सहारा का संकट : जब कार्यकर्ता और जमाकर्ता ही नहीं बचेगा तो करोगे क्या?

सहारा श्री सुब्रत रॉय की कुम्भकर्णी नींद। संस्था के मैनेंजमेंट ने संस्था और कार्यकर्ता को इस गम्भीर स्थिति में पहुंचा दिया है कि जो कार्यकर्ता हमेशा से संस्था और सहाराश्री भक्त थे, वो भी नेगेटिव बाते करने को मजबूर हो गए हैं. ये अपने व संस्था के भविष्य को लेकर सोचने लगे हैं. अब तो यूं कहें कि गूंगे भी बोलने लगे हैं, तो गलत नहीं होगा. पर अब भी कुछ अंध-भक्त ऊपरी दिखावे से बाज नहीं आते हैं और जो आवाज़ उठाता है उन लोगों को दबाने की कोशिश करते हैं. क्योंकि वो जानते हैं कि इससे उन लोगों का उल्लू सीधा हो रहा है.

हम ऐसे मैनेजमेंट के लोगों से कहना चाहते हैं कि शर्म करो, अपने मतलब के लिए मत जिओ. अपने छोटे साथियों के लिए ऊपरी मैनेजमेंट के खिलाफ आवाज बुलंद करो कि प्रोपर्टी बेचकर संस्था व कार्यकर्ता का भला करें. सच्चे अभिभावक बनो. जैसे पिता अपने बच्चों के लिए परेशानी आने पर खुद को गिरवी रख देता है, पर अपने बच्चों पर आंच नहीं आने देता. ये मत सोचो कि मुझे तनख्वाह और अन्य कोई लाभ मिल रहा है. क्योंकि जब कार्यकर्ता और जमाकर्ता ही नहीं बचेगा तो क्या कर लोगे.

जागो कुम्भकर्णी नींद से. अपनी कुर्सी के प्रेम से बाहर निकलो.

सहारा के एक वरिष्ठ फील्ड कार्यकर्ता द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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