अर्णव गोस्वामी जिन्हें ‘शहरी नक्सली’ बता कर भोंक रहा, जानिए वो सुधा भारद्वाज हैं कौन!

Ajeet Singh : मजदूर नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और मजदूरों आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए 40 साल की उम्र में लॉ की पढ़ाई करके अधिवक्ता बनने वाली सुधा भारद्वाज को ‘शहरी नक्सली’ घोषित करने का घृणित प्रयास किया जा रहा है। रिपब्लिक टीवी ने बुधवार को अपने एक कार्यक्रम में यह दावा किया कि ‘कामरेड अधिवक्ता सुधा भारद्वाज’ द्वारा किसी ‘कामरेड प्रकाश’ को एक पत्र लिखा गया था। उक्त पत्र में ‘कश्मीर जैसे हालात’ निर्मित करने की बात कही गई है। रिपब्लिक टीवी द्वारा इस कथित पत्र का हवाला देते हुए माओवादियों और अलगाववादियों के बीच संबंध-संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गई। Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘रिपब्लिक टीवी’ से इस्तीफा देने वाली श्वेता कोठारी ने लंबा-चौड़ा खुलासा कर किया धमाका, आप भी पढ़ें

श्वेता कोठारी ने ‘रिपब्लिक टीवी’ से इस्तीफा दे दिया है. वे सीनियर करेस्पांडेंट पद पर थीं. उन्होंने 11 अक्टूबर को इस्तीफा दिया और इसकी सूचना फेसबुक से अपने सभी जानने वालों को दी. उसके बाद उन्होंने एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर अपने इस्तीफे का कारण गिनाया तो रिपब्लिक टीवी में भूचाल आ गया.. श्वेता के इस्तीफानामा की आंच से सुपारी संपादक अर्नब गोस्वामी तक झुलस गए… फेसबुक और ट्वीटर पर श्वेता का इस्तीफानामा खूब शेयर और रीट्वीट किया जा रहा है. आप भी पढ़ें…

Shweta Kothari : I have resigned from my current position as a Senior Correspondent with Republic TV with immediate effect. Below is the sequence of events that led to my resignation.

On a eventful evening on 30th August 2017, my reporting manager (an editor who I would not like to name) came up to me and said that Arnab Goswami suspects me of being a mole planted by Shashi Tharoor in the organisation, the reason being, Mr Tharoor follows me on Twitter.

If the proposition wasn’t ridiculous enough, I was further told that I have signed a petition on Change.org pertaining to Mr Tharoor a few years back, which has further raised suspicions.

The witch-hunt did not end there. Later that day I was informed by my colleagues that it was in fact my Reporting Manager who diligently spent time going through my social network profiles and later proposed that I maybe a SPY and also took it up with Arnab Goswami.

The humiliation continued for a few more days. My financial status was inquired (proposing that I may have been getting paid by Mr Tharoor); my colleagues were questioned on whether I try to extract information.

My twitter cover picture was misinterpreted to question my loyalty (A famous poem that still continues to be my cover picture).

It was only in late September when I finally raised it up with Arnab. I narrated the ordeal to him and the fact it has taken a hit on my morale. There was no concrete response.

To set the record straight, I have never met/contacted/known Mr Tharoor in any capacity.

Nobody bothered to clarify. I was left in the lurch. My loyalty questioned, my vanity hurt.

I am not the first person to have faced this scrutiny of character, before me there were other colleagues who have faced worst. I am confident, I am not the last. Question is-how long before the organization pulls the plug?

This isn’t the first time either that this sort of humiliation was meted out to me. On 30th May, 2017 I had done a sting operation on a sitting SHO for a story.

Later at around 7 PM, the Editor in question called me up and accused me of ‘flirting’ with the SHO. When I protested, she threatened to make the conversation public and destroy my career.

The culture of fear, intimidation and harassment I have seen in the last few months is unparalleled. My only concern, it goes unquestioned.

Last nail in the coffin came on 9th of October when I was unceremoniously dropped from the Special Projects team at 1.30 AM. When I tried questioning the rationale behind it, my reporting manager said, “it is beneath my dignity to talk to you”.

Sadly, when I once again brought to the notice of the top bosses, there was no intervention.

I have previously been associated with two fantastic organizations and have worked with industry stalwarts. Never have I witnessed such vindictive and vicious conduct.

While I am thankful to the organisation for giving me a great learning experience and abundant opportunities, I hope this pattern of vilification of employees on the basis hearsay ceases to exist.

It has taken a great amount of courage to pen this down, against the advice of many of my well wishers who believe that this may hamper my career prospects.

Perhaps it will, but if I don’t speak up today, what good am I as a journalist?

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘रिपब्लिक’ की लांचिंग के दिन अर्नब गोस्वामी सुपारी जर्नलिस्ट नज़र आए!

पूरा नेशन जानना चाहता था कि अर्नब गोस्वामी जिस चैनल को लेकर आ रहे हैं उसके तेवर कैसे होंगे? मीडिया की घटती विश्वसनीयता के बीच वो किन खबरों को तव्वजो देंगे। लेकिन ये कहने में कोई संकोच नहीं कि अर्नब ने न केवल दर्शकों को बल्कि पत्रकारों को भी निराश किया। सुबह करीब 10 बजे से लेकर रात के 1 बजे तक वो लालू प्रसाद और डॉन शाहबुद्दीन की कथित ऑडियो टेप को बार-बार दिखाते रहे। जिसमें शाहबुद्दीन लालू प्रसाद यादव से सीवान के एसपी को हटाने की बात कर रहे हैं। ऑडियो में शाहबुद्दीन को ‘आपका एसपी खत्म है’ कहते हुए सुनाया गया।

इस टेप की विश्वसनीयता को लेकर तमाम सवाल खड़े किए जा सकते हैं और हो सकता है कि टेप गलत या सही भी हों। लेकिन जरा गौर कीजिए। इस टेप के समर्थन में कौन लोग सामने आए। अमित शाह, रविशंकर प्रसाद, वैंकैया नायडू, सुशील कुमार मोदी, रीता बहुगुणा जोशी और रामविलास पासवान। तो क्या बिहार में बाकी नेताओं ने इसे कोई तव्वजो नहीं दी। कांग्रेस के टॉम वडक्कन को रिपब्लिक की टीम ने पकड़ा जरूर, लेकिन उनसे कोई ऐसी बात नहीं कहलवा पाए जो इनके टेप के दावे को मजबूत करता हो।

एक नए न्यूज चैनल का पहला दिन बहुत खास होता है। जो बताता है कि आने वाले दिनों में उसका रंग-रूप और उसकी दिशा क्या होने जा रही है? पर अर्नब के रिपब्लिक टीवी ने पहले दिन ही बता दिया कि वो आने वाले दिनों में क्या करने जा रहे हैं? एक ही बात को बार बार कहना और खुद को सबसे बड़ा तीसमारखान बताना यही इशारा करता है कि वो बड़बोलेपन के जाल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। टीवी पर चिल्लाने से कोई खबर बड़ी नहीं हो सकती और वो एक खास वर्ग को ही प्रभावित करती है। जो एक खास विचारधारा और खास पार्टी के जरखरीद गुलाम होते हैं।

लालू यादव भले ही आज भी आरजेडी के अध्यक्ष हों, लेकिन राजनीति में वो पतन की कगार पर ही है। चारा घोटाले में दोषी करार दिए गए हैं। फिलहाल जमानत पर रिहा हैं। ना तो चुनाव लड़ सकते हैं और ही कोई पद ग्रहण कर सकते हैं। ऐसे में उनके उनपर गदा प्रहार कर अर्नब गोस्वामी क्या साबित करना चाह रहे थे? वो भी दिनभर के लगातार प्रसारण में।

हमें उम्मीद है कि अर्नब गोस्वामी को अच्छी तरह पता होगा कि बीते दशकों में जेल मैनुअल में काफी सुधार हुआ है। अब जेल को य़ातना गृह के रूप में नहीं बल्कि कैदी सुधार गृह के रूप में देखा जाता है। जहां कैदियों के लिए अपने परिवार को सरकारी खर्च पर फोन करने की सुविधा होती है। अपने रिश्तेदारों से हफ्ते में कम से कम एक बार जेल में मिलने की इजाजात होती है। और अगर कैदी का आचरण अच्छा रहा तो उसे परोल पर अपने परिवार के बीत महीने-दो महीने रहेने की इजाजात भी दी जाती है। कई आदर्श जेल तो ऐसे हैं, जिनमें कैदी दिन में बाहर जाकर अपना रोजगार कर सकते हैं और शाम को फिर जेल में वापिस लौट सकते हैं। ऐसे में अगर आरजेडी सुप्रीमो से अगर आरजेडी नेता ने जेल से बात ही कर ली तो इसमें कौन सा तूफान टूट पड़ा।

देशभर के दूरदराज के जेलों की बात तो छोड़ दें, दिल्ली की तिहाड़ जेल में ही सैकड़ों बार मोबाइल, शराब, ड्रग्स लेकर गांजा, अफीम, चरस तक मिलने और पकड़े जाने की खबरें आती रहीं हैं। अगर आपको याद हो तो एक स्टिंग ऑपरेशन में तिहाड़ जेल की हकीकत को एक युवा पत्रकार रवि शर्मा ने आजतक न्यूज चैनल में तार-तार कर दिया था। ऐसे में एक नेता का दूसरे नेता के साथ बात करना, चाहे बातचीत जेल के भीतर से ही क्यों ना की गई हों, इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि उसे एक चैनल अपनी लांचिंग के दिन 14 घंटे तक दिखाता रहे और बाकी किसी खबर को कोई तव्वजो ना दे।

