GUJARAT FILES पढ़ते हुए मन में कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं…

Anil Pandey : GUJARAT FILES पढ़ते हुए मन में कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं… पत्रकार राणा अयूब की किताब GUJARAT FILES पढ़ते हुए मन में कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं। पहला यह कि तकरीबन पांच साल पहले गुजरात दंगों को लेकर किया गया स्टिंग मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर किताब कि शक्ल में क्यों प्रकाशित किया गया? दूसरा, इस किताब के प्रकाशन और प्रचार प्रसार पर इतना पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है और यह पैसा कहां से आ रहा है? इस किताब को किसी प्रकाशक ने नहीं, खुद राणा अयूब ने प्रकाशित किया है।

किताब भी देश के सबसे बेहतरीन प्रिंटिंग प्रेस थामसन प्रेस से छपवाई गई है। क्या एक पत्रकार के पास अपनी गाढ़ी कमाई में से इतना पैसा बचता है कि वह लाखों खर्च कर किताब छपवाए और मोटी रकम देकर किताब का प्रचार प्रसार कराए!!! खैर, किताब तो अभी थोड़ी ही पढ़ी है, उसमें से कुछ डायलाग तो बॉलीवुड फिल्मों जैसे लगते हैं।

जब से यह किताब रिलीज हुई है तभी इसे पढ़ने की इच्छा मन में जग गई थी। हाल ही में खान मार्केट गया था सो “फुल सर्कल” में किताब की तलाश में पहुंच गया। नई दिल्ली के एलीट मार्केट के इस चर्चित बुक स्टोर में मुझे घुसते ही राणा अयूब की किताब के दर्शन हुए। यह किताब न केवल अच्छी तरह से डिस्प्ले की गई थी, बल्कि काउंटर पर भी इस तरह से सजा कर रखी गई थी, ताकि यह यहां आने वाले लोगों का ध्यान आकर्षित कर सके। जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूं कि बुक स्टोर और रेलवे स्टेशन आदि पर किताबों और मैगजीन के स्टाल वाले किताब और पत्रिकाओं के डिस्प्ले के लिए अच्छी खासी रकम लेते हैं। बडे स्टोर पर तो यह रकम मोटी होती है।

पत्रकार नेता अनिल पांडेय के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं:

Pushya Mitra आप ऐसे सच को सामने ला रहे हैं, जिसके बारे में बात करना पाप की श्रेणी में रखा जाता है… सच यही है कि इस देश में मोदी का विरोध करना अपने आप में आज भी बेहतरीन कैरियर है… इतना ल्यूक्रेटिव कि आप साल भर में दो विदेश यात्रा कर सकते हैं और दिल्ली में थ्री-बीएचके फ्लैट खरीद सकते हैं…

Anil Pandey इसका मतलब मोदी विरोध के व्यापार में माल है?

Shashi Shekhar फिर तो मोदी समर्थन का भी कुछ दाम होगा?

Mohan Joshi पुष्य भैया : वैसे आज के दौर में मोदी पक्षधर होना भी लयुक्रेटिव बिज़नेस है। जिन लोगों ने मोदी पक्ष में बोला या लिखा उन्हें भी व्यापारिक फायदे या पद मिले हैं। अनिल सर की बात से सहमत हूँ किताब के मैरिट पर बात होनी चाहिए।

Pushya Mitra जो मुझे नजर आ रहा है उस हिसाब से मोदी विरोधी बेहतर स्थिति में हैं… तेजी से राइज करते हैं… मोदी समर्थक अभी अपना स्ट्रक्चर खड़ा करने की कोशिश में हैं… मोदी विरोधियों के सेमिनार में आने-जाने का किराया (थर्ड एसी) और दूसरी सुविधाएं मिल जाती हैं, समर्थकों के सेमिनार में अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है… यह मेरा सामान्य ऑब्जर्वेशन है… मैं दोनों जगह जाता आता रहा हूं… इसलिए मुझे पता है… 🙂

Avinash Chandra आपकी शंकाएं लाजमी हैं.. लेकिन इसके कंटेंट पर भी चर्चा होनी चाहिए। कंटेंट फैब्रिकेटेड है या थोड़ी भी सत्यता है इसमें..? किसी भी चीज की पब्लिसिटी पर पैसा खर्च करने पर सिर्फ सरकार का एकाधिकार नहीं होना चाहिए..

Anil Pandey अविनाश पब्लिसिटी और एड पर पैसे खर्चने को कौन मना कर रहा है। सवाल इसके पीछे की मंशा और एजेंडे का है। मेरे मन में सवाल आ रहा है कि जब कोई पब्लिशर नहीं है, राणा ने खुद किताब छापी तो पैसा कहां से आ रहा है…. तीन चैप्टर पढ़े है, साफ लग रहा है कि बढ़ा चढ़ा कर लिखा जा रहा है…. आप भी पढ़िए और खुद ही फैसला करिए…

Vijay Jha तहलका ब्रांड सारे शूटरों का अंतिम मकसद गांधी परिवार के आड़े आनेवाले सभी व्यक्ति, संस्था आदि ध्वस्त करना रहा है। इसके लिए किसी ने स्टिंग को टूल्स के रूप में यूज किया, किसी ने किताब छापकर या किसी में कॉलम लिखकर तो किसने एंकरिग कर। अब ये सब कोई ढका छुपा नहीं है। सब पब्लिकली है, राजदीप-बरखा-खेतान-तेजपाल-राणा अयूब आदि किसके ड्राईंगरूम में कितने बार गया, क्यों गया, क्या मिला सब ओपन है। फिर ऐसे पात्र के लेखन – वाचन को बिना पन्ने पलटे हम पाठक अनुमान लगा लेते है इस रैपर के अंदर कौन सा बम रखा गया है और किसको उड़ाने के लिए रखा गया है। बाकी लेखकों-पत्रकारों का काम है पुस्तक पढ़कर समीक्षा लिखना, उनको अपना कर्तब्य करना चाहिए। हमारे जैसे पाठक अनिल जी के लिखे समीक्षे को धैर्य से पढ़ लेंगे, पढ़ते रहेंगे।

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