हैं कि समाज में अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ज़्यादा बढ़ा देते हैं जो मंहगाई बेकारी लूट पर बढ़ते असंतोष पर परदे के काम आ जाता है, बाकी त जो है सो हइयै है। दलित और पददलित किये जाते हैं पिछरे और पछारे जाते हैं। गाय गंगा गीता का गीत नेपथ्य में बजता रहता है और कभी कभी भाल्यूम बढ़ा दिया जाता है! हाँ आप टीवी पर उनसे कहीं ज़्यादा चिल्लाते हैं! और आपके पीएम उनके पीएम से सौ गुना ज़्यादा बार कपरा बदलते हैं! बाकी आप बोलते ही हैं लिखते तो कुछ हैं नहीं सिवाय प पू गोलवलकर पर किताब के तो आपको पकरा तो जा नहीं सकता?

जियत रहा बाबू रकेस सिन्हा
वन्दे मातरम

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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लालू के बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी की चुनावी सीट घोषित, मीसा भारती नहीं लड़ेंगी

लालू यादव से बातचीत के दौरान ब्रेक के वक्त वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह (बाएं से प्रथम) और अन्य वरिष्ठ मीडियाकर्मी.

लालू यादव ने अपने दो पुत्रों तेजप्रताप और तेजस्वी यादव को चुनाव लड़ाने की घोषणा कर दी है. ये दोनों क्रमश: महुआ और राघोपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे. बेटी मीसा भारती चुनाव नहीं लड़ेंगी. वो अपना पूरा वक्त चुनाव प्रचार में देंगी. यह खुलासा लालू यादव ने वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह से एक विशेष बातचीत के दौरान किया. 

 लालू यादव ने शीतल पी. सिंह से बातचीत के दौरान बताया कि बिहार चुनाव इस देश को दिशा देने वाला साबित होगा. सदियों से वंचित तबके के लोग बिहार में न सिर्फ सत्ता में आएंगे बल्कि सांप्रदायिक और देश-समाज बांटने वाली ताकतों को धूल चटाएंगे. अपने परिवार के सदस्यों को चुनाव लड़ाए जाने के सवाल पर लालू यादव ने कहा कि उनके दो पुत्र चुनाव लड़ेंगे. कौन-कौन लड़ेंगे और किन-किन सीटों पर लड़ेंगे? इस सवाल पर लालू ने बताया कि तेजप्रताप और तेजस्वी यादव चुनाव लड़ेंगे. इनके लिए महुआ व राघोपुर सीट तय किया जा चुका है. बेटी मीसा भारती को चुनाव लड़ाए जाने के सवाल पर लालू यादव ने कहा कि वो चुनाव नहीं लड़ेंगी. हां, वे चुनाव प्रचार में शिरकत करेंगी और अपने सभी लोगों को जिताने के लिए सभाओं को संबोधित करेंगी.

उल्लेखनीय है कि महुआ विधानसभा से राजद के जागेश्वर राय के नाम की चर्चा थी. लेकिन जब उन्हें पता चला कि लालू पुत्र तेजप्रताप यहां से चुनाव लड़ेंगे तो उन्होंने बागी तेवर अपना लिए. जागेश्वर राय के समर्थन में सभी 36 पंचायतों के अध्यक्षों ने राजद से अपना सामूहिक इस्‍तीफा दे दिया था. जागेश्‍वर राय ने राजद पर हमला बोलते हुए यहां तक कहा था कि लालू के पुत्र मोह के कारण राजद बर्बाद हो रहा है.

