जी5 ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई ‘रश्मि रॉकेट’ महिला खिलाड़ियों के दुख-सुख पर केंद्रित है!

himanshu joshi-

फ़िल्म- रश्मि रॉकेट
रिलीज़- जी5 ओटीटी प्लेटफॉर्म
निर्देशक- आकर्ष खुराना
निर्माता- रोनी स्क्रूवाला
संगीत- अमित त्रिवेदी
अभिनय- तापसी पन्नू, अभिषेक बनर्जी, प्रियांशु पैन्यूली, सुप्रिया पाठक, मनोज जोशी, सुप्रिया पिलगांवकर

बॉलीवुड में महिलाओं के अधिकारों पर बहुत कम फिल्में बनी हैं, उनमें से एक फ़िल्म ‘पिंक’ की दमदार अभिनेत्री तापसी पन्नू की ही फ़िल्म होने की वजह से मैंने ‘रश्मि रॉकेट’ को देखने के लिए चुना। पुलिस के थप्पड़ खाती रश्मि रॉकेट बनी तापसी पन्नू को देखने के बाद दर्शक 14 साल पहले की कहानी में पहुंच जाते हैं।

गुजरात की रश्मि रॉकेट के पिता की भूमिका में अपने छोटे से रोल में मनोज जोशी प्रभावित करते हैं तो रश्मि की मां बनी सुप्रिया पाठक ने अपना किरदार बखूबी निभाया है। गुजरात भूकम्प के फ्लैशबैक में पहुंचती है कहानी। फौजी ट्रेनर बने प्रियांशु पैन्यूली के प्रोत्साहन पर रॉकेट दौड़ती है और बहुत जल्द नाम कमा लेती है।

प्रियांशु पैन्यूली की पहचान वेब सीरीज़ मिर्जापुर से होती है। फ़िल्म में वह तापसी के साथ जोड़ी बना जचे हैं। हल्की मूछों में फौजी बने प्रियांशु अपने सादे अभिनय से प्रभावित करते हैं, उम्मीद है फ़िल्म से उन्हें नई पहचान मिलेगी।

फ़िल्म जैसे आगे बढ़ती है हम उसमें भारतीय महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले गलत व्यवहार के बारे में जानकारी पाते हैं। खेलों में होने वाली राजनीति पर भी फ़िल्म प्रकाश डालती है, तापसी उसे जीती हुई लगती हैं।

फ़िल्म का असली मुद्दा वहां से पता चलता है जब थप्पड़ वाला शुरुआती दृश्य वापस आता है। जेंडर टेस्ट नाम का एक ऐसा नाजुक मुद्दा जिस पर शायद हिंदी फिल्म जगत में कभी बात हुई हो और भारतीय खेल प्रशंसकों ने भी शायद इस मुद्दे पर कभी अपने खिलाडियों का साथ दिया हो।

अभिषेक बनर्जी ने वकील के तौर पर फ़िल्म में एंट्री मारी है, जिसमें वह जेंडर टेस्ट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रश्मि के साथ-साथ जेंडर टेस्ट के शिकार अन्य खिलाड़ियों को भी न्याय दिलाना चाहते हैं। अभिषेक बनर्जी को देख यह महसूस होता है कि फ़िल्म रंग दे बसंती से शुरू हुआ उनका फ़िल्मी सफ़र अब ट्रैक पर आ जाएगा। वह पहले घण्टे के बाद फ़िल्म की जान हैं पर कोर्टरूम की गम्भीरता वैसी नहीं लगती जैसी होनी चाहिए थी जबकि फ़िल्म के अंतिम 40-50 मिनट कोर्टरूम के ही हैं।

पिंक में अमिताभ बच्चन ने वकील की भूमिका के साथ जो न्याय किया था, किसी अन्य अभिनेता से उसकी बराबरी की उम्मीद रखना बेमानी ही है। जज के रूप में सुप्रिया पिलगांवकर ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। फ़िल्म के संवाद और गीतों के बोल ऐसे नही हैं जो लंबे समय तक याद रखे जाएं।

गुजरात, रांची के दृश्य खूबसूरत दिखे हैं तो शादी के जोड़े में तापसी भी उतनी ही अच्छी लगी हैं। जेंडर टेस्ट के समय तापसी को दी गई प्रताड़ना और फ़िल्म के अंतिम क्षणों में अपने होने वाले बच्चे से तापसी की बातचीत वाले दृश्य उनके दमदार अभिनय के हिस्से हैं।

अगर आप पिंक से तुलना न कर इस फ़िल्म को देखने का मूड बनाते हैं तो आप रश्मि रॉकेट से निराश नही होंगे। जेंडर टेस्ट इन स्पोर्ट्स के बारे में गूगल सर्च करने पर आपके सामने बहुत सी जानकारियां सामने आएंगी और इस वज़ह से शायद कभी आप जेंडर टेस्ट की वजह से परेशान किसी खिलाड़ी का साथ देने आगे आएंगे, यही तो फ़िल्म का उद्देश्य है।

समीक्षक- हिमांशु जोशी

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