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सुख-दुख

पीटीआई वाले कब जात-पात से उपर उठेंगे?

एक तरफ जहां राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मीरा कुमार रायसीना हिल्स की दौड़ को ‘दलित बनाम दलित’ निरूपित किए जाने से असहमत हैं और ‘जाति को जमीन में गहरे गाड़ देने’ की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ मीडिया अभी भी ‘दलित’ और ‘अल्पसंख्यक’ जैसे जातिसूचक शब्दों के खेल से बाहर नहीं निकल पा रहा है. मीडिया में बैठे तमाम तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी ऊपरी तौर पर भले ही इनसे हमदर्दी जताते हों, लेकिन इनकी असलियत क्या है, इसका एक और मुजाहिरा हाल ही में आई उन खबरों से हुआ है, जिसमें बताया गया है कि कैसे ‘मीडिया के लोग’ एक दलित होने के नाते रामनाथ कोविंद की बाइट लेने या दिखाने से गुरेज करते थे, जब वे कुछ अरसा पहले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हुआ करते थे.

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एक तरफ जहां राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मीरा कुमार रायसीना हिल्स की दौड़ को ‘दलित बनाम दलित’ निरूपित किए जाने से असहमत हैं और ‘जाति को जमीन में गहरे गाड़ देने’ की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ मीडिया अभी भी ‘दलित’ और ‘अल्पसंख्यक’ जैसे जातिसूचक शब्दों के खेल से बाहर नहीं निकल पा रहा है. मीडिया में बैठे तमाम तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी ऊपरी तौर पर भले ही इनसे हमदर्दी जताते हों, लेकिन इनकी असलियत क्या है, इसका एक और मुजाहिरा हाल ही में आई उन खबरों से हुआ है, जिसमें बताया गया है कि कैसे ‘मीडिया के लोग’ एक दलित होने के नाते रामनाथ कोविंद की बाइट लेने या दिखाने से गुरेज करते थे, जब वे कुछ अरसा पहले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हुआ करते थे.

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खैर, मीडिया के ऐसे कई किस्से हैं, लेकिन जब टीआरपी की होड़ से दूर और ‘निष्पक्ष’ कही जाने वाली समाचार एजेंसियां भी खबरों को ‘दलित’ और ‘अल्पसंख्यक’ को कोष्ठक में बंद करके पेश करती हैं, तो ताज्जुब होना लाजिमी है. प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी पीटीआई-भाषा ने बुधवार, 28 जून की दोपहर बलिया डेटलाइन से एक खबर जारी की, जो एक ‘दलित’ नाबालिग लड़की के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म से संबंधित है. खबर यदि लड़की की जातीय पहचान के बगैर भी जारी की गई होती, तो दुष्कर्म का अपराध उतना ही गंभीर होता, जितना है. लेकिन खबर में जान-बूझकर ‘दलित’ शब्द डालना, ये बताता है कि खबर को एक खास ऐंगल देने के लिए ऐसा किया गया.

ऐसा करना इसलिए भी शरारतपूर्ण लगता है, क्योंकि आरोपियों के जो नाम खबर में दिए गए हैं, उसके मुताबिक, उनमें से एक का सरनेम पासवान है, जो कि स्वयं भी एक दलित जाति से आता है. अब ये खबर मूलत: ऐसी है, जिसमें पीड़िता और आरोपी दोनों एक ही जाति के हैं, लेकिन हेडिंग और इंट्रो में ‘दलित किशोरी’ लिखकर उसे ऐसा रंग देने की कोशिश की गई है, मानो किसी सवर्ण जाति के दबंगों ने यह अपराध किया हो. और यह कोई पहली बार नहीं है. पीटीआई-भाषा पर अक्सर ऐसी खबरें आती हैं, जिनमें दलित ऐंगल जान-बूझकर जोड़ा गया प्रतीत होता है. सवाल है कि अगर जाति का जिक्र करना इतना ही जरूरी है, तो क्यों नहीं बाकी पीड़िताओं की जातियों का जिक्र किया जाता? क्या सिर्फ जाति के अगड़ी-पिछड़ी होने से अपराध की गंभीरता कम या ज्यादा हो जाती है? ऐसा खेल कोई राजनीतिक पार्टी या ‘बिकाऊ खबरों वाले चैनल’ करें, तो बात समझ में आती है, लेकिन क्या एक समाचार एजेंसी, जो देश भर के अखबारों को खबरें मुहैया कराती है, ऐसा कर सकती है? उम्मीद है कि एजेंसी में ऊंचे व जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग इस ओर ध्यान देंगे और किसी राजनीतिक खेल में ‘खिलौना’ बनने से दूर रहेंगे.

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