दरअसल लालू ने बहुत सोच समझ कर अपने बेटों के लिए महुआ और राघोपुर विधानसभा क्षेत्र चुना है. दोनों विधानसभा क्षेत्र यादव बहुल है. वहां राजद का ‘माई’ समीकरण अधिक मजबूत है. हालांकि पिछली बार दोनों जगहों पर उसे हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन इस बार स्थितियां बिलकुल अलग हैं. राघोपुर राबड़ी देवी का चुनाव क्षेत्र है. पिछली बार राबड़ी खुद यहां से चुनाव हार गई थीं, तब जदयू और भाजपा के बीच गठबंधन था. पिछली बार जदयू के सतीश कुमार ने नीतीश लहर पर सवार होकर जीत हासिल की थी. अबकी बार राजद और जदयू साथ हैं. महुआ विधानसभा क्षेत्र भी यादव बहुल क्षेत्र है. पिछली बार यहां से जदयू के रवीन्द्र राय ने राजद के जगेश्वर राय को हराया था.

ये वहीं जगेश्वर राय हैं, जिनके समर्थकों ने हाल ही में महुआ में एक कार्यक्रम के दौरान लालू प्रसाद द्वारा अपने पुत्र तेजप्रताप को उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा करने पर विरोध जताया था. इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में तेजस्वी और तेजप्रताप के मैदान में उतरने से राजद कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह है. वैसे विरोधी खेमा भी लालू के खिलाफ गोलबंद है. भाजपा इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में यादव जाति के कद्दावर उम्मीदवारों की खोज में जुटी है. देखना है कि तेजप्रताप और तेजस्वी अपने पिता के उत्तराधिकार को हासिल करने के वास्ते जंग जीतने में सफल हो पाते हैं या नहीं.

बिहार दौरे पर गए शीतल पी. सिंह द्वारा पटना में लालू यादव से हुई बातचीत पर आधारित. संपर्क: +91 9810409181

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दिल्ली पुलिस की अफरातफरी और राजनीति का गंदा खेल : वक्त बताएगा किसने क्या खोया और क्या पाया…

Om Thanvi : किसी एफआइआर पर पुलिस मंत्री क्या पार्षद के खिलाफ भी इतनी अफरातफरी में हरकत में नहीं आती। तोमर पर लगे आरोप नए नहीं हैं, अदालत में मामला पहले से है। अगर उन्होंने फर्जीवाड़ा किया है तो निश्चय ही सजा मिलनी चाहिए, मंत्री पद से छुट्टी तो होनी ही चाहिए। वैसे आप सरकार भी इसकी दोषी तो है कि अब तक न भीतरी लोकपाल नियुक्त किया है न बाहरी। तोमर की ‘असली’ डिग्रियां पेश करने का वादा भी अब तक पूरा नहीं किया गया है। लेकिन इसके बावजूद दिल्ली पुलिस की आज की नाटकीय गतिविधि संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल आती। सवाल यह है कि कल कोई एफआइआर शिक्षामंत्री स्मृति ईरानी पर डिग्री (यों) वाले उनके फर्जी हलफनामों के लिए दर्ज होती है तो क्या पुलिस इसी जोशोखरोश में पेश आएगी?

संशय तो इसमें भी है कि एफआइआर दर्ज भी हो पाएगी कि नहीं। दिल्ली पुलिस – जो केंद्र और उसके बंदे एलजी के प्रति ज्यादा वफादार है – का अतिउत्साह साफ जाहिर है और उसे अपनी घटती विश्वसनीयता की फिक्र करनी चाहिए। लेकिन वह भी क्या करे जब संविधान की गलियां उलटे-सीधे कामों के लिए केन्द्र सरकार से लेकर उपराज्यपाल खुद ढूंढ़ते फिरते हैं। मजा देखिए कि दिल्ली सरकार को भ्रष्टाचार से लड़ना है, पर नजीब जंग ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में अपना बंदा छोड़ दिया है – चुनी हुई सरकार की मंशा की परवाह किए बगैर। भाजपा के लिए कहना आसान होगा कि उनकी इन घटनाओं में कोई भूमिका नहीं है। पर उनका भरोसा कितने लोग करेंगे? पिछले महीने यह अधिसूचना जारी कर केंद्र सरकार ने आग में घी डाला था कि दिल्ली का प्रशासन और सेवाएं जनता के हाथ अर्थात चुनी हुई सरकार के पास नहीं हैं, केंद्र द्वारा मनोनीत उपराज्यपाल के पास हैं। कुल मिलाकर राजनीति का बड़ा गंदा खेल खेला जा रहा है, इसमें किसने खोया किसने पाया इसका हिसाब वक्त ही देगा।

