भोपाल में केरल के सीएम को केरलवासियों के एक प्रोग्राम में नहीं शिरकत करने दिया गया

Badal Saroj : मध्य प्रदेश में केरल के लोगों से नहीं मिलने दिया गया केरल के मुख्यमंत्री को. ऐसे में सवाल बनता है कि मध्य प्रदेश में सरकार कौन चला रहा है? आरएसएस या मुख्यमंत्री? आज शाम भोपाल के सभी केरलवासियों की ओर से मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के स्वागत समारोह को मध्यप्रदेश सरकार के प्रशासन ने नहीं होने दिया । वे शाम साढ़े पांच बजे एक सभागार में जिस आयोजन में शामिल होने वाले थे, उसके ठीक पहले पुलिस अधिकारियों ने उन्हें कार्यक्रम में न जाने को कहा।

पुलिस अधिकारियों का कहना था कि उस कार्यक्रम के बाहर आरएसएस के कुछ लोग प्रदर्शन कर सकते हैं। मध्य प्रदेश की पुलिस उन्हें संरक्षण नहीं प्रदान कर सकती। यह एक असाधारण घटना है। एक राज्य का मुख्यमंत्री यदि अपने राज्य के वासियों के एक सामान्य से मिलन समारोह में भी शामिल नहीं हो सकता, इससे अधिक अलोकतांत्रिकता और क्या हो सकती है। मध्यप्रदेश सरकार और पुलिस का यह आचरण यह साबित करता है कि प्रशासन और क़ानून व्यवस्था उसके नियंत्रण में नहीं है। उन्मादी, हुड़दंगी और साम्प्रदायिक गिरोह सरकार चला रहे हैं।

मध्य प्रदेश में संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादा से सरकार नहीं चल रही। आरएसएस उसे चला रहा है। आज का आचरण मध्यप्रदेश की भाजपा नियंत्रित सरकार द्वारा लोकतंत्र का अपमान है। संविधान का अपमान है। मध्यप्रदेश और केरल दोनों की जनता का अपमान है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की मध्यप्रदेश राज्य समिति इस की कड़ी भर्त्सना करती है।

माकपा से जुड़े कामरेड बादल सरोज की एफबी वॉल से.

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उज्जैन सिंहस्थ घोटाला : ऐसे-ऐसे कारनामे कि आप दातों तले उंगली दबा लेंगे

भोपाल : विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होते ही विपक्ष ने मप्र में हुए सिंहस्थ घोटाले की डीटेल्स जारी की हैं। कांग्रेस ने दावा किया है कि कुल 5000 करोड़ के सिंहस्थ आयोजन में करीब 3000 करोड़ का घोटाला किया गया है। 10 रुपए में बिकने वाली चीज को 20 रुपए में किराए पर लिया गया। हर चीज के नाम तीन गुने तक चुकाए गए। दागी अफसरों की पोस्टिंग की गई और विज्ञापन के नाम पर 600 करोड़ का घोटाला किया गया। अमेरिका में जहां से सिंहस्थ स्नान के लिए एक भी एनआरआई नहीं आया, 180 करोड़ का विज्ञापन किया गया।  इतने पैसे में तो भारतीय मूल के अमेरिकियों को फ्री हवाईयात्रा करवाकर सिंहस्थ दर्शन कराया जा सकता था। पढ़िए इनवेस्टीगेशन रिपोर्ट जो मीडिया के सामने सार्वजनिक की गई है :

5 करोड़ रूपये मूल्य की स्वास्थ्य सामग्री के लिए 60 करोड़ रूपये चुकाये गये।

खरीदी रेट सरकारी रेट
रबर हैण्ड ग्लब्ज 1,890 150
एक्सरे लैड फिल्म ब्यूवर सिंगल सेक्सशन 11,250 4500
एक्सरे लैड फिल्म ब्यूवर डबल सेक्सशन 22,500 8000
एक्सरे लैड फिल्म ब्यूवर ट्रिपल सेक्सशन 33,750 11,500
स्टेथो स्कोप 7000 93
ग्लूकोमीटर विथ स्ट्रिप 1450 395
स्पंज होल्डिंग फोरसेप 2250 96
ब्लड बैंक रेफ्रिजरेटर (50 बैग्स) 3,69000 97,256
सिरिज इंफ्यूजन पम्प 38,500 24,489
यूरीन एनालाईजर 95,400 29,990
डोलन कोच विथ रिमोट कंट्रोल 1,95000 10,6000
इलेक्ट्रोरेट एनालाईजर 1,90,800 81,000
आटोमेटेड सेल काउंटर 5 पार्ट 12,99000 7,90,000
ब्लैड कलेक्शन मॉनिटर 1,52000 59,102
एम्बू बैग एडल्ट सिलिकॉन 1750 379
एम्बू बैग चाईल्ड सिलिकॉन 1750 340
एम्बू बैग इनफेंट 1750 340
हॉस्ट्रोक्टोमी इंस्टूमेंट सेट 2,69,000

3500 रुपए के कूलर का किराया 6500 रुपए

बाजार में 3500/- रूपये की कीमत में जो कूलर उपलब्ध हो सकते थे, स्थानीय नगर निगम ने उसे 5600/- रूपये प्रति कूलर किराये पर लगवाया। सिंहस्थ अवधि के लिए मंगवाये गये कूलर लागत से डेढ़ गुना किराया वसूलने के बाद भी वे सप्लायर के हो गये। विभिन्न स्थानों पर 528 कूलर किराये पर लगे थे, जिनका करीब 30 लाख रूपये किराया बना, जबकि इतनी धनराशि में निगम 850 कूलर स्वयं खरीद सकता था।

बनाए 40 हजार शौचालय, लिखे 90 हजार

समूचे आयोजन स्थल, साधुओं की छावनियों में 35 हजार शौचालय, 15 हजार बाथरूम व 10 हजार मूत्रालयों का निर्माण होना था, इसके लिए 18 अगस्त, 2015 को टेंडर क्रमांक 1415 निकाला गया, जो मात्र 36 करोड़ रूपये का था। इसमें लल्लूजी एंड सन्स, सुलभ और 2004 के सिंहस्थ में अधूरा काम छोड़कर भागने वाले ब्लैक लिस्टेड ठेकेदार सिंटेक्स ने भी भाग लिया। 36 करोड़ रूपयों का यह ठेका 117 करोड़ रूपयों का कैसे हो गया?

कागजी तौर पर 90,341 शौचालयों का निर्माण बिना किसी तरह के फिजीकल वेरिफिकेशन के करवाया गया। यदि पक्के शौचालयों का निर्माण कराया जाता है तो उसकी लागत लगभग 12 हजार रूपये प्रति शौचालय आती है, फिर आश्चर्य की बात है कि एक अस्थायी शौचालय के निर्माण में 13 हजार रूपये खर्च कैसे हुए।

सरकार के दावों में 90,341 शौचालयों का निर्माण कराया गया है, जबकि जमीनी हकीकत में मात्र 40 हजार शौचालय ही बने।

उज्जैन संभाग के आयुक्त रवीन्द्र पस्तौर द्वारा प्रत्येक शौचालय, बाथरूम व मूत्रालय पर नंबरिंग करने के जारी आदेशों की अनदेखी की गई?

