रवीश को रवीश में उलझाना एक साज़िश है!

Sheeba Aslam Fehmi : जबकि पत्रकारिता पर गहरा नैतिक संकट आया हुआ है और मौजूदा दौर के लिए ज़रूरी हैं रवीश कुमार, तो सत्ता यही चाहेगी की रवीश खुद खबर बन जाएं और सफाई देने में उलझे रहें. लेकिन हमें सतर्क रहना होगा. इस मामले में रवीश खुद बेहद सतर्क हैं. अपने काम में निजी जीवन का कोई पहलू कभी आड़े ना आये इसके लिए उनके कई नियम और त्याग तो मैं भी जानती हूँ.

बिहार चुनाव के दौरान जब क़रीबी रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे थे तो वो उनके क्षेत्र के आस-पास भी नहीं फटके. हालाँकि बिहार कवर कर रहे थे लेकिन राजनैतिक रिपोर्टिंग की ही नहीं जिससे कोई ये न कहे की अमुक पार्टी की तरफ झुकाव रहा या दुराव रहा. भाभी बुरा भी मान गयीं हों लेकिन नहीं गए.

ऐसा ही एक और निषेध जो उन्होंने खुद पर लगा रखा है वो ये की सिफारिश का फ़ोन कभी नहीं करेंगे, सिर्फ क्रिटिकल मरीज़ के लिए ही अब तक फ़ोन घुमाया है वरना कोई कितना भी सगा हो या मित्रवत हो, सिफारिशी फ़ोन नहीं करेंगे.

किसी ऐसी शादी में शरीक नहीं होंगे जिसमे दहेज़ का आदान-प्रदान हो चाहें परिवार में ही क्यों न हो.

और हाँ बेटी के एडमिशन के समय पेरेंट्स के बतौर दोनों पति-पत्नी ने एक नयी भाषा सीखने में कितनी मेहनत की ये बात भी यहाँ बताने लायक़ है. रसूख या सेलिब्रिटी स्टेटस का इस्तेमाल नहीं किया, नियम के तहत सभी मरहले तय किये.

इसके अलावा ईमानदार और बेलाग पत्रकारिता के जो नुकसान सगे संबंधी झेल रहे हैं, उनके उलाहने अलग है. दोनों तरफ से पिस कर ये शख्स संयम बनाये हुए है.

इनके एक सीनियर सहकर्मी ने पिछले हफ्ते ही एक निजी बातचीत में कहा की रवीश अकेले दम पर हिंदी चैनल खींच रहे हैं अब, प्राइम टाइम के अलावा किसी कार्यक्रम में जान नहीं बची है. सिर्फ वही हैं जो मेहनत करते हैं जबकि इतने सीनियर हैं.

रवीश की पत्रकारिता तो लाजवाब है ही लेकिन निजी जीवन में भी इज़्ज़त करने लायक़ इंसान हैं ये.

सोशल एक्टिविस्ट शीबा असलम फ़हमी की एफबी वॉल से.

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