Sheetal P Singh : तोमर और हम… हम जिस समाज से हैं वहाँ किसी कमज़ोर व्यक्ति (स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़े या अल्प/अर्ध शिक्षित या अशिक्षित) के पास अपने ख़िलाफ़ हुए / हो रहे / हो सकने वाले गुनाह के मामले में न्याय पाने की गुंजाइश बहुत कम होती है! शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में एक स्थानीय पत्रकार को एक मंत्री और पुलिस के कारकुनों ने ज़िन्दा जला दिया। अभी सिर्फ FIR हुई है और न्याय बहाने ढूँढ रहा है! राजस्थान में एक मंत्री गंभीर अपराधों में अदालत और पुलिस को वांछित है, मिल ही नहीं रहा है! मध्य प्रदेश के बरसों चले “व्यापम” घोटाले की हाई कोर्ट जाँच करवा रहा है SIT बनी हुई है पर उपर के छोर राजभवन और मुख्यमंत्री आवास की ओर सिर्फ इशारा करते हैं पहुँच नहीं पा रहे हैं! क़रीब ४१ लोग इस क़वायद में संदिग्ध रूप से दुनिया कूच कर गये!

२००२ में गुजरात में दुनिया के टीवी चैनलों/अख़बारों के सामने हज़ारों लोग तलवारों से भालों से कटे / गोदे जलाये फूंके मृत/घायल दर्ज हुए। कुछ लोग पकड़े गये, जो बड़े थे बाहर हैं, कुछ साधारण सज़ा पा गये पर असाधारण” तक क़ानून ही नहीं पहुँच पाया, फ़ेल कर गया! १९८४ में दिल्ली के हज़ारों सिक्ख फूँक दिये गये, टाइटलर और सज्जन कुमार बेगुनाह बने रहे! बिहार के दुर्दम नरसंहारों के आरोपियों को क़ानून ने मासूम माना, मरने वाले दलित वलित थे! पर हम चाहते हैं कि “तोमर” को पुलिस पीटे / घसीटे कमर से रस्सी बाँध हथकड़ी लगाये टीवी क्लिप दे, सलमान को घंटों में आज़ाद करने वाले हाईकोर्ट तोमर मामले में सुनवाई की अगली तारीख़ दे दें, पुलिस रस्सी का साँप बना ले और हम दुनिया के सामने “न्याय” साबित कर दें! बहुत सारी पोस्ट्स कुछ ऐसी ही ध्वनि पैदा करती लगीं! या हम क़रीब तीस फ़ीसद धूर्त मक्कार बड़ी जात/बड़े पद/बड़े घर वाले पचपन फ़ीसद झुग्गी, कच्ची बस्ती, अकलियत और कुछ संवेदनशील लोगों के बेहतरी के सपने पालने के गुनाह की सज़ा आयद कर रहे हैं!

वरिष्ठ पत्रकार द्वय ओम थानवी और शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को दूसरे पत्रकार ने ‘Certified Modified journo’ करार दिया!

(वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह)

शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में चौथी दुनिया की लांचिंग टीम के हिस्सा थे. इंडिया टुडे में भी काम कर चुके हैं. अमर उजाला से अखबारी करियर शुरू करने से पहले शीतल सोशल और पोलिटिकल एक्टिविस्ट हुआ करते थे. देश समाज बदलने का जज्बा लिए ग्रासरूट लेवल यानि गरीबी के ग्राउंड जीरो पर काम किया करते थे. बाद में बिजनेस में आए और अपने उद्यम से आर्थिक रूप से समृद्ध हो गए. लेकिन इस भागमभाग में मीडिया कहीं पीछे छूट गया. अब फेसबुक और ट्विटर ने उन्हें फिर से लिखने कहने बोलने का माध्यम दे दिया है.