सिंहस्थ के प्रभारी मंत्री भूपेन्द्रसिंह और मुख्यमंत्री के नौ-रत्नों में एक वरिष्ठ आईएएस विवेक अग्रवाल दक्षिण भारत से बगैर टेंडर 25 करोड़ रूपयों की लेट्रीन-बाथरूम का ढांचा लेकर आये थे और इस बड़ी कमीशनखोरी ने ही संभागायुक्त के आदेश को हवा में उड़ा दिया। 36 करोड़ रूपये के शौचालय 117 करोड़ रूपये के हो गये।

प्याऊ और कचरा प्रबंधन घोटाला

इसी प्रकार नगर निगम ने आर-ओ युक्त 750 प्याऊ का निर्माण 2.50 लाख रूपये की प्रति प्याऊ लागत से करवाया और प्रतिदिन की मान से 40 करोड़ रूपयों में कचरा प्रबंधन का ठेका दिया, इसमें भी बहुत बड़ा भ्रष्टाचार हुआ है।

5 करोड़ का पुल 15 करोड़ भुगतान

निगम के तमाम पुलों के निर्माण में हर एक के रेट रिवाईज किये गये, जबकि लोहा और सीमेंट के दाम कम थे। रिश्वत खाकर हर मामले में सरकार की गलती बताकर देरी का कारण बताया गया और कीमतें दोगुना कर दी गईं।

5 करोड़ रूपये में नदी पर बनने वाला पुल 15 करोड़ रूपयों में बना

जीरो पाइंट के पुल ठेकेदार नरेन्द्र मिश्रा को 01 करोड़ रूपयों का अतिरिक्त भुगतान यह कहकर करवाया गया कि, उसने रेल्वे के मापदंडों के अनुसार पुताई की है।

खेतों की लेवलिंग के नाम पर 10 करोड़ गप

मेला क्षेत्र में किसानों के लिए खेतों के ठेके पूर्व में ही हो गये थे। खेतों की लेवलिंग का काम बताकर इसके ठेकेदार कोमल भूतड़ा को 10 करोड़ रूपयों का भुगतान किया गया। काम कहां, क्या और कितना हुआ इसकी जानकारी देने के लिए आज भी कोई व्यक्ति अधिकृत नहीं है?

66 करोड़ का अस्पताल 93 करोड़ भुगतान

मेसर्स यशनंद इंजीनियरिंग एवं कान्टेक्टर को 28 जुलाई, 2014 को 450 बेड के अस्पताल का ठेका 66.44 करोड़ रूपयों में 31 दिसम्बर, 2015 तक की अवधि में पूर्ण करने के साथ दिया गया जो पूरा नहीं हो सका। गृह निर्माण मंडल के भ्रष्ट अधिकारी इसका खर्च अब 93.10 करोड़ रूपये बता रहे हैं, इनकी बेईमानी, मनमानी और भ्रष्टाचार की वजह से शासन को 27 करोड़ रूपयों का चूना लगा।

तालाब की सफाई में घोटाला

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के मुख्य कनेक्टिंग तालाब की सफाई को लेकर भी मेसर्स स्टील इंजीनियरिंग, फरीदाबाद की एक कंपनी को ठेका दिया गया था, इस कार्य की अनुमानित लागत 54 लाख रूपये थी, सफाई कार्य मशीनों की बजाय मजदूरों से कराया गया, इंजीनियरों की सांठगांठ से ठेकेदार ने ऊपरी काम करके भुगतान प्राप्त कर लिया।

पीडब्ल्यूडी के दागी अफसर को सौंपी जिम्मेदारी

सिंहस्थ के दौरान 600 करोड़ रूपयों के निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग की जबावदेही लोक निर्माण विभाग के उसी कार्यपालन यंत्री पी.जी. केलकर को क्यों सौंपी गई, जिसे मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर में घटिया सड़क निर्माण कराने का दोषी पाया गया था और उसके वेतन से 42 लाख रूपयों की वसूली भी हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि केलकर को उज्जैन में इस जबावदारी को निभाने में कलेक्टर उज्जैन कवीन्द्र कियावत की भूमिका रही है, क्योंकि जब कियावत सीहोर कलेक्टर थे, तब उसी अवधि में केलकर का यह घोटाला सामने आया था।

मंत्रीजी के दामाद की भूमिका संदिग्ध

मेला अधिकारी आईएएस अविनाश लवानिया जो प्रदेश काबिना मंत्री नरोत्तम मिश्रा के दामाद हैं, इस समूचे भ्रष्टाचार में उनकी भूमिका क्या है। सीएम के भांजे साहब भी जद में मुख्यमंत्री के भांजा-दामाद और उज्जैन नगर निगम के उपायुक्त वीरेन्द्रसिंह चौहान की इस दौरान पाई गई संदिग्ध भूमिका को लेकर प्रभारी मंत्री भूपेन्द्रसिंह ने नोटशीट जारी कर तत्काल प्रभाव से उनके स्थानांतरण किये जाने हेतु कहा था, आखिरकार किसके दबाव में उनका स्थानांतरण न करते हुए सिर्फ उनके वित्तीय अधिकारों पर रोक लगाई गई?

इन दागी अफसरों को भी मिली महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां

सिंहस्थ की महत्वपूर्ण जबावदारी संभालने वालों में लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री पी.जी. केलकर के अतिरिक्त उज्जैन विकास प्राधिकरण के मुख्य पदाधिकारी शैलेन्द्रसिंह, चंद्रमौली शुक्ला, शोभाराम सोलंकी, के.सी. भूतड़ा सहित करीब एक दर्जन वे दागी अफसर शामिल हैं, जिनके विरूद्व गंभीर घोटालों/भ्रष्टाचार को लेकर लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू में प्रकरण दर्ज हैं, इन्हें किन विशेष योग्यताओं के तहत बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी गईं?

विज्ञापनों पर 600 करोड़ लुटाए, 180 करोड़ अमेरिका के नाम पर गप

प्राप्त जानकारी के अनुसार (जनसंपर्क एवं माध्यम, सूचना का अधिकार कानून-2005 के तहत जानकारी नहीं दे रहा है।) सिंहस्थ के नाम पर प्रदेश सरकार ने करीब 600 करोड़ रूपये मुख्यमंत्री की फोटो के साथ निर्लज्जतापूर्वक उनकी ब्रांडिंग के लिए बजट राशि का आवंटन किया था, जिस तरह से उन्होंने देश-विदेश के विभिन्न हवाई अड्डों, अन्य राज्यों और देश भर में चलने वाली रेल गाडि़यों/रेल्वे स्टेशनों आदि स्थानों पर प्रचार-प्रसार करवाया, हालांकि उसके बावजूद भी अपेक्षा के अनुरूप धर्मावलंबियों ने इस आयोजन में हिस्सा नहीं लिया, उसके बावजूद भी कहा जा रहा है कि 180 करोड़ रूपये का अमेरिका में, जहां 4000 भारतीय मूल के निवासी भी नहीं हैं, ब्रांडिंग व प्रचार-प्रसार हेतु भुगतान किया गया है, सरकार स्पष्ट करे?

24 को मेला खत्म हुआ, 26 को आडिट भी हो गया

सिंहस्थ का समापन हालाकि 21 मई, 2016 को हुआ, उसके बाद राज्य सरकार ने साधु-संतो और जनता की सुविधा हेतु उसमें तीन दिन का इजाफा कर विधिवत समापन 24 मई, 2016 को कराया। आखिरकार जनसंपर्क विभाग को इतनी कौन सी जल्दबाजी थी, जिसमें उसने 26 जून, 2016 यानि एक माह के भीतर महालेखाकार की टीम को बुलाकर उसका ऑडिट भी करवा लिया और प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया?

बीमा घोटाला: 206 पोस्टमार्टम हुए, बीमा भुगतान किसी को नहीं

सिंहस्थ के दौरान दो माह के लिये प्रत्येक आने-जाने वाले नागरिकों का 2 लाख रूपये का बीमा कराया गया था, इसे लेकर सरकार ने न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को 1 करोड़ 76 लाख 37 हजार 542 रूपयों के प्रीमियम की अदायगी की थी, बीमा कंपनी ने संपूर्ण मेला क्षेत्र, नगर निगम सीमा क्षेत्र में कार्यरत पुलिस, प्रशासन के अधिकारियों/कर्मचारियों/नागरिकों को इसमें शामिल करते हुए दुर्घटना, मृत्यु, आगजनी, तूफान या शासकीय संपत्ति के नुकसान को भी मुआवजा राशि में शामिल किया था। 8 अप्रैल 2016, को बीमा कंपनी के मुख्य रीजनल मैनेजर दीपक भारद्वाज और मेला अधिकारी अविनाश लवानिया के बीच इस बाबत हुए सहमति अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे, कहा जा रहा है कि इस दौरान सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आंधी, तूफान व डूबने के कारण लगभग 206 पोस्टमार्टम एवं यात्रियों की लगभग 96 मौतें विभिन्न दुर्घटनाओं में हुई हैं, किन्तु नोडल अधिकारी ने एक भी दावा बीमा कंपनी में प्रस्तुत नहीं किया, इसका कारण क्या है?

