रिजर्व बैंक को जान-बूझकर कर्ज ना चुकाने वालों की सूची सार्वजनिक करने का सुप्रीम निर्देश

जेपी सिंह

रिज़र्व बैंक आफ इंडिया ने उच्चतम न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करते हुए आदेश के लगभग सवा चार साल बाद भी देश के टॉप 100 लोन डिफॉल्टर्स के बारे में जानकारी नहीं दी है और न ही इससे संबंधित कोई सूचना अपनी वेबसाइट पर अपलोड की है। सूचना के अधिकार के तहत बैंकों की वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराने को लेकर उच्चतम न्यायालय ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को फटकार लगाई है। उच्चतम न्यायालय ने रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया को कड़ा संदेश देते हुए आदेश दिया है कि वह जान-बूझकर कर्ज ना चुकाने वालों और अपनी वार्षिक जांच रिपोर्टों को सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक करे।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और एम आर शाह की पीठ ने इस मामले में आरबीआई से कड़ी नाराज़गी व्यक्त करते हुये रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया को उच्चतम न्यायालय के आदेशों का सख्ती से पालन करने की हिदायत दी। पीठ ने कहा कि अगर बैंक ऐसा नहीं करता है तो उसे न्यायालय की अवमानना के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। न्यायालय के आदेश का पालन करने का उसके पास आखिरी अवसर है।

उच्चतम न्यायालय ने आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चन्द्र अग्रवाल द्वारा दायर की गई अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। याचिका में कहा गया था कि आरबीआई ‘रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया बनाम जयंतीलाल मिस्त्री और अन्य’ मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा 16 दिसम्बर 2015 को जारी विशेष दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है। जयंतीलाल एन मिस्त्री मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना था कि आरटीआई अधिनियम के तहत रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया जानकारी का खुलासा करने के लिए बाध्य है।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और प्रणव सचदेवा के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया था कि आरबीआई ने सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करने के लिए अलग से नीति बना ली और अपने सूचना अधिकारियों को भी यह आदेश दे दिया कि वह इस केंद्रीय बैंक से मांगी जाने वाली सभी तरह की सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करे। याचिका में कहा गया था कि इन सूचनाओं में वे सूचनाएं भी शामिल थीं, जिनको सार्वजनिक करने का आदेश खुद उच्चतम न्यायालय ने ही दिया था। इस तरह रिज़र्व बैंक आफ इंडिया ने उच्चतम न्यायालय के आदेश का उल्लंघन किया।

रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया बनाम जयंतीलाल मिस्त्री और अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि वह उन सभी बैकों से जुड़ी सूचनाएं सार्वजनिक करें जिनका विनियमन वह करता है। रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने बैंकों के साथ आर्थिक हितों का हवाला देकर ऐसी सूचनाएं सार्वजनिक करने का विरोध किया था। उसने कहा था कि ऐसा करना बैकों के साथ विश्वासघात करना होगा. उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा था कि वास्तव में सूचनाएं सार्वजनिक नहीं करने से आर्थिक नुकसान होगा।

वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट का खुलासा करने का भी निर्देश
उच्चतम न्यायालय ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से ‘सूचना का अधिकार’ के तहत बैंकों की वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट के बारे में सूचना का खुलासा करने का निर्देश दिया जब तक कि उन्हें कानून के तहत इससे छूट ना मिल जाए। न्यायालय ने आरबीआई को चेतावनी दी कि भविष्य में ‘सूचना का अधिकार’ के किसी भी तरह के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा।साथ ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से सूचना के अधिकार’ के तहत सूचना के खुलासे पर अपनी नीति की समीक्षा करने के लिए कहा। न्यायालय ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से अपनी नॉन-डिस्क्लोज़र पॉलिसी को खारिज करने के लिए कहा है, जो न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करती है।

चार साल बाद भी नहीं बताया टॉप 100 डिफॉल्टरों के नाम
रिज़र्व बैंक आफ इंडिया ने उच्चतम न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करते हुए आदेश के लगभग सवाचार साल बाद भी देश के टॉप 100 लोन डिफॉल्टर्स के बारे में जानकारी नहीं दी है और न ही इससे संबंधित कोई सूचना अपनी वेबसाइट पर अपलोड की है। उच्चतम न्यायालय न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने 16 दिसंबर, 2015 को रिज़र्व बैंक आफ इंडिया की तमाम दलीलों को ख़ारिज करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग के उस फैसले को सही ठहराया था जिसमें ये कहा गया था कि आरबीआई देश के शीर्ष-100 डिफॉल्टर्स के बारे में जानकारी दे।

रिज़र्व बैंक आफ इंडिया ने कहा था कि डिफॉल्टर्स के बारे में जो जानकारी बैंकों द्वारा भेजी जाती है उसे भरोसेमंद क्षमता में रखा जाता है और ये सूचना गोपनीय होती है। इसलिए ये जानकारी सूचना का अधिकार (आरटीआई) एक्ट की धारा 8(1)(ई) के तहत नहीं दी जा सकती है। इसके बाद साल 2015 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बनाम जयंतीलाल एन. मिस्त्री मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय के जस्टिस एमवाई इकबाल और जस्टिस सी. नगप्पन ने कई सारे अन्य मामलों को मिलाकर, जिसमें सीआईसी का ये आदेश भी शामिल था, लंबी बहस की और सीआईसी के आदेश को सही ठहराया।

उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा था कि आरबीआई को कुछ चुनिंदा बैंकों के हित की जगह जनहित को तरजीह देनी चाहिए।बैंक को पारदर्शिता के साथ काम करना चाहिए और ऐसी सूचनाओं को नहीं छुपाना चाहिए जो कि किसी बैंक के लिए आपत्तिजनक साबित हो सकता है।आरबीआई का ये तर्क बिल्कुल आधारहीन और गलत है कि ऐसी सूचनाओं को सार्वजनिक करने से देश के आर्थिक हितों पर प्रभाव पड़ेगा।

प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट.

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One comment on “रिजर्व बैंक को जान-बूझकर कर्ज ना चुकाने वालों की सूची सार्वजनिक करने का सुप्रीम निर्देश”

  • Shivramsingh says:

    Bat Emandari kee Hai. Saty Pareshan ho Sakta, Prast Kabhi Nahi. Desh ko Modi ke Hawale Karna, Dhan Bal ko Lakar Khada Karte Hue Manbata Kee Jeetey jee Hatya Krna hai.

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