शीतल पी सिंह ने अपने फेसबुक वॉल पर आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को Certified Modified journo करार दिया है. सुमित अवस्थी ने एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने पीएम के डायरेक्ट आए मैसेज को दिखाया है और पीएम के एक साल पूरा होने पर उनकी तारीफ की है. दरअसल सुमित अवस्थी उसी आईबीएन7 के संपादक हैं जिसके मालिक मुकेश अंबानी हैं. मुकेश अंबानी ने लोकसभा चुनाव से पहले ही सबको कह दिया था कि इस बार मोदी का भरपूर सपोर्ट करना है. देखते ही देखते आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन से मोदी को लेकर क्रिटिकल रुख रखने वालों को भगा दिया गया और मोदी भक्त पत्रकारों की जमात को जोड़ा जाने लगा.

नतीजा ये कि अब इन चैनलों में कोई बहस नहीं होती, एकतरफा दुष्प्रचार किया जाता है. मोदी और अंबानी को महफूज रखते हुए बाकी सभी पर ये चैनल हमलावर रहते हैं. इस पूरे गेम को महीन नियंत्रण संचालन सुमित अवस्थी और अन्य इन्हीं जैसों द्वारा किया जाता है. इसके बाद से पूरे मार्केट में आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन के संपादकों-पत्रकारों की हैसियत पर बट्टा लग गया है. देखिए सुमित अवस्थी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट और शीतल पी सिंह का स्टेटस.

Sheetal P Singh : Certified Modified journo exhilarating by his achievement…

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अंबानी के रिलायंस और नमो की सरकार के खिलाफ बोलने से क्यों कतरा रहे हैं बड़े मीडिया घराने

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दिल्ली विस चुनाव में न्यूज चैनल खुल्लमखुल्ला ‘आप’ और ‘भाजपा’ के बीच बंट गए हैं

Dayanand Pandey : दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार टीवी चैनल खुल्लमखुल्ला अरविंद केजरीवाल की आप और भाजपा के बीच बंट गए हैं। एनडीटीवी पूरी ताकत से भाजपा की जड़ खोदने और नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोकने में लग गया है। न्यूज 24 है ही कांग्रेसी। उसका कहना ही क्या! इंडिया टीवी तो है ही भगवा चैनल सो वह पूरी ताकत से भाजपा के नरेंद्र मोदी का विजय रथ आगे बढ़ा रहा है। ज़ी न्यूज, आईबीएन सेवेन, एबीपी न्यूज वगैरह दिखा तो रहे हैं निष्पक्ष अपने को लेकिन मोदी के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाने में एक दूसरे से आगे हुए जाते हैं। सो दिल्ली चुनाव की सही तस्वीर इन के सहारे जानना टेढ़ी खीर है। जाने दिल्ली की जनता क्या रुख अख्तियार करती है।

