मजीठिया वेज बोर्ड : सुप्रीम कोर्ट में आज की सुनवाई, भविष्य की रणनीति और लड़ने का आखिरी मौका… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : सुप्रीम कोर्ट से अभी लौटा हूं. जीवन में पहली दफे सुप्रीम कोर्ट के अंदर जाने का मौका मिला. गेट पर वकील के मुहर लगा फार्म भरना पड़ा जिसमें अपना परिचय, केस नंबर आदि लिखने के बाद अपने फोटो आईडी की फोटोकापी को नत्थीकर रिसेप्शन पर दिया. वहां रिसेप्शन वाली लड़की ने मेरा फोटो खींचकर व कुछ बातें पूछ कर एक फोटो इंट्री पास बनाया. पास पर एक होलोग्राम चिपकाने के बाद मुझे दिया. जब तक कोर्ट नंबर आठ पहुंचता, केस की सुनवाई समाप्त होने को थी.

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में भड़ास यानि Bhadas4Media.com की पहल पर दायर सैकड़ों याचिकाओं की सुनवाई आज थी. जो साथी छुपकर लड़ रहे हैं, उनको मैं रिप्रजेंट कर रहा हूं. कोर्ट नंबर आठ में आइटम नंबर तीन था. दूसरे कई पत्रकार साथी और उनके वकील भी आए हुए थे. मामले की सुनवाई शुरू होते ही टाइम्स आफ इंडिया की तरफ से आए एक वकील ने कहा कि उनके खिलाफ जिस कर्मचारी ने याचिका दायर की थी, उसने वापस लेने के लिए सहमति दे दी है. इस पर कर्मचारी के वकील ने विरोध किया और कहा कि ये झूठ है. इसको लेकर न्यायाधीश ने लड़-भिड़ रहे दोनों वकीलों को फटकार लगाई और इस प्रकरण को अपने पास रोक लिया. इसी तरह वकील परमानंद पांडेय के एक मामले में जब दूसरे पक्ष के वकील ने कहा कि मजीठिया मांगने वाला कर्मी इसके दायरे में आता ही नहीं तो न्यायाधीश ने परमानंद पांडेय से पूछ लिया कि क्या ये सही है. पांडेय जी फाइल देखने लगे. तुरंत जवाब न मिलने पर न्यायाधीश ने इस मामले को भी होल्ड करा लिया. बाकी सभी मामलों में  कोर्ट ने सभी मालिकों को नोटिस भेजने का आदेश दिया है. इस नोटिस में कहा गया है कि क्यों न अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा शुरू किया जाए. मामले की सुनवाई की अगली तारीख 28 अप्रैल है.

दोस्तों, एक मदद चाहिए. सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े चाहिए. जो साथी इसे मुहैया करा सकता है वह मुझे yashwant@bhadas4media.com पर मेल करे. अखबार मालिक अपने बचाव के लिए जो नई चाल चल रहे हैं, उसका काउंटर करने के लिए ये आंकड़े मिलने बहुत जरूरी हैं ताकि आम पत्रकारों को उनका हक दिलाया जा सके. मालिकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख बहुत तल्ख है. आज की सुनवाई से यह लग रहा है कि 28 अप्रैल की डेट पर सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ कोई कड़ा आदेश जारी कर सकता है. अगली डेट पर मालिकों की तरफ से क्या क्या नई चाल चली जाने वाली है, इसके कुछ डिटेल हाथ लगे हैं. उसी के तहत आप से सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े मांगे जा रहे हैं. आप लोग जिन-जिन अखबारों में हो, उन उन अखबारों के उपरोक्त डिटेल पता लगाएं. मैं भी अपने स्तर पर इस काम में लगता हूं.

दोस्तों बस कुछ ही दिनों का खेल है. जी-जान से सबको लग जुट जाना है. ये नहीं देखना है कि उसका वकील कौन है मेरा वकील कौन है. जो भी हैं, सब अच्छे हैं और सब अपने हैं. जो साथी अब तक इस लड़ाई में छुपकर या खुलकर शरीक नहीं हो पाए हैं, उनके लिए अब कुछ दिन ही शेष हैं. आप सिर्फ सात हजार रुपये में सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बनने वाली अपनी सेलरी व अपना एरियर का हक पाने के लिए एडवोकेट Umesh Sharma​ के मार्फत केस डाल सकते हैं. एडवोकेट उमेश शर्मा से उनकी मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com या उनके आफिस के फोन नंबर 011-2335 5388 या उनके निजी मोबाइल नंबर 09868235388 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

आज यानि 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा ने जो कुछ मुझे बताया, उसे मैंने अपने मोबाइल से रिकार्ड कर लिया ताकि आप लोग भी सुनें जानें और बूझें. क्लिक करें इस लिंक पर: https://www.youtube.com/watch?v=KTTDbkReQ1k

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


संबंधित खबर…

भड़ास की पहल पर दायर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार, 27 मार्च को होगी सुनवाई

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजस्थान पत्रिका में मजीठिया वेज बोर्ड के साइड इफेक्ट : डीए सालाना कर दिया, सेलरी स्लिप देना बंद

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं

जब से मजीठिया वेज बोर्ड ने कर्मचारियों की तनख्‍वाह बढ़ाने का कहा व सुप्रीम कोर्ट ने उस पर मोहर लगा दी तब से मीडिया में कार्य रहे कर्मचा‍रियों की मुश्किलें बढ रही हैं. इसी कड़ी में राजस्‍थान पत्रिका की बात बताता हूं। पहले हर तीन माह में डीए के प्‍वाइंट जोड़ता था लेकिन लगभग दो तीन वर्षों से इसे सालाना कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए तनख्‍वा बढ़ी तो जहां 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी होनी थी तो मजीठिया लगने के बाद कर्मचारियों की तनख्‍वाह में मात्र 1000 रुपए का ही फर्क आया। किसी किसी के 200 से 300 रुपये की बढ़ोतरी।

इसके बाद बारी आई सालाना वेतन वृद्धि की जो इंक्रीमेंट के साथ डीए आदि मिलाकर देखा जाए तो कम से कम भी 1500 रुपये के लगभग बढती थी। राजस्‍थान पत्रिका में सालाना वेतन वृद्धि जनवरी एवं जुलाई में होती है। आज सालाना वेतन वृद्धि के बढ़ी हुई सैलेरी मिली लेकिन सैलेरी लेकर हंसी आ रही थी व दुख हो रहा था। अब डीए भी बंद व तनख्‍वाह बढी मात्र 200 रुपए यानि एक माह का सोलह रुपए 67 पैसा और एक दिन का हुआ लगभग 22 पैसा।

इतना वेतन एक साथ बढ़ने से मैं तो धन्‍य हो गया। अब तो मेरे बच्‍चे हमारे शहर की सर्वोच्‍च शिक्षण संस्‍था में पढ सकेंगे। मैं छुट्टियों के दौरान घूमने के लिए विदेश भी जा सकूंगा। अपने लिए एक गाड़ी व घर भी ले सकूंगा। आखिर लूं भी क्‍यों ना सकूंगा। आखिर एक साल में 200 रुपए की वेतन वृद्धि जो हुई है जो मैंने कभी सपने में नहीं सोचा था। खैर व्‍यंग्य को छोड़ दें।

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं ताकि दूसरे भाईयों का शायद कुछ भला हो जाए मेरा तो जो होगा देखा जाएगा बाकि पूरा परिवार साथ में होगा तो पीछे की चिंता भी नहीं रहेगी। एक बात और यदि सैलेरी के लिए पैसे कम हो तो कर्मचारियों से कह देना वो शायद चंदा इकठा करके आपके ऐशो आराम की जिंदगी जीन का प्रबंध कर ही देंगे इतने बुरे भी नहीं है कर्मचारी।

इसके अलावा राजस्‍थान पत्रिका ने सैलेरी स्लिप भी देना बंद कर दी। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसमें गुलाब कोठारी जी का संपादकीय छपता है। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसके संस्‍थापक कुलिश जी ने उधार रुपए लेकर अखबार की शुरुआत की। लेकिन कुलिश जी ने कभी कर्मचारियों का बोनस नहीं रोका अब तो सरकार से मिलने वाली सुविधाएं खुद तो ले रहे हैं लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं रोकने का प्रयास किया जा रहा है। यह सत्‍य भी कि यदि कुलिश जी उधार के पैसे से अखबार चला सकते हैं कर्मचारी उधार रुपए लेकर क्‍या अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकते क्‍योंकि सबको पता है कि पत्रिका के कर्मचारी को दिया उधार वो चुकाएगा कैसे।

यहां एक बात का ओर उल्‍लेख करना चाहता हूं कि वितरण विभाग में जो टैक्सियों का पेमेंट होता है उसमें टेक्सियों का बिल तो ज्‍यादा बनता है लेकिन उनके चैक को पत्रिका के वितरण विभाग के कर्मचारी साथ जाकर कैश करवाते हैं व उसमें से लगभग दो रुपये प्रति किलोमीटर का पैसा गुलाब जी के घर पहुंचता है जो हर ब्रांच से कम से कम 10 लाख बनता है। ये है इनकी सच्‍चाई।

एक पत्रिका कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजस्थान पत्रिका के दस मीडियाकर्मियों ने सभी निदेशकों को भेजा लीगल नोटिस

राजस्थान पत्रिका से खबर है कि यहां के दस मीडियाकर्मियों ने सुप्रीम कोर्ट के एक वकील से संपर्क साधकर मालिकों को लीगल नोटिस भिजवाया है. लीगल नोटिस भिजवाने की पहल की है राजस्थान पत्रिका, उदयपुर के ललित जैन ने. ललित जैन 13 वर्षों से पत्रिका में जूनियर मेंटनेंस आफिसर के पद पर कार्यरत हैं. जैन के नेतृत्व में दस मीडियाकर्मियों ने पत्रिका जो लीगल नोटिस भिजवाया, उसे पत्रिका समूह मुख्यालय की तरफ से रिसीव भी कर लिया गया है.

इस तरह मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में एक और पन्ना जुड़ गया है. ललित जैन की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के वकील धर्मेंद्र सिंह चौधरी और अमित सिंह राठौर ने जो लीगल नोटिस पत्रिका प्रबंधन को भेजा है, उसकी एक कापी भड़ास के पास है, जिसे यहां प्रकाशित किया गया है.

ज्ञात हो कि भड़ास की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा भी देश के सभी प्रिंट मीडिया हाउसों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर और सेलरी देने के लिए लीगल नोटिस भेज रहे हैं. सात दिनों बाद सभी प्रिंट मीडिया हाउसों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा कर दिया जाएगा. भड़ास के साथ सैकड़ों पत्रकार गोपनीय रूप से लड़ रहे हैं तो दर्जनों पत्रकार खुलकर लड़ाई लड़ रहे हैं.

भड़ास के साथ जो-जो साथी खुलकर लड़ रहे हैं, वे 31 जनवरी को अंतिम रूप से दिल्ली पहुंचकर वकालतनामा और याचिका पर हस्ताक्षर कर दें. 31 जनवरी को दिल्ली में आईटीओ के पास दीनदयाल रोड स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में 12 बजे से 2 बजे तक बैठक होगी. इसमें वकालतनामा और याचिका पर हस्ताक्षर कराए जाएंगे. जो भी साथी इसमें शिरकत करने को आएं, वे अपने साथ अपने सारे डाक्यूमेंट्स की फोटोकापी और वकील के खाते में जमा किए छह हजार रुपये की रसीद लेते आएं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

7 फरवरी के बाद मजीठिया के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे, भड़ास आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार

जी हां. ये सच है. जो लोग चुप्पी साध कर बैठे हैं वे जान लें कि सात फरवरी के बाद आप मजीठिया के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे. सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक साल पूरे हो जाएंगे और एक साल के भीतर पीड़ित पक्ष आदेश के अनुपालन को लेकर याचिका दायर कर सकता है. उसके बाद नहीं. इसलिए दोस्तों अब तैयार होइए. भड़ास4मीडिया ने मजीठिया को लेकर आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील उमेश शर्मा की सेवाएं भड़ास ने ली है.

( File Photo Umesh Sharma Advocate )

इस अदभुत आर-पार की लड़ाई में मीडियाकर्मी अपनी पहचान छुपाकर और नौकरी करते हुए शामिल हो सकते हैं व मजीठिया का लाभ पा सकते हैं. बस उन्हें करना इतना होगा कि एक अथारिटी लेटर, जिसे भड़ास शीघ्र जारी करने वाला है, पर साइन करके भड़ास के पास भेज देना है. ये अथारिटी लेटर न तो सुप्रीम कोर्ट में जमा होगा और न ही कहीं बाहर किसी को दिया या दिखाया जाएगा. यह भड़ास के वकील उमेश शर्मा के पास गोपनीय रूप से सुरक्षित रहेगा. इस अथारिटी लेटर से होगा यह कि भड़ास के यशवंत सिंह आपके बिहाफ पर आपकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ सकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में आपका नाम कहीं न खुलेगा न कोई जान सकेगा. दूसरी बात. जो लोग अपने नाम पहचान के साथ लड़ना चाहते हैं, उससे अच्छा कोई विकल्प नहीं है. उनका तहे दिल से स्वागत है. ऐसे ही मजबूत इरादे वाले साथियों के साथ मिलकर भड़ास मजीठिया की आखिरी और निर्णायक जंग सुप्रीम कोर्ट में मीडिया हाउसों से लड़ेगा.

बतौर फीस, हर एक को सिर्फ छह हजार रुपये शुरुआती फीस के रूप में वकील उमेश शर्मा के एकाउंट में जमा कराने होंगे. बाकी पैसे जंग जीतने के बाद आपकी इच्छा पर निर्भर होगा कि आप चाहें भड़ास को डोनेशन के रूप में दें या न दें और वकील को उनकी शेष बकाया फीस के रूप में दें या न दें. यह वैकल्पिक होगा. लेकिन शुरुआती छह हजार रुपये इसलिए अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपये लगते हैं, लेकिन एक सामूहिक लड़ाई के लिए मात्र छह छह हजार रुपये लिए जा रहे हैं और छह हजार रुपये के अतिरिक्त कोई पैसा कभी नहीं मांगा जाएगा. हां, जीत जाने पर आप जो चाहें दे सकते हैं, यह आप पर निर्भर है. बाकी बातें शीघ्र लिखी जाएगी.

आपको अभी बस इतना करना है कि अपना नाम, अपना पद, अपने अखबार का नाम, अपना एड्रेस, अपना मोबाइल नंबर और लड़ाई का फार्मेट (नाम पहचान के साथ खुलकर लड़ेंगे या नाम पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ेंगे) लिखकर मेरे निजी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर भेज दें ताकि यह पता लग सके कि कुल कितने लोग लड़ना चाहते हैं. यह काम 15 जनवरी तक होगा. पंद्रह जनवरी के बाद आए मेल पर विचार नहीं किया जाएगा. इसके बाद सभी से अथारिटी लेटर मंगाया जाएगा. जो लोग पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर भेजना पड़ेगा. जो लोग पहचान उजागर कर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर देने की जरूरत नहीं है. उन्हें केवल याचिका फाइल करते समय उस पर हस्ताक्षर करने आना होगा.

हम लोगों की कोशिश है कि 15 जनवरी को संबंधित संस्थानों के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा की तरफ से लीगल नोटिस भेजा जाए कि आपके संस्थान के ढेर सारे लोगों (किसी का भी नाम नहीं दिया जाएगा) को मजीठिया नहीं मिला है और उन लोगों ने संपर्क किया है सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए. हफ्ते भर में जिन-जिन लोगों को मजीठिया नहीं मिला है, उन्हें मजीठिया के हिसाब से वेतनमान देने की सूचना दें अन्यथा वे सब लोग सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने को मजबूर होंगे.

हफ्ते भर बाद यानि एक या दो फरवरी को उन संस्थानों के खिलाफ याचिका दायर कर दी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट से इस अनुरोध के साथ कि संबंधित संस्थानों को लीगल नोटिस भेजकर मजीठिया देने को कहा गया लेकिन उन्होंने नहीं दिया इसलिए मजबूरन कोर्ट की शरण में उसके आदेश का पालन न हो पाने के चलते आना पड़ा है.

और, फिर ये लड़ाई चल पड़ेगी. चूंकि कई साथी लोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर जीत चुके हैं, इसलिए इस लड़ाई में हारने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

मुझसे निजी तौर पर दर्जनों पत्रकारों, गैर-पत्रकारों ने मजीठिया की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ने के तरीके के बारे में पूछा. इतने सारे सवालों, जिज्ञासाओं, उत्सुकताओं के कारण मुझे मजबूरन सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा जी से मिलना पड़ा और लड़ाई के एक सामूहिक तरीके के बारे में सोचना पड़ा. अंततः लंबे विचार विमर्श के बाद ये रास्ता निकला है, जिसमें आपको न अपना शहर छोड़ना पड़ेगा और न आपको कोई वकील करना होगा, और न ही आपको वकील के फीस के रूप में लाखों रुपये देना पड़ेगा. सारा काम आपके घर बैठे बैठे सिर्फ छह हजार रुपये में हो जाएगा, वह भी पहचान छिपाकर, अगर आप चाहेंगे तो.

दोस्तों, मैं कतई नहीं कहूंगा कि भड़ास पर यकीन करिए. हम लोगों ने जेल जाकर और मुकदमे झेलकर भी भड़ास चलाते रहने की जिद पालकर यह साबित कर दिया है कि भड़ास टूट सकता है, झुक नहीं सकता है. ऐसा कोई प्रबंधन नहीं है जिसके खिलाफ खबर होने पर हम लोगों ने भड़ास पर प्रकाशित न किया हो. ऐसे दौर में जब ट्रेड यूनियन और मीडिया संगठन दलाली के औजार बन चुके हों, भड़ास को मजबूर पत्रकारों के वेतनमान की आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए एक सरल फार्मेट लेकर सामने आना पड़ा है. आप लोग एडवोकेट उमेश शर्मा पर आंख बंद कर भरोसा करिए. उमेश शर्मा जांचे परखे वकील हैं और बेहद भरोसेमंद हैं. मीडिया और ट्रेड यूनियन के दर्जनों मामले लड़ चुके हैं और जीत चुके हैं.

दुनिया की हर बड़ी लड़ाई भरोसे पर लड़ी गई है. ये लड़ाई भी भड़ास के तेवर और आपके भरोसे की अग्निपरीक्षा है. हम जीतेंगे, हमें ये यकीन है.

आप के सवालों और सुझावों का स्वागत है.

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया
+91 9999330099
+91 9999966466
yashwant@bhadas4media.com


मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा लिखित और भड़ास पर प्रकाशित एक पुराना आर्टकिल यूं है…

Majithia Wage Board Recommendations : legal issues and remedies

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रिका ग्रुप ने अपने कई पत्रकारों को सम्मानित किया

जयपुर। प्रतिवर्ष होने वाली पंडित झाबरमल्ल स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन रविवार सुबह 10.30 बजे राजस्थान पत्रिका के के सरगढ़ कार्यालय में किया गया। इस अवसर पर पत्रिका की ओर से सृजनात्मक साहित्य व पत्रकारिता पुरस्कार दिया गया। इस अवसर पर पत्रिका समूह के प्रधान संपाधक गुलाब कोठारी ने लोकतंत्र में मीडिया के घटते प्रभाव पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल चुनावों के समय मीडिया को सिर-आंखों पर चढ़ा लेते हैं लेकिन इसके बाद वह उन्हें बोझ लगने लगता है। जनता के लिए बना लोकतंत्र अब सरकार के लिए हो गया है। सरकारें मीडिया को दबंगई दिखाने लगी हैं।

उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को जितना बहुमत मिलता है वह उतना ही अहंकार दिखाती है। मोदीजी ने भी सरकार बनने के बाद अपने साथियों को मीडिया से दूरी बनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जनता सरकार का पेट पालती है लेकिन उसे अपना काम कराने के लिए रिश्वत भी देना पड़ता है। हम उनको सत्ता में ला रहे है लेकिन घूस भी दे रहे हैं। ऎसा होने का क्या कारण है। इसका जवाब मीडिया को देना होगा। आज हम जो बोते हैं उसका फल खुद ही खाना चाहते हैं, यह कैसे संभव है। ऎसा होने पर तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और तानाशाही आ जाएगी। इस अवसर पर पत्रकारिता के मूल्यों को बनाए रखते हुए खबरें देने और साहस से सच का साथ देने वाले “कलम के सिपाहियों” को उनको पुरस्कृत किया गया।

सर्वश्रेष्ठ स्पेशल कवरेज – संदीप उपाध्याय
सर्वश्रेष्ठ ओपीनियन – लोकेन्द्र चौहान
सर्वश्रेष्ठ एक्सक्लूजिव न्यूज – विकास जैन
सर्वश्रेष्ठ मानवीय स्टोरी – भरतपुर ब्यूरो
सर्वश्रेष्ठ शाखा अभियान – सूरत
सर्वश्रेष्ठ भागीदारी अवार्ड – जयपुर
सर्वश्रेष्ठ ब्यूरो अभियान – जितेन्द्र सारण
सर्वश्रेष्ठ फोटो -हाबूलाल शर्मा
सर्वश्रेष्ठ कार्टून – सुधाकर सोनी
सर्वश्रेष्ठ ग्राफिक्स – अभिषेक शर्मा

सृजनात्मक साहित्य पुरस्कारों के तहत इस साल कहानी में प्रथम पुरस्कार जयपुर के कथाकार प्रबोध कुमार गोविल, दूसरा पुरस्कार राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मनोज कुमार शर्मा और कविता में प्रथम पुरस्कार उज्जैन के हेमंत देवलेकर तथा दूसरा पुरस्कार विनोद पदरज को दिया गया।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजस्थान पत्रिका, जोधपुर में भ्रष्टाचार और जातिवाद चरम पर, गुलाब और नीहार कोठारी को भेजा गया गोपनीय पत्र

यशवंत जी, यह पत्र दो सप्ताह पहले राजस्थान पत्रिका के प्रमुख गुलाब कोठारी और नीहार कोठोरी को भेजा गया था… इस आशा के साथ कि यह पत्र मिलने के बाद कोई ठोस कार्यवाही होगी… लेकिन जैसे खबरें दबाई जाती हैं, वैसे ही इस पत्र को दबा दिया गया… आखिर में यह पत्र आपको भेजा जा रहा है… व्हिसल ब्लोअर का नाम उजागर नहीं करना पत्रकारिता का धर्म है और बात रही सत्यता की एक भी बात असत्य नहीं है… हर कर्मचारी पीड़ित है…

7 नवम्बर को भेजा गया पत्र
व्यक्तिगत एवं गोपनीय        
सेवा में
गुलाब कोठारी
प्रधान संपादक, राजस्थान पत्रिका
केसरगढ़, जेएलएन मार्ग, जयपुर

व्यक्तिगत एवं गोपनीय
सेवा में
नीहार कोठारी
संपादक, राजस्थान पत्रिका
केसरगढ़, जेएलएन मार्ग, जयपुर

विषय : राजस्थान पत्रिका जोधपुर में भ्रष्टाचार और जातिवाद चरम पर

श्रीमान गुलाब जी कोठारी और श्री निहारी जी कोठारी

यह पत्र आपका ध्यान राजस्थान पत्रिका के जोधपुर संस्करण के सूरत-ए-हाल बताने के लिए लिखा जा रहा है। आपसे उम्मीद है कि आप इन मामलों पर संज्ञान लेते हुए उचित कार्यवाही करेंगे। जोधपुर संस्करण में गत कई माह से हालत बद से बदत्तर हो गए हैं। संपादकीय विभाग में जातिवाद पूरी तरह हावी हो गया है और अपने लोगों को हर तरह से सपोर्ट किया जा रहा है, इतना ही नहीं पत्रिका की साख पर दाग लग रहा है और वह भी भ्रष्टाचार का। शहर में पत्रिका पर पैसे लेकर खबर लगाने और रोकने के कई आरोप लग रहे हैं।  भास्कर के कर्मचारियों से लेकर शहर प्रतिष्ठित लोगों में इन दिनों चर्चा का विषय है। इससे पत्रिका की 50 वर्षों की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है।

केस -1

संपादक ने की लाखों की डील

जोधपुर संस्करण के संपादकीय प्रभारी पर पैसे लेकर एक राजनेता को फेवर करने के गंभीर आरोप हैं। इसकी जानकारी कई लोगों ने मौखिक और लिखित रूप से जयपुर मुख्यालय को दी है। संपादकीय प्रभारी राजेश नैन पर भाजपा के स्थानीय नेता राजेन्द्र गहलोत से दो से पांच लाख रूपए लेने का आरोप है। यह चर्चा शहर भर में है। राजेन्द्र गहलोत की विधानसभा चुनाव के दौरान मोबाइल कॉल रिकॉर्डिंग की खबर लोकसभा चुनाव में पत्रिका में प्रमुखता से प्रकाशित की गई  थी और भास्कर में यह समाचार नहीं था। इस मुद्दे को लेकर कई खबरें प्रकाशित करने की कार्ययोजना बनीं थी, लेकिन उसके बाद एक भी खबर प्रकाशित नहीं हुई ।

