टाइम्स की दुकान और पत्रकार से छुटकारा

अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाऊ क्यों छोड़ा, वे जानें। पर जैसा कि नौकरी छोड़ने वाले ज्यादातर पत्रकारों के साथ होता है, नौकरी छोड़ने के समय हर कोई कहता है, अपना कुछ काम करेंगे। ऐसा कई पत्रकारों के मामले में हुआ है। कई साल से हो रहा है। किसी एक का क्या नाम लेना – लोग जानते हैं और जो नहीं जानते उनके लिए नाम बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। वैसे यह सच है कि नौकरी छोड़ने के बाद कइयों ने अपना काम शुरू भी किया, कर भी रहे हैं पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि जैसी संस्था छोड़ी वैसी ही खड़ी कर ली। या जो है वैसी होने की ओर अग्रसर है। फिर भी अर्नब गोस्वामी के बारे में कहा जा रहा है (उन्होंने नहीं कहा है) कि वे चैनल शुरू करेंगे। और फिर इससे जुड़ी अटकलें। मेरी दिलचस्पी उसमें नहीं है।

मुझे यह समझ में आ रहा है कि अर्नब जितनी तनख्वाह पाते होंगे उतने का पूरा कारोबार कर लेना भी असाधारण होगा – शुरू करने के बाद कई वर्षों तक। ऐसे में कोई स्वेच्छा से क्यों नौकरी छोड़ेगा और कोई योजना-साजिश है तो उसका खुलासा धीरे-धीरे ही होगा। इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्प याद है। सोचा आज इस मौके पर उसी की चर्चा करूं। मौका है, दस्तूर भी। मामला पुराना है, मोटे तौर पर टाइम्स संस्थान का अपनी हिन्दी की पत्रिकाओं को बंद करना। दूसरे शब्दों में, 10, दरियागंज का इतिहास हो जाना। टाइम्स ने अचानक हिन्दी की अपनी कई अच्छी, चलती, बिकती, प्रतिष्ठित और लोकप्रिय पत्रिकाओं को बंद करने की घोषणा कर दी। हिन्दी के पत्रकार – कहां छोड़ने और मानने वाले थे। और उस जमाने में सरकार हिन्दी के पत्रकारों को नाराज कैसे कर सकती थी।

टाइम्स समूह को समझ में आया कि पत्रकारों से छुटकारा पत्रकार ही दिलाएगा और घोषणा हुई कि सभी टाइटिल्स मशहूर पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने ले लिए हैं। (दे दिया, बेच दिया, खरीद लिया – मुझे याद नहीं है और अब महत्वपूर्ण भी नहीं है)। पत्रकारों को लगा कि मालिक बदलेगा। अच्छा है, पत्रकार मालिक होगा। नौकरी यहां नहीं, वहां कर लूंगा। आंदोलन शांत। मामला ठंडे बस्ते में। वो पत्रिकाएं आज तक बाजार में नहीं दिखीं। छपती हों और नेताओं के घर डाक से जाती हों तो मुझे नहीं पता। वैसे उन दिनों साउथ एक्सटेंशन की एक बिल्डिंग पर पत्रिकाओं के बोर्ड जरूर लगे थे। कुछ दिनों बाद से ही नहीं दिखते।

अर्नब का मामला अलग है। पर हिन्दी के पत्रकारों के मालिकों से संबंध हमेशा दिलचस्प रहे हैं। आनंद बाजार समूह ने हिन्दी की पत्रिका रविवार बंद की तो फिर हिन्दी में हाथ नहीं डाला। इंडिया टुडे हिन्दी में निकलता है पर गिनती के कर्मचारियों से। हिन्दी आउटलुक का हाल आप जानते हैं। और भी कई हैं। पत्रकार से छुटकारा पाना किसी भी संस्थान के लिए मुश्किल होता है और कोई भी पत्रकार रामनाथ गोयनका बनने से कम का सपना नहीं देखता है। ऐसे में पत्रकारों खासकर हिन्दी वालों को बांटने और अमीर बनाने का खेल भी हुआ संपादक नाम की संस्था अंग्रेजी में खत्म हो गई पर हिन्दी में बची हुई है तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है। यह अलग बात है कि आम पत्रकारों को इससे कोई लाभ नहीं है।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं.

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