पीसीआई चुनाव : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार!

Naved Shikoh : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार! क्योंकि ये ऐसा पत्रकार ने जो ब्रांड अखबारों की नौकरी छोड़कर शोषित पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। इस क्रान्तिकारी पत्रकार ने अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर, वेतन गंवाया.. तकलीफें उठायीं. मुफलिसी का सामना किया.. जेल गये.. सरकारों से दुश्मनी उठायी… ताकतवर मीडिया समूहों के मालिकों /उनके मैनेजमेंट से टकराये हैं ये। छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों में पत्रकारों का शोषण /महीनों वेतन ना मिलना/बिना कारण निकाल बाहर कर देना.. इत्यादि के खिलाफ कितने पत्रकार संगठन सामने आते हैं? कितने प्रेस क्लब हैं जहां पत्रकारों की इन वाजिब समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाता है!

इन्टरनेट के इस दौर में कलमकार भूखा नहीं मरेगा

Naved Shikoh : अब कलम बिकेगा, अखबार नहीं… RNI और DAVP में दर्ज यूपी के 97% पत्र-पत्रिकाओं का वास्तविक सर्कुलेशन 0 से 1000 तक ही है। सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात या अपना विज्ञापन फ्री में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में बड़े अखबारों को छोड़कर किसी अन्य को चुनावी विज्ञापन क्या खाक मिलेगा! यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लिखने की कला का बाजार सजने लगा है। सुना है यूपी के निकाय चुनाव के चुनावी दावेदार सोशल मीडिया को प्रचार का सबसे बड़ा-आसान और सस्ता माध्यम बनाने जा रहे हैं।

लखनऊ के पत्रकारों को दीपावली पर प्रदेश सरकार ने नहीं भेजी मिठाई

कल्याण सिंह की परम्परा योगी ने तोड़ी…  पत्रकारों की सरकारी मिठाई खटाई में पड़ी… वरिष्ठ पत्रकार के घर दीपावली मिलने गया। लंच का वक्त था। दोपहर के खाने का इंतजाम था। खाने के बाद मैंने खुद बेगैरती से कुछ मीठा खाने की जिद करते हुए कहा कि आज दीपावली है मिठाई तो खिलाना ही पड़ेगी। वरिष्ठ पत्रकार महोदय बोले अभी तक आई नहीं। शाम तक आना शायद आ जाये। मैंने कहा किस नौकरानी से मिठाई मंगवाई है जो शाम को मिठाई लायेगी। निकाल बाहर करिये उसे। आप जैसे पत्रकार सरकारें भगा देते हैं नौकरानी नहीं भगा सकते। 

मकान खाली कराने का डंडा इमानदारी से भरा है, इसे रोकने में हम क्यों साथ दें?

-नवेद शिकोह-

मुसीबत में लखनऊ के पत्रकार, फिर भी आपस में तकरार… केंद्र सरकार ने अखबारों पर तलवार चलायी तो हजारों पत्रकारों की नौकरी पर बन आयी। पत्रकारों ने मदद की गुहार लगाई तो स्वतंत्र पत्रकार की प्रेस मान्यता वाले दिग्गज / रिटायर्ड / प्रभावशाली पत्रकारों ने कहा कि हम इमानदारी की तलवार को रोकने की कोशिश क्यों करें? अच्छा है, फर्जी अखबार और उनसे जुड़े फर्जी पत्रकार खत्म हों। इसी बीच यूपी की प्रदेश सरकार ने बड़े पत्रकारों से बड़े-बड़े सरकारी मकान खाली कराने का डंडा चलाया। बड़ों ने एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए छोटों का समर्थन जुटाने का प्रयास किया। छोटों को बदला लेने का मौका मिल गया।  बोले- मकान खाली करने का डंडा इमानदारी का डंडा है। इसे रोकने में हम क्यों साथ दें। अच्छा है- करोड़ों के निजी मकानों के मालिकों को सरकारी मकानों से बाहर करना ईमानदारी का फैसला है।