वसुंधरा राजे ने हाइवे पर हर दो किमी के फासले पर शराब ठेके खुलवा दिए थे!

क्या सचमुच टूट जाएगा हाइवे पर शराब का सपना… हाइवे पर अब शराब की दुकानें नहीं दिखेंगी। लेकिन यह तभी होगा, जब राज्यों की सरकारें सुप्रीम कोर्ट की बात मान ले। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि अप्रैल महीने से हाइवे पर शराब की दुकानों को बंद कर दिया जाना चाहिए। फैसला जनहित में है। वास्त में देखा जाए, तो हाइवे हमारे विकास के रास्ते हैं। उन रास्तों पर खुले आम शराब के ठेके खुलने से हमारे हाइवे विकास के बजाय विनाश के रास्ते बनते जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला देश के सभी राज्यों के सभी हाइवे पर लागू होगा। हमारे हिंदुस्तान में देखें, तो हर हाइवे पर भगवान के मंदिरों की भरमार है। ड्राइवर अगर अपनी जिंदगी की दुआ के लिए हर भगवान को हाथ जोड़ने लगे, तो अगला मंदिर आने से पहले उसका एक्सीडेंट तय है। इतने सारे मंदिर। कदम कदम पर मंदिर। लेकिन उन्हीं हाइवे पर शराब के ठेके मंदिरों से भी ज्यादा।

अपना मानना है कि अतिरिक्त कमाई के लिए राज्य सरकारें जनता की जिंदगी को जोखिम में डालकर हाइवे पर शराब की दुकाने खोलने के लाइसेंस बांटती रही हैं। पंद्रह साल पहले राजस्थान में जब अपन आबूरोड़ से जयपुर जाते थे, तो या तो पाली जिले के बर में, या फिर सीधे जयपुर जिले के दूदू में हाइवे पर शराब मिलती थी। पांच सौ किलोमीटर लंबे रास्ते में सिर्फ दो जगह हाईवे पर शराब की बिक्री। लेकिन वसुंधरा राजे की सरकार के पिछले दौर में हमने देखा कि हर दो किलोमीटर के फासले पर हाइवे पर शराब के ठेके खुल गए हैं। यह केंद्र सरकार की उस सलाह की उपेक्षा घोर उपेक्षा है,  जिसमें साफ साफ कहा गया था कि राज्य सरकारें हाइवे पर शराब की दुकान के लिए लाइसेंस जारी नहीं करे। लेकिन केंद्र की अवहेलना करके महारानी साहिबा ने हाइवे पर शराब के ठेके खोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पहली बार केंद्र सरकार ने इस मामले में 2007 में राज्यों को इस मामले में नोटिस भेजा था। लेकिन उसके बाद भी न केवल राजस्थान बल्कि देश भर में राज्य सरकारों ने हाइवे पर शराब की दुकानों के लिए खूब लाइसेंस दिए।

सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला सामाजिक सरोकारों और पारिवारिक नजरिए से दोनों तरीकों से बिल्कुल सही है। अपना मानना है कि हाइवे वैसे भी हमारे देश में अपराध के अड्डे के रूप में कुख्यात रहे हैं। इन हाइवे पर खुलनेवाले ढाबे अपराध के घर कहे जा सकते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सड़क सुरक्षा को सुनिश्चित करने और बेमौत मरनेवालों की जिंदगी को बचाने के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण है। राजस्थान चले जाइए, पंजाब में कहीं भी निकल जाइए या फिर दिल्ली के आसपास किसी भी हाइवे पर अगर देखेंगे, तो कदम कदम पर शराब के बोर्ड मिलेंगे। कायदे से शराब और उसकी दूकान का विज्ञापन गैर कानूनी है। लेकिन हमारे हाइवे तो बने ही गैरकानूनी काम के लिए हैं। इसी कारण हर अपराध वहीं पर बहुत आसानी से होता दिखता है। अब, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि हाइवे पर जो दुकानें अभी चल रही हैं, अप्रैल के बाद उनका लाइसेंस को फिर से बहाल नहीं किया जाएगा। ताजा फैसले में जस्टिस ठाकुर ने साफ साफ कहा है कि राष्ट्रीय और राज्य हाइवे को शराब की बिक्री और शराब के विज्ञापनों से मुक्त होना चाहिए। उन्होंने सभी हाइवे ऑथरिटी को निर्देश दिए है कि शराब से जुड़े सारे होर्डिंग हाइवे से हटाए जाएं।

अपना मानना है कि विज्ञापनों की आकर्षक भाषा और उनमें दिखाई गई मॉडल की देह का आकर्षण ड्राइवर का ध्यान भटकाती है और इसी कारण दुर्घटनाएं होती हैं।  हमारे देश में ट्राइवर सबसे ज्यादा पियक्कड़ पाए जाते हैं। इसकी वजहें भी हैं। एक तो घर से ज्यादातर दूर रहना और फिर रात रात थक चलते रहना। दोनों ही कारण ड्राइवरों को शराब पीने के लिए प्रेरित करते हैं, ऊपर से सड़कों पर इन होर्डिंग्स का दिखना उनके भीतर के लालच को उकसाने का काम करता है।  नए आदेश के मुताबिक अब शराब की दुकानें स्टेट और नेशनल हाइवे से कम से कम आधा किलोमीटर की दूरी पर होंगी। चीफ़ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली बैंच ने यह फ़ैसला दिया है। जिसे देश के लिए बहुत अहम माना जाना चाहिए। लेकिन सिर्फ इतने भर से ही काम नहीं होगा। हमारे हाइवे पर चलनेवालों को शराब की आदत है। सो, जब ये ठेके बंद हो जाएंगे, तो बहुत सहज है कि उन हाइवे के ढाबे शराब की बिक्री के नए अड्डो के रूप में उभरेंगे। स्थानीय पुलिस और प्रशासन के लिए वे कमाई का नया जरिया होंगे। सरकारों को इतनी ईमानदारी तो रखनी होगी कि उन पर भी वे लगाम अभी से लगाने की कोशिश करे। राज्य सरकारो को सख्त होना पड़ेगा। तभी हाइवे पर शराब बंद करने का सुप्रीम कोर्ट का सपना पूरा हो सकेगा। वरना सामाजिक सरोकार और सड़क सुरक्षा से जुड़े इस आदेश का कबाड़ा तय है। क्योंकि शराब से कमाई के मामले में हमारे देश की बहुत सारी राज्य सरकारें बहुत बदनाम है। और, राजस्थान इस मामले में कुछ ज्यादा ही बदनाम है।

Niranjan Parihar

niranjanparihar@gmail.com

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