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मध्य प्रदेश

व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले लोगों को जान का खतरा

भोपाल: मध्य प्रदेश के चर्चित व्यापम घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपे कल एक साल पूरा हो जाएगा. पिछले साल व्यापम की आंच मुख्यमंत्री शिवराज तक पहुंच गई लेकिन एक साल में ज्यादातर हाईप्रोफाइल आरोपी जेल से बाहर आ गए हैं. ऐसे में व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले लोगों को अब जान का खतरा सताने लगा है. घोटाले का खुलासा करने वाले आनंद राय को जान का भय सता रहा है. व्हिसिल ब्लोअर डॉ आनंद राय का कहना है, ‘’जान का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया है. मुझे सुरक्षा दी गई है लेकिन परिवार को नहीं. 2500 लोगों से दुशमनी मोल ले रखी है.’’

भोपाल: मध्य प्रदेश के चर्चित व्यापम घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपे कल एक साल पूरा हो जाएगा. पिछले साल व्यापम की आंच मुख्यमंत्री शिवराज तक पहुंच गई लेकिन एक साल में ज्यादातर हाईप्रोफाइल आरोपी जेल से बाहर आ गए हैं. ऐसे में व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले लोगों को अब जान का खतरा सताने लगा है. घोटाले का खुलासा करने वाले आनंद राय को जान का भय सता रहा है. व्हिसिल ब्लोअर डॉ आनंद राय का कहना है, ‘’जान का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया है. मुझे सुरक्षा दी गई है लेकिन परिवार को नहीं. 2500 लोगों से दुशमनी मोल ले रखी है.’’

डॉक्टर से इंजीनियर तक, कांस्टेबल से फूड इंस्पेक्टर तक, प्रवेश परीक्षा से लेकर नौकरी की भर्ती तक, सबकुछ व्यापम के तहत मध्य प्रदेश में हुआ करता था. आनंद राय ने खुलासा किया तो पूरा खेल खुला और कई लोग सलाखों के पीछे पहुंच गये लेकिन गिरफ्तार आरोपी अब धीरे धीरे जेल से बाहर आने लगे हैं. पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, अरविंदो मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर विनोद भंडारी, बीजेपी नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा, कांग्रेस नेता संजीव सक्सेना, राज्यपाल पीए धनराज यादव और डीआईजी आरके शिवहरे सहित दर्जन भर से ज्यादा हाईप्रोफाइल आरोपी जेल से बाहर आ चुके हैं. जबकि कई आरोपी बाहर आने के इंतजार में हैं. यही वजह है कि घोटाले का खुलासा करने वाले लोग परेशान हैं.

मध्य प्रदेश के मेडिकल कॉलेज और सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा कर भर्ती कराने वाले ये घोटाला साल 2000 से चल रहा था लेकिन इंदौर पुलिस ने भर्ती कराने वाले दलाल डॉ जगदीश सागर को 2013 में जब गिरफतार किया तब पता चला कि ये घोटाला कितना बड़ा है. साल 1982 में शुरू हुए मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानि व्यापम का काम था प्रदेश के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए प्रवेश परीक्षाएं करवाना. साल 2008 से व्यापम के जरिए सरकारी नौकरी के लिए भर्तियां भी होने लगीं.

व्यापम के दफ्तर से मध्य प्रदेश को शिक्षक, पुलिस कॉंस्टेबल, सब इंस्पेक्टर, फूड इंस्पेक्टर, वन रक्षक मिलने शुरु हो गए. लेकिन धीरे-धीरे आरोप लगने लगे कि व्यापम की परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा हो रहा है. सीबीआई से पहले इस घोटाले की जांच मध्य प्रदेश पुलिस की एसटीएफ कर रही थी जिसने 200 से ज्यादा केस दर्ज कर ढाई हजार लोगों को आरोपी बनाया था. एसटीएफ की जांच की निगरानी के लिए एसआईटी भी गठित हुई. जांच में पचा चला कि व्यापम से जुडे करीब 40 लोगों की मौत हुई है. इस बीच न्यूज चैनल आजतक के पत्रकार अक्षय सिंह की झाबुआ में रहस्यमय मौत के बाद 9 जुलाई 2015 को इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया.

अब इस एक साल में सीबीआई ने भोपाल में दो दफ्तर बनाये. 185 केसों की एफआईआर नये सिरे से लिखी और 35 मामलों में चार्जशीट पेश की. लेकिन इन सबके बीच बडे आरोपियों को जमानत मिलती जा रही है और उनके जेल से छूटने का सिलसिला जारी है. सीबीआई की भूमिका को लेकर इसीलिए सवाल उठाये जा रहे हैं. लेकिन सीबीआई का कहना है कि व्यापम मामले में पूरी गंभीरता से जांच जारी है. जमानत देना कोर्ट का काम है और जो जांच पूरी हो रही है उनमें आरोप पत्र दाखिल किए जा रहे हैं. मध्य प्रदेश की सरकार भी जांच से संतुष्ट है. जबकि इस मामले की निगरानी कर रही सुप्रीम कोर्ट में भी सीबीआई अपनी स्टेटस रिपोर्ट लंबे समय से पेश नहीं कर पा रही है. रिपोर्ट पेश करने की तारीख नौ बार बढ़ चुकी है. अब 11 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट और 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में व्यापम केस की सुनवाई पर फिर सबकी नजर है.

(रिपोर्ट- ब्रजेश राजपूत, साभार-एबीपी न्यूज)

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