रोहित सरदाना और अंजना ओम कश्यप के इस ‘युद्ध’ से आपने कुछ सोचा-सीखा?

Dilip Khan : आजतक न्यूज़रूम का एक वीडियो देख रहा था। रोहित सरदाना और अंजना ओम कश्यप आपस में पद्मावती को लेकर भिड़े हुए थे। एक पक्ष, एक प्रतिपक्ष। दोनों एक-दूसरे को चित्त करने के अंदाज़ में मोहल्ले के गमछाधारी गैंग की तरह लड़ रहे थे। फिर याद आया कि टाइम्स ग्रुप ने एक नया चैनल शुरू किया है- मिरर नाऊ। आप एक ही मुद्दे पर टाइम्स नाऊ को देखिए और मिरर नाऊ को, तो काउंटर नैरेटिव बनता नज़र आएगा। मतलब एक खित्ते के लोग जो एक चैनल के कंटेंट से उखड़े हुए हैं, उन्हें उसी समूह का दूसरा चैनल हाजमोला की गोली खिलाकर पचाने में जुटा है।

इनमें वो तमाम मुद्दे आपको दिखेंगे, जो दरअसल टीवी के पर्दे पर ही तैयार हुए और हमारे बीच परोसे गए। फिर उन मुद्दों को पूरा देश असली मुद्दा मान बैठा। फिर दो गुट बने और उस पर शब्दभेदी वाण चलने लगे। मिशेल चोस्डुवस्की इसे मैनुफैक्चरिंग डिसेंट कहते हैं। इसमें वास्तविक बग़ावत और विरोध को तेज़ होने से रोकने के लिए विरोध प्रायोजित किए जाते हैं। इस प्रायोजित विरोध को वही निकाय मदद भी करता है जिसके ख़िलाफ़ विरोध हो रहा हो। लोगों को लगता है कि वाह क्या शानदार विरोध था, लेकिन असल में वो विरोध से ज़्यादा समर्थन होता है। असली विरोध इस प्रायोजित विरोध के शोर में दब जाता है। लोग निश्चिंत हो जाते हैं। निकाय मज़बूत हो जाता है।

राज्यसभा टीवी में कार्यरत प्रतिभाशाली पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.



 

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