किसी भी न्यूज चैनल से दर्शकों को उम्मीद होती है कि उसे एक घंटे में दिनभर की सारी छोटी-बड़ी खबरें मिल जाएं। अगर हम कल की ही बात करें तो तुगलकाबाद में गैस रिसने से 475 छात्राएं बीमार पड़ गईं। बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। कश्मीर में बिगड़ते हालात और महबूबा मुफ्ती की चिंता थी। स्कूली बच्चों की पत्थरबाजी थी। जिस पर गंभीर चिंतन के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा सकते थे। सबसे बड़ी बात महबूबा मुफ्ती का वो बयान था जिसमें उन्होंने कश्मीर में हालात सामान्य करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई और उन्हें वाजपेयी जी की तरह ठोस कदम उठाने को कहा। आम आदमी पार्टी के भीतर मचे कोहराम और कुमार विश्वास के करीबी जल संसाधन मंत्री को हटाए जाने की खबर भी छोटी नहीं थी। लेकिन ये खबरें रिपब्लिक टीवी की हेडलाइंस से गायब नजर आई। गैस रिसाव से 475 छात्राओं के बीमार होना तो रिपब्लिक के पहले दिन की खबरों में जगह भी नहीं पा सकी।

देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक कई ऐसी खबरें थीं, जिस अर्नब आज खबर बना सकते थे। कशमीर के ताजा हालात, तमिलनाडु के किसानों की समस्याएं, तेलंगाना के मिर्ची उगाने वाले किसानों के दर्द, भीषण गर्मी में पानी के लिए देश के कई हिस्से में त्राहिमाम्, उत्तर प्रदेश समेत देशभर में गौ रक्षकों की गुंडागर्दी, समंदर में मछली पकड़ने वाले मछुआरों की समस्याओं, किसानों की एमएसपी, बैंको के लाखों करोड़ के डूबे कर्ज, नोटबंदी से देश की इकोनॉमी को हुए नुकसान, नक्सलवाद की समस्याएं जैसे कई मसले थे, जिन्हें रिपब्लिक अपने लांचिंग के दिन बड़ी खबर के रूप में संजीदा तरीके से पेश कर सकता था। लेकिन अर्नब गोस्वामी ने मुंह दिखाई के दिन लालू को ध्वस्त करने की ठान ली। अर्नब को अच्छी तरह मालूम है कि उस तरह खबरें भले ही उन्हें टीआरपी दे दे, लेकिन पत्रकारिता के लिहाज से इसे सनसनी फैलाने वाली खबर ही माना जाएगा। जिसका आम जिंदगी से कोई खास सरोकार नहीं हो सकता।

अर्नब गोस्वामी को आमतौर पर सत्ता के करीबी पत्रकार के तौर पर ही देखा जाता है। जो चिल्लाते ज्यादा हैं और काम की बात कम करते हैं। उनके चैनल की फंडिंग को लेकर भी इसी तरह की बातें सामने आ रहीं हैं। ऐसे में हम उम्मीद करते हैं कि आनेवाले दिनों में अर्नब और उनकी टीम कुछ संजीदा खबरों के साथ सामने आएंगे। जिनसे देश की आवाम को सरकार के सामने अपनी आवाज बुलंद करने में थोड़ी सहूलियत होगी। कहते हैं ना कि मरे हुए को तो कोई भी दो लात मार सकता है लेकिन आपको ताकतवर तब माना जाता है जब आप अपने से बड़े और रसूखदार लोगों पर वार करते हैं और अंजाम की परवाह नहीं करते। 

लेखक संजय कुमार राज्यसभा टेलीविजन के एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं. उनसे संपर्क sanjaykumary2kok@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बधाई, एक और ‘निष्पक्ष’ चैनल बाजार में आ गया :)

अर्नब गोस्वामी और राजीव चंद्रशेखर का रिपब्लिक टीवी अब लॉन्च हो गया है। इस मौक़े पर ज़रा मालिक राजीव चंद्रशेखर के बारे में बता दूं। फ़िलहाल वो राज्यसभा सांसद हैं और केरल में NDA के उपाध्यक्ष हैं। डिफेंस पर स्टैंडिंग कमेटी में भी वो हैं। उनकी कंपनी को भारतीय एयरफोर्स के एयरक्राफ्ट्स में तकनीकी सहयोग का ठेका मिला हुआ है। बीते साल ये ठेका मिला। चैनल जब शुरू हुआ तो उनकी कंपनी जुपिटर कैपिटल के CEO अमित गुप्ता ने एडिटोरियल को मेल लिखा कि कंटेंट “प्रो मिलिट्री” होना चाहिए। मिलिट्री नैशनलिज़्म चंद्रशेखर की आइडियोलॉजी में फिट बैठता है, लेकिन इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण ये फैक्ट है कि मिलिट्री के साथ उनका धंधा चलता है। बिजनेस इंटरेस्ट है।

बाक़ी अर्नब के पास बीजेपी को छोड़कर हर पार्टी को गरियाने का एक बढ़िया मंच मिला है। लालू यादव से शुरुआत भी हो गई। टीवी में एक और बीजेपी चैनल खुल गया है। बाक़ी चंद्रशेखर एशियानेट के भी मालिक हैं। बाय द वे, रिपब्लिक में 14 लोगों का शेयर है, जिनमें अर्नब और उनकी पत्नी भी शामिल हैं। किसका कितना शेयर है, ये नहीं पता।

The Wire ने राजीव चंद्रशेखर, अर्नब और रिपब्लिक पर दो लेख छापे। चंद्रशेखर ने सिद्धार्थ वरदराजन पर मानहानि का मुक़दमा कर दिया। एक लेख Sandeep Bhushan का था और एक सचिन राव का। कहा क्या गया था लेख में कि चंद्रशेखर बिलबिला गए? किन बातों से बिलबिलाए? फैक्ट लिखा गया था। मैं उसी तरह का फैक्ट फिर से लिख रहा हूं।

-चंद्रशेखर की कंपनी जुपिटर कैपिटल का Axiscades Engineering Technology Limited में निवेश है, जोकि रक्षा उत्पाद से जुड़ी कंपनी है।

-जुपिटर को रक्षा मंत्रालय ने सेना और एयरफोर्स के लिए 18 महीने तक Aircraft Recognition Training Systems सप्लाई करने का ठेका दिया। दशक भर से ऊपर का मेनटेंनेंस भी इसी कंपनी को मिली।

-मार्च 2016 में रक्षा मंत्रालय और जुपिटर की ये डील हुई।

-चंद्रशेखर फ़िलहाल संसद की रक्षा संबंधी स्थाई समिति के सदस्य हैं। वे रक्षा पर परामर्श समिति के भी सदस्य हैं। वे NCC के भी केंद्रीय परामर्श समिति के सदस्य हैं।
मुझे कोई समझाएं कि ये कैसे हितों का टकराव (conflict of interest) नहीं है?

-जुपिटर के CEO ने चैनल लॉन्च होने से पहले अर्नब समेत एडिटोरियल के टॉप लोगों को मेल लिखकर साफ़ कहा कि कंटेंट “प्रो-मिलिट्री” होना चाहिए। ये मिलिट्री को बचाने के लिए है या फिर अपना धंधा बचाने के लिए?

-चंद्रशेखर “Flags of honour” नाम से एक NGO भी चलाते हैं। इसमें वो मिलिट्री से जुड़े लोगों की हौसला-आफजाई करते हैं। चंद्रशेखर का पूर धंधा MMMM यानी मीडिया, मिलिट्री, मोबाइल और मोदी है।

-Asianet News, कन्नड़ प्रभा, सुवर्ण न्यूज़, बेस्ट FM और रेडियो इंडिगो इन्हीं की कंपनी है।

-बीपीएल मोबाइल इन्होंने ने ही खोला था।

-राज्यसभा में हैं निर्दलीय सांसद, लेकिन केरल में NDA के उपाध्यक्ष हैं।

(यह पोस्ट फेसबुक पर वायरल हो गई है. इसके ओरीजनल लेखक कौन हैं, इसका पता नहीं चल पाया है.)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अरनब गोस्वामी का खुलासा- प्रबंधन ने मुझे टाइम्स नाऊ के स्टूडियो जाने से रोक दिया तो देना पड़ा इस्तीफा

केजरीवाल पर निशाना साधा था जिसके कारण मुझे मेरे स्टूडियो में ही जाने से रोक दिया गया… इसके दो दिन बाद मैंने टाइम्स नाऊ छोड़ दिया… टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल छोड़कर द रिपब्लिक मीडिया वेंचर शुरू करने वाले पत्रकार अरनब गोस्वामी ने खुलासा किया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधने पर उन्हें उनके स्टूडियो में जाने पर ही रोक दिया गया था। अरनब गोस्वामी ने यह बात बीएजी फिल्म्स के मीडिया इंस्टीट्यूट आईसॉम्स द्वारा आयोजित मीडिया फेस्ट मंथन 2017 में कही।