1000 करोड़ का खाद्यान्न घोटाला

सिंहस्थ-2016 को लेकर प्रदेश के खाद्य विभाग ने समूचे प्रदेश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत संचालित प्रति राशन दुकानों, समितियों, गेहूं खरीदी केंद्रों से 1000/- रूपये नगद और 01 क्विंटल गेहूं अप्रैल-मई माह के निर्धारित कोटे से गोपनीय रूप से निर्देश जारी कर एकत्र किया था, ताकि साधु-महत्माओं के शिविरों में यह खाद्यान्न दिया जा सके, जबकि हकीकत यह है कि सभी शिविरों में प्रतिदिन होने वाली भोजन-प्रसादी/भण्डारों की खाद्य सामग्री व अन्य व्यय विभिन्न धर्मालुओं, समाजसेवी संगठनों और साधु-महात्माओं ने ही उठाये हैं। लिहाजा, खाद्य विभाग द्वारा एकत्र किये गये 2.50 लाख टन खाद्यान्न और नगद राशि का उपयोग कहां और किसने किया, सरकार को स्पष्ट करना चाहिए।

वैचारिक कुंभ में 127 करोड़ फूंक दिए

अपने बदनुमा चेहरे पर सफाई का आवरण ओढ़ने एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुश करने के लिए 127 करोड़ रूपये ‘‘वैचारिक कुंभ’’ के नाम पर फूंक दिये गये। मुख्यमंत्री बतायें कि इतनी बड़ी धनराशि को ‘‘वैचारिक कुंभ’’ के नाम पर खर्च करने के बाद इस प्रदेश को इससे क्या हासिल हुआ? सिवाय ‘‘वैचारिक कुंभ’’ से प्राप्त ‘‘आर्थिक आनंद’’ से प्रेरित होकर ही ‘‘आनंद मंत्रालय’’ की स्थापना।

मनजीत सिंह ठकराल
अमित कुमार पाण्डेय
जबलपुर
स्वराज अभियान

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व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले लोगों को जान का खतरा

भोपाल: मध्य प्रदेश के चर्चित व्यापम घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपे कल एक साल पूरा हो जाएगा. पिछले साल व्यापम की आंच मुख्यमंत्री शिवराज तक पहुंच गई लेकिन एक साल में ज्यादातर हाईप्रोफाइल आरोपी जेल से बाहर आ गए हैं. ऐसे में व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले लोगों को अब जान का खतरा सताने लगा है. घोटाले का खुलासा करने वाले आनंद राय को जान का भय सता रहा है. व्हिसिल ब्लोअर डॉ आनंद राय का कहना है, ‘’जान का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया है. मुझे सुरक्षा दी गई है लेकिन परिवार को नहीं. 2500 लोगों से दुशमनी मोल ले रखी है.’’

डॉक्टर से इंजीनियर तक, कांस्टेबल से फूड इंस्पेक्टर तक, प्रवेश परीक्षा से लेकर नौकरी की भर्ती तक, सबकुछ व्यापम के तहत मध्य प्रदेश में हुआ करता था. आनंद राय ने खुलासा किया तो पूरा खेल खुला और कई लोग सलाखों के पीछे पहुंच गये लेकिन गिरफ्तार आरोपी अब धीरे धीरे जेल से बाहर आने लगे हैं. पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, अरविंदो मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर विनोद भंडारी, बीजेपी नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा, कांग्रेस नेता संजीव सक्सेना, राज्यपाल पीए धनराज यादव और डीआईजी आरके शिवहरे सहित दर्जन भर से ज्यादा हाईप्रोफाइल आरोपी जेल से बाहर आ चुके हैं. जबकि कई आरोपी बाहर आने के इंतजार में हैं. यही वजह है कि घोटाले का खुलासा करने वाले लोग परेशान हैं.

मध्य प्रदेश के मेडिकल कॉलेज और सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा कर भर्ती कराने वाले ये घोटाला साल 2000 से चल रहा था लेकिन इंदौर पुलिस ने भर्ती कराने वाले दलाल डॉ जगदीश सागर को 2013 में जब गिरफतार किया तब पता चला कि ये घोटाला कितना बड़ा है. साल 1982 में शुरू हुए मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानि व्यापम का काम था प्रदेश के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए प्रवेश परीक्षाएं करवाना. साल 2008 से व्यापम के जरिए सरकारी नौकरी के लिए भर्तियां भी होने लगीं.

व्यापम के दफ्तर से मध्य प्रदेश को शिक्षक, पुलिस कॉंस्टेबल, सब इंस्पेक्टर, फूड इंस्पेक्टर, वन रक्षक मिलने शुरु हो गए. लेकिन धीरे-धीरे आरोप लगने लगे कि व्यापम की परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा हो रहा है. सीबीआई से पहले इस घोटाले की जांच मध्य प्रदेश पुलिस की एसटीएफ कर रही थी जिसने 200 से ज्यादा केस दर्ज कर ढाई हजार लोगों को आरोपी बनाया था. एसटीएफ की जांच की निगरानी के लिए एसआईटी भी गठित हुई. जांच में पचा चला कि व्यापम से जुडे करीब 40 लोगों की मौत हुई है. इस बीच न्यूज चैनल आजतक के पत्रकार अक्षय सिंह की झाबुआ में रहस्यमय मौत के बाद 9 जुलाई 2015 को इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया.

अब इस एक साल में सीबीआई ने भोपाल में दो दफ्तर बनाये. 185 केसों की एफआईआर नये सिरे से लिखी और 35 मामलों में चार्जशीट पेश की. लेकिन इन सबके बीच बडे आरोपियों को जमानत मिलती जा रही है और उनके जेल से छूटने का सिलसिला जारी है. सीबीआई की भूमिका को लेकर इसीलिए सवाल उठाये जा रहे हैं. लेकिन सीबीआई का कहना है कि व्यापम मामले में पूरी गंभीरता से जांच जारी है. जमानत देना कोर्ट का काम है और जो जांच पूरी हो रही है उनमें आरोप पत्र दाखिल किए जा रहे हैं. मध्य प्रदेश की सरकार भी जांच से संतुष्ट है. जबकि इस मामले की निगरानी कर रही सुप्रीम कोर्ट में भी सीबीआई अपनी स्टेटस रिपोर्ट लंबे समय से पेश नहीं कर पा रही है. रिपोर्ट पेश करने की तारीख नौ बार बढ़ चुकी है. अब 11 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट और 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में व्यापम केस की सुनवाई पर फिर सबकी नजर है.

(रिपोर्ट- ब्रजेश राजपूत, साभार-एबीपी न्यूज)

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एमपी में जिन लोगों ने भूखंड प्राप्त किए उनमें नवभारत, दैनिक जागरण, नईदुनिया और दैनिक स्वदेश के मालिक भी हैं!

अनिल जैन

Anil Jain : मध्य प्रदेश यानी ‘व्यापमं प्रदेश’ की सरकार ने पत्रकारों के नाम पर करीब तीन सौ लोगों को भोपाल में अत्यंत सस्ती दरों पर आवासीय भूखंड आबंटित किए है। सार्वजनिक हुई लाभार्थियों की सूची में सुपात्र भी हैं और वे कुपात्र भी जो बेशर्मी के साथ पत्रकारिता के नाम पर सत्ता की दलाली में लगे हुए हैं। बहरहाल, यह खबर कतई चौंकाती नहीं है बल्कि इस बात की तसदीक करती है मध्य प्रदेश में सत्ता और पत्रकारिता का आपराधिक गठजोड न सिर्फ कायम है बल्कि निरंतर फल-फूल रहा है।

जिन लोगों ने ये भूखंड प्राप्त किए हैं उनमें नवभारत के मालिक सुमित माहेश्वरी, दैनिक जागरण के मालिक राजीव मोहन गुप्त, दैनिक नईदुनिया के मालिक त्रय राजेंद्र तिवारी, सुरेंद्र तिवारी, विश्वास तिवारी और दैनिक स्वदेश के मालिक राजेंद्र शर्मा के साथ ही कुछ अन्य अखबार मालिक तथा उमेश त्रिवेदी, श्रवण गर्ग, अरुण पटेल, अभिलाष खांडेकर और इसी तरह के कुछ अन्य लोगों के नाम भी शामिल हैं जो पत्रकारिता से ज्यादा दूसरे कामों के लिए जाने-पहचाने जाते हैं। (हालांकि प्राप्त सूचना के मुताबिक अभिलाष खांडेकर और कुछ अन्य लोगों का दावा है कि वे न तो संबंधित गृह निर्माण समिति के सदस्य हैं और न ही उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से कोई भूखंड प्राप्त किया है। फिलहाल इस सूचना पर भरोसा करते हुए उन्हें इस चर्चा से अलग रखा जा रहा है)।

बहरहाल ये कुछ नाम, दलाली से सनी मध्य प्रदेश की अखबारी मंडी और पत्रकारिता के प्रतिनिधि चेहरे हैं, जो भ्रष्ट राजनेताओं और नाकाबिल नौकरशाहों के इर्द-गिर्द अपनी कलम के काले अक्षरों से अक्सर चंवर डुलाते रहते हैं। हालांकि इस जमात में कुछ ऐसे भी हैं जो पढने-लिखने के मामले में अत्यंत प्रतिभाविहीन हैं लेकिन दलाली के काम में इतने प्रतिभाशाली हैं कि कुछ बडे अखबारों ने उनकी इसी काबिलियत का कायल होकर उन्हें अपने यहां ऊंचे पदनाम और मोटी तनख्वाह पर रखा हुआ है।

वैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकारों के नाम पर इन दलालों को उपकृत कर कोई नया काम नहीं किया है। दरअसल अपने भ्रष्ट कारनामों पर परदा डालने के लिए जमीन के टुकडों और सरकारी मकानों से अखबार मालिकों और पत्रकारों का ईमान खरीदने के खेल की शुरुआत अस्सी के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने की थी। यही नहीं, उन्होंने तो मध्य प्रदेश में फर्जी पत्रकारों की एक नई जमात ही पैदा कर उसे सत्ता की दलाली में लगा दिया था। उस दौर में अर्जुनसिंह के दरबार में मुजरा करने वाली बेगैरत पत्रकारों की इस जमात ने अर्जुनसिंह को ‘संवेदनशील मुख्यमंत्री’ का खिताब अता किया था। इस ‘संवेदनशील मुख्यमंत्री’ ने अपनी ‘संवेदना’ के छींटे सिर्फ मध्य प्रदेश के पत्रकारों पर ही नहीं, बल्कि दिल्ली में रहकर सत्ता की दलाली करने वाले कुछ दोयम दर्जे के साहित्यकारों और पत्रकारों पर भी डाले थे और उन्हें इंदौर व भोपाल जैसे शहरों में जमीन के टुकडे आबंटित किए थे।

अपने राजनीतिक हरम की इन्हीं बांदियों की मदद से अर्जुनसिंह चुरहट लाटरी और आसवनी कांड जैसे कुख्यात कारनामों को दफनाने में कामयाब रहे थे। इतना ही नहीं, दस हजार से ज्यादा लोगों का हत्यारा भोपाल गैस कांड भी अर्जुनसिंह का बाल बांका नहीं कर पाया था। अर्जुनसिंह अपने इन कृपापात्रों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों की छवि मलिन करने और उन्हें ठिकाने लगाने में भी किया करते थे।

अर्जुनसिंह के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए शिवराज सिंह भी अखबार वालों को साधकर ‘व्यापमं’ जैसे खूंखार कांड तथा ऐसे ही कई अन्य मामलों को दफनाने में लगभग कामयाब रहे हैं। उनके द्वारा उपकृत किए गए पत्रकारों की सूची में कुछ नाम तो ऐसे भी हैं, जो निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज के परोक्ष-अपरोक्ष रुप से संचालक हैं और इस नाते खुद भी ‘व्यापमं’ में भागीदार रहे हैं। कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनका भूमि से अनुराग बहुत पुराना है। उन्होंने अपने इसी भूमि-प्रेम के चलते पिछले तीन-साढे तीन दशक के दौरान अपवाद स्वरुप एक-दो को छोडकर लगभग सभी मुख्यमंत्रियों से सरकारी मकान और जमीन के टुकडे ही नहीं बल्कि दूसरी तरह की और भी कई इनायतें हासिल की हैं।

अब चूंकि मीडिया संस्थानों में कारपोरेट संस्कृति के प्रवेश के बाद अहंकारी, मूर्ख, नाकारा, क्रूर और परपीडक संपादकों और संपादकनुमा दूसरे चापलूस कारकूनों के साथ किसी भी काबिल, ईमानदार और पेशेवर व्यक्ति का खुद्दारी के साथ काम करना आसान नहीं रह गया है, यानी नौकरी पर अनिश्चितता की तलवार हमेशा लटकी रहती है। लिहाजा मीडिया संस्थानों में साधारण वेतन पर ईमानदारी और प्रतिबध्दता के साथ काम रहे पत्रकारों को सरकार अगर रियायती दरों पर भूखंड देती है तो इस पर शायद ही किसी को ऐतराज होगा। होना भी नहीं चाहिए, लेकिन इन्हीं मीडिया संस्थानों में दो से तीन लाख तक की तनख्वाह पाने वालों, धंधेबाजों और प्रबंधन के आदेश पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहने वालों को सरकार से औने-पौने दामों पर भूखंड क्यों मिलना चाहिए?

मैं कुछ ऐसे भू-संपदा प्रेमी पत्रकारों को जानता हूं जिन्होंने अपने करिअर के दौरान मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में, जिस-जिस शहर में काम किया वहां-वहां पत्रकारिता से इतर अपनी दीगर प्रतिभा के दम पर अचल संपत्ति अर्जित की है और मध्य प्रदेश सरकार से भी लाखों की जमीन कौडियों के मोल लेने में कोई संकोच नहीं दिखाया है। ऐसे ‘महानुभाव’ जब किसी राजनीतिक व्यक्ति के घपले-घोटाले पर कुछ लिखते हुए या सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच से नैतिकता और ईमानदारी की बात करते दिखते हैं तो सिर्फ और सिर्फ उस आसाराम बापू का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है जो इन दिनों जेल में रहते हुए भी ईश्वर से अपना साक्षात्कार होने का पाखंड भरा दावा करता है।

हालांकि पत्रकारिता के इस पतन को सिर्फ मध्य प्रदेश के संदर्भ में ही नहीं देखा जाना चाहिए, यह अखिल भारतीय परिघटना है। नवउदारीकरण यानी बाजारवादी अर्थव्यवस्था ने हमारे सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर प्रतिकूल असर डाला है। पत्रकारिता भी उनमें से ऐसा ही एक क्षेत्र है। इसलिए ऐसी पतनशील प्रवृत्तियों को विकसित होते देखने के लिए हम अभिशप्त है। लेकिन इस अभिशाप के बावजूद पत्रकारिता अब भी एक संभावना है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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मध्य प्रदेश सरकार ने छल वेबसाइटों को 4 साल में दिए 14 करोड़ के सरकारी विज्ञापन, इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित की रिपोर्ट

वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव की रिपोर्ट में खुलासा, पत्रकारों और उनके रिश्तेदारों की ओर से संचालित की जा रही हैं वेबसाइट, 10 हजार रूपए से लेकर 21 लाख 70 हजार रुपए तक विज्ञापन दिए गए, कांग्रेसी विधायक बाला बच्चन ने विधानसभा में उठाया था सवाल

-दीपक खोखर-

भोपाल, 10 मई। मध्य प्रदेश में 4 साल के दौरान 244 छल वेबसाइटों को 14 करोड़ रूपए के सरकारी विज्ञापन दिए गए। इनमें से ज्यादातर वेबसाइट पत्रकारों और उनके रिश्तेदारों की ओर से संचालित की जा रही हैं। इन वेबसाइट को वर्ष 2012 से वर्ष 2015 के बीच 10 हजार रूपए से लेकर 21 लाख 70 हजार रूपए के विज्ञापन दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में सोमवार 9 मई के अंक में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव की रिपोर्ट में यह तमाम खुलासे हुए हैं। दरअसल कांग्रेस विधायक बाला बच्चन ने विधानसभा में सवाल उठाया था। जिसके बाद उन्हें दिए गए जवाब में तमाम जानकारी हासिल हुई।

इंडियन एक्सप्रेस हमेशा ही अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए अलग पहचान रखता है और इस रिपोर्ट में भी इस प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने बेहतरीन पत्रकारिता का नमूना पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश सरकार की ओर से 26 वेबसाइट को 10 लाख रूपए से ज्यादा के विज्ञापन जारी किए गए। जिनमें से 18 वेबसाइट पत्रकारों के रिश्तेदारों द्वारा संचालित की जा रही हैं। 81 वेबसाइट को 5 से 10 लाख रूपए के विज्ञापन दिए गए। 33 वेबसाइट तो ऐसी हैं जो मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भोपाल में आवंटित भवन से संचालित हो रही हैं। एक बात और जिस वेबसाइट को सबसे ज्यादा 21 लाख 70 हजार रूपए मिले हैं, वह अश्वनी राय के नाम से हैं, जो भाजपा के एक पदाधिकारी के कार्यालय में काम करते हैं। राय स्पष्टीकरण देते हैं कि वे भाजपा के लिए काम करते हैं, लेकिन वेबसाइट से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

वेबसाइट अलग-अलग नाम से, सामग्री एक समान

यहीं नहीं खास बात यह है कि कई वेबसाइट अलग-अलग नाम से हैं, लेकिन उन सबमें सामग्री एक ही है। ज्यादातर वेबसाइट ने तो अपने बारे में कोई जानकारी भी नहीं दी है। इस बारे में पूछे जाने पर मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग के आयुक्त अनुपम राजन कहते हैं यह न्यू मीडिया है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इन्हें कौन संचालित कर रहा है। हालांकि साथ ही वे कहते हैं कि अपनी विज्ञापन पॉलिसी में बदलाव कर रहे हैं और यह देखा जा रहा है कि वेबसाइट चल रही है या नहीं। उधर, विधायक बाला बच्चन का सीधे तौर पर आरोप है कि भाजपा से जुड़े लोगों को ही फायदा पहुंचाया गया, जबकि वास्तविक पत्रकार की वेबसाइट को ही विज्ञापन मिलने चाहिए।

विस्तृत जानकारी के लिए इंडियन एक्सप्रेस की मूल खबर की कटिंग उपर अपलोड किया गया है. इसी मुद्दे पर इंडियन एक्सप्रेस ने एक अन्य खबर भी प्रकाशित की है जो नीचे है. पढ़ने के लिए नीचे की न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें ताकि अक्षर साफ साफ पढ़ने में आ सकें.

दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क- 09991680040

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मध्य प्रदेश में सौ करोड़ रुपये का TV चैनल विज्ञापन घोटाला

जीरो TRP वाले चैनल्स पर मेहरबान शिवराज सरकार

भोपाल : मध्य प्रदेश में इन दिनों बड़ा चैनल घोटाला चर्चा में है जिसकी अंतर्कथा व्यापम से जोड़कर देखी जा रही है। खबर यह है की वर्ष 2012 से उन  चैनलस पर मेहरबानी की जो अधिकांश जीरो टीआरपी पर हैं या बंद पड़ी हैं जबकि बड़ी चैनल्स अपने प्राइम टाइम के समाचारों के विज्ञापन के लिए  तरस रहीं हैं यहाँ तक की प्रधानमंत्री मोदी की पसंद दूरदर्शन को छ अंकों की राशि में भी शामिल नहीं किया गया है, कुल १०० करोड़ के इस घोटाले में उन चैनल मालिकों की पौ बारह हो गयी है जो या तो जेल में बंद हैं या उन पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं.

दरअसल मध्य प्रदेश विधानसभा में ८ दिसम्बर २०१५ को कांग्रेस के विधायक बालबच्चन  ने ताराकित प्रश्न क्रमांक २८८ के माध्यम से सरकार से यह जानकारी मांगी तब से मध्यप्रदेश के राजनैतिक और प्रशासनिक हलकों में मीडिया मैनेजमेंट और चैनल घोटाले के चर्चों को पर लग गए हैं मध्यप्रेश शासन के जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख सचिव एस के मिश्रा ने आज मंत्रालय  में इस घोटाले की जाँच के आदेश दिए हैं दूसरी और कांग्रेस इस मुद्दे को व्यापम से जोड़कर भुनाने चाहती है. कांग्रेस के नेताओं ने इसे मीडिया मैनजमेंट में जनधन लुटाने का आरोप लगते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को खरीदने का सीधा सीधा आरोप सरकार पर लगाया है.

प्रदेश के सहारा समय को १२ करोड पचास लाख रुपये की राशि दी गयी है वहीँ ई टीवी मध्यप्रदेश को १३ करोड़ और ई टी वी उर्दू को लगभग १ करोड़ की राशि दी गए है, मध्यप्रदेश के स्थानीय चैनल बंसल न्यूज़ को ११ करोड़ ५७ लाख, साधना न्यूज़ मध्यप्रदेश को ८ करोड ७८ लाख रुपये की राशि विज्ञापनों के नाम पर बाँट दी गयी है. जबकि देश के प्रधानमंत्री की सर्वाधिक पसंद और शासकीय समाचारों की अधिकृत चैनल दूरदर्शन को  मात्र ८ लाख में संतोष करना पड़ा है।

लोकल चैनल आपरेटर हथवे इंदौर को ५० लाख, सुदर्शन न्यूज़ को १४ लाख, सिटी केबल को ८४ लाख , टाइम्स नाउ को १ करोड़ ३९ लाख, एबीपी न्यूज़ को १२ करोड ७६ लाख, ज़ी मीडिया को ६ करोड़ १० लाख, सी एन बी सी आवाज को ६ करोड़ ५० लाख, इंडिया न्यूज़ को ८ करोड ६८ लाख , एन डी टी वी को १२ लाख ८४ हजार, न्यूज़ वर्ल्ड को १ करोड २८ लाख रुपय , भास्कर मल्टिनेट के मालिक सुधीर अग्रवाल को ६ लाख ९५ हजार , सेंट्रल इंडिया डिजिटल नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड को १ करोड़ ४१ लाख की राशि लुटाए गयी है.

अपराधिक छवि वाले संचालकों पर कृपा

सरकार का जनसम्पर्क महकमा मध्यप्रदेश की जनता का पैसा लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है, जिन चैनल्स को विज्ञापनों के नाम पर करोड़ों रुपये दिए गए हैं उनमें से अधिकांश चैनल के मालिक जेलों में बंद हैं या उनके विरुद्ध वारंट निकले हुए हैं मसलन पी ७ के संचालक केसर सिंह पर आर्थिक अपराध के कई मामले चल रहे हैं उनकी बंद पड़ी चैनल को सरकारी खजाने से ७६ लाख रुपये की राशि दी गई हैं.

चिटफंड कंपनी साईं प्रसाद मीडिया लिमिटेड के चैनल को २३ करोड़ ३३ लाख रुपये दिए गए हैं जिसमें कंपनी ने दो बार कंपनी और चैनल का नाम बदला, सूत्र बताते हैं  की चैनल के मालिक भापकर मुंबई जेल में बंद हैं।  खबर भारती, भारत समाचार और स्टेट न्यूज़ को क्रमश ९ करोड़, ४५ लाख और १ करोड़ से नवाजा गया है जबकि जो चैनल गर्भ में ही हैं दबंग डी लाइव को १ लाख अग्रिम रूप से दे दिए गए हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती प्रोडक्शन हाउस निकिता फिल्म्स को चैनल की आड़ में ६१ लाख रुपये की रेवाड़ी बांटी  गयी है।  कई नेशनल चैनल्स के स्टेट ब्यूरो भी इस घोटाले की आड़ में भरी भरकम राशि ले कर उपकृत हुए हैं, इस घोटाले की सूची बहुत लम्बी है किन्तु स्थानाभाव के कारन चुनिंदा नाम ही यहाँ दिए गए हैं। 

कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा ने पूरे मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा है कि “देश की आजादी में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानि मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी लेकिन लोकतंत्र के मूल्यों को भभ्रष्टाचार से बचाने  का प्रतिबिम्ब मीडिया भी शिवराज सिंह चौहान के बदनाम चेहरे को बचाने  में इस्तेमाल हो गया है.  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पहले डम्पर कांड फिर व्यापम घोटाल के कलंक को धोने के लिए लोकतंत्र के महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ की प्रतिमा और प्रतिभा को खंडित करने का दुस्साहसास सरकारी खजाने से धन लूटा कर किया है.”

मध्यप्रदेश शासन के जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख सचिव एस  के मिश्रा ने राज्य में हुए चैनल घोटाले के उजागर होने का बाद अब जाकर संपूर्ण मामले की जाँच करवाने के आदेश दिए हैं। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश की राजनीती में एक बार फिर व्यापम घोटाले को मैनेज करने के लिए चैनल घोटाला सुर्खियां बटोर रहा है ऐसे में सरकार की छवि बनाने वाले विभाग जनसम्पर्क और राज्य के मुखिया मुख्यमंत्री की परेशानी बढ़ गई है।

(साभार- खरी न्यूज)

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विज्ञापन घोटाला : क्या सिर्फ वेबसाईट संचालक ही घोटालेबाज हैं, दूसरी तरफ नजर टेढ़ी क्यों नहीं?

मध्यप्रदेश में मचे विज्ञापन घोटाले के हंगामे के बीच निशाने पर सिर्फ और सिर्फ वेब मीडिया यानी समाचार वेबसाईट्स हैं। वेबसाईट्स को दिये गये विज्ञापनों को लेकर एक हद तक काफी चीजें सही भी हैं जो बताती हैं कि गड़बड़ तो हुई है लेकिन सवाल ये है कि क्या गड़बड़ सिर्फ वेबसाईट्स को लेकर ही है? सुना है किसी मीडिया सन्घ के पदाधिकारी द्वारा कोर्ट में विज्ञापन घोटाले को लेकर सीबीआई जांच की मांग की गई है इस पूरे मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि एकतरफा खेल खेला जा रहा है हर तरफ सिर्फ वेबसाइट्स की चर्चा है। जताया ऐसा जा रहा है कि सबसे बड़े घोटालेबाज सिर्फ और वेबसाईट संचालक पत्रकार ही हैं। वेबसाईट संचालक पत्रकारों पर सबकी टेढ़ी नजर है मगर क्यों?

जारी की गई सूची को या तो कोई पूरा देख नहीं रहा या देखना नहीं चाहता। अगर वेबसाइटों की ही बात करें तो असली फर्जीवाड़े पर बात हो ही नहीं रही लोग सिर्फ इस बात पर पगलाये हुये हैं कि उसे इतना मिला, इसे इतना मिला। लगातार यह बात कही जा रही है कि बन्द वेबसाइटों को भी विज्ञापन जारी हुए। इस पूरी सूची में जो तमाम तरह की सोसायटीज हैं उनकी कोई बात नहीं कर रहा सवाल इस पर भी उठने चाहिए कि 257 वेबसाइट्स को 12 करोड़ और एक-एक चेनल को 11-12 करोड़?

सवाल यह भी उठे कि मांगे जाने पर चाहे जिसने भी जानकारी मांगी हो तमाम तरह के चार पन्नों के अखबार, पत्र—पत्रिकाओं को क्यों बख्श दिया गया? बाला बच्चन ने भी यह सवाल क्यों नहीं उठाया? यहां बता दूं कि मुझे शुरू से ही सूची देखने में रुचि नहीें थी मगर बार—बार कुछ ऐसी बातें की गईं जिससे मैंने रुचि ली और सबसे बड़ी बात जिन पत्रकारों को सबसे ज्यादा सूची देखने की खुजली मची हुई थी अब सारे एपीसोड में खामोशी अख्तियार किए हुये हैं।

मैं किसी गलत के साथ नहीं हूँ चाहे वेबसाईट्स हों या कोई और मगर मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है कि सवाल वेबसाइट्स पर ही क्यों? बेशक सबकुछ ठीक नहीं है मगर बहुत कुछ छुपा हुआ ऐसा भी है जो बताता है कि बहुत ज्यादा बहुत कुछ ठीक नहीं है। सुना है कुछ वेबसाइट चला रहे पत्रकारों को संस्थानों ने नौकरी से हटा दिया है अगर उक्त बातें साफ हों तो कितने लोग कमा खा पायेंगे? जो बाकी लोग दूध के धुले बनकर न्यूज वेबसाइट वालों को टेढ़ी नजर से देख रहे हैं अगर उनके प्रकाशनों को मिले विज्ञापनों का ब्यौरा बाहर आ जाए तो…?

बता दूं कि मुझे किसी ने उकसाया नहीं है न ही मैं किसी का टूल बन रही हूं मगर ये वो सवाल हैं जो हर वेबसाईट संचालक को पूछने चाहिए? पर उससे पहले मेरा सवाल क्यों छुपाया गया कि वेबसाईट भी चलाई जा रही हैं? क्यों एक सीधे रास्ते को चोर रास्ता बना दिया गया? क्यों एक लाईन से सब घोटालेबाजों में शामिल कर दिये गये? इस पूरे खेल में गलती चाहे जिसकी भी हो पिसेंगे छोटे ही। खबरनेशन और बाला बच्चन से मेरा यह सवाल तब तक जारी रहेगा जब तक यह स्पष्ट नहीं कर दिया जाता कि असली घोटालेबाज कौन और विशुद्ध पत्रकार कौन? या सिर्फ थोड़ी देर की पब्लिसिटी और वाहवाही पाने के लिये यह किया गया? खबरनेशन बताये ​क्या उसने पत्रकारिता के सारे मापदंड पूरे किये? क्यों नहीं सारी बातें स्पष्ट की गईं? बसाईट्स को लेकर सवाल हर बार उठते हैं मगर जवाब क्यों नहीं दिये गये? यहां बता दूं कि मुझे किसी ने उकसाया नहीं है लेकिन ये बातें भी तो साफ हों? कहीं ऐसा न हो कि पत्रकार एक दूसरे की टांग—खिचाई में घर फूंक तमाशा देखते रहें। एक साथ दो काम करना गुनाह तो नहीं है?

लेखिका ममता यादव मल्हार मीडिया वेब न्यूज पोर्टल की संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क 7566376866 या 9826042868 के जरिए किया जा सकता है.

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एमपी पुलिस का शर्मनाक चेहरा : तीन पत्रकारों से इस कदर बदतमीज़ी और बेइज़्ज़ती…

सिवनी (मध्य प्रदेश) : नया साल इस तरह से पुलिस के नये चेहरे को लेकर आयेगा इसका भान सपने में भी नहीं था। पुलिस के द्वारा 31 दिसंबर और 01 जनवरी की दर्म्यानी रात में दो जिम्मेदार संपादकों के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया है उसको पाठकों के समक्ष रखा जा रहा है अब पाठक ही फैसला करें और अपना निर्णय दें।

0 वर्ष 2015 की आखिरी रात में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक लिमटी खरे, दैनिक हिन्द गजट के संपादक शरद खरे एवं एक अन्य कर्मचारी सादिक खान रोज़ की तरह ही लगभग साढ़े ग्यारह पौने बारह बजे सिवनी जिला मुख्यालय में सर्किट हाउस चौराहे के बारापत्थर स्थित अपने कार्यालय से घर को रवाना हुये।

0 सर्किट हाउस चौराहे पर खाकी वर्दी वाले सिपाहियों के द्वारा दोनों के दो पहिया वाहनों को रोका गया। इसके बाद यातायात प्रभारी जगोतनी मसराम के द्वारा दोनों को नये साल की बधाईयां दी गयीं। इसी बीच नगर पुलिस अधीक्षक राजेश तिवारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने भी बाकायदा गर्मजोशी के साथ नये साल की बधाईयां लीं और दीं। राजेश तिवारी के द्वारा पूछा गया कि क्या हो गया कैसे रूके हैं? इसके जवाब में हमने बताया कि पुलिस ने गाड़ी रोकी है, रूटीन चैकिंग है, अभी कागज़ वगैरह दिखाकर चले जायेंगे।

0 राजेश तिवारी के द्वारा मौके पर तैनात पुलिस को निर्देश दिये जाते हैं। इसके बाद हमने राजेश तिवारी को बताया कि ये वे ही अधिकारी (रघुराज चौधरी) हैं जिन्होंने 25 दिसंबर को भी हमारी गाड़ी रोककर जमकर हुज़्ज़त की थी। पांच सौ रूपये का चालान काटा जा रहा था। हमने पांच सौ दिये पर चालान नहीं काटा गया। हमने बताया कि उस दिन भी इनके (रघुराज चौधरी) के द्वारा बदतमीज़ी की गयी थी।

0 इसी बीच दैनिक हिन्द गजट के संपादक शरद खरे ने सीएसपी का ध्यान आकर्षित कराया कि रघुराज चौधरी इस समय भी लोगों से बदतमीज़ी से बात कर रहे हैं। इस पर सीएसपी ने पूछा कि आप कौन हैं। हमने बताया कि ये दैनिक हिन्द गजट के संपादक हैं। फिर क्या था, अमूमन शांत चित्त और धीर गंभीर रहने वाले सीएसपी राजेश तिवारी हत्थे से उखड़ गये और उन्होंने यातायात प्रभारी को निर्देश दिये कि इन दोनों (जबकि मौके पर हम तीन लोग थे) का मुलाहजा कराओ।

0 सर्किट हाउस चौराहे पर सीएसपी राजेश तिवारी इस कदर चीख रहे थे मानो वे आम जुआरी, सटोरिये या जरायमपेशा व्यक्ति से बात कर रहे हों। इसके बाद शातिर बदमाशों की तरह पुलिस ने दोनों संपादकों को यातायात पुलिस के वाहन में बैठाया और लेकर कोतवाली चले गये। कोतवाली में दोनों जिम्मेदार संपादकों को इस तरह बैठाया गया मानो वे शातिर चोर या अपराधी हों।

0 इसके बाद सीएसपी कोतवाली पहुंचे और उन्होंने यातायात प्रभारी को फिर डांट पिलायी कि दोनों के साथ क्या बातें कर रहीं हैं। जाकर मुलाहजा करवाओ और अगर कोई बात हो तो धारा 353 का मामला कायम कर दो। दोनों संपादक पुलिस के इस बर्ताव से बेहद आश्चर्य में थे।

0 जब दोनों को लेकर पुलिस अस्पताल पहुंची तब वहां मौजूद चिकित्सक के द्वारा मुलाहज़ा फार्म पढ़ा ही जा रहा था कि अचानक ही एक सिपाही प्रकट हुए और उन्होंने चिकित्सक को मोबाईल देते हुये कहा कि टीआई साहब से बात कर लें। चिकित्सक ने नगर कोतवाल से बात की और बिना किसी परीक्षण के ही मुलाहज़ा फार्म भर दिया गया। दोनों संपादकों के द्वारा बार बार आग्रह किया जाता रहा कि उनका रक्त परीक्षण कराया जाये ताकि पता लग सके कि हकीकत क्या है? इसके जवाब में चिकित्सक ने कहा कि साहब से बात हो गई है, हमारे यहां रक्त परीक्षण नहीं होता है। चिकित्सक के द्वारा महज़ दो लाईन में लिख दिया गया कि कंज्यूम्ड अल्कोहल बट नॉट एंटॉक्सीकेटेड अर्थात अल्कोहल का सेवन किया है पर नशे में नहीं हैं।

0 इसके बाद दोनों को फिर शातिर बदमाशों की तरह यातायात पुलिस के वाहन में कोतवाली ले जाया गया। कोतवाली में पुलिस अधीक्षक के सामने चर्चा हुयी। सुलझी सोच के धनी पुलिस अधीक्षक ए.के. पाण्डेय के द्वारा मामले की जानकारी ली गयी। उन्होंने 25 दिसंबर और 31 दिसंबर के वीडियो फुटेज़ मांगे। इसके बाद रात लगभग ढाई बजे दोनों को बिना किसी अपराध की कायमी के छोड़ दिया गया।

0 इस पूरे मामले को क्या माना जाये। इस तरह की हरकतों से सुलझी सोच के धनी शांत चित्त सीएसपी राजेश तिवारी आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं?

0 समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के कैमरापर्सन का कैमरा पांच अक्टूबर को छुड़ा लिया गया था। इसकी शिकायत पुलिस में दर्ज़ है। रात डेढ़ बजे कैमरा पर्सन को एसडीओपी के द्वारा थाने बुलाया जाता है, हम भी साथ जाते हैं। रात को जबरन ही परेशान किया जाता है। इसके बाद सीएसपी राजेश तिवारी ने हमें फोन कर बताया कि कैमरा मिल गया है और कैमरा पर्सन को वापस कर दिया गया है, जब तहकीकात हुयी तो बात गलत निकली।

0 इसके बाद दैनिक हिन्द गजट कार्यालय पर 14 फरवरी को बम पटकने के आरोपी हिन्द गजट आते हैं, वाद विवाद करते हैं। इसकी सूचना नगर कोतवाल को दी जाती है। रात एक बजे फिर शांत चित्त एसडीओपी राजेश तिवारी का फोन आता है। उन्हें कहा जाता है कि हम नींद में हैं। हमने इसकी सूचना आई.जी. जबलपुर को उसी समय दी कि हमें जबरन ही देर रात फोन करके परेशान किया जाता है।

0 हमने 33 साल के पत्रकारिता जीवन में नई दिल्ली, रायपुर, भोपाल, रीवा, जबलपुर, नागपुर आदि अनेक प्रदेशों के ख्यातिलब्ध अखबारों में काम किया है। इस दौरान जिन भी जिलों में रहे हैं वहां की पुलिस थानों के रिकॉर्ड से इस बात को तस्दीक किया जा सकता है कि हमारा चाल चलन कैसा है? क्या हम आदतन आपराधिक प्रवृत्ति के हैं? क्या हम सरकारी काम में बाधा डालने के आदी हैं?

0 यह है पूरा घटनाक्रम, आप पाठक ही फैसला करें कि सिवनी में अमन चैन कायम है या फिर कुछ और। अगर आपको लगता है कि पुलिस की कार्यवाही सही है तो आपका फैसला सिर आँखों पर।

लेखक लिमटी खरे वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क limtykhare@gmail.com या फिर 9425011234 के जरिए किया जा सकता है.

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मध्य प्रदेश विज्ञापन घोटाले के बहाने उघड़ती असलियत को कोई दिन के उजाले में भी नहीं देखना चाहता

एक घोटाला मध्यप्रदेश का जिसे विज्ञापन घोटाला कहा जा रहा है। बहरहाल इस घोटाले के बहाने कई और भी परतें उधड़ रही हैं और कुछ असलियतें सामने आ रही हैं जिनकी तरफ कोई दिन के उजाले में भी देखने को तैयार नहीं है।  इस मामले की लिखी गई खबर में वेबसाईटस की संख्या लिखी 235 जबकि सूची में वेबसाईटस हैं 259 । गिनती फिर से करिये। दे कॉपी पेस्ट दे कॉपी पेस्ट किये जा रहे हैं। सूची के अनुसार जितना पूरी वेबसाई्टस को विज्ञापन को नहीं दिये गये उससे कहीं ज्यादा तो सिर्फ एक चैनल को पकड़ा दिये गये। बाजी मार गईं तमाम तरह की सोसयटीज और क्षेत्रीय प्रचार कंपनियां इनमें कई करोड़पतिये हैं।

कुछ ऐसे भी महारथी हैं जो नौकरियां भी कर रहे हैं वेबसाईट्स भी चला रहे हैं और सोसायटीज में भी कमा ले गये। जमीनों और सरकारी बंगलों की सूची की तो अभी बात ही नहीं हो रही, जिसमें सोसयटीज बनाकर लाखों की जमीन औने—पौने दामों में दे दी गई। और भी दिलचस्प बात ये कि कई रिटायर्ड जनसंपर्क अधिकारी पत्रकार बनकर इन सोसायटीज में तो घुसपैठ कर ही गये वेबसाईट्स बनाकर पत्रकार भी बन गये। यही रिटायर्ड अधिकारीगण पत्रकारों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते घूम रहे हैं पत्रकारों को चार वेबसाईट नहीं चलानी चाहिये।