Sheetal P Singh : नरेन्द्र मोदी सचमुच में एक क़ाबिल राजनेता हैं बड़ी सफ़ाई से उन्होंने दिल्ली चुनाव को केजरीवाल बनाम मोदी को नेपथ्य में डाल केजरीवाल बनाम किरन बेदी कर दिया ! बीते कुछ दिनों की मीडिया कवरेज इसकी गवाह है ! किरन बेदी कोई बीस दिन पहले तक इंडिया टुडे ग्रुप के टी वी चैनलों पर चुनाव के दौरान होने वाली बहसों में panelist का contract डिस्कस कर रहीं थीं यानि कहीं से लूप में नहीं थीं और आज दिल्ली BJP की पूरी लीडरशिप परेड में है। केजरीवाल की जीत का माहौल बनते ही तलवारें म्यान से बाहर निकल आंईं हैं । शांतिभूषण ने किरन बेदी को उस समय ईमानदारी की सनद देना तय किया जब तीस हज़ारी में दिल्ली के वक़ील उनका पुतला फूँकने के लिये इकट्ठा हो रहे थे । कल जस्टिस हेगड़े ने बीजेपी/राजनीति में आने की अफ़वाहों पर पूर्णविराम लगाकर ऐसी ही एक कोशिश धराशायी की थी । अन्ना से किरन बेदी का समर्थन कराने की कोशिशें फलीभूत न होने से भी आप” का भूषण कैम्प समय से पहले किरन बेदी की सुरक्षा में उतर पड़ा। आश्चर्यजनक रूप से कवि कुमार विश्वास भले ही केजरीवाल के साथ न दिखे हों पर मनीष और दूसरे दोस्तों के लिये वे लगातार संभायें कर रहे हैं, मीडिया बहुत समय से उन्हे मोदी कैम्प में भेज रहा है। इस नये विकास से लगता है कि जितने लोग विरोध में होने की वजह से केजरीवाल को दिल्ली जीतते नहीं देखना चाहते उससे कुछ ही कम “आप” की ऊपरी लेयर में हैं जो मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल की सामर्थ्य/राजनैतिक क़द बढ़ने के स्वप्न से घबराये हुए हैं!

Deepak Sharma : ये राजनीति है. दंगल नही. दंगल में आखिरी वक़्त पर चन्दगी राम के खिलाफ दारा सिंह को उतारकर कुश्ती जमाई जा सकती है. पर राजनीति में आखिरी वक़्त पर प्रत्याशी बदलना भारी पड़ सकता है. वैसे भी किरण बेदी प्रत्याशी है दारा सिंह नही. सवाल अब बस इतना है कि अगर किरण बेदी की कप्तानी में बीजेपी हार गयी तो क्या होगा ? इस हार का ठीकरा किस पर फूटेगा ? इस हार से हारेगा कौन ? 15 दिन की किरण बेदी को दोष दिया नही जा सकता. हर्षवर्धन पहले से ही हाशिये पर हैं. सतीश उपाध्याय का अध्याय ही समाप्त है. मुखी सुखी को जानता कौन है . तो क्या बारी अब वजीर की है? वजीर जिसने आखिरी वक़्त पर कजरी के खिलाफ किरण को उतारा. वजीर जिसने 48 घंटे में किरण को पार्टी में शामिल करवाया और 72 घंटो में मुख्यमंत्री की उमीद्वारी दे डाली. वजीर जिसने राजा से कजरी को कचरने की सुपारी ली है. मित्रों, अगर बीजेपी दिल्ली में हारी तो ये सच है कि केजरीवाल वजीर को मात देंगे और राजा को पहली बार शह. इस शह से बचने का अब एक ही रास्ता है. बाजी अब खुद राजा को लड़नी होगी. मोदीजी अब मिस बेदी का मुखौटा उतार दीजिये. आर पार खुद लड़िये केजरीवाल से. रोज़ रैली करिए गली गली. छोडिये ओबामा को. पहले इस टोपी से बचिए. आपने कभी टोपी नही पहनी .पर कहीं अब पहनने की नौबत न आ जाय. तो मोर्चा खुद संभालिये.क्यूंकि आपका वजीर फेल हो रहा है. इसलिए खुद ही कुछ करिए. जल्दी करिए . कहीं बनारस का स्कोर 1-1 न हो जाए.

वरिष्ठ पत्रकार त्रयी दयानंद पांडेय, शीतल पी. सिंह और दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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लोग बार-बार फंस जाते हैं पर जान ही जाते हैं कि खांग्रेसी और हिन्दू पार्टी में कोई अंतर नहीं है