गोस्वामी ने कहा, ‘टाइम्स नाऊ छोड़ने से दो दिन पहले मुझे प्रोग्राम करने से बंद कर दिया गया। मुझे कहा गया कि आप प्रोग्राम नहीं कर सकते। मैंने बोला कि आप डरिए मत। 18 नवंबर 2016 टाइम्स नाऊ में मेरा आखिरी दिन था। मुझे मेरे स्टूडियो में जाने से रोक दिया। मैंने वह स्टूडियो बनाया था। मैं इसके बाद बहुत दुखी थी। जब आपने कोई स्टूडियो बनाया और उसमें घुसने ना दे तो दुख होता है। मुझे रोक दिया गया था। 14 नवंबर को मैंने कहा था कि नोटबंदी के बाद जंतर-मंतर पर लोगों को बुलाने से अरविंद केजरीवाल को रोकना चाहिए।’

गोस्वामी मीडिया फेस्ट मंथन में मीडिया के छात्रों को संबोधित कर रहे थे। गोस्वामी ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं बिना किसी डर के सवाल उठाता हूं। मैं इन सवालों को इसलिए उठा रहा हूं, क्योंकि मैंने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया है। मैंने अपने आपको मीडिया से स्वतंत्र घोषित किया है। मैंने अपने आपको फर्जी मीडिया से आजाद कर लिया है। मैंने अपने आपको समझौता करने वाली मीडिया से आजाद कर लिया है।’

साथ ही उन्होंने कहा, ‘मैं और मेरे युवा पत्रकारों की टीम ये सवाल करती रहेगी। मुझे किसी की जरूरत नहीं है। मुझे सुरक्षा की जरूरत नहीं है। केवल सवाल ये है कि क्या हम कठिन सवाल पूछेंगे या फिर उन्हें नजर अंदाज कर देंगे। क्या मुझे इन सवालों को छोड़ देना चाहिए या मुझे सुरक्षित चलना चाहिए।’

अरनब गोस्वामी बतौर एडिटर-इन-चीफ टाइम्स ग्रुप के न्यूज चैनल टाइम्स नाऊ के साथ जुड़े हुए थे। टाइम्स नाऊ से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने मीडिया वेंचर ‘द रिपब्लिक’ की शुरुआत की है। हालांकि, अभी उनका ये वेंचर आधिकारिक तौर पर लॉन्च नहीं किया गया है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अर्णब गोस्वामी और रवीश कुमार पत्रकारिता के दो विपरीत छोर हैं : उदय प्रकाश

Uday Prakash : There have been two striking popular and leading poles in TV journalism spirited these days. One in English and the other in Hindi. I’m always skeptical about Hindi as it’s always characterized by the people who represent it, in politics, culture and media. My friends here on Facebook know about my views through my posts time and again. One of the poles, in English was Times Now, anchored by Arnab Goswami and the other, in Hindi is NDTV, with its anchor Ravish Kumar. 

 

The First with commanding monologues, superiority, self-righteousness, provided with Y security by the government, brilliant, eloquent, deafening and the other, always appearing inconsequential, fragile, meek and lesser.

These two belonged to the same, as Baba Saheb Ambedkar had held, Hindu priestly caste, the Brahmins, which will never allow a social change to happen. At the maximum it can act as an agent of ‘political change.’

Here, I’m not going to write a big analytical piece about the contrary roles these two anchors have been playing since last few stormy months this year but friends look at state of affairs of these two as of now.

Arnab Goswami has been made to resign from Times Now and is now trying to start a news industry on his own, after serving ten years in TOI. He is out to test his fortune in commercially competitive media business to make more money and more power. He claims to disrupt existing media news industry with his teammates and to create a private ‘independent’ channel. 

And Ravish Kumar, who just succeeded saving his career and his employer’s profession for his journalistic conscience from getting ‘banned’ for a day by the government, is seen tonight in his most sought-after and hugely watched ‘Prime Time’ talking to desperate, crying mother of Najeeb, a JNU student, missing for the last 24 days. 

Ravish represents the sanity, rationale of India’s plural, liberal, secular and democratic conscience.

Arnab Goswami might prosper becoming more moneyed and more powerful with more securities for his cover.

Geometrical ‘edge line’ between language and caste here appear blurred to me and think it’s individual who is a subject to be certified.

Friends, watch tonight’s Prime Time and see how calm and humane Ravish executes his responsibility as a noncombatant journalist.

Ravish stands with the known tradition of patriotic and sane journalism of India and Arnab Goswami ….an aberration…an anomaly. 

One has demeaned and defamed English. The other, risking his livelihood rescued almost the decomposed and treacherous casteist image of Hindi.

(Let’s celebrate the victory of Freedom of Expression against Censor-shipping and Banning politics, even if it’s a last one.)

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आईं टिप्पणियों में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Amit Kumar : अंग्रेजी, हिंदी के दो एंकरों के आधार पर बहुत विशिष्ट विश्लेषण! हिंदी टेलीविज़न पत्रकारिता का दुःखद पक्ष यह है कि रवीश जैसे एंकर ढूंढे नहीं मिलते। वहीं अंग्रेजी में अर्णव अभी भी बहुत कम हैं, उनके अनुयायी हिंदी एंकर अधिक हैं।

डॉ अरुण बुद्धिहीन : बेजोड़। एक अहंकारी , अभिजात्य एवं सत्ता का दलाल एवं दूसरा साधारण जनता से मिलता जुलता, विनम्र लेकिन पत्रकारिता धर्म का निडरता के साथ निर्वाहक।

Mazhar Kamran : Very well said. This is true in a big way across the entire culture in the country.

Prakash Badal : Rightly said. Ravish kumar and Arnav are true journalists . Thay proved the definition of journalism in their own way. And they win.

Anurag Arya : नायक कोई नहीं होता ,सिर्फ सन्दर्भ सही और गलत होते है. सिद्दांत और सामाजिक सरोकार सही या गलत होते है. कल को रविश कुमार या एन डी टी वी हमारी समझ से किसी सरोकार के खिलाफ नजर आये तो हम आलोचना से हिचकिचाएंगे नहीं ! एक प्रतिबद्ध नागरिक का कोई पक्ष नहीं होता है।

Hasnain Naqvi : Arnab and Ravish: the Poles apart!

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अर्णब गोस्वामी के बारे में इस पत्रकार ने जून महीने में ही कर दी थी भविष्यवाणी

adim S. Akhter : अर्णब गोस्वामी के बारे में इस साल जून में की गई इसे मेरी भविष्यवाणी कहिए या आशंका, पर ये सच साबित हुई। तब मैंने अपने विश्लेषण में कहा था कि पीएम मोदी के सॉफ्ट इंटरव्यू के बाद अर्णब और टाइम्स नाउ की जो छीछालेदर हुई है, उन हालात में अर्णब की जल्द ही टाइम्स नाउ से विदाई हो सकती है। और कल ही अर्णब की टाटा-बाय बाय वाली खबर आ गई। और जो लोग ये चिंता कर रहे हैं कि अर्णब के बिना टाइम्स नाऊ का क्या होगा, उनके टनाटन न्यूज़ ऑवर डिबेट का क्या होगा, टाइम्स नाऊ की टीआरपी का क्या होगा, वो ज़रा धीरज रखें। मैंने लिखा था कि आज के ज़माने में टाइम्स ग्रुप कभी संपादकों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता। उनका फंडा अलग है। जो लोग टाइम्स ग्रुप में काम कर चुके हैं और जिनका थोड़ा बहुत भी मैनेजमेंट से वास्ता रहा है, वो ये बात बखूबी जानते हैं।

सो अर्णब गोस्वामी कितने भी बड़े हो जाएं, संस्थान से बड़े नहीं हो सकते। संस्थान से बड़ा वही एडिटर हो सकता है, जो चौथे स्तंभ का पत्रकार हो और लिखने-पढ़ने वाला हो। अर्णब महज़ एक मैनेजर, न्यूज़ प्रेजेंटर और डिबेटर बन के रह गए। वैसे अर्णब की शोर वाली पत्रकारिता के भी कई फैन हैं, पर व्यक्तिगत रूप से मुझे ये शोर पत्रकारिता कहीं से भी नहीं भाती। ये सच हो सकता है कि अर्णब भारत से प्रसारित होने वाले किसी अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी न्यूज़ चैनल के प्रोजेक्ट का हिस्सा बन जाएं। ये उनकी दिली चाहत रही है और एक कार्यक्रम में अपने दिल की ये बात उन्होंने कही भी थी, जिसका वीडियो मैंने तब फेसबुक पे शेयर किया था। पर अर्णब अगर अंग्रेजी का भारत से प्रसारित होने वाला सीएनएन टाइप न्यूज़ चैनल लाना चाहते हैं, तो इसके लिए टाइम्स ग्रुप से अच्छा प्लेटफार्म और कोई नहीं हो सकता था।

ज़ी वाले भी ऐसा एक चैनल ले के आये हैं, जिसे कोई गांधी महाशय लीड कर रहे हैं, उनका पूरा नाम अभी याद नहीं आ रहा। उनसे एक बार मुलाक़ात हुई है अपनी। पर टाइम्स ग्रुप की तो बात ही निराली है क्योंकि वो हर काम बड़े ishtyle से करते हैं। टाइम्स नाउ को ही देख लीजिए। अर्णब के बिना भी ये चैनल चलता रहेगा और मार्किट लीडर बना रहेगा। आप देखते रहिये। यही टाइम्स ग्रुप की यूएसपी है। बाकी अर्णब आगे क्या करते हैं, इस पे suspence जल्द ही खत्म हो जायेगा।

ये है जून में की गई भविष्यवाणी वाली पोस्ट…

नदीम एस. अख्तर कई चैनलों-अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. वे मीडिया शिक्षण प्रशिक्षण के कार्य से भी जुड़े रहे.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स की दुकान और पत्रकार से छुटकारा

अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाऊ क्यों छोड़ा, वे जानें। पर जैसा कि नौकरी छोड़ने वाले ज्यादातर पत्रकारों के साथ होता है, नौकरी छोड़ने के समय हर कोई कहता है, अपना कुछ काम करेंगे। ऐसा कई पत्रकारों के मामले में हुआ है। कई साल से हो रहा है। किसी एक का क्या नाम लेना – लोग जानते हैं और जो नहीं जानते उनके लिए नाम बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। वैसे यह सच है कि नौकरी छोड़ने के बाद कइयों ने अपना काम शुरू भी किया, कर भी रहे हैं पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि जैसी संस्था छोड़ी वैसी ही खड़ी कर ली। या जो है वैसी होने की ओर अग्रसर है। फिर भी अर्नब गोस्वामी के बारे में कहा जा रहा है (उन्होंने नहीं कहा है) कि वे चैनल शुरू करेंगे। और फिर इससे जुड़ी अटकलें। मेरी दिलचस्पी उसमें नहीं है।

मुझे यह समझ में आ रहा है कि अर्नब जितनी तनख्वाह पाते होंगे उतने का पूरा कारोबार कर लेना भी असाधारण होगा – शुरू करने के बाद कई वर्षों तक। ऐसे में कोई स्वेच्छा से क्यों नौकरी छोड़ेगा और कोई योजना-साजिश है तो उसका खुलासा धीरे-धीरे ही होगा। इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्प याद है। सोचा आज इस मौके पर उसी की चर्चा करूं। मौका है, दस्तूर भी। मामला पुराना है, मोटे तौर पर टाइम्स संस्थान का अपनी हिन्दी की पत्रिकाओं को बंद करना। दूसरे शब्दों में, 10, दरियागंज का इतिहास हो जाना। टाइम्स ने अचानक हिन्दी की अपनी कई अच्छी, चलती, बिकती, प्रतिष्ठित और लोकप्रिय पत्रिकाओं को बंद करने की घोषणा कर दी। हिन्दी के पत्रकार – कहां छोड़ने और मानने वाले थे। और उस जमाने में सरकार हिन्दी के पत्रकारों को नाराज कैसे कर सकती थी।

टाइम्स समूह को समझ में आया कि पत्रकारों से छुटकारा पत्रकार ही दिलाएगा और घोषणा हुई कि सभी टाइटिल्स मशहूर पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने ले लिए हैं। (दे दिया, बेच दिया, खरीद लिया – मुझे याद नहीं है और अब महत्वपूर्ण भी नहीं है)। पत्रकारों को लगा कि मालिक बदलेगा। अच्छा है, पत्रकार मालिक होगा। नौकरी यहां नहीं, वहां कर लूंगा। आंदोलन शांत। मामला ठंडे बस्ते में। वो पत्रिकाएं आज तक बाजार में नहीं दिखीं। छपती हों और नेताओं के घर डाक से जाती हों तो मुझे नहीं पता। वैसे उन दिनों साउथ एक्सटेंशन की एक बिल्डिंग पर पत्रिकाओं के बोर्ड जरूर लगे थे। कुछ दिनों बाद से ही नहीं दिखते।

अर्नब का मामला अलग है। पर हिन्दी के पत्रकारों के मालिकों से संबंध हमेशा दिलचस्प रहे हैं। आनंद बाजार समूह ने हिन्दी की पत्रिका रविवार बंद की तो फिर हिन्दी में हाथ नहीं डाला। इंडिया टुडे हिन्दी में निकलता है पर गिनती के कर्मचारियों से। हिन्दी आउटलुक का हाल आप जानते हैं। और भी कई हैं। पत्रकार से छुटकारा पाना किसी भी संस्थान के लिए मुश्किल होता है और कोई भी पत्रकार रामनाथ गोयनका बनने से कम का सपना नहीं देखता है। ऐसे में पत्रकारों खासकर हिन्दी वालों को बांटने और अमीर बनाने का खेल भी हुआ संपादक नाम की संस्था अंग्रेजी में खत्म हो गई पर हिन्दी में बची हुई है तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है। यह अलग बात है कि आम पत्रकारों को इससे कोई लाभ नहीं है।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स नाऊ से अरनब गोस्वामी ने इस्तीफा दिया, खुद का चैनल लांच करेंगे

मीडिया इंडस्ट्री की एक बड़ी खबर सामने आ रही है. टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल के चर्चित एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने संपादकीय विभाग की बैठक में अपने इस्तीफे का ऐलान किया. बताया जा रहा है कि अर्णब जल्द ही अपना न्यूज चैनल लांच करेंगे. टाइम्‍स नाऊ चैनल का मालिक टाइम्स आफ इंडिया अखबार समूह है जिसके मालिक विनीत जैन और समीर जैन हैं.

अरनब टाइम्‍स नाऊ के साथ साथ बिजनेस न्यूज चैनल ईटी नाऊ के भी एडिटर इन चीफ थे. अरनब गोस्वामी का शो ‘न्‍यूज आवर’ कई वजहों से सुर्खियों में रहा करता है. अरनब पर कई बार पीत पत्रकारिता करने और मोदी सरकार का बचाव करने जैसे आरोप लगे. अरनब की आलोचना शो में चिल्‍लाने और बहुत जल्‍दी आपा खो देने के लिए होती रही है.

अरनब गोस्वामी मूलत: असम के रहने वाले हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से सोशियालॉजी में बीए (आनर्स) और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से सोशल एंथ्रोपॉलजी में एमए करने वाले अरनब ने अपने करियर की शुरुआत 1995 में कोलकाता के अखबार द टेलीग्राफ से की थई. फिर वह एनडीटीवी चैनल से जुड़े. उन्होंने 2003 तक एनडीटीवी पर न्यूज आवर कार्यक्रम की एंकरिंग की. अरनब 2006 में टाइम्स नाऊ के एडिटर इन चीफ बने.

अरनब गोस्वामी के दादा असम के जाने माने वकील थे और उनके नाना गौरी शंकर भट्टाचार्य कम्युनिस्ट नेता और असम में विपक्ष के नेता रहे हैं. अरनब गोस्वामी के पिता मनोरंजन गोस्वामी सेना में कर्नल के पद से रिटायर हुए हैं. उनके पिता 1998 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गुवाहाटी से लोक सभा चुनाव लड़ चुके हैं. उनके मामा गुवाहाटी पूर्व से बीजेपी के विधायक हैं और असम के वर्तमान मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल से पहले पार्टी की असम इकाई के प्रमुख भी थे.

ये भी पढ़ सकते हैं…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अरनब गोस्वामी ने लाइव शो से पूर्व एसीपी शमशेर पठान को बाहर निकाल दिया

पूर्व एसीपी शमशेर पठान को टाइम्स नाउ के लाइव शो न्यूजआवर से अरनब गोस्वामी ने बाहर निकाल दिया. पैनलिस्ट शमशेर पठान ने कुछ ऐसा कह दिया कि जिससे लाइव शो के दौरान टीवी एंकर अरनब गोस्वामी उखड़ गए और उन्हें गेट आउट कह दिया. अरनब गोस्वामी ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर डिबेट कर रहे थे. अरनब ने शमशेर की राय जाननी चाही तो उन्होंने अपने तर्क में महिला गेस्ट की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी. पठना ने शो में मौजूद पैनलिस्ट शाजिया इल्मी और एक अन्य महिला को कुछ ऐसा कह दिया जो अरनब को पसंद नहीं आया.

पठान ने शाजिया इल्मी और अन्य महिला गेस्ट से कहा कि उन्हें अपने पति से तलाक ले लेना चाहिए.  इसकी शुरुआत करें. फिर देखते हैं. इस पर अरनब नाराज हो गए और बीच शो में पठान को निकल जाने के लिए कहा. शमशेर काफी देर तक अरनब से बहस करते रहे लेकिन बाद में वे खुद ही उठकर वहां से चले गए. शमशेर पठान को जाकिर नाइक का करीबी माना जाता है. ये अवामी विकास पार्टी नाम का एक राजनीतिक दल भी चलाते हैं. शो का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=5B1NKPtGo4A

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

लाखों सेलरी पाने वाले भक्त संपादकों अरनब-सुधीर को Y कैटगरी देने पर मोदी की लानत-मलानत

Markandey Katju :Why should Arnab Goswamy be provided Govt. security, and that too of the Y category, which means 20 guards will be with him day and night. Who will pay the salaries of these guards? It will be the government, which really means the public, because these salaries come from the taxes we pay. So we will have to pay for Arnab’s security.

Arnab is surely getting a huge salary from his employer. Why should he not pay for his security from his own pocket? There are many private security agencies which provide armed guards. Why did Arnab not hire them? Or else his employer, which is a very affluent business house, could have done so I believe some other mediapersons wh,o toe the govt. line have also been provided similar security by the Govt. Is this not deplorable? Must the public for these hired ‘tattoos’ and buffoons?

