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सुख-दुख

लगातार भागदौड़ और हाई बीपी से क्या हो सकता है, जान लीजिए!

डॉ विजय नाथ मिश्रा-

लकवा हुआ। होश पूरी तरह था। सीटी स्कैन में छोटा सा ब्लीड हुआ। जिसको हुआ वो, लखनऊ में हाई सोसाइटी के लोग थे। तमाम सरकारी चिकित्सालयों को नाकार पहुँचे, पाँच सितारा चिकित्सालय।

वहाँ तुरंत आईसीयू में रख इलाज शुरू। बेहोशी की दवा दे, वेंटीलेटर पर। ३ दिन बाद, गला काट के ट्यूब लग गया। इधर, बड़े आदमी के रिश्तेदार बड़े डाक्टर्स से चर्चा कर रहे। गूगल पर इलाज ढूँढ रहे। दस दिन का खर्च, बीस लाख का बिल। मरीज़ आधा होश के हाल में, गले के पाइप के साथ डिस्चार्ज।

पाँच सितारा चिकित्सालय के चिकित्सकों ने, घर पर ही आईसीयू केयर के लिये कुछ उपकरण और बेड बता दिये। साथ में अपना एक आदमी भी रोज़ केयर के लिये लगा दिया। अब एक महीने में घर का इलाज में भी दस लाख खर्च। पर मरीज़ अब वेंटिलेटर जनित रोग से ग्रसित। अभी भी लाचार रिश्तेदार, अब इलाज ढूँढ रहे।

पर ऐसे रोग का इलाज, केवल रेस्ट करने और बीपी कंट्रोल से हो सकता है। ऐसे बड़े लोग, रोज़ ठगे जा रहे। साथ में ग़रीब लोग भी बड़े चिकित्सालयों के चक्कर में बिक जा रहे! कोई सुध लेने को तैयार नहीं! इसका बड़ा कारण है कि बिना जाने सोचे, बड़े चिकित्सालयों की और दौड़ना!

उधर मज़बूरी है कि इतना बड़ा चिकित्सालयों का खर्च कैसे निकले? तो बस फिर क्या, मरीज़ पहुँचे, तो बस रिश्तेदारों का लूटना शुरू! अब इसका एक ही इलाज है। चिकित्सालय में इलाज संबंधित सभी दस्तावेजों को सार्वजनिक आप डिजिटल प्लेटफर्म पर डाल, इसके एनएमसी से ऑडिट करायें और जानकारी को रिश्तेदारों को साझा करें।

गाँव देहात से लेकर शहरों के मरीज़ों को, बराबर बड़े पाँच सितारा चिकित्सालयों में भेजने की होड़ लगी रहती है। कभी सोचियेगा कि आख़िर वो कौन लोग हैं जो, बिना पहचान आपके मरीज़ को बड़े चिकित्सालय में के लिये लालायित रहते है! ये और कोई नहीं, बल्कि हमारे चिकित्सकीय सेवा में छिपे वो भेड़िये हैं जिनका यही काम होता है।

ना जाने कितने लोग रोज़ ऐसे मिलते हैं जो गाँव से चले कि सरकारी चिकित्सालय में इलाज करायें पर किसी ने पहुँचा दिया वहाँ जहां, रोज़ का लाख रुपए का खर्च। मरीज़ के ठीक होने की आस में, भिखमंगे जैसी स्थिति होने पर पुनः मरीज़ अपने बेहोश मरीज़ को, गले में पाइप लगाये, ऑक्सीजन कनेक्ट कर, पुनः सरकारी चिकित्सालय में भर्ती के लिए सिफ़ारिश लगवाता है। पर तब तक देर बहुत हो गई रहती है और मरीज़ के इलाज के लिये कोई पैसे भी नहीं बचे होते!

इसका एक बड़ा कारण ये भी है कि गाँव / क़स्बों में कोई चिकित्सक उपलब्ध ही नहीं कि ये बताएँ कि आख़िर मरीज़ का रिश्तेदार कहाँ जाये या किस चिकित्सालय में जायें। ऐसे में मरीज़ के रिश्तेदार भटक जाते हैं। बहुत दयनीय स्थिति बन जाती है।

इसका क्या उपाय हो, शोचनीय विषय है। पाँच सितारा चिकित्सालय में भी, ये व्यवस्था होनी चाहिए कि मरीज़ के रिश्तेदारों को बतायें कि यहाँ इलाज का बड़ा खर्च है और आप कहीं और भी जा सकते हैं। बेसिक इलाज कर सरकारी चिकित्सालय में भिजवा देना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि कोई हेल्पलाइन न. उपलब्ध कराये कि आख़िर तत्काल इलाज के लिए कहाँ जायें!

लेखक डॉ वीके मिश्रा बनारस के जाने माने डाक्टर हैं.

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