Sheetal P Singh : नई सरकार की असलियत सामने है… अब सरकार कभी भी किसी की भी जमीन कब्जा कर लेगी। ज़मीन अधिग्रहण पर आये अध्यादेश ने इसको पूरी तरह बेनक़ाब कर दिया है। हम जानते थे पर लोगों को समझाने में असफल थे क्योंकि सारे 24×7 चैनल, सारे अख़बार, सारी पत्र पत्रकायें, रेडियो FM और पेड सोशल मीडिया ने विचार विमर्श के सारे प्लेटफार्मों पर इकतरफ़ा क़ब्ज़ा किया हुआ था, क़ब्ज़ा आज भी है पर इक्का दुक्का आलोचना और विवेक झूठ और सिर्फ़ झूठ की मार्केटिंग से बजबजाती सच्चाइयों पर पर्दा हटाने में धीरे धीरे ही सही पर नज़र आना शुरू कर चुका है।

साबित हो गया है कि सीमाओं की रक्षा में रैम्बो की तरह पेश किये गये मोदी का सीना ५६ इंच नहीं बल्कि नवाज़ शरीफ़ या जियांग जेमिन जितना ही है। बार्डर पर मारे गये एक सैनिक के बदले उधर के दस सिर काट लाने के दावे की धज्जियाँ समर्थक चैनलों पर औंधी पड़ी हुई हैं और बयानवीर सुषमा स्वराज नेपथ्य में। मंहगाई किसी चीज़ की कम नहीं हुई न बिजली के दाम। तेल में सांकेतिक कमी के बारे में भक्तों के अलावा ज़्यादातर शहरी जान गये हैं कि यह भी “विकास अली” का किया धरा नहीं है, क्रूड में आई बेतहाशा गिरावट का अंश भर है।

आस्ट्रेलिया और अमरीकी दौरे से फुलाये गये बैलून की हवा भी निकली जा रही है क्योंकि लगातार दो तिमाही में अर्थव्यवस्था मनमोहन काल से बदतर हाल में है, न export बढ़ा न manufacturing न GDP, बढ़े सिर्फ़ अंबानी अडानी। FDI बाहर से ही ताक झाँक कर रहे हैं bold steps का! RSS इसे समझ रहा है। लोकसभा के तत्काल बाद के विधानसभाई चुनाओं में ब्रांड मोदी क़रीब बाइस तेइस परसेंट का गोता लगा चुका है। अगर केजरीवाल ने अश्वमेध का घोड़ा दिल्ली में पकड़ लिया तो पिछली सदी भर से देखें जा रहे “हिन्दू राष्ट्र” के स्वप्न का क्या होगा? “धोख” हमेशा कारगर नहीं होता । लोग बार-बार फँस जाते हैं पर जान ही जाते हैं कि खांग्रेसी और हिन्दू पार्टी में कोई फ़र्क़ नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मोदी की बनारस यात्रा : स्मृति ईरानी से मात खाकर हर्षवर्धन को औकात बोध हो गया!

Sheetal P Singh : प्रधानमंत्री की आज होने वाली बनारस यात्रा से “ट्रामा सेन्टर” के शिलान्यास कार्यक्रम को रद्द कराने में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी कामयाब हो गईं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन अपनी सारी कोशिशों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मनाने में नाकामयाब साबित हुए। उन्होंने पिछले कार्यक्रम (जो टल गया था, अब हो रहा है) में इसे सबसे प्रमुख कार्यक्रम तय कराया था। क़रीब २०० करोड़ की लागत से बीएचयू में बना ट्रामा सेंटर पिछले डेढ़ साल से उद्घाटक की प्रतीक्षा कर रहा है।

सूचना यह आ रही है कि नेपाल में डेपुटेशन पर तैनात इसी संस्था के एक उच्चाधिकारी श्रीमती ईरानी के करीबी हैं और इस संस्था के सर्वोच्च पद पर तैनाती के इच्छुक हैं। स्मृति ईरानी ने हर्षवर्धन से इन्हें यह पद देने की सिफ़ारिश की थी पर दिल्ली AIIMS के CVO वाली controversy में बदनाम हुए हर्षवर्धन ने इसमें पड़ना ठीक न समझा और टाल गये। पर इस रस्साकशी में ईरानी से मात खाकर उन्हे “औक़ात बोध” जरूर हो गया है।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह के फेसबुक वॉल से.

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