Nadim S. Akhter : अरनब गोस्वामी रिटार्यड पाकिस्तानी फौजियों-विशेषज्ञों को अपने शो में बुलाकर खूब लताड़ते हैं, दूसरों से गरियावाते हैं और बदले में उन पाकिस्तानियों को अपने शो में शामिल होने की मोटी फीस देते हैं. वरना अरनब की गाली सुनने कौन पाकिस्तानी उनके शो में शामिल होगा? फिर वही अरनब को कोई धमकी दे देता है. पाकिस्तान वाला ही कोई होगा. और अरनब को Y कैटिगरी की सुरक्षा मिल जाती है. लेकिन भारत सरकार को कोई नुमाइंदा और अरनब को सुरक्षा देने वालों में से कोई ये बताएगा कि अरनब की जिन बातों को सुनकर पाकिस्तान वालों की तरफ से उन्हें धमकी मिली है, वही आतंकी पाकिस्तान में ही रह रहे उन रिटार्यड फौजियों-विशेषज्ञों को क्यों नहीं धमकाते कि खबरदार जो अरनब के शो में शामिल हुए तो!! अरनब के शो के गेस्ट तो वहीं रह रहे हैं, उन्हें धमकाना आसाना है. अरनब तो इंडिया में है, उन्हें धमकाना मुश्किल है.

आपका लड़का अगर गलत रास्ते पर चल पड़ेगा तो आप पहले उसे डांटेंगे-समझाएंगे या फिर मुहल्ले के उस दादा के धमकाएंगे कि खबरदार ! जो मेरे बेटे के साथ दुबारा दिखे तो !! पहले आप अपने बच्चे को ही समझाएंगे ना. फिर सीमा पार से धमकी देने वाले पहले अपने पाकिस्तानी भाइयों को ही समझाएंगे-धमकाएंगे ना कि भारत के किसी भी टीवी शो में पार्टिसिपेट ना करो. या फिर दंबूक लेकर भारत के टीवी एंकरों को ही धमकाना शुरू कर देंगे? सोचने वाली बात है. फिर भी अरनब डर गए. सरकार भी डर गई. झटपट अरनब को बड़ी वाली सुरक्षा दे दी गई. उनका शो जारी रहेगा. फुंक चुके पाकिस्तानी विशेषज्ञ उनकी शो की शान बढ़ाते रहेंगे, टाइम्स नाऊ उनकी खाली जेबें गर्म करता रहेगा और शो चलता रहेगा. सब फिक्स है. अरनब को अगर इतना ही खतरा है तो उनका संस्थान और वे खुद प्राइवेट सिक्युरिटी गार्ड क्यों नहीं रख लेते? गजब पतन हुआ है ई अरनब का. सारा किया-धरा मट्टी में मिलाई दिया रे. अब से उसे अरनब गोस्वामी नहीं, भक्त अरनब कह के बुलाया जाएगा.

जाने माने पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू और पत्रकार नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पीएम मोदी के Soft Interview का इनाम! अरनब गोस्वामी को Y कैटिगरी की सुरक्षा मिली

Nadim S. Akhter : अरनब गोस्वामी को “पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण” उसी दिन मिल गया था, जिस दिन उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का Soft Interview लिया था. भारत सरकार की ओर से अरनब को मिली Y कैटिगरी की सुरक्षा उसकी पहली कड़ी भर है. Soft Journalism का ये कमाल आगे कइयों के सिर चढ़कर बोलने वाला है. Soft रहके ही स्वादिष्ट SOFTY खाई जा सकती है. बस Softy पिघलने से पहले उसे गटकने का हुनर आना चाहिए. Soft Journalism तेजी से फैलती बीमारी है. पत्रकारों के अलावा सोशल मीडिया पर citizen journalists भी द्रुत गति से इसकी चपेट में आ रहे हैं.

Priyabh Ranjan : मैंने सुना था कि पत्रकार यदि वाकई ईमानदार होता है तो ‘सत्ता’ उसे नुकसान पहुंचाने की भरपूर कोशिश करती है। लेकिन हमारी सरकार अपने ‘प्रिय’ पत्रकारों को Y कटेगरी की सुरक्षा मुहैया करा रही है। मतलब साफ है – ‘सत्ता’ को पसंद आ रहे ये पत्रकार ‘जनता’ से जुड़े मुद्दों की पत्रकारिता नहीं कर रहे। देश के असल मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों को तो सरकार या उनके ‘भक्त’ तरह-तरह से परेशान करते हैं, सुरक्षा मुहैया कराने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर और प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ओम थानवी ने टाइम्स नाऊ वालों के बुलाने पर भी डिबेट में न जाने के कारणों का किया खुलासा

Om Thanvi : पिछले कुछ हफ़्तों से टाइम्ज़ नाउ से फ़ोन आता है कि अर्णब गोस्वामी के ‘न्यूज़ आवर’ में शिरकत करूँ। पर मेरा मन नहीं करता। एक दफ़ा समन्वयक ने कहा कि आप हिंदी में बोल सकते हैं, अर्णब हिंदी भी अच्छी जानते हैं आपको पता है। मुझे कहना पड़ा कि उनकी हिंदी से मेरी अंगरेज़ी बेहतर है। फिर क्यों नहीं जाता? आज इसकी वजह बताता हूँ। दरअसल, मुझे लगता है अर्णब ने सम्वाद को, सम्वाद में मानवीय गरिमा, शिष्टता और पारस्परिक सम्मान को चौपट करने में भारी योगदान किया है।

हम बोलने के अधिकार की बहुत बात करते हैं, पर उसका वध देखना हो तो ‘न्यूज़ आवर’ शायद सर्वश्रेष्ठ जगह होगी। मैं अर्णब के आग्रहों-दुराग्रहों की बात नहीं करता (किस पत्रकार के नहीं होते?), लेकिन एक शोर पैदा करने की हवस में वे किसी ‘मेहमान’ को चुन कर थानेदार की तरह हड़काएँगे, किसी को बोलने न देंगे, बाक़ी को कहेंगे कि जब चाहें बिना बारी बहस में कूदते रहें। कोई भी समझ सकता है कि इससे एक हंगामे का दृश्य तैयार होता है, जो स्वाभाविक ही भीड़ को खींचता है (भगवतीचरण वर्मा की कहानी ‘दो बाँके’ याद नहीं आपको?)। माना कि यह व्यापार है, पर व्यापार और चैनल भी करते हैं। देखना चाहिए कि किसकी मर्यादा कहाँ है।

इसके अलावा मेरा स्पष्ट सोचना यह है कि सांप्रदायिकता, छद्म राष्ट्रवाद, कश्मीर और पाकिस्तान आदि अत्यंत नाज़ुक मसलों पर निहायत ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैया आग भले न लगाए (जिसकी लपटें परदे पर अर्णब को बहुत प्रिय हैं), लोगों में दुविधा, द्वेष, अलगाव, रंजिश और घृणा ज़रूर पैदा कर सकता है। क्या इसे हम सार्थक पत्रकारिता कहेंगे?

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी के इंटरव्यू में अर्णब गोस्वामी खुद एक्सपोज हो गए, सोशल मीडिया पर हो रही थू थू

Mukesh Kumar : बहुत बेरहम मीडियम है टीवी। आप कभी किसी को एक्सपोज़ कर रहे होते हैं तो कभी खुद भी एक्सपोज़ हो रहे होते हैं। राहुल गाँधी को आपने एक्सपोज़ किया मगर मोदी को इंटरव्यू करते हुए खुद देश के सामने। प्रधानमंत्री का पहला इंटरव्यू लेते समय न्यूज़ ऑवर के आक्रामक, दूसरों की बोलती बंद कर देने वाले या दूसरों को बोलने ही न देने वाले, बड़बोले, तर्कों और रिसर्च से लैस अर्नब गोस्वामी को क्या हो गया था? वे इतने नरम क्यों थे, बार-बार नवनीत लेपन क्यों कर रहे थे? क्या उन्होंने ये इंटरव्यू कुछ शर्तों के साथ किया? क्या प्रश्न पहले से तय थे? क्या ये पीआर एक्सरसाइज थी? और हाँ, इतना बड़ा चैनल प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करे और तकनीकी स्तर पर इतनी बड़ी चूक करे अच्छा नहीं लगता। ऑडियो बहुत खराब था भाई।

Priyabhanshu Ranjan : एक इंटरव्यू अर्णब ने किया, जिसे पूरी भगवा ब्रिगेड सोशल मीडिया पर शेयर करते नहीं थक रही। एक इंटरव्यू करण थापर ने किया था, जिसमें मोदी को पहले पीना पड़ा था और फिर बीच में ही भागना पड़ा था। इसी इंटरव्यू के बाद मोदी दमखम वाले पत्रकारों के सामने आने से कतराते हैं। बहरहाल, असल इंटरव्यू तो करण थापर वाला ही माना जाएगा। अर्णब तो अपने स्वामी की सेवा कर रहे थे!

Mithilesh Priyadarshy : इंटरव्यू के दौरान अर्णब गोस्वामी सर्कस के ठीक उस शेर की तरह नज़र आया, जो यूं तो पिंजड़े से दहाड़कर, पंजे मारकर, गुर्राकर दर्शकों को लगातार डराता रहता है, पर जैसे ही रिंग मास्टर की इंट्री होती है, वह किसी पालतू कुत्ते की तरह चुप मारकर देह और दुम हिलाकर प्यार जताने लगता है.

Vimal Kumar : टीवी पर शेर की तरह दहड़नेवाले पत्रकार आज खामोश थे। महंगाई के मुद्दे पर साहब का काउंटर ही नहीं किया। आज वे गोले की तरह दाग नहीं रहे थे सवाल। जबाव भी चतुराई से दिए जा रहे थे यह थी निष्पक्ष पत्रकारिता।

Shikha : मोदी से कोई कहे कि औकात है तो राणा अयूब जैसी पत्रकार को इंटरव्यू देकर दिखाएl चमचों के साथ “कौन बनेगा करोड़पति” खेलकर काहे भौकाल काट रहा है? नेशन वांट्स टू नो

Panini Anand : Nation wants to know: why did Arnab lose his voice in front of Modi? The question is, what was Arnab Goswami doing? The same anchor, who can even grill tables, chairs and walls if he is alone in the studio, failed to pose any tough questions to the prime minister. The entire interview seemed to be a PR exercise, a promotional video of Modi Sarkar.

