Connect with us

Hi, what are you looking for?

वेब-सिनेमा

(पार्ट नौ) वंचित तबके की लड़की मीना कोतवाल की जुबानी बीबीसी की कहानी

मेरी स्टोरी सरकारी फाइल की तरह राजेश प्रियदर्शी और महिला डेस्क के बीच झूलती रहती

मीना कोतवाल

मैं और बीबीसी- 9

‘कहां से हो?’

‘दिल्ली से ही, जन्म-पढ़ाई सब दिल्ली से ही हुआ है, लेकिन राजस्थान से भी संबंध रखते हैं.’

Advertisement. Scroll to continue reading.

‘राजस्थान..? राजस्थान में कहां से हो?’

‘बूंदी ज़िले से’

Advertisement. Scroll to continue reading.

‘अच्छा… राजस्थान में क्या हो?’

‘दलित हैं मैम’

Advertisement. Scroll to continue reading.

(गर्दन हिलाते हुए शांति-सी छा जाती है)

ये सब मुझ से शुरूआत के दिनों में ही पूछा गया था. वे भी ऑफिस में नई थीं और मैं तो थी ही. हां, उनको कई सालों का अनुभव जरूर था. एक जाने-माने हिंदी चैनल की रिपोर्टर रही हैं और बीबीसी में सीनियर ब्रॉडकास्ट के लिए चुनी गई थी.

Advertisement. Scroll to continue reading.

शिफ्ट बदलवाने की काफ़ी जद्दोजहद के बाद मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला. और, उन्हें भी मेरे ज्यादातर काम में कमी निकालने का. अब मेरी स्टोरी वुमन एंड यूथ डेस्क हेड और डिजिटल एडिटर राजेश प्रियदर्शी सर से होकर गुजरनी थी. मेरी स्टोरी कई बार इन दोनों के बीच में ही उलझ कर रह जाती थी. कई बार अगर वुमन एंड यूथ डेस्क हेड किसी स्टोरी के लिए मना नहीं कर पाती थीं तो राजेश सर के पास मेरी स्टोरी जाती थी. अगर वे मना नहीं कर पाते थे तो वो वुमन एंड यूथ डेस्क हेड के पास भेजते. और इस तरह मेरी स्टोरी इन दोनों के बीच में ही झूलती रहती, जैसे सरकारी ऑफिस में एक फाइल को जबरदस्ती जगह-जगह घुमाया जाता है.

कुछ ऐसी स्टोरी थी, जिन पर मैंने बहुत मेहनत की थी. लेकिन जब भी वो राजेश प्रियदर्शी सर और महिला डेस्क के पास जाती तो हर बार एक नई कमी निकल जाती.

Advertisement. Scroll to continue reading.

ऐसा ही एक बार तब हुआ जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षित सीटों पर हेर-फेर की एक स्टोरी कर रही थी, जिसके बारे में शुरू से ही पता था कि मामला क्या है और कितना बड़ा है. लेकिन बार-बार दोनों लोग बारी-बारी से पढ़ते और हर बार एक नई कमी निकाल देते. जब भी उस कमी को पूरा करके पहुंचती हूं तो एक और नई कमी. इस तरह स्टोरी को लगभग 21 दिन हो गए थे. जब आखिर में सबकी कमियों को पूरा करके स्टोरी आगे बढ़ाई तो वो स्टोरी गिरा दी गई.

महिला डेस्क की मैम का कहना था कि राजेश प्रियदर्शी सर ने कहा है कि मामला ज्यादा बड़ा नहीं है. अगर मामला ज्यादा बड़ा नहीं था तो शुरू से ही क्लियर था. अगर नहीं भी पता था तो एक संपादक को एक ही स्टोरी कितनी बार पढ़कर सही करवाने की जरूरत पड़ती है! एक अच्छा संपादक एक बार में ही पढ़कर सारी कमी एक बार में ही बता देता है. एक नहीं तो ज्यादा से ज्यादा दो बार. लेकिन मेरी स्टोरी को गिराने का हर बार एक नया बहाना तैयार होता.

Advertisement. Scroll to continue reading.

बीच में मैंने सीवर साफ करने से हो रही मौतों पर स्टोरी की थी. महिला डेस्क की मैम कुछ दिन की छुट्टी पर थीं और मेरी स्टोरी बिना किसी रीराइट किए पब्लिश भी हो रही थी और अच्छा परफॉर्म भी कर रही थी. महिला डेस्क की मैम मेरी हर स्टोरी में रीराइट करती थीं क्योंकि इनकी नज़र में मुझे कुछ नहीं आता था.

इनका तो यहां तक कहना था कि “देखो मैंने तुम्हें इतना अच्छा लिखना सीखा दिया कि तुम्हें आईआईएमसी से अवार्ड भी मिल गया”, जबकि उस स्टोरी में इनका रत्तीभर भी हाथ नहीं था. जिसका हाथ था, उसने सीपीएस पेज जरूर बनाया था पर सारे इनपुट मैं ही लिखकर दे रही थी. वो भी इसलिए क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी तो थोड़ा-थोड़ा लिख कर बार-बार अपडेट करना था, जो डेस्क पर बैठा व्यक्ति कर रहा था.

Advertisement. Scroll to continue reading.

खैर, इनकी गैर-मौजूदगी में भी काम बहुत अच्छे से चल रहा था. महिला डेस्क की मैम जब छुट्टियों से वापस आती हैं तो मुझसे ये नहीं पूछा कि काम कैसे मैनेज हुआ या डेस्क पर कोई दिक्कत तो नहीं आई. वे मिलकर सीधा कहती हैं, ‘तुम क्या इसी तरह (यानि दलितों से जुड़ी स्टोरी) की स्टोरी कर के अपनी पहचान बनाना चाहती हो. एक कर ली ठीक है, लेकिन अब क्या बार-बार ऐसी स्टोरी करोगी?’ उनके इस सवाल पर मैंने जवाब देना भी सही नहीं समझा लेकिन सवालों से भरी एक स्माइल जरूर दे दी.

मैं समझ गई थी कि मैं यहां कितना भी अच्छा काम कर लूं, लेकिन लोगों को वही सोचना है जो वो सोचना चाहते हैं. इनका व्यवहार भी मेरे लिए बहुत अच्छा नहीं रहा है. हां, ये हाय-हेलो, हाल-चाल सब पूछती जरूर थी, लेकिन उसमें फॉर्मेलिटी दिखाई देता था, अपनत्व नहीं. वे शायद मुझे पसंद नहीं करती थी. जिनके अगर मैं उदाहरण दूं तो वो बहुत छोटे किस्से हो सकते हैं, लेकिन समझदार के लिए इशारा काफ़ी होता है.

Advertisement. Scroll to continue reading.

हालांकि इन्होंने एक-दो बार बोला भी कि मीना तुम्हें जो परेशानी हो मुझ से साझा कर सकती हो. लेकिन जिनसे शिकायत हो उसी के पास शिकायत लेकर नहीं जाया जाता, तो आपसे क्या ही बताऊं मैम (ये मैं खुद ही मन में बात करती).

मेरी कई स्टोरी करवाने के बाद गिरा दी गई. ऐसा करके वे साबित भी कर देते कि मुझे कुछ नहीं आता और मेरा आत्मविश्वास भी गिरा दिया जाता. मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर इन्हें चाहिए क्या! जो कहते थे वो कर देती थी फिर भी हर बार एक नई कमी, नया सवाल तैयार रखते थे ताकि कहीं तो मैं हार मान लूं. अगर तब भी ऐसा नहीं होता तो स्टोरी गिराने का हथियार इनके पास होता ही था.

Advertisement. Scroll to continue reading.

To be continued…

युवा पत्रकार मीना कोतवाल की एफबी वॉल से.

Advertisement. Scroll to continue reading.

इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें-

पार्ट आठ : मैंने BBC हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा से कह दिया- किसी भी स्टोरी के लिए राजेश प्रियदर्शी के पास न जाऊंगी!

Advertisement. Scroll to continue reading.
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Advertisement

भड़ास को मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप ग्रुप से जुड़ें- Bhadasi_Group_one

Advertisement

Latest 100 भड़ास

व्हाट्सअप पर भड़ास चैनल से जुड़ें : Bhadas_Channel

वाट्सअप के भड़ासी ग्रुप के सदस्य बनें- Bhadasi_Group

भड़ास की ताकत बनें, ऐसे करें भला- Donate

Advertisement