क्यों साहब आप जनसंपर्क अधिकारी रहते तबादलों से कमाई कर सकते हैं,सरकारी बंगलों में रह सकते हैं और कहीं से सूंघ लिया तो पत्रकार बनकर जमीन पर भी कब्जा कर सकते हैं और पत्रकार के असली काम पर ही सवाल? कमाल की नैतिकता है। वेबसाईट्स को लेकर सरकारों की नीति में भी विरोधाभास है। सरकार को वेबसाईट्स को विज्ञापन देने से गुरेज नहीं है मगर जनसंपर्क की संवाददाता सूची में वेबसाइट पत्रकारों का नाम शामिल करने से परहेज है। और भी कई नियम हैं जो प्रिंट—इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिये तो हैं मगर वेबमीडिया के लिये नहीं। बीमारी के नाम पर खैरात ऐसी बंटती है कि भिखारी भी शरमा जायें मगर वेबसाईट्स को विज्ञापन देने में ही लोहे के चने चबवा दिये जाते हैं। सबसे बड़ा खेल स्मारिकाओं में फोटोकॉपी करो कवर बदलो और लो विज्ञापन।

ई—गर्वनेंस में सफलता के आयामों की तरफ बढ़ती सरकारों को समाचार वेबसाइट्स के बारे में फिर से नीति बनाने की जरूरत है। सूत्रों के अनुसार अभी—भी जो घोटाला सामने आया है उसमें भी कई खास तथ्यों की तरफ ध्यान देने के बजाय नीति यह बनाई जा रही है कि हिट्स से विज्ञापन तय होंगे तो नया क्या है पहले भी यही था। उनका तो फिर भी कुछ नहीं बिगड़ना जो अंगद के पैरों की तरह जमे हुये हैं।   

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दो गुना बढ़ गया था पत्रकार अक्षय का दिल!

व्यापमं घोटाले की रिपोर्टिंग के दौरान आकस्मिक मौत का शिकार बने दिल्ली के पत्रकार अक्षय सिंह की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सीबीआई को मिली पीएम रिपोर्ट में अक्षय के दिल का आकार सामान्य से दो गुना बताया गया है। सामान्य दिल का वजन 320 ग्राम होता है जबकि अक्षय का दिल 700 ग्राम पाया गया। हृदय के असामान्य आकार को लेकर विशेषज्ञ कोई कारण तो नहीं बता सके लेकिन मौत की वजह हृदयाघात बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल और विसरा में किसी प्रकार का जहर नहीं पाया गया है।

पत्रकार अक्षय सिंह की 4 जुलाई को झाबुआ के मेघनगर में संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी। पोस्टमार्टम दाहोद के अस्पताल में हुआ था। सीबीआई एसपी हरि सिंह ने पीएम रिपोर्ट में दिल के आकार के बढ़े होने की पुष्टि की है। इस सनसनीखेज मामले में अक्षय सिंह ने अंतिम समय में जिन लोगों से इंटरव्यू किए थे सीबीआई उन विजुअल्स की छानबीन में जुटी है। उस दौरान अक्षय के साथ रहे पत्रकार राहुल करैया से दो दिन पहले ही सीबीआई ने भोपाल में फिर से पूछताछ की थी।

राहुल ने सीबीआई को यह भी बताया कि उन्होंने अक्षय की तबीयत बिगड़ने की पहली सूचना डॉ. आनंद राय को दी थी। राहुल ने इस घटनाक्रम की 27 मिनट की वीडियो रिकॉर्डिंग भी सीबीआई को दिखाई। हृदय का आकार बढ़ने की असली वजह क्या है यह तो रिपोर्ट से ही पता चलेगा। या तो ब्लड प्रेशर बढ़ गया होगा अथवा उनके मसल्स मोटे रहे होंगे। लेकिन यह असामान्य मौत का कारण नहीं बनता।

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नेशनल हेराल्ड केस मे सोनिया-राहुल की बदनामी के बाद लगता नहीं शुरू हो पाएगा शिवराज के स्वप्नों का दैनिक अखबार

नेशनल हेराल्ड मामले मे सत्ता के शर्मनाक दुरुपयोग का खुलासा होने के बाद यह सवाल उठना लाज़मी है कि राजनैतिक पार्टियों द्वारा अपना अखबार, खासतौर पर दैनिक अखबार निकालने की क्या तुक है? मजबूरी में खरीदने वाले भी इन्हे रद्दी की टोकरी मे डालना पसंद करते हैं। वैसे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की दिली तमन्ना है कि एक दैनिक अखबार शुरू किया जाए जो पार्टी की विचारधारा और उनकी सरकार की उपलब्धियों को आमजन तक सीधे पहुंचाने का काम करे। इसका खुलासा उन्होने पिछले बरस पार्टी पदाधिकारियों को दिए गए रात्रिभोज मे किया था। इसके लिए उन्होने प्रमुख सहयोगी शिवसेना के मुखपत्र सामना का जिक्र भी किया था। मुख्यमंत्री का मानना है की प्रस्तावित दैनिक पार्टी के दस लाख कार्यकर्तायों तक पहुँच सकेगा। वैसे प्रदेश भाजपा का मासिक पत्र चरैवेति प्रकाशित होता है।

अपने अखबार के विचार के पीछे व्यापम मामले में मीडिया, खासतौर पर राष्ट्रीय अखबार और न्यूज़ चैनलों मे सरकार की बदनामी को प्रमुख कारण माना गया। अब नेशनल हेराल्ड के मामले में सोनिया और राहुल गांधी की फजीहत और अदालतबाजी के बाद संभावना कम ही है कि चौहान अखबार निकालने के अपने इरादे को मूर्त रूप दें। बिना सरकार की कृपा के दैनिक शुरू तो किया जा सकता है पर चलाया नहीं जा सकता। जाहिर है जब मुख्यमंत्री का अखबार शुरू होगा तो सरकार की कृपा बरसेगी ही और बदनामी भी होगी। भोपाल में अर्जुनसिंह द्वारा प्रेस कॉम्प्लेक्स की स्थापना ही इसलिए की गई थी क्योंकि सरकार हेराल्ड को कौड़ियों के भाव जमीन देना चाहती थी। यह खुलासा दमदार पत्रकारों में शुमार नरेंद्र कुमार सिंह ने नईदुनिया में छपे लेख में किया है।

लेख बताता है कि जमीन के लिए यशपाल कपूर कई बार भोपाल आए और एक लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से जमीन ले उड़े। जब इंडियन एक्सप्रेस ने नरेंद्रकुमार सिंह की रिपोर्ट पहले पेज पर छाप दी तो हँगामा मच गया, जिसे शांत करने के लिए अर्जुन सिंह ने सभी अखबारों को जमीन देने का निर्णय किया। फिर शुरू हुई मीडिया के नाम पर पात्रों के अलावा अपात्रों और कुपात्रों को जमकर प्लाटों की बंदरबाँट। इसके बाद जो हुआ और जो हो रहा है वह खुला खेल फर्रूखाबादी है और सब जिम्मेदारों की जानकारी में है।

उधर भोपाल की पचास करोड़ कीमत की जमीन यशपाल कपूर एंड कंपनी ने  2007 मे सिर्फ पौने दो करोड़ मे बेच दी । इसे बेचने के लिए भोपाल विकास प्राधिकरण से एनओसी भी नहीं ली गई।भोपाल के बाद कंपनी से जुड़ी जमीन का इंदौर मे हुआ सौदा भी सुर्खियों मे आ गया है। मालूम हो कि इंदौर मे आवंटित जमीन 17 साल पहले महज 27 लाख मे बेच दी गई थी। यहाँ आवंटित जमीन की जांच प्रवर्तन निदेशालय ने शुरू कर दी है। ऐसा नहीं है कि प्रेस के नाम पर हड़पी जमीन के दुरुपयोग मे हेराल्ड अकेला है। इंदौर मे ही चौथा संसार को दी गई जमीन का आवंटन इंदौर विकास प्राधिकरण मार्च, 2012 में ही निरस्त कर चुका है, पर अखबार का कब्जा बरकरार है.

भोपाल से श्रीप्रकाश दीक्षित का विश्लेषण.

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