Neeti Vashisht : मोदी जी का इंटरव्यू ‘अर्णब गोस्वामी’ की जगह ‘रवीश कुमार’ या ‘करण थापर’ ले तो मोदी जी की हालत बिहार टॉपर “रुबी रॉय” जैसी ही होगी

Nadim S. Akhter : अभी-अभी मेरी एक सहेली बता रही थी कि टाइम्स नाऊ पर अर्नब गोस्वामी और नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू देखते वक्त उन्हें ये गाना याद आ रहा था—सुहाग रात है, घूंघट उठा रहा हूं मैं.. 🙂

Mayank Saxena : वीर अर्णब सवाल करते हैं… आप पहले पीएम हैं, जिनकी विदेश नीति में इतनी रुचि है…आप ने बड़ा संतुलन साधा है…आप ये कैसे कर लेते हैं… आपको ये चारण का गान लगता है या सवाल लगता है?

Ajay Setia : पता है न, सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कई बार अर्णब गोस्वामी को डांट दिया था। फिर स्वामी ने टाइम्स नाऊ पर आने से इंकार कर दिया। तब से अर्णब गोस्वामी ने स्वामी के खिलाफ अभियान शुरू किया हुया है। स्वामी का अरुण जेटली से 36 का आंकड़ा तो सब को पता ही है। रिजर्व बेंक के गवर्नर रघुराम राजन के खिलाफ स्वामी का अभियान असल में जेटली के खिलाफ ही था। स्वामी के बयानों का निशाना अक्सर जेटली ही होते हैं। इसका फायदा अर्णब ने उठाया। पहले जेटली से स्वामी के खिलाफ बयानबाजी शुरू करवाई। और, आज रिजर्व बेंक के गवर्नर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी से भी स्वामी के बारे में पूछा। मोदी का स्वामी के खिलाफ दिया गया बयान स्पष्ट करता है की मोदी का जेटली पर पूरा विश्वास बना हुया है।

सौजन्य : फेसबुक

इन्हें भी पढ़ें….

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी का टाइम्स नाऊ पर इंटरव्यू : अर्नब एक स्टूडेंट की तरह Yes Sir-Yes Sir करते जा रहे थे

Nadim S. Akhter : किसी भी समाचार संस्थान और पत्रकार की प्रतिष्ठा बनने व जनता में उसका विश्वास जमने में काफी लम्बा वक्त लगता है. ये चीजें आते-आते आती हैं. लेकिन प्रतिष्ठा गंवाने और विश्वास खोने में मिनट भी नहीं लगते. कल Times Group के चैनल Times Now पर अर्नब गोस्वानी द्वारा पीएम नरेंद्र मोदी का लिया गया इंटरव्यू Modern Television Era में एक केस स्टडी साबित होने वाला है. आरोपों के अनुसार, अगर यह प्रायोजित इंटरव्यू था भी तो भी अर्नब गोस्वामी एक सुलझे हुए पत्रकार की तरह कम से कम बिहेव तो कर सकते थे !!! वो तो मोदी जी से ऐसे बात कर रहे थे कि जैसे मोदी जी उनकी क्लास ले रहे हों और अर्नब एक स्टूडेंट की तरह Yes Sir-Yes Sir करते जा रहे थे.

Times Group में मैंने काम किया है, बहुत से हालात देखे हैं, अटल बिहारी वाजपेयी का केंद्र की सत्ता से जाना और सोनिया गांधी का अप्रत्याशित रूप से केंद्र की राजनीति में मजबूती से उभरना. इन परिस्थितियों में खबरों और सम्पादकीय नीति के बदलते तेवरों को भी महसूस किया है. लेकिन कल Times Now पर अर्नब ने जो किया, वो चैनल की साख के साथ-साथ खुद उनकी साख भी उड़ा ले गया. एक निष्पक्ष और जनता के प्रतिनिधि के रूप में बात करने वाले और The nation wants to know की रट लगाने वाले अर्नब की मूर्ति विखंडित हो गई. ये बहुत बड़ा झटका है, Times Now चैनल के लिए भी और अर्नब के लिए भी.

जिस तरह नीरा राडिया कांड के बाद एनडीटीवी वाली बरखा दत्त ने अपनी साख गंवाई थी और उन्हें बाहर का रास्ता ना दिखाकर चैनल भी सवालों के घेरे में आया था, उसी तरह पीएम मोदी के ताजातरीन इंटरव्यू ने टाइम्स नाऊ और अर्नब, दोनों की प्रतिष्ठा धूल-धूसरित की है. पर अपनी जानकारी के अनुसार एक बात मैं जानता हूं. टाइम्स ग्रुप के मालिक जैन बंधु इस मामले में बहुत सचेत रहते हैं क्योंकि जब ब्रैंड ही नहीं बचेगा तो बिजनेस कहां से आएगा?

ये सभी जानते हैं कि टाइम्स ग्रुप में एडिटोरियल पर ब्रांड-रिस्पॉन्स यानी मार्केटिंग कितना हावी रहता है. हां, अपवाद स्वरूप अब तक अर्नब को चैनल में काफी स्वतंत्रता मिली हुई है पर पीएम के इंटरव्यू की उनकी mishandling ने मैनेजमेंट के माथे पर चिंता की लकीरें जरूर खींची होगी. एक और बात, जैन बंधु एक सीमा तक ही किसी को बर्दाश्त करते हैं.

सो अगर एक खास पार्टी के प्रति अर्नब की एडिटोरियल पॉलिसी में मैनेजमेंट का दखल नहीं है, तो ये मिस्टर अर्नब गोस्वामी को महंगा पड़ सकता है. उनकी चैनल से विदाई तक हो सकती है क्योंकि टाइम्स ग्रुप हमेशा से ये मानता आया है कि सम्पादक नहीं, मैनेजमेंट उनका -प्रॉडक्ट- चलाता है. अगर अर्नब के इस पत्रकारीय कौशल में मैनेजमेंट की सहमति है या थी तो बहुत कुछ होने वाला है. पर एक अंदाजा लगा सकता हूं. जल्द ही आपको Times Now पर Damage Control Exercise देखने को मिल सकता है. पर साख तो साख ही है. अगर गई तो समझिए कि भैंस पानी में ही रहेगी.

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वेद प्रताप वैदिक बोले- अरनब गोस्वामी बहुत नीच आदमी है (देखें वीडियो)

वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं. काफी सुलझे हुए पत्रकार माने जाते हैं. भाषा और विचार के स्तर पर संतुलित माने जाते हैं. लेकिन अरनब गोस्वामी को लेकर उनका गुस्सा ऐसा फूटा कि उन्होंने अरनब गोस्वामी को ना जाने क्या क्या कह दिया, वह भी पूरी मीडिया के सामने. उपर दिए गए तस्वीर पर क्लिक करिए और वीडियो देखिए.

टाइम्स नाऊ के एडिटर इन चीफ अरनब गोस्वामी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से किसी वरिष्ठ पत्रकार ने इतना गुस्सा पहली बार जाहिर किया है. इस वीडियो को लेकर लोगों में तरह तरह की चर्चाएं हैं :  https://www.youtube.com/watch?v=mUrI5Fp-YyM

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स ऑफ इंडिया के पतन की पराकाष्ठा… सलमान खान पर 5 पेज बिछा दिया!

Nadim S. Akhter : TIMES NOW वाले अर्नब गोस्वामी भी कमाल है. हमेशा लाइमलाइट में रहना चाहते हैं. ये देखकर ताज्जुब हुआ कि कल रात के थकाऊ News Hour शो के बाद आज सुबह-सुबह एंकरिंग करने स्टूडियो में बैठ गए हैं. माने के Live हो गए हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट में आज सलमान खान मामले की सुनवाई होनी है, सो अर्नब पूरी फौज के साथ तैयार हैं. और एक मैं हूं कि खामोख्वाह इस इवेंट को लाइटली ले रहा था. जब अर्नब ने इतनी बड़ी तैयारी कर रखी है तो दूसरे चैनलों, खासकर हिन्दी के चैनलों ने क्या किया होगा, अंदाजा लगा रहा हूं.

वैसे एक सवाल मन में उठ रहा है कि क्या सलमान खान इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनके एक अपराध पर बन रही स्टोरी पर बड़े मीडिया संस्थान इस तरह की तैयारी करें!!! रिपोर्टरों की फौज तैनात कर दें मैदान में. पल-पल की खबर दें!!! कल मुंबई से एक मित्र का मैसेज आया कि तुम पत्रकार लोग ये कर क्या रहे हो??!! आज मुंबई के The Times of India के शुरुआती पांच पेज सलमान खान के ऊपर हैं. क्या टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे बड़े और प्रतिष्ठित अखबार का इतना पतन हो चुका है कि सलमान खान पर वह 5 पेज बिछा दे!! उसका संदेश पढ़कर मैं भी दंग रहा गया. सोचने लगा कि क्या वाकई Times of India ने ऐसा किया है!!!

समझ नहीं आ रहा है कि मीडिया संस्थानों और उनके धीर-गम्भीर सम्पादकों को हो क्या गया है!!! एक खबर अचानक से नैशनल हेडलाइन्स बनती है, उसे खूब रगड़ा-चलाया जाता है और फिर अचानक से वह सिरे से गायब हो जाती है. ना कोई फॉलोअप, ना कोई याद. और फिर आती है चमचमाती एक नई स्टोरी, रगड़े जाने के लिए. उसे भी दमभर धुना जाता है और फिर एक नई स्टोरी की तलाश शुरु हो जाती है…

ताजा-ताज उदाहरण दे रहा हूं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली में एक किसान सीएम के सामने खुदकुशी कर लेता है और पूरा का पूरा मीडिया उस खबर पर पिल पड़ता है. पूरे देश में गुस्सा भर दिया जाता है और ऐसा लगने लगता है कि मानो अब किसानों के अच्छे दिन वाकई में आने वाले हैं, उनके दिन बहुरेंगे. संसद तक में सवाल उठने लगते हैं. मीडिया के माइकवीर खेतों में जा-जाकर किसानों का हाल पूछने लगते हैं…टीवी की स्क्रीन पर मैला-कुचैलां गांव दिखने लगता है, लेकिन तभी, लेकिन तभी…

अचनाक खबर आती है कि नेपाल में एक बड़ा भूपकम्प आया है और टीवी कैमरों के तोपनुमा मुंह का रूख किसानों से हटाकर नेपाल भूकम्प पर फोकस कर दिया जाता है. अचानक से किसान, उनकी आत्महत्याएं, उनका मुआवजा, फसल की खरीद जैसे सुलगते सवाल और उन सवालों पर सवाल उठाते एंकरों के तमतमाए चेहरे टीवी स्क्रीन से गायब हो जाते हैं. लड़ाई का मैदान बदल चुका होता है और अब टीवी के माइकवीर नेपाल की धरती पर लैंड कर जाते हैं. कोई हेलिकॉप्टर पर सवार दिखता है, कोई दबे मकानों से अपना बचा-खुचा सामान निकालते लोगों के जख्मों पर नमक लगाकर ये पूछता हुआ कि ये आपका ही मकान था क्या??!! पूरा समान दब गया क्या??? और कोई विध्वंस के बीच झूल रहे शहर के खंडहर मकानों के बीच खड़ा होकर फोटुक खिंचवाता है और फेसबुक-ट्विटर पर अपलोड करके ये घोषणा करता है कि देखों !! हम अब नेपाल में हैं. त्रासदी का तमाशा बनाने को तैयार.

भारतीय मीडिया इस कुदरती हमले पर जिस तरह की कवरेज करता है, उससे नेपाली आवाम और वहां की मीडिया भी आजिज आ जाता है. वो घोषणा कर देते हैं कि भारतीय मीडिया अपने टोटा-टंटा लेकर यहां से उखड़े और घर का रास्ते नापे. कुछ लोग नेपाल की जनता के इस स्वाभिमानी कदम में चीन की साजिश ढूंढते हैं लेकिन ये नहीं देखते कि दूसरे देशों की मीडिया से नेपाल की जनता को कोई शिकायत नहीं. फिर भी हमारा स्वनामधन्य मीडिया उस अतिरेक से कोई सबक नहीं सीखता. कोढ़ में खाज ये कि BEA यानी ब्रॉडकॉस्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एनके सिंह ये कहते दिखते हैं कि भारतीय मीडिया नें नेपाल में अच्छा काम किया. कोई आत्ममंथन नहीं, कोई विचार नहीं. सब के सब ये मानकर चल रहे हैं कि जो किया, वो बहुत अच्छा किया. खैर !!!

नेपाल से भगाए जाने के बाद भारतीय मीडिया अचानक से उस त्रासदी को भूल जाता है. टीवी पर 24 घंटे आसन जमाए नेपाल की तस्वीरें यकायक गायब हो जाती हैं. अरे भाई, माना कि आपको खदेड़ दिया गया लेकिन क्या इतना बुरा मान गए कि आप अपने पेशे से न्याय करके भूकम्प की खबर ही दिखाना बंद कर दोगे??!! जिस भूकम्प और उससे जुड़े मानवीय संवेदनाओं से अब तक बहुत सारा सरोकार दिखा रहे थे, अचानक से वे सरोकार क्या उड़न-छू हो गए आपके??!! आपके रिपोर्टर वहां ना सही, कम से कम एजेंसी की खबर-विजुअल लेकर ही खबर दिखा देते भाई. लेकिन ये हो ना सका और नेपाल भूकम्प का तमाशा बनाती खबरें भारतीय टीवी स्क्रीन से फुर्र हो गईं…

नए मसाले की तलाश में लगे मीडिया की उस समय चांदी हो गई जब ये खबर आई कि हिंट एंड रन मामले में सलमान खान पर फैसला आना है. फिर क्या था!!! किसान की आत्महत्या और नेपाल भूकम्प को दुह चुका मीडिया सलमान खान पर बरस पड़ा. सलमान कब घर से निकले, वे किससे गले मिले, उन्होंने क्या पहन रखा है, मामले की सुनवाई के दौरान वे खांसे कि नहीं, उन्हें पसीने आए कि नहीं (शुक्र है इन लोगों ने ये नहीं बताया कि वे टॉयलेट गए कि नहीं और गए तो कितनी बार गए !!!) वगैरह-वगैरह जैसी बातें बताकर सभी चैनल-सम्पादक धन्य महसूस करने लगे. और इन सबके बीच वाट लगी बेचारे रिपोर्टरों की. एक चैनल ने तो बाकायदा टीवी स्क्रीन का स्क्रीन शॉट दिखाकर ये ढोल बजाया कि हमने सलमान खान की हर खबर सबसे पहले आप तक पहुंचाई. शायद औरों ने भी किया हो. लेकिन ये बात बताइए भाई लोगों. बतौर एक दर्शक मुझे क्या फर्क प़ड़ता है कि मैंने सलमान को 5 साल जेल की सजा की खबर 11 बजकर 24 मिनट पर सुनी-देखी या 11 बजकर 30 मिनट पर.

टीवी का स्क्रीन ना हुआ कि कोई स्पेस शटल हो गया, जहां एक-एक सेकेंड का हिसाब रखना पड़ता है. आपको बता दें कि मंगल ग्रह पर भेजे गए यान को उसके आखिरी चरण में मंगल की धरती पर लैंड करने के लिए सिर्फ 15 सेकेंड मिले थे और ये 15 सेकेंड ही उस अभियान की सफलता या असफलता तय कर देती है. लेकिन टीवी का स्क्रीन कोई स्पेस शटल है क्या कि आप घड़ी दिखाकर अपनी कामयाबी का ढिंढोरा पीट रहे थे??!!! अरे पत्रकारिता ही करनी थी तो सलमान की स्टोरी से जुड़े गंभीर तथ्यों की विवेचना करते ना आप लोग??!! ये क्या बता रहे थे कि सलमान को पसीना आ रहा था आदि-आदि.

खैर, लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूं लेकिन बहुत लम्बा हो जाएगा. सुबह-सुबह अर्नब गोस्वामी को स्टूडियो में बैठकर सलमान की सुनवाई मामले पर एंकरिंग करते देखा तो रहा ना गया. सलमान का मामला अभी कुछ दिनों तक और दुहा जाएगा. और जब गन्ने का रस निचोड़ लिया जाएगा तो सलमान नामक यह -राष्ट्रीय आपदा- फिर अचानक से आपके टीवी स्क्रीन से गायब हो जाएगी. फिर किसी नए मसाले को कूटा जाएगा और उसकी फ्रेश बिरयानी बनाई जाएगी. तब तक आप इस ग्रेट इंडियन मीडिया ड्रामे का मजा लीजिए. जय हो.

लेखक नदीम एस. अख्तर कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों आईआईएमसी में अध्यापन के कार्य से जुड़े हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तेज गति कार चलाकर फंसे अर्णब गोस्वामी! (देखें तस्वीरें)

टाइम्स नाऊ के बड़बोले एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी इन दिनों एक नए कारण से चर्चा में है. कुछ लोगों का आरोप है कि वे तेज गति से कार चला रहे थे. इसकी शिकायत पुलिस को पहुंची तो मुंबई की ट्रैफिक पुलिस ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए उनकी कार उठवा ली. अर्णब को जुर्माना भरने के बाद छोड़ा गया. वहीं, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि कार कोई दूसरा शख्स तेज गति से चला रहा था, अरनब ने तो पुलिस को सूचना देकर इस कार को पकड़वाया. ये पूरा घटनाक्रम असल में इन दो तस्वीरों के कारण चर्चा में है जिसे किसे ने मौके पर क्लिक कर लिया.

कोई कह रहा है कि अर्णब टेस्ट ड्राइव कर रहे थे. किसी का कहना है कि वे नई कार खरीदने के बाद उसका लुत्फ उठा रहे थे. कुछ का कहना है कि अरनब ने तेज गति कार को उठवाकर अच्छा काम किया. जितने मुंह उतनी बातें. सोशल मीडिया पर अरनब फिलहाल उपरोक्त दोनों तस्वीरों के कारण चर्चा में हैं और इस पर प्रतिक्रियाओं टिप्पणियों लाइक शेयर की झड़ी लगी हुई है.

