वर्दी में गुंडई (9) : यांत्रिक ढंग से विवेचना के कारण सोशल एक्टिविस्ट को लंबे समय तक रहना पड़ा जेल में!

Shiivaani Kulshresthhaa : मन की बात….. इस दुनिया में सारे लोग गलत करेंगे तो सही कौन करेगा? मेरे मन में कई दिनों से विचार आ रहा हैं कि जेल में कितने ऐसे अभियुक्त बंद हैं जो फेक मुकद्दमों में भी बंद हो सकते हैं, पर वो अक्षम हैं। अपनी जमानत नहीं करा सकते। उनके पास वकील नही हैं। कुछ ऐसे भी केस हैं, जहां व्यक्ति को जुवनाइल एक्ट के अन्तर्गत अभियुक्त ट्रीट करना चाहिये था लेकिन विवेचक द्वारा यांत्रिक ढ़ंग से कार्य किया गया। ऐसे कितने लोग जेल में बंद हैं जो जुर्माना नही दे पाये हैं।

मेरी स्मृतियों में रुदुल शाह का मामला ताजा हो जाता है। यह व्यक्ति जेल प्रशासन की गलती के कारण कितने वर्षों तक जेल में निरुद्ध रहा। अभी Yashwant Singh सर एक सज्जन की स्टोरी कर रहे हैं। उन सज्जन के मैटर में पुलिस ने यांत्रिक ढंग से विवेचना की। वह सज्जन सोशल एक्टिविस्ट हैं। उन्हें छेड़खानी के झूठे मुकद्दमे में फंसाया गया। जबकि वह घटना स्थल पर उपस्थित नहीं थे। ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। तमाम साक्ष्य होने के बावजूद भी उनको एक लम्बे समय तक जेल में रहना पड़ा। आखिर ऐसे कितने लोग होंगे जो फेक एफआईआर का दंश झेल रहे हैं।

बिहार के जज मानवेन्द्र मिश्रा जी का एक जजमेंट पढ़ रही थी। उसमें उन्होंने विवेचक के खिलाफ उनके आला अधिकारियों को निर्देशित किया कि उन्हें पुन: ट्रेनिंग करायी जाये, क्योंकि विवेचक ने यांत्रिक ढंग से कार्य किया।

मैं यह कहना चाहती हूं कि कभी सोचा है कि फेक मुकद्दमों के कारण पूरा परिवार सफर करता है। लड़कियां अपने बलात्कार, छेड़खानी, फैमिली कोर्ट के केस लड़ती हैं तो उनके और व उनसे सम्बन्धित लोगों पर फेक मुकद्दमे लगाये जाते हैं। ताकि पीड़िता की शक्ति क्षीण की जा सके। स्टेट इनके मुकद्दमे नहीं लड़ती। सरकार हेल्पलाइन नम्बर तो जारी करती है। पुलिस विभाग के तथाकथित एक्टिविस्ट स्कूलों में जाकर ज्ञान तो देते हैं लेकिन पीड़िताओं को इस बात से भी अवगत करायें कि जब वह फील्ड में लड़ने निकलेंगी तो स्टेट किस तरह उनकी सहायता करेगी?

जेल, कोर्ट, पुलिस हर जगह रिफॉर्मेशन की जरुरत है। पर क्या बदलाव फेसबुक से लिखने से आयेगा? कहां से शुरु करूं? सबको नोबल पुरस्कार मिल रहा है। मैग्सेसे पुरुस्कार मिल रहा है लेकिन भारत की जमीन आज भी बंजर है। यहां अधिकार और कर्तव्य की पौध नही है। यहां फेक मुकद्दमो का दंश है।

मेरे एक परिचित हैं। वह गलत विवेचना का दंश सह रहे हैं। लम्बे समय तक जेल में रहे और कैंसर से पीड़ित हो गये। पूरा परिवार कितना सफर करता है। हम किसको सजा देना चाहते हैं? हमारे विधि निर्माताओं का कानून बनाने का प्रयोजन पूर्ण नहीं हो पाया। कोई निर्दोष व्यक्ति भले कोर्ट से रिहा हो जाये लेकिन उसका रिकॉर्ड थाने में मौजूद रहता है। कोर्ट के दोषमुक्त किये जाने से माथे पर लगा कंलक नहीं धुलता। आखिर क्यों?

सीआरपीसी कहती है कि गरीब लोगों की जमानत राज्य के खर्चे पर कराई जाए लेकिन कितने प्रतिशत गरीब लोगों की जमानत राज्य के खर्चे पर कराई जाती है? इसलिए कुछ विद्वानों ने कहा है कि कानून बलवान का हित है। आखिर वह वक्त कब आएगा जब कानून हर व्यक्ति का अधिकार होगा?

लखनऊ की युवा और प्रतिभाशील वकील शिवानी कुलश्रेष्ठ की एफबी वॉल से.

इसके पहले के पार्ट पढ़ें-

दल्ला थानेदार

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