पत्रिका ने राजेन्द्र गहलोत को जमकर फेवर किया, इसका प्रमाण प्रकाशित खबरें हैं । इतना ही नहीं कई रिपोर्टर्स के माध्यम से गहलोत को ऑबलाइज किया गया। इसकी पुष्टि संबंधित रिपोर्टर और चीफ रिपोर्टर से की जाती है। इस डील में दलाली का काम पत्रिका के रिपोर्टर रामेश्वर बेड़ा ने किया। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय शिक्षक भर्ती सुपर घोटाले के बारे में पत्रिका ने प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी। बताया जा रहा है कि विवि पीआरओ रामनिवास चौधरी (जाट भाई) अपने जाट भाई राजेश नैन से मिला और कुलपति आवास पर मिटिंग करवाई। इसमें चैनल 24 के इंचार्ज अजय अस्थाना भी शामिल है और संपादक के साथ डील कर ली। जिसके बाद पत्रिका में खबरों का प्रकाशन कम हो गया।

केस- 2

रिपोर्टर ने खुलेआम लिया एप्पल का फोन

राजेश नैन ने जातिवाद को इतना हावी कर रखा है कि सजातीय भाई रामेश्वर बेड़ा की हर गलती को नजरअंदाज करते हैं और कई गंभीर गलतियों के बारे में जयुपर को अवगत तक नहीं कराया। रामेश्वर बेड़ा के पास एक एप्पल का आई-फोन आया। सभी रिपोर्टर्स को पूर्ण रूप से मालूम है कि बेड़ा की इतनी हैसियत नहीं है कि वह एप्पल का नया या पुराना फोन ले सके। इन दिनों ऑफिस में चर्चा है कि एप्पल का फोन खरीदा नहीं गया है, बल्कि यह किसी से लिया गया है। पुष्ट सूत्रों के अनुसार  रामेश्वर ने यह फोन शिक्षक नेता शंभूसिंह मेड़तिया से लिया है। इसकी तस्दीक भी हो चुकी है। इतना ही नहीं स्कूली शिक्षा की बीट आने के बाद रामेश्वर बेड़ा ने  मेड़तिया को खबरों के माध्यम से इतना ऑब्लाइज किया है कि दूसरे शिक्षक संगठन पत्रिका से नाराज हैं । इसकी शिकायत कई संगठनों ने स्थानीय संपादक से लेकर जयपुर तक की है।

केस -3

धर्मेन्द्र बनाम संपादक

वर्तमान में न्यूज टुडे में कार्यरत धर्मेन्द्र सिंह ने जोधपुर नियुक्ति के दौरान संपादक राजेश नैन पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया था। बताया जाता है कि इसकी लिखित शिकायत भी जयपुर तक पहुंची, जिसके बाद धर्मेंद का स्थानांतरण जोधपुर से न्यूज टुडे में कर दिया गया।

 
केस -4

पत्रिका बना जाटिस्तान

राजेश नैन के आने के बाद पत्रिका में जातिवाद इतना हावी हो गया है कि लोग इसे पत्रिका कार्यालय कम और जाटिस्तान ज्यादा कहते है।  जोधपुर कार्यालय में जितने भी जाट भाई कार्यरत हैं, उनका एक ग्रुप बन गया है। इनमें विकास चौधरी, रामेश्वर बेड़ा, श्यामवीर सिंह, रामलाल जैसे अन्य साथी शामिल है। इसका प्रमाण यह भी है कि राजेश नैन ने पदभार ग्रहण करने के बाद सभी साथियों से उनके सरनेम पूछे थे। इतना ही नहीं पत्रिका ने जिस खींवसर विधायक हनुमान बैनीवाल का बहिष्कार कर रखा है, उसे कार्यालय में बुलाकर चाय-नाश्ता कराया गया। कई जाट नेताओं को संपादक से मिलाया जाता है, जाट समाज के नेताओं का आना आम है। संपादक ने विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जाट उम्मीदवार को पर्दे के पीछे से फेवर किया था। जाट संपादक को जाट नेताओं से मिलाने का जिम्मा विकास चौधरी का है। विकास चौधरी बड़े जाट नेता के जोधपुर आने पर लाइनअप कर संपादक से मिलाता है। विकास चौधरी क्राइम रिपोर्टर है और अधिकारियों, नेताओं और पुलिसवालों से इसकी सेटिंग है। जाट पुलिसवालों को विकास जमकर फेवर करता है।

केस -5

चरित्रहीनों की ढाल बना संपादक

पत्रिका की परम्पराओं के अनुसार महिला साथी के साथ दुर्व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाता है। लेकिन पत्रिका जोधपुर कार्यालय में संपादक ऐसे चरित्रहीनों की ढाल बने हुए हैं । गत दिनों एक महिला साथी ने रामेश्वर बेड़ा की शिकायत राजेश नैन से की थी, जिसमें कहा गया था कि बेड़ा रात में उसे फोन कर अश्लील बातें करता है। ऑफिस के बाहर अकेले में मिलने के लिए कहता है । इसके अलावा ऐसी ही कई अन्य बातें हैं, जिनका जिक्र भी नहीं किया जा सकता है। जब राजेश नैन से महिला साथी ने बेड़ा की शिकायत की तो उनसे मिले जवाब से वह बहुत आहत हुई और नौकरी छोड़ने का मानस बना रही है। इससे पहले एक महिला साथी के जन्मदिन पर बेड़ा उसके घर पर मिठाई और गिफ्ट लेकर पहुंच गया था। एक ट्रेनी महिला साथी को भी बेड़ा ने इतना परेशान किया कि वह संस्था छोड़कर चली गई। बेड़ा के खिलाफ महिला कांस्टेबल से लेकर जिला परिषद की महिला सदस्यों को कॉल करने तक की शिकयतें है। राजेश नैन को जब इसके बारे में बताया गया तो उन्होंने कुछ शिकायतों को अपने कार्यकाल का न बता कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

केस -6

मानसिक प्रताड़ना झेल रहे कर्मचारी

राजेश नैन की हिटलरशाही, जातिवाद, गुस्सा, कुतर्क से (जाट भाई छोड़कर) संपादकीय  साथी परेशान हैं। कई साथियों को राजेश नैन ने दुर्भावनावश इतना परेशान किया कि उनका मनोबल गिर गया है और वे अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पा रहे हैं । कई कर्मचारी नौकरी छोड़ने का मानस बना रहे हैं। ताजा उदाहरण धर्मेंद सिंह का है, जिसने मानसिक प्रताड़ना का लिखित में आरोप लगाया था।

केस -7

भ्रष्टाचारियों की हो रही भर्ती

राजेश नैन ने  संपादकीय विभाग जोधपुर में अपने जैसे भ्रष्टाचारियों की सेना खड़ी करनी तैयार कर दी है । जिन रिपोर्टर्स पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उन्हें पत्रिका में लिया जा रहा है । उदाहरण के तौर पर गजेन्द्र सिंह दहिया जिस पर अपने पूर्व कार्यकाल में लैपटॉप लेने का आरोप है, जिसकी वजह से पहले पत्रिका ने उसका स्थानान्तरण जोधपुर से अलवर कर दिया था। इसके बाद उसने नौकरी छोड़ दी । तीन साल बाद हाल ही में उसे वापस ले लिया गया है। दूसरा उदाहरण सौरभ पुरोहित का।  पत्रिका जोधपुर से स्थानान्तरण के बाद सौरभ ने भास्कर जॉइन किया और एक लाख से ज्यादा रुपए के गबन के आरोप में उसे भास्कर से निकाल दिया गया। पत्रिका में सौरभ की वापसी की कवायद तेजी से चल रही है। तीसरा उदाहरण प्रॉपर्टी डीलर चैनराज भाटी का है।  पाली से बिना बताए छोड़कर गए चैनराज को पत्रिका ने वापस ले लिया। जोधपुर में पत्रिका के नाम पर प्रॉपर्टी का काम देख रहा है। चैनराज का शानो-शौकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चैनराज के पास कार से आता है और रिपोर्टिंग करता है। जबकि उसकी सैलरी मात्र 18 हजार है । इतना ही नहीं रामेश्वर बेड़ा संपादक को मंडी से सब्जी, घी, तेल सहित अन्य सामानों की सप्लाई सीधे घर तक करता है।

धन्यवाद

कर्मचारी

राजस्थान पत्रिका, जोधपुर

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: