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राम मंदिर आध्यात्मिक मुद्दा, पहले की सरकारों ने इसे राजनीतिक बने रहने दिया : हरिवंश


प्रभात खबर अख़बार के लंबे समय तक प्रधान संपादक रहे और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने कहा है कि रामंदिर का मुद्दा कभी से राजनीतिक नहीं रहा, ये आध्यात्मिक मुद्दा है और ऐसा ही रहा है। इसे पहले की सरकारों ने सुलझाने का प्रयास ही नहीं किया अगर पहले की सरकारों ने चाहा होता, तो राम मंदिर कभी राजनीतिक मुद्दा बनता ही नहीं।

“भारतिका” के संस्थापक और लेखक-पत्रकार अनुरंजन झा से बात करते हुए उन्होंने बताया कि “चंद्रशेखर जी जब प्रधानमंत्री थे तब मैं कार्यालय में उनके साथ था और चंद्रशेखर जी राममंदिर मामले को लगभग हल तक ले जा चुके थे। लेकिन उस वक्त की जो पार्टी उन्हें समर्थन दे रही थी, उनके नेता को जब ये सूचना मिली तो उन्होंने सरकार गिरा दी। इसका मतलब वो चाहते नहीं थे कि इस समस्या का निदान निकले।

इस बात पर आगे प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, डॉ लोहिया ने राम, कृष्ण, शिव तीनों को भारत के जीवन का हिस्सा माना था। भारत में ये तीन प्रतीक ऐसे हैं जिनपर बहुसंख्यक का विश्वास था। इनका अगर हल हमने पहले ही निकाल लिया होता, तो ये राजनीति का विषय बनते ही नहीं। ये आस्था और आध्यात्म का ही विषय रहते। आज राजनीति में जो लोग बात कर रहे हैं, विरोध कर रहें हैं। इन्होंने ही शुरू से राम मंदिर नहीं बनने दिया। लेकिन अब राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हो रही है तो अब विरोध का कोई तुक नहीं बनता।

करीब 4 दशकों तक पत्रकारिता करने के बाद राजनीति में अपना सिक्का जमाने वाले राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह जी ने ‘भारतिका’ के संस्थापक अनुरंजन झा को दिए साक्षात्कार में न सिर्फ राम मंदिर एवं भारतीय राजनीति, बल्कि नई तकनीक और समाज से जुड़े कई मुद्दों पर खुल कर बात की।

एक सवाल के जवाब में हरिवंश जी ने कहा कि “पत्रकारिता में उनका आना राजनीति की वजह से ही हुआ। मैं जयप्रकाश जी के गांव का रहने वाला हूं। ये संयोग की बात है। लेकिन उनके जीवन का, उनकी विचारधारा का और उनके सात्विक जीवन का लोगों पर काफी प्रभाव रहा, क्योंकि तब जयप्रकाश 1942 के हीरो थे या जयप्रकाश के अंदर लोगों ने एक नए भारत का सपना देखा था।“

महात्मा गांधी की प्रासंगिकता के सवाल पर हरिवंश जी ने कहा कि गांधी विकल्पहीन थे, हैं, और रहेंगे। ये मेरी निजी धारणा है। वर्धा में गांधी जी की कुटिया में एक कोटेशन लगा है जिसका आशय है, “एक दिन दुनिया को गहरा पश्चाताप होगा कि भोग के जिस रास्ते में हम चल पड़े हैं इसने हमें कहां पहुंचा दिया है”

आजादी के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू जी से गांधी जी का जो मतभेद था वो इसी बात को लेकर था। पंडित जी सोचते थे, कि शायद पश्चिम के रास्ते देश का विकास होगा। वहीं महात्मा गांधी ने हमेशा कहा कि देश को हमारे गांवों ने मजबूत कराया है। हमारे देश की जो पुरानी सभ्यता-संस्कृति है अगर हम उन्हें बेहतर करते चले तो ही देश मजबूत होगा। दुनिया को बेहतरी के लिए गांधी के ही रास्ते ही आना पड़ेगा।

आर्टिफिशियल इंटिलिजेंस पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि ये एक नई क्रांति का आगाज है, अगले दो-तीन सालों में दुनिया का दूसरा स्वरूप देखने को मिलेगा लेकिन ये समझना होगा कि अगर इसकी खोज करने वाले इसकी तुलना मैनहट्टन प्रोजेक्ट (परमाणु बम की खोज) से करते हैं तो इसके विध्वंश की ताकत को भी ध्यान में रखना होगा अगर ये गलत लोगों के हाथ में लगा तो कल्पना से ज्यादा नुकसान कर जाएगा।

हरिवंश जी का ये पूरा साक्षात्कार आप भारतिका डिजिटल bharatika.com के सभी सोशल मीडिया प्लेफार्म्स पर देख सकते हैं…

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