जिगह्वील्स नामक एक वेबसाइट ने भी सचित्र खबर छापकर पूरे प्रकरण के बारे में बताया है कि अरनब ने तेज गति कार के बारे में पुलिस को खबर देकर उसे पकड़वा दिया. इस वेबसाइट में खबर का शीर्षक ”Arnab Goswami and the Lamborghini Huracan – What Really Happened” है. खबर की शुरुआत कुछ यूं है: ”With the social media awash with comments and speculation about a recently clicked picture of Arnab Goswami and a Lamborghini Huracan pulled over at Worli Sea Face in Mumbai, here is what really happened. In the day and age when everything is recorded and a billion people with internet access worldwide can essentially comment on something from any corner of the world, there are often instances where a simple act can be blown out of proportion. Sadly, this is exactly what has happened in what should be termed as ‘The Curious Case of Arnab Goswami and the Lamborghini Huracan’. Although there are several speculation about whether the Times Now Editor-in-Chief owns or was driving the car, the real story is far from the truth. Allegedly, Arnab, while travelling on the sea link was overtaken by the Huracan. The Lamborghini, travelling over the speed limit was then reported to the police by Arnab prompting action by the local traffic police department. The car in question, a demo or test drive car belonging to Lamborghini Mumbai was then pulled over by the traffic police and the driver fined for speeding.”

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

डिबेट में अर्णब ने जब किया आशुतोष को शर्मसार

दिल्ली : अर्णव गोस्वामी को दाद तो देनी ही पड़ेगी. साथ ही उनकी प्रोडक्शन टीम को. जिस तरह आशुतोष की कही बात को उन्होंने Live झूठा करार दिया और उस दिन के फुटेज को तुरंत चला दिया, आशुतोष हतप्रभ रह गए. इसे कहते हैं तेजी. टीवी की तेजी, जवाब देने की तेजी, टीम की तेजी… और अर्णब के तेवर देखिए. वो भी पूरे रौ में हैं. मजा आ गया.

https://www.youtube.com/watch?v=xCRn6Rmxcn8

और आशुतोष के बारे में क्या कहें. पत्रकारिता में थे तो ये भी तेज-तर्रार एंकर हुआ करते थे. राजनीति में जाने के बाद पता नहीं सब कुछ हवा हो गया. अर्णब ने तो ऑन एयर कह दिया कि– आशुतोष, मैं आपको लम्बे समय से जानता हूं, इसलिए नैशनल टीवी पर आपको embarrass नहीं करना चाहता था. और आशुतोष को आईना दिखाने के बाद कह दिया कि अभी के अभी माफी मांगिए, आपने झूठ बोला है और आपका झूठ हम अभी टाइम्स नाऊ पर दिखा रहे हैं. So Ashutosh, Apologize.

आशुतोष बेचारे करें भी तो क्या. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा. लगता है कि blank हो गए हैं. बार-बार अपने चश्मे के फ्रेम को ठीक कर रहे हैं. अफसोसनाक. आशुतोष को ऐसा करते देख दुख भी हुआ. इसे कहते हैं सार्वजनिक रूप से भद्द पिटना. अर्णब के News Hour Debate का ये हिस्सा देखने लायक है. 

(‘मीडिया खबर’ से साभार)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रजनीकांत, आलोक नाथ और आलिया भट्ट के बाद अब अरनब गोस्वामी की बारी

होली के मौके पर टाइम्स नाऊ के एंकर अरनब गोस्वामी को लेकर एक पोस्ट सोशल मीडिया और मोबाइल पर खूब वायरल हुआ. इसमें कहा गया है कि रजनीकांत, आलोक नाथ और आलिया भट्ट पर तो खूब जोक मारे गए. अब बारी अरनब गोस्वामी सीरिज शुरू करने की है. तो लीजिए पढ़िए, अरनब गोस्वामी के बारे में आजकल सोशल मीडिया के लोग क्या क्या इजहार ए खयाल करते हैं…

After Rajnikanth, Alok nath & Alia bhatt, it’s time for Arnab Goswami series…..

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अर्नब गोस्वामी पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर चुके थे, मुंबई ने उन्हें रोक लिया!

Nadim S. Akhter :  Times Now वाले अर्नब गोस्वामी को मैं पसंद करता हूं. आप उन्हें अच्छा कहें या बुरा कहें या जो कहें, मुझे लगता है कि तमाम सीमाओं के बावजूद (एक बार फिर दोहरा रहा हूं, बाजार और सियासत की तमाम सीमाओं के बावजूद) वो अपना काम शिद्दत से कर रहे हैं. हां, अफसोस तब होता है जब रवीश कुमार के अलावा हिंदी चैनलों में मुझे अर्नब जैसा passionate एक भी पत्रकार नहीं दिखता.

अर्नब मुझे पसंद हैं क्योंकि मुझे उनमें FIRE दिखता है जो कि पत्रकारिता के लिए बहुत जरूरी है. हालांकि मुझे भी मेरे कई बॉसेज कह चुके हैं कि तुममें बहुत FIRE है, संभल कर, कहीं अपना हाथ ही ना जला बैठो लेकिन मुझ जैसे “FIRE PERSONALITY” (अपने मुंह मियां मिट्ठू भी समझ सकते हैं) को भी जब अर्नब में आग दिखती है तो या तो ये मेरी समझ बहुत कम है या फिर ये एक सच्चाई है. खैर, अभी अर्नब का एक लंबा भाषण सुना, जिसमें उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन के कुछ -राज- खोले और पत्रकारिता पर अपने विजन की चर्चा की. सोचा कि आप लोगों से भी शेयर करूं. तो पहली बात ये कि

1. अर्नब गोस्वामी ने वर्ष 2003 में पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर लिया था लेकिन Times Group के मालिकों ने जब उन्हें चैनल लॉन्च करने के लिए मुंबई में समुद्र किनारे टहलते हुए उन्होंने अपना फैसला बदल दिया.

2. अर्नब मुंबई को देश का मीडिया हब बनाना चाहते हैं यानि नोएडा की फिल्म सिटी को खाली करके सारा तामझाम मुंबई में शिफ्ट कराना चाहते हैं.

3. उनके अनुसार मुंबई से पत्रकारिता ईमानदारी से की जा सकती है क्योंकि तब आप दिल्ली के नेताओं को टाल सकते हैं और फालतू की चमचागीरी-सोशल सर्कल को avoid कर अपना पूरा फोकस खबर के कंटेंट और उसकी निष्पक्षता पर लगा सकते हैं.

4. अर्नब आज जो कुछ भी हैं, सिर्फ और सिर्फ मुंबई शहर की वजह से हैं. अगर ये शहर ना होता तो आज अर्नब गोस्वामी भी ना होते….

5. एक सबसे महत्वपूर्ण बात, जो मुझे खटक रही है, वो ये कि अर्नब पत्रकारिता के बेसिक उसूल यानी basic principle को बदलना चाहते हैं. संभव हो तो उसे जमीन में दफ्न करना चाहते हैं. और ये मूलभूत सिद्धांत है खबरों में Objectivity यानी निष्पक्षता बनाए रखने का यानी खबर में views, opinions या विचार मिक्स नहीं करने का.

अर्नब कहते हैं कि मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद उन्होंने दिल्ली में सीखा ये उसूल हमेशा के लिए दफ्न कर दिया है. उनके अनुसार पत्रकार अगर सही-गलत के बीच में खड़ा होकर ये कहे कि मैं तो सिर्फ फैक्ट बताऊंगा, बाकी पाठक-दर्शक पर छोड़ दूंगा तो वह अपने पेशे से न्याय नहीं कर रहा है. पत्रकार को स्टैंड तो लेना ही होगा और वो लेते हैं. अर्नब के अनुसार पत्रकारिता में इस बदलाव की बहुत जरूरत है और news के साथ reporter का view दिखाना जरूरी है.

अब सोचिए कि अगर संघ या कांग्रेस या वाम समर्थक कोई पत्रकार अपनी खबर में view दिखाने लगे, स्टोरी प्लांट करने लगे तो भारत की पत्रकारिता किस ओर जाएगी?? मुझे लगता है कि समान्य परिस्थितयों में पत्रकार को -विचार- बताने से अलग ही रखना चाहिए. हां, जैसे मुंबई हमले के समय भी क्योंकि ऐसा ना हो कि -देशभक्ति- के चक्कर में आपकी किसी खबर से किसी का ऐसा बुरा हो कि उसका पूरा जीवन ही बर्बाद हो जाए. खैर ये डिबेट का विषय तो है ही.

और आखिरी बात जो अर्नब ने कही. वो ये कि मुंबई से जल्द दी दुनिया को बीबीसी और सीएनएन को टक्कर देने वाला एक हिन्दुस्तानी अंग्रेजी चैनल मिलने वाला है. और हम दुनिया भर में टीवी न्यूज इंडस्ट्री की परिभाषा बदल कर रख देंगे.

खैर, पूरे भाषण के दौरान कुछ कर गुजरने की अर्नब की छटपटाहट मुझे अच्छी लगी. यही तो है अर्नब की कामयाबी का राज

नोटः पत्रकारिता के विद्यार्थियों (जो हम सब आज भी हैं) को अर्नब का ये लम्बा भाषण जरूर सुनना चाहिए क्योंकि यह उनका News Hour शो नहीं है. इससे आप को पता चलेगा कि अर्नब ऐसे क्यों हैं और टाइम्स नाऊ ऐसा क्यों है.

और एक सवाल मेरे मन में भी है. क्या हम हिंदी में भी टाइम्स नाऊ के तेवर और कलेवर वाला चैनल ला सकते हैं. अगर हां, तो उस दिन देश के टेलिविजन इतिहास में एक नई क्रांति का जन्म होगा.

देखिए, अर्नब का पूरा भाषण.

https://www.youtube.com/watch?v=JBV_FK_x7t8

युवा और तेज-तर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. नदीम कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: