सृजन घोटाले में नेताओं-अफसरों की गिरफ्तारी के लिए वारंट मांगने वाले सीबीआई अधिकारी पर गिरी गाज

नाम है एसके मलिक. सीबीआई में एएसपी हैं. ये बिहार के सृजन घोटाले की जांच करने वाली बीस सदस्यीय सीबीआई टीम के अगुवा हैं. सृजन घोटाला पंद्रह सौ करोड़ रुपये का है और इसमें नेता, अफसर, पत्रकार सब शामिल हैं. कहा जा रहा है कि यह घोटाला चारा घोटाले से भी बड़ा है. इस घाटाले की तह तक जा चुके सीबीआई आफिसर एसके मलिक ने पुख्ता प्रमाण जुटाने और पूछताछ के वास्ते जब सीबीआई कोर्ट से घोटाले में शामिल कुछ नेताओं व अफसरों की गिरफ्तारी के लिए वारंट मांगा तो फौरन उन पर कार्रवाई हो गई. उनका तबादला कर दिया गया.

उन्हें दिल्ली बुलाकर सीबीआई मुख्यालय से अटैच कर दिया गया. उनकी जगह सीबीआई अधिकारी एन. महतो को भेजा गया है. इस सृजन घोटाले में चार बड़े नेता सीबीआई के राडार पर हैं जिनमें से एक केंद्रीय मंत्री है. दूसरा बीजेपी का झारखंड से लोकसभा सदस्य है. तीसरा एक पूर्व भाजपा सांसद है. चौथा जनता दल यूनाइटेड का एक नेता है जो इस स्कैम में शामिल होने की चर्चा के बाद अब पार्टी से सस्पेंड किया जा चुका है. इसी तरह कुल पांच आईएएस अधिकारी इस घोटाले में शामिल हैं जिन पर सीबीआई की निगाह है. ये सारे आईएएस अफसर भागलपुर में जिला मजिस्ट्रेट रह चुके हैं. इनमें से एक ने वीआरएस लेकर 2014 का लोकसभा चुनाव जद यू के टिकट पर लड़ा और हार गया.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ताजमहल में टिकट बिक्री का घोटाला (देखें वीडियो)

दुनिया की नायाब और हसीन इमारतों में शुमार ताजमहल को देखने के लिए दुनिया भर के पर्यटक आते हैं और इसकी ख़ूबसूरती के क़ायल हो जाते हैं। लेकिन ताजमहल में जाने के लिए जो टिकट ली जाती है, वो प्रयोग की हुई होती है। इसी टिकट का काला सच एक वीडियो में सामने आया है। वीडियो में एक विदेशी पर्यटक को एक हज़ार रुपये वाले टिकट देने की बजाए चालीस रुपए वाला टिकट थमा दिया जाता है। इस वीडियो से पुरातत्व विभाग से लेकर ताजमहल से जुड़े कई विभागों में हड़कंप मच गया है।

ताज़महल में टिकट के इस खेल से सरकार को राजस्व का करोड़ो का चूना लगाया जा रहा है। ताजमहल के विदेशी टूरिस्ट को पश्चिमी गेट की विंडो से दी गई यूज की हुई टिकट। रोज़ होती है यूज की हुई टिकिटों से अवैध कमाई। केनरा बैंक के पास है ताज की टिकट का ठेका। वहीं पुरात्तव अधीक्षण भुवन विक्रम सिंह ने बताया कि वीडियो की जाँच पड़ताल की जा रही है। जो सच होगा, वह सामने आएगा। रीसेलिंग इज़ वेरी डिफिकल्ट। अगर 1000 का टिकट 40 में बेचेंगे तो ठीक नहीं है। यह कभी हो नहीं सकता है। लेकिन फिर भी इस वीडियो की सच्चाई की हम जांच करेंगे।

देखें वीडियो…

आगरा से फरहान खान की रिपोर्ट. संपर्क : 9411948123

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सहारा के पत्रकार रमेश अवस्थी और उनके बेटे सचिन अवस्थी ने किया पुरस्‍कार घोटाला!

बाप-बेटे ने नेशनल मीडिया क्‍लब नामक संगठन के माध्यम से पत्रकारिता दिवस के मौके पर योगी के नाम की आड़ लेकर उन लोगों को भी सम्मानित बता दिया जो सम्मान लेने गए ही नहीं…

लखनऊ में नेशनल मीडिया क्लब नाम की एक संस्‍था ने ऐन हिंदी पत्रकारिता दिवस के दिन उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के नाम का इस्‍तेमाल करते हुए कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों को बदनाम करने का काम किया है। इस संस्‍था ने 30 मई को एक ऐसा भयंकर पुरस्‍कार घोटाला किया है जिसमें 60 साल की उम्र पार कर चुके ऐसे पत्रकारों को पुरस्‍कार दिलवा दिया गया जिन्‍हें न तो अब तक पुरस्‍कार मिलने की ख़बर है, न ही वे वहां सशरीर मौजूद थे और जिन्‍होंने पुरस्‍कार की पेशकश पर अपनी सहमति तक नहीं दी थी।

सबसे ज्‍यादा आश्‍चर्य की बात यह है कि ‘मीडिया रत्‍न’ नाम का यह पुरस्‍कार विधानसभा अध्‍यक्ष हृदयनारायण दीक्षित और उपमुख्‍यमंत्री दिनेश शर्मा ने कुछ पत्रकारों को दिया जब मुख्‍यमंत्री कार्यक्रम से जा चुके थे, लेकिन कार्यक्रम में मुख्‍यमंत्री के मुख्‍य अतिथि होने के नाते इसके प्रचार और प्रेस रिलीज़ आदि में मुख्‍यमंत्री के नाम से पुरस्‍कार दिए जाने की बात कही गई। क्‍लब द्वारा जारी सूची में कुल 38 पत्रकारों का नाम शामिल है और क्‍लब का दावा है कि सभी वहां मौजूद थे, लेकिन छानबीन में पता चला है कि यह सरासर झूठ है।

जब इस बारे में नेशनल मीडिया क्‍लब के न्‍योते में दिए मोबाइल नंबर 8285002222 पर बात की गई तो पहले वहां से पुरस्‍कारों की पुष्टि करते हुए एक प्रेस रिलीज़ भेजी गई जिसमें 38 पत्रकारों के नाम शामिल थे। दूसरी बार फोन लगाकर जब यह पूछा गया कि क्‍या ये सभी पत्रकार वहां उपस्थित थे पुरस्‍कार लेने के लिए, तो क्‍लब के प्रतिनिधि ने इसका हां में जवाब दिया जो कि सरासर झूठ था। सच्‍चाई का पता चार पत्रकारों से सीधे और दूसरे माध्‍यमों से बात कर के चला। पुरस्‍कृत पत्रकारों की सूची में शामिल वरिष्‍ठ पत्रकार वीरेंद्र सेंगर, रामकृपाल सिंह, कमलेश त्रिपाठी और अनिल शुक्‍ला वहां न तो मौजूद थे, न ही इन्‍हें ख़बर थी कि इनके नाम पर कोई पुरस्‍कार दिया गया है।

नवभारत टाइम्‍स के पूर्व कार्यकारी संपादक रामकृपाल सिंह का कहना है- ”मुझे तो पता ही नहीं। मेरे पास दिनेश श्रीवास्‍तव का फोन आया था तो मैंने मना कर दिया था कि मैं उस दिन शहर में नहीं रहूंगा। मेरा पुरस्‍कार आदि से क्‍या लेना देना है।” मीडियाविजिल के आग्रह पर जब एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने वीरेंद्र सेंगर से योगी आदित्‍यनाथ के हाथों पुरस्‍कार लेने की बात पूछी, तो वे चौंकते हुए बोले, ”सवाल ही नहीं उठता।” अनिल शुक्‍ला भी कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे। उनके पास बेशक पुरस्‍कार से संबंधित एक चिट्ठी आई थी लेकिन उन्‍होंने उसका कोई जवाब ही नहीं दिया। सहमति ज़ाहिर करने की तो बात ही दूर की है।

नेशनल मीडिया क्‍लब को रमेश अवस्‍थी नाम के एक सज्‍जन चलाते हैं और कार्यक्रम के आयोजन व प्रचार में उनके बेटे सचिन अवस्‍थी का नाम बार-बार आया है। रमेश अवस्थी सहारा समूह में बड़े पद पर हैं। जब एक पत्रकार ने रमेश अवस्‍थी से मुख्‍यमंत्री के हाथों पुरस्‍कार दिए जाने की बाबत पूछा कि वहां तो तमाम पत्रकार गए ही नहीं थे जिनके नाम से उन्‍होंने विज्ञप्ति जारी की है, तो वे बचाव की मुद्रा में आ गए और उन्‍होंने माना कि कुछ गलती हो गई है। उन्‍होंने उसे तुरंत दुरुस्‍त करने की बात कही।

इसकी ख़बर हालांकि प्रेस रिलीज की मार्फत कुछ जगहों पर पहले ही छप चुकी है और यह बात प्रचारित कर दी गई है कि तमाम वरिष्‍ठ पत्रकारों ने योगी आदित्‍यनाथ के हाथों पुरस्‍कार ले लिया है। हकीकत यह है कि योगी उस कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि अवश्‍य थे, लेकिन पत्रकारों को पुरस्‍कारों की घोषणा होने से पहले वहां से निकल चुके थे। क्‍लब द्वारा जारी प्रेस रिलीज़ कहती है, ”​पत्रकारिता दिवस के अवसर पर मीडिया रत्न सम्मान के साथ स्वच्छता सम्मान देने के लिये नेशनल मीडिया क्लब की सराहना करते हुये सकारात्मक खबरों को प्रमुखता दिये जाने पर मुख्यमंत्री योगी ने जोर दिया।” प्रेस रिलीज़ में सम्‍मानित पत्रकारों की संख्‍या कुल 38 है।

फिलहाल तो केवल चार मामले पता चले हैं जो इस सूची को फर्जी साबित करते हैं और यह बात साफ़ हो जाती है कि पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारिता पुरस्‍कारों के नाम पर लखनऊ में भारी घोटाला हुआ है। मुख्‍यमंत्री के नाम की आड़ लेकर न केवल विश्‍वसनीय और वरिष्‍ठ पत्रकारों के साथ छल किया गया है, बल्कि पत्रकारिता के पेशे को भी कलंकित किया गया है।

अभिषेक श्रीवास्तव तेजतर्रार पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं. वे मीडिया विजिल डाट काम के प्रधान संपादक भी हैं.

मूल खबर…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वास्तु विहार घोटाला (5) : भाजपा सांसद मनोज तिवारी के अलावा शशिकांत चौधरी और विनय तिवारी पर भी गबन का मुकदमा

आज कई अखबारों और वेबसाइटों पर वास्तु विहार घोटाले को लेकर मुकदमा दर्ज किए जाने की खबर है. दरभंगा में भाजपा सांसद और दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के अलावा इस घोटाले में जिन दो अन्य लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी व गबन का मुकदमा दर्ज किया गया है, उनके नाम हैं- शशिकांत चौधरी (कार्यपालक निदेशक बिल्डर वास्तु बिहार मेसर्स दरभंगा) और विनय कुमार तिवारी उर्फ विजय कुमार तिवारी (महाप्रबंधक, वास्तु विहार बी2, ग्रेंड चंद्रा अपार्टमेंट, फ्रेजर रोड, पटना)। इनके विरुद्ध आपराधिक षडयंत्र, ठगी, धोखाधड़ी कर राशि गबन का मामला मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में दर्ज कराया गया.

बीजेपी से दिल्ली के सांसद व दिल्ली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी सहित तीन लोगों के खिलाफ दरभंगा की अदालत में जिन धाराओं में शिकायत दर्ज की गई है, वो इस प्रकार हैं-  धारा 120B, 420, 406, 467, 468 और 471. ये मुकदमा वास्तु विहार प्रोजेक्ट में समय से फ्लैट नहीं देने तथा पैसा वापस मांगने पर आनाकानी करने के कारण नाराज़ एक खरीदार मुन्ना चौधरी ने सीजेएम की अदालत में दर्ज कराई.

शिकायतकर्ता के मुताबिक वास्तु बिहार के ब्रांड एंबेसडर मनोज तिवारी हैं और उन्हीं से प्रभावित होकर उसने इस प्रोजेक्ट में पैसा लगाया. शिकायतकर्ता का कहना है कि मनोज तिवारी का चेहरा देखकर उसने सोचा की उसके साथ ठगी नहीं होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कंपनी ने मेरे साथ ठगी की. मुन्ना के मुताबिक 2013 में उसने वास्तु विहार में फ्लैट बुक कराया था, जिसे बारह महीने बाद कंपनी को बनाकर देना था. कंपनी ने उससे आठ लाख रुपये ले लिए लेकिन उसे आजतक कोई फ्लैट नहीं मिला. पैसा वापस मांगने पर कंपनी की ओर से आनाकानी किया जा रहा है.

एक अखबार में इस बाबत छपी खबर इस प्रकार है…

दर्ज कराई गई शिकायत यूं है…

बनारस से सुजीत सिंह ‘प्रिंस’ की रिपोर्ट.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इसे भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Vastu Vihar Scam (4) : पटना में भी भाजपा सांसद मनोज तिवारी के खिलाफ दर्ज हो चुकी है एफआईआर

वास्तु विहार घोटाले में अलग-अलग जगहों पर मुकदमों का क्रम साल भर पहले से शुरू हो गया लेकिन इस घोटाले पर मीडिया वाले रहस्यमय चुप्पी साधे हुए हैं. इस स्कैम का सबसे पहले भड़ास ने खुलासा किया. किसी भी मुख्यधारा के अखबार और चैनल ने वास्तु विहार घाटाले पर एक लाइन नहीं छापा न दिखाया. ऐसा माना जा रहा है कि मीडिया वाले भाजपा के शीर्ष नेताओं और केंद्र-राज्य की सरकारों के दबाव / प्रलोभन के कारण मनोज तिवारी के खिलाफ कुछ नहीं छाप रहे हैं. मनोज तिवारी की जगह अगर यही आरोप आम आदमी पार्टी के किसी नेता पर लगा होता तो सारे चैनल पूरे दिन इसी घोटाले के गड़े मुर्दे खोदते रहते. इसे ही कहते हैं मीडिया का नंगा और दोगला चेहरा.

दरभंगा में भाजपा नेता मनोज तिवारी के खिलाफ चीटिंग व फ्राड का केस फाइल होने के पहले भी एक एफआईआर दर्ज हो चुकी है. यह एफआईआर पटना साल भर पहले मनोज तिवारी के खिलाफ दर्ज हुई. पटना वाले एफआईआर में मनोज तिवारी समेत कुल नौ लोगों के नाम हैं जो आरोपी वास्तु विहार कंपनी से संबद्ध हैं. मुकदमा एक वकील की पत्नी ने दर्ज कराया जिसने वास्तु विहार कंपनी से एक प्लाट बुक कराया था लेकिन कंपनी अपने अन्य कस्टमर्स की तरह इस महिला को भी न तो प्लाट दे रही और न ही पैसे लौटा रही है.

पटना के गांधी मैदान पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में शिकायतकर्ता रानी देवी ने कहा है कि उसने 2013 में वास्तु विहार कंपनी में 7.86 लाख रुपये निवेश कर दो हजार स्क्वायर फीट का एक प्लाट बुक कराया. उसने यह कदम मनोज तिवारी द्वारा वास्तु विहार कंपनी के ब्रांड एंबेसडर होने और इनके द्वारा वास्तु विहार कंपनी के प्रोजेक्ट का प्रचार प्रसार किए जाने के कारण उठाया. कंपनी ने प्लाट की रजिस्ट्री तो की लेकिन कभी भी प्लाट हैंडओवर नहीं किया. उन्होंने पैसा भी नहीं लौटाया. रानी देवी, जो खुद शिक्षिका हैं और एक वकील की पत्नी हैं, ने बताया कि मनोज तिवारी का नाम एफआईआर में इसलिए डाला गया क्योंकि उन्होंने एक फ्राड कंपनी को प्रमोट किया जिसके कारण हजारों निर्दोष लोगों का पैसा फंस गया.

बनारस से सुजीत सिंह प्रिंस की रिपोर्ट. संपर्क : 9451677071

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इसे भी पढ़ें….

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आईएएस रमा रमण के कार्यकाल में नोएडा और ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरणों में हुए घपले-घोटालों की जांच की मांग

Yashwant Singh : चर्चित आईएएस सूर्य प्रताप सिंह अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं :

”कोई ताज़िन्दगी येनकेन प्रकारेण नॉएडा / ग्रेटर नॉएडा में ही रहना चाहता है.. उसने मायावती व अखिलेश यादव/रामगोपाल को ख़ूब खिलाया और ख़ुद ‘ऐड़ा-बनके-पेड़ा’ खाया… नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा में पिछले १० वर्षों के commercial, industrial व housing प्राजेक्ट्स के लैंड आवंटन घोटाले की जांच हो…. भू उपयोग परिवर्तन, builders के रु. 15,000 करोड़ के ब्याज माफ़ी की जांच हो… नॉएडा इक्स्टेन्शन में बिल्डर्स को भू आवंटन व नियमों में दी गयी छूट की जांच हो… ग्रीन बेल्ट आवंटन की जांच हो…. निर्माण कार्यों के घोटाले की जांच हो… DND टोल घोटाला, बिल्डर्र्स पर लम्बित बकायों की माफ़ी की भी जांच हो… बिल्डर्ज़ द्वारा आवंटीयों के साथ नॉएडा अथॉरिटी से मिलकर की गयी धोखाधड़ी की जांच हो… भू अधिकरण व मुआवजों का पेमेंट घोटाला जो करीब रु.५०,००० करोड़ का घोटाले अनुमानित है, की जांच हो… IAS अधिकारियों को farm आवंटन की लोक आयुक्त द्वारा की गयी जाँच में लीपापोती की भी जांच हो…”

जाहिर है यह सारा घोटाला रमारमण के नेतृत्व में हुआ जो नोएडा और ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण पर लगातार कब्जा जमाए हैं और मायावती से लेकर अखिलेश तक के कार्यकाल में अपने हुनर के दम पर कुर्सी से चिपके रहे हैं…यही नहीं जब यमुना एक्सप्रेसवे विकास प्राधिकरण बनाया गया तो भी इसका शीर्ष अफसर रमा रमण को ही बनाया गया. सवाल है कि क्या योगी सरकार इच्छा शक्ति दिखाते हुए रमा रमण के कार्यकाल के सारे फैसलों की जांच कराएगी और सूर्यप्रताप सिंह द्वारा उल्लखित उपरोक्त घोटालों-गड़बड़ियों की जांच कराएगी?

(IAS Rama Raman)

अगर यह जांच नहीं हुई तो माना जाएगा कि सत्ता में चाहें जो विचारधारा आ जाए, वह असली खेल भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने में ही होता है. हां, ये हो सकता है कि वह भ्रष्टाचारी अपनी विचारधारा के ढूंढ ले. लेकिन बदलता कुछ नहीं है. उम्मीद करते हैं कि योगी आदित्यनाथ बड़े भ्रष्टाचिरयों को जेल भेजेंगे. अन्यथा उनके और अखिलेश-मायावती के कार्यकाल में कोई खास अंतर नहीं रह पाएगा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रमा रमण की लगातार तैनाती को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी और इस अफसर को हटाने के लिए आदेश भी दिया था जिसकी खबरें उन दिनों मीडिया में आई थीं. लेकिन बाद में सब कुछ लीप पोत के बराबर कर दिया गया. देखिए वो खबर जिसमें हाईकोर्ट ने इस शख्स को तीनों प्राधिकरणों नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे से हटाने से संबंधित आदेश दिया था…

HC questions SP, BSP’s clemency on Noida Authority chairman Rama Raman; restricts IAS officer of duties… Allahabad HC has seized all the powers of UP’s IAS officer Rama Raman. The court has come down strictly on the chairman of the Noida authority. This order came down as a shocker not only for the Akhilesh Yadav government in the state but also for the IAS officer. Rama Raman is the chairman of Noida, Greater Noida and Yamuna Development Authority for the past seven years. The court in its order has asked the UP government to take the decision on the transfer of the IAS officer within 2 weeks. The court’s order comes as a result of a PIL filed by Jitin Goel in Allahabad HC. Also, the court has demanded the state government to give an answer as to why did they make Rama Raman the chairman of three authorities. Raman faces corruption charges. Rama Raman was also the chairman of these various authorities during the chief ministerial ship of BSP Supremo Mayawati. The IAS office has been restricted of his duties and power by the court.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

खबर से भड़के डीएम ने जारी किया आदेश : ‘हिंदुस्तान’ अखबार के इस उगाहीबाज रिपोर्टर को आफिस में घुसने न दें!

Dinesh Singh : मैं नहीं जानता कि बाका के जिलाधिकारी के दावे में कितनी सच्चाई है। बिहार में हिन्दुस्तान की स्थापना के समय से जुड़े होने के चलते मैंने देखा है कि रिमोट एरिया में ईमानदारी के साथ काम करने वाले पत्रकार भी भ्रष्ट अधिकारियों के किस तरह भेंट चढ़ जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सारे पत्रकार ईमानदार हैं मगर मैं यह भी कदापि मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि सारे पत्रकार चोर और ब्लैकमेलर ही होते हैं।

सच यह है कि बिहार में मध्याह्न भोजन के नाम पर जहां भी हाथ डालिए और खास कर बाका, मुंगेर और जमुई जिले में, केवल लूट और बदबू ही मिलेगा। यदि किसी पत्रकार से शिकायत थी तो सबसे पहले संपादक से शिकायत करनी चाहिए थी। संपादक द्वारा कार्रवाई नहीं होने पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का रास्ता खुला था। मगर नहीं। डीएम ने सीधे तुगलकी फरमान जारी कर दी।

भागलपुर के संपादक बदले हैं और सुना है ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई भी करते हैं। किन्तु लगता है अनुभवहीन जिला अधिकारी ने भ्रष्ट अधिकारियों के प्रभाव में आकर कोई बड़ा बवंडर कर दिया हो। अखबार के संपादक से मैं निवेदन करना चाहता हूं कि वे इस मामले मे तत्काल कार्रवाई करें ताकि पत्रकारिता की मर्यादा बिहार में अक्षुण्ण बनी रहें।

हिंदुस्तान अखबार के विशेष संवाददाता रह चुके पत्रकार दिनेश सिंह की एफबी वॉल से.

नीचे वो खबर है जिससे भड़के बांका के जिलाधिकारी ने रिपोर्टर को उगाहीबाज करार देते हुए आफिसियल लेटर जारी कर दिया…. खबर को साफ-साफ पढ़ने के लिए नीचे दी गई न्यूज कटिंग के उपर ही क्लिक कर दें :

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Niraj Ranjan अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है. चौथे स्तंभ को हिलाना मुश्किल है.

Uday Murhan मीडिया संस्थानों और पत्रकारिता जगत पर भी सवाल है . दूसरे क्या करेंगे और करना चाहिये दूसरे जानें .मीडिया जगत सोचे .

Brajkishor Mishra सत्यप्रकाश जी को बधाई। एक जिला अधिकारी को आपके कारण इस ओछेपन पर आना पड़ा। डीएम द्वारा लिखे गए डिपार्टमेंटल लेटर के सेंटेंस से स्पष्ट है कि मामला मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग का नहीं है। कही न कही आपकी किसी और रिपोर्टिंग से डीएम की फटी पड़ी है। जिसका खुन्नस वो मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग के नाम पर निकल रहा है। यदि मामला उगाही का होता तो डीएम एफआईआर भी दर्ज करा सकता था। लेकिन शायद कोई सबूत नहीं। डीएम साहब मध्यान भोजन आप नहीं खाते। वो देश के भविष्य, बच्चो के विकास के लिए है। पत्रकार छोड़िये, यदि मध्यान भोजन के गुणवत्ता में किसी भी व्यक्ति को शक होता है तो रसोई देखना उसका अधिकार है। बांका के पत्रकार बंधुओ का आग्रह हैं की पता करें इस डीएम को मंथली उगाही कौन-कौन से विभाग से कितनी पहुँचती है। अखबार में खबर नहीं लग पाती तो इनकी ईमानदारी की सबूत सोशल मीडिया पर डालिये।

Jayram Viplav डीएम के लिखने का अंदाज दाल में काला है ।

Dinesh Singh उदय जी, सवालो के घेरे मे आज कौन नही है। कस्बाई पत्रकारिता की स्थिति जानिए । दस रुपये प्रति खबर पर काम करता है और महीने मे दस खबर नही छपती है। मिलता है एक खबर पर दस रुपये मगर खर्चा पड़ता है 50 रु। अखबार को उसी के माध्यम से विज्ञापन भी चाहिए । वह भ्रष्ट और चोरी नेताओ की चाकरी मे लगा रहता है कि कुछ ऐड मिलेगा । उसे परिवार भी चलाना है। कठिनाई तब हो जाती है जब ओहदा और सैलरी मिल जाने के बाद भी गंदगी फैलाते हैं। धुआं वही से उठता है जब कही आग लगा होता है । विशेश्वर प्रसाद के समय मे हिन्दुस्तान भागलपुर मे कंट्रोवर्सी मे रहा और खबर छापने के लिए पैसे मांगने के खिलाफ बहुत सारे होल्डिंग्स भी टंगे । मै नही जानता की उस आरोप मे कितनी सच्चाई थी मगर चुने हुए बदनाम पत्रकारो को मिला संरक्षण और शहर के धंधेवाजो से उनके रिश्ते उनकी बदनामी को हवा देता रहा। मगर आप ही बताइए विशेश्वर प्रसाद और अक्कु श्रीवास्तव जैसे लीग जो कभी -कभी संपादक बन जाते है वही पत्रकारिता के चेहरे बनेगे या ईमानदार संपादको की भी चर्चा होगी? मैं दावे के साथ कहा सकता हू की आज भी पत्रकारिता मे ईमानदारी अन्य सभी क्षेत्रो की तुलना मे ज्यादा बची हुई है।

Uday Murhan एकदम सहमत . मेरा आशय आप से भिन्न नहीं है .

Brajkishor Mishra दिनेश सर, पत्रकारिता में सबसे बड़ी दिक्कत है की एक पत्रकार ही दूसरे पत्रकार की लेने में लगा हुआ है … अपने गिरेबाँ देखना किसी को पसंद नहीं।
Jayram Viplav पत्रकारिता और राजनीति “सेवा” के क्षेत्र है यहाँ कदम कदम पर नैतिकता और मूल्यों का तकाजा है लेकिन जब लोग इसे पैशन की जगह प्रोफेशन बना लेंगे तो क्या होगा? और हां यदि जिला ब्यूरो से नीचे प्रखंडों में काम करना हो तो आर्थिक रूप से मजबूत हो।

Dinesh Singh जिला अधिकारी के खिलाफ सत्यप्रकाश मानहानि का मुकदमा करें । मैं हर तरह से मदद के लिए तैयार हूं ।

Brajkishor Mishra विशेश्वर कुमार सर के साथ 12 साल पहले मुझे 2 साल काम करने का मौका मिला था, बड़े ही खड़ूस संपादक थे। जर्नलिज्म को छोड़ कर अपनापन नाम की कोई चीज ही नहीं। बड़े ही सेल्फिश संपादक हैं। सिर्फ खबर से मतलब रखते हैं। एक बार तो दूसरे संस्थान में किसी कारण परेशान हो उनसे नौकरी मांगा था सीधे ना कर बैठे। भविष्य में भी उनसे किसी फेवर की उम्मीद नहीं। लेकिन ये दावे के साथ कह सकता हूँ उनके जैसे पत्रकार और संपादक होना आसान नहीं। अकेले वो दस पत्रकार पर भाड़ी हैं। पत्रकार के सम्मान की सुरक्षा के लिए हमेशा सबसे आगे रहे है। वो कभी-कभी नहीं मेरे सामने बीते डेढ़ दशक में तीन जगहों पर स्थानीय संपादक के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किये हैं। मैंने बोल्ड जर्नलिज्म उनसे ही सीखा है।

Dinesh Singh पत्रकारिता केवल खबरों का लेखन नहीं है। यह एक आन्दोलन भी है । भारत मे पत्रकारिता का जन्म ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से हुआ है। शहर का एक बड़ा व्यापारी शहर मे होर्डिन्ग लगाकर पैसा माँगने का आरोप लगाए और संपादक खामोश रहे यह कैसा वोल्डनेस है? काम करना और स्वाभिमान के लिए चट्टान से टकरा जाना अलग -अलग बात है। पत्रकारिता मे ईमानदारी और निर्भिकता बाहर से भी दिखनी चाहिए। यह मानहानि का मुकदमा बनता था। कुछ नही होने से पूरी टीम का सर शर्म से झुका रहा। मै मानता हूं कि आरोप गलत थे जैसे सत्यप्रकाश पर लगे आरोप गलत हैं। मगर चुप रह जाओगे तो लोग तरह -तरह के मतलब निकालेगे ही।
अजय झा ऐसे पत्रकार को सलाम जिसके लेखन से प्रशाशन की….

Sanjay Kumar Singh मैं भी एक पत्रकार हूँ। दो दशक से अधिक समय से इससे जुड़ा हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि पत्रकारिता कभी चाटुकारिता में बदलेगी लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दे तो यह अब इससे भी नीचे दलाली में बदल गई है। हर कोई अपना एजेंडा लेकर चल रहा है। जिसमे पत्रकारिता मुखौटा बना हुआ है। सिवान, छपरा, बांका से लेकर पटना तक ऐसे मुखौटाधारि बैठे हुए हैं। ऐसे लोगों को कौन बेनकाब करेगा, शायद कोई नहीं, क्योंकि ये लोग अब सिस्टम में शामिल हो चुके हैं। दिनेश जी को बधाई… सिवान की ईमानदारी भी सीबीआई जरूर सामने लाएगी

Hari Prakash Latta आँख मूँदकर किसी को समर्थन देना या झुटला देना गलत है। बिना सत्यता जाने किसी एक व्यक्ति , घटना को केंद्रित कर सैद्धान्तिक बहस का कोई अर्थ नहीं होता है। हिंदुस्तान के सम्पादक को इन्क्वारी कर उचित निर्णय लेना चाहिए

Kumar Rudra Pratap मैंने देवरे को जाना है गया कार्यकाल के दौरान, ईमानदार और निडर अब तक।

Omprakash Yadav दिनेश जी जिलाधिकारी बाँका का तुगलकी भी कह सकते है और महाराष्ट्रीय फरमान भी कह सकते है आज के दौर का।जिस तरह महाराष्ट् में उत्तर भारत के लोगो को घुसने पर पावंदी हो गया है, चुकी बाँका के जिलाधिकारी महाराष्ट्रा के हैं और बाँका में उसी तर्ज पर काम कर रहे हैं। दिनेश जी आपने सही अनुमान लगाया की मध्यान भोजन बाला मामला बहाना है। एक समाचार पर जिलाधिकारी भड़के हैं।

Neel Sagar यदि सत्यप्रकाश जी पर आरोप गलत लगा है जो सत्य से परे है तो तत्काल उन्हे राय दिजिए कि डी0एम0 के खिलाफ भा0द0सं0 की धारा 499 के आधार पर मान-प्रतिष्ठा के साथ खेलने के लिए 25 लाख रूपया का मानहानि दायर करें।-सम्पादक-नील सागर दैनिक पटना -9835482126

Dinesh Singh अब तुगलकी फरमान जारी करने वाले बाका के जिला अधिकारी का असलियत सामने आ चुका है। —खबर पढ़कर बौखलाए जिला अधिकारी और कुछ नहीं बल्कि अहंकार का नाजायज पैदाइस है। –बिहार मे रहकर बिहारी को गाली देने वाले को तत्काल प्रभाव से सरकार निलम्बित करे। — पूरा बिहार सत्यप्रकाश के साथ है। अब बात साफ हो गई है कि माजरा क्या है । हमारी पत्रकार विरादरी कुछ आदत से लाचार है। ईमानदारी का सार्टिफिकेट हम मुफ्त मे बाटते है। यार पहले अपनी विरादरी पर गर्व करना सीखो। मै पहले ही कह चुका हूं कि पत्रकार विरादरी मे आज भी ईमानदारी बहुत हद तक कायम है। तुम बिहार की जनता की गाढ़ी कमाई पर पलते हो और बिहारी को ही गाली बकते हो। यहा का आदमी जब महाराष्ट्र काम की तलाश मे जाता है तो नपुंसको की परवरिश बनकर हमला करते हो और बिहार आकर बिहारी पर ही रोब गाठते हो। कम से कम सत्यप्रकाश जैसे पत्रकार के रहते यह नही चलने वाला है । सत्यप्रकाश की रिपोर्टिंग यह साबित करता है कि वह पत्रकारिता का हीरो है। सत्यप्रकाश को तुम सरकारी कार्यालय जाने से नही रोक सकते । तुम अपना देखो की तुम कैसे जाओगे । वक्त आ गया है पत्रकार विरादरी अपनी एकजुटता दिखाए।

Amit Roy सत्यप्रकाश जी दुर्गापूजा के बाद इस दिशा में कोई ठोस निर्णय ले।हमलोग आपके हर कदम पर साथ है।

Guddu Rayeen मेरा एक ही हिसाब है ऐसे कलकटर को बिहार से उठा कर बाहर फेक देना चाहिऐ

Himanshu Shekhar Hahaha sir ne article 19 Ni padhe Kya.??? Kabhi bihari word use krte hai kabhi Kuch ? Bhagwan bharose hai Banka zila soch samjhdar kr cmnt kijye sir PTA Ni it act me jail daal Diya jaye

Ashish Deepak इस प्रकार का फरमान पुर्वाग्रह से प्रेरित लगता है। कहीं पत्रकार महोदय ने कड़वा सत्य तो नही लिख डाला ।

Nabendu Jha इस बात को रखने का यह तरीका सही नहीं। बल्कि ,इसके लिए एक जिम्मेदार अधिकारी को बात रखने की सही जगह की जानकारी होनी चाहिए । इसे वापस ले।

Pushpraj Shanta Shastri जिलाधीश ने किसी साक्ष्य के बिना जो निर्देश जारी किया है, यह आश्चर्यजनक नहीं है। हमारी पत्रकारिता ने डीएम से लेकर सीएम की आलोचना की आदत छोड़ दी है। जिलाधीश के पास अगर संवाददाता के द्वारा रिश्वत मांगने के साक्ष्य थे तो उन्हें किसने प्राथमिकी दर्ज कराने से रोका था? मुझे इस फरमान की भाषा में जिलाधीश प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत हो रहे हैं। बिहार के वरिष्ठ पत्रकारों को इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेना चाहिए। मैं इस मसले के तथ्यान्वेषण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हूँ, शर्त यह है कि अपने कुछ बंधु साथ शरीक हों। पत्रकारिता कथ्य के बावजूद तथ्य की मांग करता है। जिलाधीश के पक्ष-विपक्ष में तत्काल कोई राय प्रकट करना अनुचित है। महाराष्ट्र-बिहार के प्रदेशवाद की चर्चा फूहड़ता है। जिलाधीश का पत्र तथ्य के बिना कथ्य पर आधारित है इसलिए कथ्य के भीतर की हकीकत के पड़ताल की जरुरत है।

Dinesh Singh जिला अधिकारी किसी वजह से इस तुगलकी हरकत पर उतरे वह प्रकाशित खबर तथ्य बनकर सामने है।

Awadhesh Kumar arajak bihar ka namuna. Jab rajneeti fail karte hi to yehi hota hi.ek dm bihar mei…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कथित पत्रकार ने ‘इंडिया टीवी’ के नाम पर आधा दर्जन सरपंचों से लाखों रुपये की ठगी कर ली

अपने आपको पत्रकार बताने वाले एक व्यक्ति ने इंडिया टीवी के नाम पर आधा दर्जन सरपंचों को ठग लिया. छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा से खबर है कि अपने आपको इंडिया टीवी का पत्रकार बताते हुए शातिर ठग ने पहले सचिवों तथा सरपंचों से उनके गांव के विकास कार्यों के बारे में जानकारी ली. फिर कुछ दिनों बाद वो वापस पहुंचकर समाचार के बदले पन्द्रह पंद्रह सौ रुपए की मांग करने लगा. पन्द्रह सौ रुपए का चेक दिए जाने पर उस शातिर ठग ने उसमें कूटरचना कर आधा दर्जन सरपंचों से लाखों रूपए ठग लिए. निर्माण कार्यों के लिए राशि निकलवाने बैंक पहुंचने पर सरपंचों को खाते में राशि नहीं होने पर ठगे जाने का अहसास हुआ जिसके बाद सरपंचों ने मामले की शिकायत जांजगीर थाने में की है.

ग्राम पंचायत हरदी हरि के सरपंच नारदप्रसाद कश्यप पिता लल्लूराम कश्यप ने बताया कि एक माह पूर्व एक व्यक्ति खुद को इंडिया टीवी का पत्रकार बताते हुए आया और गांव में हुए विकास कार्यों के बारे में इंटरव्यू लिया. फिर वहा सरपंच श्रीमती सुकबाई के पास पहुंचा तथा उससे भी गांव में हुए विकास कार्यों के संबंध में इंटरव्यू लिया. जाते समय समाचार चलने पर शुल्क लगने की बात कही. दो दिन बाद उसने समाचार के एवज में पन्द्रह सौ रूपए की मांग की. उस समय पैसा नहीं दिए जाने पर बाद में आने की बात कहकर वह चला गया.

20 जून 2016 को फिर आने पर सरपंच एवं सचिव ने अपने हस्ताक्षर कर उसे ग्रामीण बैंक शाखा जांजगीर का एक हजार पांच सौ रूपए का चेक क्रमांक 786269 पंचायत प्रस्ताव की कापी के साथ दे दिया. दो दिन बाद वापस गांव पहुंचकर ठग ने उस पंचायत प्रस्ताव के आधार पर बैंक से राशि नहीं निकलने की बात कहते हुए अपने हाथ से लिखकर लाए गए पंचायत प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जिस पर सरपंच एवं सचिव ने हस्ताक्षर कर दिए. 16 जुलाई को सांसद मद से ग्राम पंचायत हरदी हरि में बनवाए गए सीसी रोड का पैसा निकलवाने के लिए सरपंच एवं सचिव जब ग्रामीण बैंक की जांजगीर शाखा पहुंचे तो उन्हें अपने खाते में राशि नहीं होने और 6 लाख 1 हजार पांच सौ रूपए निकलवाए जाने की जानकारी हुई.

नवागढ़ सचिव संघ के अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह गहलौत ने बताया कि अपने आपको इंडिया टीवी का रिपोर्टर बताने वाले उस ठग के शिकार नवागढ़ ब्लाक के ही आधा दर्जन पंचायत के सरपंच हुए हैं. शातिर ठग ने सभी से 1 हजार 5 सौ रूपए का चेक लिया था जिसमें कूटरचना कर ग्राम पंचायत जगमहंत के खाते से 3 लाख 1 हजार 5 सौ, हरदी हरि के खाते से 6 लाख 1 हजार 5 सौ, पचेड़ा के खाते से 2 लाख 1 हजार 5 सौ, ग्राम पंचायत गौद के खाते से 91 हजार 5 सौ तथा दो अन्य पंचायतों के खाते से भी लाखों रुपये निकाल लिए.

इंडिया टीवी के नाम से जो बिल ठग ने सरपंचों को दी है उसे देखते ही उसके फर्जी होने का अहसास हो रहा है. बिल में इंडिया टीवी का मोनो अथवा लेटर पेट के स्थान पर सामान्य रूप से ही इंडिया टीवी लिखा है तथा उसके कार्यालय के रूप में भारत टाकीज, जुब्लेरी बिल्डिंग इन्द्रपुरी भोपाल मध्यप्रदेश का पता तथा प्रधान कार्यालय शाप नं.9, शिवाजी नगर, एलएमरोड, बोरीबली वेष्ट, लैन्डमार्क माउस प्रोयसर चर्च मुम्बई 400103 भारत लिखा हुआ है. बिल में दिए ईमेल एड्रेस सहित इसके नियम और शर्ते इसे संदेहास्पद बनाते हैं जिसमें कंपनी के नाम पर चेक बनाए जाने की जगह चेक अथवा ड्राफ्ट प्रतिनिधि या ब्यूरो चीफ के नाम से ही बनाए जाने की बातें लिखी है वहीं संवाददाता के नाम के स्थान पर आशीष तिवारी लिखा गया है. थाना प्रभारी जांजगीर बी.एस. खूंटिया ने बताया कि सरपंचों द्वारा ठगी का शिकार होने की लिखित शिकायत की गई है. मामले की जांच के बाद उचित कार्यवाही की जावेगी.

नीचे दी गई तस्वीर में थाने में शिकायत करने पहुंचे ठगी के शिकार सरंपच और सचिव दिख रहे हैं.

छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस के संपादक राजेश सिंह क्षत्री की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले लोगों को जान का खतरा

भोपाल: मध्य प्रदेश के चर्चित व्यापम घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपे कल एक साल पूरा हो जाएगा. पिछले साल व्यापम की आंच मुख्यमंत्री शिवराज तक पहुंच गई लेकिन एक साल में ज्यादातर हाईप्रोफाइल आरोपी जेल से बाहर आ गए हैं. ऐसे में व्यापम घोटाले का खुलासा करने वाले लोगों को अब जान का खतरा सताने लगा है. घोटाले का खुलासा करने वाले आनंद राय को जान का भय सता रहा है. व्हिसिल ब्लोअर डॉ आनंद राय का कहना है, ‘’जान का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया है. मुझे सुरक्षा दी गई है लेकिन परिवार को नहीं. 2500 लोगों से दुशमनी मोल ले रखी है.’’

डॉक्टर से इंजीनियर तक, कांस्टेबल से फूड इंस्पेक्टर तक, प्रवेश परीक्षा से लेकर नौकरी की भर्ती तक, सबकुछ व्यापम के तहत मध्य प्रदेश में हुआ करता था. आनंद राय ने खुलासा किया तो पूरा खेल खुला और कई लोग सलाखों के पीछे पहुंच गये लेकिन गिरफ्तार आरोपी अब धीरे धीरे जेल से बाहर आने लगे हैं. पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, अरविंदो मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर विनोद भंडारी, बीजेपी नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा, कांग्रेस नेता संजीव सक्सेना, राज्यपाल पीए धनराज यादव और डीआईजी आरके शिवहरे सहित दर्जन भर से ज्यादा हाईप्रोफाइल आरोपी जेल से बाहर आ चुके हैं. जबकि कई आरोपी बाहर आने के इंतजार में हैं. यही वजह है कि घोटाले का खुलासा करने वाले लोग परेशान हैं.

मध्य प्रदेश के मेडिकल कॉलेज और सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा कर भर्ती कराने वाले ये घोटाला साल 2000 से चल रहा था लेकिन इंदौर पुलिस ने भर्ती कराने वाले दलाल डॉ जगदीश सागर को 2013 में जब गिरफतार किया तब पता चला कि ये घोटाला कितना बड़ा है. साल 1982 में शुरू हुए मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानि व्यापम का काम था प्रदेश के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए प्रवेश परीक्षाएं करवाना. साल 2008 से व्यापम के जरिए सरकारी नौकरी के लिए भर्तियां भी होने लगीं.

व्यापम के दफ्तर से मध्य प्रदेश को शिक्षक, पुलिस कॉंस्टेबल, सब इंस्पेक्टर, फूड इंस्पेक्टर, वन रक्षक मिलने शुरु हो गए. लेकिन धीरे-धीरे आरोप लगने लगे कि व्यापम की परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा हो रहा है. सीबीआई से पहले इस घोटाले की जांच मध्य प्रदेश पुलिस की एसटीएफ कर रही थी जिसने 200 से ज्यादा केस दर्ज कर ढाई हजार लोगों को आरोपी बनाया था. एसटीएफ की जांच की निगरानी के लिए एसआईटी भी गठित हुई. जांच में पचा चला कि व्यापम से जुडे करीब 40 लोगों की मौत हुई है. इस बीच न्यूज चैनल आजतक के पत्रकार अक्षय सिंह की झाबुआ में रहस्यमय मौत के बाद 9 जुलाई 2015 को इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया.

अब इस एक साल में सीबीआई ने भोपाल में दो दफ्तर बनाये. 185 केसों की एफआईआर नये सिरे से लिखी और 35 मामलों में चार्जशीट पेश की. लेकिन इन सबके बीच बडे आरोपियों को जमानत मिलती जा रही है और उनके जेल से छूटने का सिलसिला जारी है. सीबीआई की भूमिका को लेकर इसीलिए सवाल उठाये जा रहे हैं. लेकिन सीबीआई का कहना है कि व्यापम मामले में पूरी गंभीरता से जांच जारी है. जमानत देना कोर्ट का काम है और जो जांच पूरी हो रही है उनमें आरोप पत्र दाखिल किए जा रहे हैं. मध्य प्रदेश की सरकार भी जांच से संतुष्ट है. जबकि इस मामले की निगरानी कर रही सुप्रीम कोर्ट में भी सीबीआई अपनी स्टेटस रिपोर्ट लंबे समय से पेश नहीं कर पा रही है. रिपोर्ट पेश करने की तारीख नौ बार बढ़ चुकी है. अब 11 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट और 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में व्यापम केस की सुनवाई पर फिर सबकी नजर है.

(रिपोर्ट- ब्रजेश राजपूत, साभार-एबीपी न्यूज)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मध्य प्रदेश सरकार ने छल वेबसाइटों को 4 साल में दिए 14 करोड़ के सरकारी विज्ञापन, इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित की रिपोर्ट

वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव की रिपोर्ट में खुलासा, पत्रकारों और उनके रिश्तेदारों की ओर से संचालित की जा रही हैं वेबसाइट, 10 हजार रूपए से लेकर 21 लाख 70 हजार रुपए तक विज्ञापन दिए गए, कांग्रेसी विधायक बाला बच्चन ने विधानसभा में उठाया था सवाल

-दीपक खोखर-

भोपाल, 10 मई। मध्य प्रदेश में 4 साल के दौरान 244 छल वेबसाइटों को 14 करोड़ रूपए के सरकारी विज्ञापन दिए गए। इनमें से ज्यादातर वेबसाइट पत्रकारों और उनके रिश्तेदारों की ओर से संचालित की जा रही हैं। इन वेबसाइट को वर्ष 2012 से वर्ष 2015 के बीच 10 हजार रूपए से लेकर 21 लाख 70 हजार रूपए के विज्ञापन दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में सोमवार 9 मई के अंक में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव की रिपोर्ट में यह तमाम खुलासे हुए हैं। दरअसल कांग्रेस विधायक बाला बच्चन ने विधानसभा में सवाल उठाया था। जिसके बाद उन्हें दिए गए जवाब में तमाम जानकारी हासिल हुई।

इंडियन एक्सप्रेस हमेशा ही अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए अलग पहचान रखता है और इस रिपोर्ट में भी इस प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने बेहतरीन पत्रकारिता का नमूना पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश सरकार की ओर से 26 वेबसाइट को 10 लाख रूपए से ज्यादा के विज्ञापन जारी किए गए। जिनमें से 18 वेबसाइट पत्रकारों के रिश्तेदारों द्वारा संचालित की जा रही हैं। 81 वेबसाइट को 5 से 10 लाख रूपए के विज्ञापन दिए गए। 33 वेबसाइट तो ऐसी हैं जो मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भोपाल में आवंटित भवन से संचालित हो रही हैं। एक बात और जिस वेबसाइट को सबसे ज्यादा 21 लाख 70 हजार रूपए मिले हैं, वह अश्वनी राय के नाम से हैं, जो भाजपा के एक पदाधिकारी के कार्यालय में काम करते हैं। राय स्पष्टीकरण देते हैं कि वे भाजपा के लिए काम करते हैं, लेकिन वेबसाइट से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

वेबसाइट अलग-अलग नाम से, सामग्री एक समान

यहीं नहीं खास बात यह है कि कई वेबसाइट अलग-अलग नाम से हैं, लेकिन उन सबमें सामग्री एक ही है। ज्यादातर वेबसाइट ने तो अपने बारे में कोई जानकारी भी नहीं दी है। इस बारे में पूछे जाने पर मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग के आयुक्त अनुपम राजन कहते हैं यह न्यू मीडिया है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इन्हें कौन संचालित कर रहा है। हालांकि साथ ही वे कहते हैं कि अपनी विज्ञापन पॉलिसी में बदलाव कर रहे हैं और यह देखा जा रहा है कि वेबसाइट चल रही है या नहीं। उधर, विधायक बाला बच्चन का सीधे तौर पर आरोप है कि भाजपा से जुड़े लोगों को ही फायदा पहुंचाया गया, जबकि वास्तविक पत्रकार की वेबसाइट को ही विज्ञापन मिलने चाहिए।

विस्तृत जानकारी के लिए इंडियन एक्सप्रेस की मूल खबर की कटिंग उपर अपलोड किया गया है. इसी मुद्दे पर इंडियन एक्सप्रेस ने एक अन्य खबर भी प्रकाशित की है जो नीचे है. पढ़ने के लिए नीचे की न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें ताकि अक्षर साफ साफ पढ़ने में आ सकें.

दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क- 09991680040

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पब्लिक का हजारों करोड़ रुपया दबाए विजय माल्या सरकार की नाक के नीचे से भाग गया!

Sheetal P Singh : वो हू ला ला ला करके देश को दस हज़ार करोड़ का प्रत्यक्ष चूना लगा कर निकल गया। देशभक्त प्रोफ़ाइलों का मुँह आटोमेटिकली तालाबन्द हो गया है “नो कमेंट”! वे सेना और सैनिक बहुत बेचते हैं, ख़ासकर जब कोई सैनिक या सैन्य अफ़सर बार्डर पर शहीद हो जाय तो तुरंत उसके फ़ोटो लाइक/ शेयर करने के मर्सिये पढ़ने लगते हैं। पन्द्रह दिन बाद उसके घर परिवार के दुख लापता हो जाते हैं! हेमराज (जिसका सर पाकिस्तानियों ने नहीं लौटाया) का परिवार कहाँ किस हाल में है किसी को पता है? और, सेना श्री श्री के लिये फ़्री में प्लांटून पुल बनाने में लगा दी गई है। ध्यान से नोट करते रहिये देशभक्ति को।

Nadim S. Akhter : पब्लिक का हजारों करोड़ रुपया दबाए शानोशौकत की जिंदगी जीने वाला विजय माल्या सरकार की नाक के नीचे से भाग गया और ईडी, वित्त मंत्रालय, आईबी, पुलिस, मंत्री, प्रधानमंत्री, कोर्ट…सब देखते रह गए. सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने आज कोर्ट को बताया कि माल्या 2 मार्च को ही देश छोड़ चुका है. अब कौन कहता है कि इस देश में सहिष्णुता नहीं है? और कितनी सहिष्णुता चाहिए? पब्लिक सब सह ही तो रही है. किसान खेती के लिए बैंक से कुछ हजार रुपये लेता है और फसल बर्बाद होने पर नहीं चुका पाता, तो ये बैंक वाले और पूरा सरकारी सिस्टम उसे इतना परेशान करता है कि बेचारा खुदकुशी कर लेता है. लेकिन माल्या जैसे लोग हजारों करोड़ रुपये गटक कर डकार भी नहीं लेते और देश का पूरा सिस्टम डिस्को-डांडिया करता रहता है. Total safe passage. काला धन नहीं ला सके मोदी जी, कम से कम पब्लिक का पैसा-देश का पैसा हड़पने वाले को तो पकड़कर रखते !!! सब मिले हुए हैं जी.

Ajay Prakash : विजय माल्या जी गए। मोदी जी की सरकार ने उन्हें विदेश गमन करा दिया। परदेस गमन। बहुते बड़े देशभक्त थे माल्या जी। और भारतीय संस्कृति के अव्वल रक्षक तो थे ही। बैंकों का जो वह 9 हजार करोड़ लेकर भागे हैं, वह जनता का पैसा तो है नहीं। हमारा टैक्स तो बिल्कुले नहीं। वह तो बीयर बेचकर कमाए थे सो लुटा दिया छमिया की नाच में। है कि नहीं।

(सौजन्य : फेसबुक)


आगे पढ़ें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडिया को गरियाने से पहले मोदी के उपासक पढ़ लें ताजे और पुराने घपलों-घोटालों की यह लिस्ट

जिन मई ’14 से पहले अखबार नईं वेख्या…

सबसे पहले प्रतिष्ठित रचनाकार असगर वज़ाहत Asghar Wajahat साहब से माफ़ी कि उनके कालजयी नाटक “जिन लाहौर नहीं वेख्या” से मिलता जुलता शीर्षक रख रहा हूँ। बात दरअसल ये है कि इस वक्त एक पूरी जमात उठ खड़ी हुयी है जिसने 16 मई 2014 से पहले न अखबार देखे हैं न टीवी का रिमोट हाथ में उठाया था। और इसीलिए यह जमात देश के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी की आलोचना पर छाती कूटने लगती है। भाई लोग ऐसे कलपते, किकियाते, बिलबिलाते हैं मानो इससे पहले कभी किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शब्द भी न लिखा गया हो न बोला गया हो।

इन लोगों को लगता है कि उनके देवतुल्य शिखर पुरुष को “पवित्र” महामानव माना जाये और एक भी सवाल न पूछा जाये। अरे भाइयो भैनो… देश ने खुद अपनी ख़ुशी से प्रधानमंत्री और सरकार को चुना है, कोई देवलोक से अवतार प्रकट नहीं हुआ है। इसलिए जब जब ज़रूरी होगा सवाल भी पूछे जायेंगे , उंगली भी उठेगी। इस कलपती हुयी जमात की जानकारी के लिए बता दिया जाये कि नेहरू से लेकर मनमोहन तक कलमकारों ने कभी किसी को नहीं छोड़ा। ये पत्रकार ही हैं जो सन् 47 से आज तक सब से सवाल करते रहे हैं।पत्रकारिता हमेशा सत्ता का प्रतिपक्ष और जनता के हक़ में रही है। तमाम खामियों के बावज़ूद ऐसी ही रहेगी।यही उसका ईमान है। हां ये हमारा फ़र्ज़ है, जिम्मा है और पेशा भी। “कोऊ नृप होये, हमें तौ सवालयि पूछनें…”

आइये जान लीजिये कुछ बड़े मामले जो पत्रकारिता ही देश दुनिया के सामने लेकर आई~~

नेहरू युग
कृष्ण मेनन का जीप घोटाला
टी टी कृष्णमचारि कांड
सिराजुद्दीन काण्ड
चीन युद्ध में विफलता

शास्त्री युग
प्रताप सिंह कैरों का मामला

इंदिरा युग
अंतुले का प्रतिभा प्रतिष्ठान काण्ड
तानाशाही तौर तरीकों का खुलासा
आपातकाल का घनघोर विरोध

जनता पार्टी युग
मोरारजी को सी आई ए एजेंट बताने वाला कांड
जनता पार्टी की कलह

राजीव युग
बोफोर्स तोप घोटाला
प्रशासनिक नाकामी का खुलासा

नरसिंह राव युग
झामुमो रिश्वत काण्ड

अटल युग
एनरॉन समझौता कांड
रिलायंस प्रमोद महाजन कांड

मनमोहन युग
टू जी घोटाला
कोयला घोटाला
कॉमन वेल्थ घोटाला

ये सब उन लोगों को नहीं मालूम जिन्होंने 16 मई 2014 से पहले न अखबार पढ़े न टीवी देखा। तभी तो आज वे इसलिए बिलख रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिखा जा रहा है। सन् 47 से अब तक पत्रकारिता ने हमेशा सत्ता की विसंगतियों पर कलम चलायी लेकिन तब कभी किसी ने पत्रकारिता को देशद्रोही नहीं कहा। तब सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं कहलाता था। सिर्फ दो साल में ललितगेट, डीडीसीए, व्यापम, चिक्की घोटालों आदि आदि और विश्वविद्यालयों में असंतोष की खबरों से तिलमिलाए लोग अपने नेता और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह बताने पर आमादा हैं। इन लोगों को लगता है कि मीडिया (पहले सिर्फ प्रिंट था अब इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल भी है) उनके महानायक के कामकाज की मीमांसा करके कोई अक्षम्य पाप कर रहा है। वे दिन रात मीडिया को बिकाऊ, देशद्रोही आदि बता कर “कुम्भीपाक नर्क” का श्राप दे रहे हैं।

…तो हे उपासकों, हमारे लिए न पहले कोई प्रधानमंत्री पवित्र गाय था, न आज है और न कल होगा। मोदी से पहले वालों के धत करम भी आपको नानी- दादी ने कहानियों में नहीं सुनाये थे। वो भी हम और हम जैसे कलमघसीट लोग ही खोज कर आपके लिए लाये थे। अगर अपने दिव्य पुरुष की आराधना और फोटो वीडियो मॉर्फिंग से फुरसत मिले तो किसी लायब्रेरी में मई 2014 से पहले का कोई भी अखबार पलट कर देख लेना। पता चल जायेगा कि इस तारीख़ से पहले भी देश में प्रधानमंत्री होता था और कलम उस पर भी ऐसे ही चलती थी जैसी आज चल रही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


डा. पाठक का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सीबीआई से डरे समाजवादी कुनबे ने यूपी में भाजपा को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की छूट दी!

Vishwanath Chaturvedi : मुलायम के मुंह में जमी दही, कठेरिया के बयान पर राम गोपाल की जवाबी कौव्वाली.. 5 राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में अपनी हार के प्रति आश्वस्त भाजपा ने उत्तर प्रदेश में राजनैतिक ध्रुवीकरण की तैयारी शुरू कर दी है. मुलायम भाजपा के मोहरे की तरह इस्तेमाल होने को मजबूर हैं क्योंकि सीबीआई केंद्र के पास है और कुनबा 2007 से वांटेड है। यादव सिंह की गिरफ्तारी के बाद इस घोटाले में बात-बात पर बाहें चढ़ाने वाले राम गोपाल के बेटे व बहू का नाम आ जाने के बाद अब भाजपा के पास इनको नचाने का अवसर मिल गया है। 

अपने को समाजवादी डॉ राममनोहर लोहिया का शिष्य होने का दावा करने वाले मुलायम कुनबे द्वारा 6 करोड़ मजदूरों के प्रॉविडेंट फण्ड पर टैक्स लेने के भाजपाई बजट के फैसले के खिलाफ और पूंजीपतियों के हक़ में लिए गए बजटीय फैसले के खिलाफ मौन साधना इसी का नतीजा है। भाजपाई देशद्रोहियों चौधरी बाबू लाल व कठेरिया के ख़िलाफ एफआईआर दर्ज कर जेल की सलाखों के पीछे भेजने के बजाए छुटभैयों के खिलाफ कार्यवाही कर मामले को रफा-दफा करने के पीछे क्या मज़बूरी है, इसे समझा जा सकता है।

राज्य में हुए 2 लाख करोड़ के खाद्य घोटाले जिसकी जाँच सीबीआई कर रही है और मानिटरिंग इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच कर रही है, के आरोपियों को बचाकर मंत्री बनाने वाली सरकार को घोटाले रोकने का इंतजाम किये बिना जल्दबाजी में फूड गारन्टी बिल लागू कर संसद में भाजपा को मूक समर्थन देने के बाद उठने वाले सवालों से बचने के लिए समाजवादी पार्टी द्वारा अवाम का ध्यान बांटने से ज्यादा कुछ नहीं है। जब देश जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था कि तर्ज पर मुलायम को जेल जाने का डर सता रहा है। खुद और कुनबे को जेल जाने से बचाने के लिए सौदे पर सौदे कर भाजपा को राज्य में धार्मिक ध्रुवीकरण कराने का प्लेटफार्म देकर राज्य को जलाने पर मुलायम आमादा हैं। मनमोहन की सरकार को 2004 से 2014 तक सीबीआई जाँच से बचने के लिए समर्थन देने वाले नकली सेकुलरिज्म का लबादा ओढे मुलायम का चेहरा जनता के बीच बेनक़ाब हो चुका है। जनवादी कबि अदम गोंडवी की पक्तियां सटीक बैठती हैं.

इलेक्शन भर मुसलमानों से हम रुमाल बदलेंगे।
अभी बदला है चेहरा देखिये अब चाल बदलेंगे।।
मिले कुर्सी तो दलबदलू कहो क्या फ़र्क़ पड़ता है।
ये कोई वल्दियत है पार्टी हर साल बदलेंगे।।

xxx

सौदागर मुलायम की सीबीआई के भय से बदलती वफादारी… पहले मनमोहन अब मोदी.. 22 फरवरी से शुरू हुए बजट सत्र से पहले यादव सिंह की गिरफ्तारी से घबराये मुलायम कुनबे को संसद में मोदी सरकार के लिए हाथ उठाना मजबूरी हो चुकी है, क्योंकि उसमें कुनबे के सदस्य राम गोपाल यादव के बेटे और बहू की हिस्सेदारी सामने आ चुकी है. वहीं दूसरी ओर कोर्ट की अवमानना कर 2007 से अब तक आय से अधिक मामले मामले में एफआईआर ना करने वाली सीबीआई से डरा सहमा कुनबा अब पूरी तरह से मोदी के गुणगान में जुटा है.

7 रेस कोर्स प्रधानमंत्री आवास पर z news के मालिक के बुक रिलीज कार्यक्रम में मुलायम की मोदी से रिरियाते हुए जेल जाने से बचने की भीख मागते हुए तस्वीरें जरूर देखी होगी. मुलायम द्वारा ठगे गए लोगों की फेहरिस्त स्व. कर्नल अर्जुन भदौरिया से शुरू होकर आज तक जारी है. अब मोदी की बारी है. मुलायम द्वारा मनमोहन से मोदी तक ठगे गए लोगो की लंबी फेहरिस्त है. स्व. देवी लाल, स्व. चौधरी चरण सिंह, स्व. वीपी सिंह, स्व. चंद्रशेखर और 1990 में कार सेवकों पर चली गोली के बाद भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री रहे मुलायम से भाजपा द्वारा समर्थन वापसी के बाद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कांग्रेस के 90 विधायकों के समर्थन से सरकार बचाने के बाद एक रात स्व. राजीव गाँघी को धोखा देकर सरकार भंग करने की सिफारिश कर 1991 में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाने वाले मुलायम ही थे। 2003 में भाजपा ने मुलायम का कर्ज उतारते हुए उस समय के विधानसभा अध्यक्ष रहे केसरी नाथ जी से कह कर विधायकों की मंडी लगाकर बिना बहुमत की गुंडागर्दी से सरकार बनवा दी. अब मुलायम फिर भाजपा से मिलकर साझा सरकार की सौदेबाजी कर रहे हैं.

xxx

1991 में भाजपा को सत्ता सौंपने के बाद 1993 के चुनाव पूर्व स्व. काशी राम से समझौते के बाद प्रदेश में हर मौके मुलायम के साथ खड़े रहे वाम पंथी दलों के विधायकों को तोड़कर मुलायम ने एक विचारधारा और दल को खत्म कर सत्ता में आए. सत्ता में आते ही 1994 में गेस्ट हाउस कांड कर बसपा को धोखा दिया. 1991 से कांग्रेस की बैसाखियों के सहारे सरकार चलाने वाले मुलायम, 1999 में 1 वोट से संसद में हारी भाजपा सरकार के पतन के बाद वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति भवन पहुंची काग्रेस के साथ धोखा दिया.

इस तरह देश को मध्यावधि चुनाव में झोंक कर भाजपा की मदद की. फिर 2003 में भाजपा बसपा गठबंधन टूटते ही स्व. प्रमोद महाजन और अमर सिंह की जोड़ी के सहारे तत्कालीन विधान सभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी की कृपा से विधायकों की खरीद फरोख्त की. फिर गुंडा गर्दी के सहारे की गई लोकतंत्र की हत्या. 2004 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनते ही बिन बुलाये मेहमान की तरह जबरदस्ती समर्थन और हर समर्थन के हर मुद्दे की कीमत मोल भाव कर वसूलते रहे. जेल जाने के डर से हर मुद्दे पर ब्लैकमेल कर मनमोहन के लिए हाथ उठाते रहे. मौसम विज्ञानी मुलायम अपने वकीलों व हलफनामों के माध्यम से कोर्ट में मुझे कांग्रेसी बताते रहे और वहीं दूसरी तरफ 2004 से 2014 तक मनमोहन की सरकार चलाने के बाद अब पूरे कुनबे के साथ मोदी जी के साथ हैं.

xxx

सौदागर मुलायम का भाजपा से चार दशक पुराना याराना यानि “धोती के नीचे खाकी”… 1999 में भाजपा सरकार के पतन के बाद देश में सेकुलर सरकार बनाने के लिए वामपंथियों की पहल पर कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रपति भवन गए प्रतिनिधि मंडल को मुलायम ने ऐन वक्त धोखा दे दिया. उन्होंने कहा कि वे विदेशी मूल की महिला को समर्थन नहीं देंगे. वामपंथियों सहित सारे सेकुलर दलों को धोखा देकर भाजपा के पाले में दिखे. 2002 में गुजरात दंगों के बाद हुए चुनाव में भाजपा को लाभ देने की नीयत से और सेकुलर वोटों के विभाजन के लिए बिना आधार पूरे गुजरात में चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. वहां भाजपा की सरकार बनवा दी.

2003 में भाजपा की कृपा से विधायकों की खरीद फ़रोख्त की. गुंडागर्दी से विधायकों का अपहरण कर बिना बहुमत की सरकार को उस समय के विधानसभा अध्यक्ष श्री केसरी नाथ जी की कृपा से मुलायम को शपथ दिला दी गयी. मुख्यमंत्री बनते ही मुलायम ने भाजपा का कर्ज उतारते हुए सुप्रीम कोर्ट में 18 नवम्बर 2003 में बाबरी विध्वंस मामले में हलफनामा दाखिल कर कहा कि 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाये जाने में कोई साजिश नहीं हुई थी. इस प्रकार मुलायम ने सरकारी तोते सीबीआई के हलफनामे को समर्थन कर दिया. बिहार चुनाव से पूर्व संयुक्त जनता दल परिवार के मुखिया बने मुलायम ने सीबीआई के डर से एन वक्त गठबंधन तोड़कर भाजपा को लाभ देने के लिए पूरे बिहार में मतदाताओ को भ्रमित करने व भाजपा की सरकार बनवाने का पूरा जी तोड़ प्रयास किया लेकिन बिहार के मतदाताओ ने मुलायम की “धोती के नीचे खाकी” को पहचान लिया.

कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल करने वाले विश्वनाथ चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यादव सिंह की कंपनी में राजा भैय्या और उनकी पत्नी ने लगाए 150 करोड़ रुपये!

Vishwanath Chaturvedi : राजा भैय्या ने यादव सिंह की कंम्पनी में लगाये 150 करोड़… राजा भैय्या के पी आर ओ राजीव यादव ने सी बी आई को सौंपे दस्तावेज… उत्तर प्रदेश में 2 लाख करोड़ के खादय् घोटाले (जिसकी जांच सीबीआई कर रही है) के समय मंत्री रहे रघुराज प्रताप सिंह सिंह द्वारा जिलों से वसूली गई रकम को ठिकाने लगाने के लिए यादव सिंह की फर्जी कंम्पनियो का सहारा लिया गया…

अब यादव सिंह की जाँच सीबीआई कर रही है… घोटाले के दौरान राजा भैय्या के पीआरओ रहे राजीव यादव द्वारा सीबीआई को सौंपे गए दस्तावेजों में राजा भैय्या व उनकी पत्नी के हस्ताक्षर से लगाई गई रकम का ब्योरा व उनके हस्ताक्षर मौजूद हैं.

कई बड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल कर चुके विश्वनाथ चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दैनिक जागरण वाले चोर ही नहीं, बहुत बड़े झुट्ठे भी हैं… देखिए इनका ये थूक कर चाटना

दैनिक जागरण के मालिक किसिम किसिम की चोरियां करते हैं. कभी कर्मचारियों का पैसा मार लेते हैं तो कभी कानूनन जो देय होता है, उसे न देकर फर्जी लिखवा लेते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक नियमानुसार दिया लिया जा रहा है. ऐसे भांति भांति के फर्जीवाड़ों और चोरियों का मास्टर दैनिक जागरण समूह अब तो बहुत बड़ा झुट्ठा भी घोषित हो गया है. यही नहीं, जब इसका झूठ पकड़ा गया तो इसे थूक कर चाटने को मजबूर किया गया और इसे ऐसा करना भी पड़ा.

जागरण वालों ने बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में बड़ी बड़ी होर्डिंग लगाकर खुद को नंबर वन बता रहे थे. अचानक एक रोज इन्होंने अपने ही अखबार में बड़ा बड़ा माफीनामा छापा कि हम लोगों को मालूम नहीं था कि हम लोग इस जिले में नंबर वन नहीं हैं इसलिए गलती से गलती हो गई भाइयों! नीचे पढ़िए वो माफीनामा जो जागरण के 13 अगस्त के मुजफ्फरपुर एडिशन में पेज नंबर दस पर बड़ा बड़ा प्रकाशित किया गया है. उपर अखबार का वो पेज नंबर दस है जिसमें नीचे दाहिने साइड बड़ा सा माफीनामा छपा दिख रहा है.

ऐसा नहीं है कि दैनिक जागरण के मालिकों को पता नहीं था कि वे मुजफ्फरपुर में नंबर वन नहीं हैं. इन्हें खूब पता था लेकिन चोरी और सीनाजोरी इनकी आदत है. सत्ता, कानून, सिस्टम सब कुछ को ये ठेंगे पर रखकर चलते हैं. पर जब दूसरे अखबारों ने जागरण के झूठे दुष्प्रचार पर आपत्ति कर वाद ठोंका तो जागरण को अपनी चोरी कबूल करनी पड़ी और मजबूरन माफीनामा छापना पड़ा.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

म.प्र. जनसंपर्क में पत्रकारों को बांटे गए लैपटाप में हुए घोटाले की जांच के आदेश

भोपाल। मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा तथाकथित वरिष्ठ एवं अधिमान्य पत्रकारों को बांटे गये लैपटाप में हुए घोटाले की जाँच के आदेश नवागत जनसंपर्क आयुक्त श्री अनुपम राजन ने दे दिए हैं। श्री राजन ने यह आदेश आज उनसे मिलने गये इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) नई दिल्ली से संबद्ध भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन भोपाल की एमपी यूनिट के एक प्रतिनिधि मंडल की मांग पर जारी किए हैं। यूनियन के प्रतिनिधि मंडल ने जनसंपर्क आयुक्त श्री राजन को एक ज्ञापन प्रस्तुत कर पत्रकारों की विभिन्न समस्याओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा करते हुए प्रदेश के पत्रकारों को वितरित किए गये लेपटाप में हुई गड़बड़ियों की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया था। इस पर उन्होंने इस मामले की तत्काल जाँच कराने के आदेश जारी किये।

शुरू होगी जनसुनवाई
प्रतिनिधि मंडल ने ज्ञापन में पत्रकारों की विभिन्न प्रकार की समस्याओं के निराकरण के लिए राज्य शासन के विभिन्न विभागों द्वारा हर सप्ताह की जा रही जनसुनवाई की भांति जनसंपर्क विभाग में भी यह व्यवस्था लागू किये जाने की मांग की, जिस पर आयुक्त श्री राजन ने तत्काल जनसुनवाई की व्यवस्था शुरू किये जाने के निर्देश संबंधित अधिकारी को दिये। संभवत: अगले माह से जनसंपर्क संचालनालय में जनसुनवाई प्रारंभ हो जाएगी, जिसमें पत्रकार साथी अपनी समस्याओं के निराकरण हेतु संबंधित अधिकारी को आवेदन प्रस्तुत कर सकेंगे।

बंद नहीं होगी आर्थिक सहायता, नि:शुल्क किया जाएगा बीमा
पत्रकारों को बीमारी के इलाज हेतु जनसंपर्क विभाग द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता बंद नहीं की जाएगी। प्रतिनिधि मंडल ने आयुक्त महोदय का ध्यान इस ओर आकर्षित कराते हुए यह मांग भी रखी थी कि पत्रकारों की बीमा योजना की आड़ में बंद की जा रही आर्थिक सहायता को जारी रखते हुए सामान्य बीमारी के इलाज हेतु दी जाने वाली आर्थिक सहायता राशि 20 हजार रुपए से बढ़ाकर 50 हजार रुपए तथा गंभीर बीमारी के इलाज में सहायता राशि 50 हजार रुपए से बढ़ाकर एक लाख रुपए की जाये। इस मांग पर आयुक्त श्री राजन ने सहमति जताते हुए इस व्यवस्था को जारी रखने के साथ ही सहायता राशि में बढ़ोत्तरी का आश्वासन दिया। साथ ही ऐसे पत्रकार साथी जो कि बीमा राशि की 25 प्रतिशत प्रीमियम राशि भी जमा करने की स्थिति में नहीं हैं उनका बीमा भी नि:शुल्क कराये जाने की बात कही।

श्रद्धा निधि राशि बढ़ेगी, खत्म होगी अधिमान्यता की बाध्यता 
प्रतिनिधि मंडल ने आयुक्त महोदय से पत्रकारों को शासन की ओर से दी जा रही श्रद्धा निधि की राशि 5 हजार रुपए प्रतिमाह से बढ़ाकर 15 हजार रुपए प्रतिमाह किये जाने की मांग भी रखी, जिस पर उन्होंने सहानुभूतिपूर्वक इस मांग को स्वीकारते हुए शासन के समक्ष प्रस्ताव भेजे जाने का आश्वासन दिया। जब श्री राजन का ध्यान इस ओर आकर्षित कराया गया कि सभी पत्रकार अधिमान्यता प्राप्त नहीं कर पाते हैं और जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ही पत्रकारिता को समर्पित कर दिया है ऐसे में केवल अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही श्रद्धा निधि प्रदान करने के शासन के फैसले से वे सभी पत्रकार श्रद्धा निधि के लाभ से वंचित हो जाएंगे जिन्होंने जिन्दगीभर पत्रकारिता की और सेवानिवृत्ति के बाद उनके समक्ष आजीविका चलाने का संकट पैदा हो गया है। इस पर आयुक्त श्री राजन ने श्रद्धा निधि योजना में अधिमान्यता की बाध्यता समाप्त करने का आश्वासन देते हुए यह प्रस्ताव राज्य शासन को भेजने की बात कही।

यूनियन के अध्यक्ष सलमान खान के नेतृत्व में जनसंपर्क आयुक्त श्री राजन से हुई सौहार्द्रपूर्ण चर्चा में आयुक्त महोदय ने यूनियन की अन्य मांगों पर भी शीघ्र ही कार्यवाही किये जाने का आश्वासन दिया। प्रतिनिधि मंडल में यूनियन के अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य भी बड़ी संख्या में शामिल रहे। इस अवसर पर संचालक जनसम्पर्क श्री अनिल माथुर भी मौजूद थे।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या ‘प्याज’ घोटाला छिपाने के लिए दिया गया फुल पेज का विज्ञापन?

नई दिल्ली: प्याज को लेकर घोटाले के आरोपों से घिरी दिल्ली सरकार ने घोटाले के आरोपों को नकार दिया है. लेकिन आज केजरीवाल सरकार ने अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन छापकर आजतक चैनल पर निशाना साधते हुए बदनाम करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है. बीजेपी ने कहा है कि करोड़ों का विज्ञापन देकर सरकार ने प्याज घोटाला छुपाने की कोशिश की है. केजरीवाल सरकार पर सस्ते में प्याज खरीदकर जनता को महंगा बेचने का आरोप लगा है. बड़ा सवाल ये है कि प्याज में घोटाला हुआ या नहीं.

प्याज की बिक्री पर कथित घोटाले के आरोपों के बीच केजरीवाल सरकार ने हर बड़े अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन छापकर न्यूज चैनल आज तक पर बदनाम करने के लिए झूठी खबरें चलाने का आरोप लगाया. विज्ञापन में लिखा है कि केंद्र सरकार ने नासिक से प्याज 18 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदी. केंद्र सरकार ने ही दिल्ली सरकार को प्याज 33 रुपये किलो की दर से बेची. दिल्ली सरकार ने 33 रुपये प्रति कोल के ऊपर ट्रांसपोर्टेशन, लोडिंग-अन लोडिंग और दुकनदारों के मार्जन मनी पर 7 रुपये अतिरिक्त खर्च करके भी जनता को तीस रूपये किलो की दर से प्याज उपलब्ध कराई. केंद्र सरकार ने अपनी दो एजेंसियों डीएमएस और सफल के माध्यम से प्याज 35 से 40 रुपये किलो तक बेची.

संजय सिंह ने बताया कि कोई घोटाला नहीं हुआ. घोटाले की फर्जी खबर दिखाई जा रही है. अगर ऐसी खबरें दिखाई जाएंगी तो जवाब देना होगा.. चाहे विज्ञापन देना पड़े. विज्ञापन में आंकडों के हवाले से वही दावा किया गया है जो घोटाले के आरोप में सफाई में दिल्ली सरकार कह चुकी है. अब बीजेपी कह रही है कि प्याज घोटाला छिपाने के लिए अखबारों में करोड़ों का विज्ञापन छपवाया गया. एबीपी न्यूज ने दिल्ली सरकार का विज्ञापन देने वाली संस्था डीएवीपी के रेट के आधार पर जब विज्ञापनों के खर्च का हिसाब लगाया तो ये 23 लाख 65 हजार रुपये तक पहुंचा. अगर ये अनुमान सही है कि विज्ञापन के खर्च के पैसे से 72 हजार 2 किलो प्याज आ जाता जो केजरीवाल सरकार एक दिन में 72 हजार लोगों को एक-एक किलो फ्री में बांट सकती थी. एबीपी न्यूज ने ईमेल भेजकर आप सरकार से विज्ञापन पर खर्च का हिसाब मांगा है जिसका जवाब अभी तक नहीं मिला है. दिल्ली सरकार के सूत्रों के मुताबिक प्रत्येक सरकारी काम नियमों के तहत होता है. तय DAVP रेट पर पारदर्शी तरीके से विज्ञापन जारी किया जाता है. विधिवत तरीके से सारी जानकारी सरकार से ली जा सकती है. इधर आरटीआई के जरिये खुलासा करके घोटाले का दावा करने वाले विवेक गर्ग ने एंटी करप्शन ब्रांच और उपराज्यपाल के पास घोटाले की शिकायत दर्ज कराई है. केजरीवाल सरकार पर 24.45 रुपये की दर से प्याज खरीदकर तीस रुपये किलो बेचने का आरोप लगा था जिसके बाद दिल्ली सरकार ने दस्तावेज जारी करके दावा किया था कि केंद्र सरकार से खरीदकर प्याज बाजार में चालीस रुपये के भाव का पड़ा था जिसे तीस रुपये किलो बेचा गया. बड़ा सवाल ये है क्या विज्ञापन देकर जनता के पैसे की बर्बाद की? (साभार- एबीपी न्यूज)

मूल खबर…

प्‍याज घोटाले का आरोप लगने पर केजरीवाल सरकार ने आजतक न्‍यूज चैनल पर निशाना साधते हुए अखबारों में निकाला पूरे पेज का विज्ञापन

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्‍याज घोटाले का आरोप लगने पर केजरीवाल सरकार ने आजतक न्‍यूज चैनल पर निशाना साधते हुए अखबारों में निकाला पूरे पेज का विज्ञापन

नई दिल्‍ली। दिल्‍ली में केजरीवाल सरकार पर कम दामों में प्‍याज खरीदकर ज्‍यादा दामों में बेचने के आरोप लगने के बाद आप की सफाई आई है। उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया ने रविवार को एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करते हुए कहा कि हमने प्‍याज 32.86 रुपए में खरीदे और बाजार में अपनी जेब से पैसे भरते हुए कम कीमत पर बेचे। जबकि केंद्र सरकार 33 रुपए में खरीदा प्‍याज ज्‍यादा दामों में बेच रही थी। उन्‍होंने आरोप लगाया कि यह सब लोगों का ध्‍यान हटाने के लिए किया जा रहा है। मीडिया को कागज दिखाते हुए उन्‍होंने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि हमने केंद्र की एजेंसी एसफएसी से प्‍याज खरीदे थे।

उन्‍होंने केंद्र पर आरोप लगाते हुए कहा कि, ‘यह पूरी तरह गलत है कि हमने नासिक से प्‍याज खरीदे। इसकी बजाय नाफेड और एसएफएसी ने केंद्र की तरफ से महाराष्‍ट्र से 18 रुपए प्रति किलो की दर से प्‍याज खरीदे और हमें यही प्‍याज 32.86 रुपए प्रति किलो की दर से बेचे। इसमें जो 14 रुपए अतिरिक्‍त हैं वो एडमिनिस्‍ट्रेटिव एक्‍सपेंस के रूप में बीजेपी सरकार ने चार्ज किए हैं। अगर कोई गड़बड़ है तो वो नफेड और एसएफएसी की तरफ से है।’

सि‍सोदिया ने आजतक न्यूज चैनल पर भी निशाना साधा और कहा कि वो लगातार झूठी खबर दिखा रहा है। सिसोदिया ने कहा कि भाजपा विपक्ष में है और उसका हक है सवाल करना जिसका हम जवाब देंगे लेकिन एक न्‍यूज चैनल इस तरह की झूठी खबरें कैसे दिखा सकता है। नफेड के दावे को लेकर उन्‍होंने कहा कि नफेड ने 19 रुपए किलो की कीमत पर प्‍याज देने के लिए कहा था तो हमने पत्र लिखा की आप दिल्‍ली में हमें यह उपलब्‍ध करा सकते हो जिसका अब तक कोई जवाब नहीं आया। सिसोदिया ने कहा कि ये जानबूझकर उस वक्‍त किया जा रहा है जब दिल्‍ली सरकार लगातार मेहनत करते हुए डेंगू पर नियंत्रण पाने लगी है।

इस मामले को लेकर फेसबुक पर आईं कुछ टिप्पणियां इस प्रकार है…

Sandeep Verma : कजरी सरकार तो विज्ञापन देने में माहिर सरकार है. मुझे लगता है यह इस मद में भाजपा को बखूबी पछाड़ सकते हैं. मोदी सरकार की बनियों के साथ मिलकर की जा रही मुनाफाखोरी का पर्दाफ़ाश जिस मीडिया को करना था, उसने उलटे कजरी को फंसाया.. डबल फायदा… मोदी सरकार की चमचागिरी और कजरी से विज्ञापन…

Sanjay Kumar Singh : ‘जंग लगी’ सरकार के राज में जनता का पैसा ऐसे ही बर्बाद होता है। मीडिया को टीआरपी की मलाई के साथ-साथ विज्ञापन की सौगात भी।

Mohammad Anas : आज पूरे देश के अख़बारों में अरविंद केजरीवाल ने प्याज़ मुद्दे पर फुल पेज विज्ञापन दिया है। केजरीवाल सरकार ने आजतक न्यूज़ चैनल पर झूठ बोलने का आरोप लगाया और केंद्र सरकार द्वारा प्याज़ की खरीद बिक्री पर विस्तार से बात की है। अरविंद केजरीवाल जब से दिल्ली पर काबिज़ हैं तब से वे कुछ न कुछ प्रपंच कर रहे हैं। जनता का पैसा बेहिसाब विज्ञापनों पर खर्च कर रहे हैं। राज्यपाल से दिखावे की लड़ाई और मोदी से मिलाई। आज निकाले गए विज्ञापनों का हिसाब लगाया जाए तो करोड़ों रूपए बनते हैं। यदि इन पैसों से प्याज़ खरीद कर दिल्ली वालों को दिया जाता तो कम से कम जनता को फायदा होता लेकिन मीडिया में झूठमूठ के मुद्दों पर बने रहने के लिए केजरीवाल ने जन हित को किनारे रख दिया। केंद्र कैसा है वह पता है, केजरीवाल कैसे हैं वह भी मालूम है। जिस लोकपाल के मुद्दे पर वे जंतर मंतर पर बैठे थे, उसे भूल चुके हैं। केजरीवाल की लड़ाईयों से केंद्र की निरंकुशता पर रत्ती भर फर्क़ नहीं पड़ा। अब धरने प्रदर्शन सिर्फ अपने आप को सही सिद्ध करने के लिए होते हैं। इन सबके बीच किसान/गरीब/आम जनता के मुद्दे पोस्टर बैनर तक सिमट जा रहे हैं। केजरीवाल- मोदी- मीडिया के चकल्लस से किसे फायदा हो रहा? सरकार को। सरकार में शामिल लोगों को। करोड़ों का विज्ञापन निकाल कर आरोप प्रत्यारोप करने से फुर्सत मिल जाए तो प्याज़ सस्ता करवा दीजिएगा।


इसे भी पढ़ें…

क्या ‘प्याज’ घोटाला छिपाने के लिए दिया गया फुल पेज का विज्ञापन?

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रियल स्टेट : कानपुर प्रेस क्लब के पत्रकार और सपा नेताओं के संरक्षण में करोड़ों का घोटाला

कानपुर (उ.प्र.) : समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं के संरक्षण में कानपुर रियल स्टेट में करोड़ों रुपए के घोटाले की खबर है। पीड़ित के अनुसार कानपुर प्रेस क्लब के नामी पदाधिकारी भी इस घोटाले में शामिल हैं। ‘हैप्पी होम्स इंफ्रा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड’ के माध्यम से जालसाजी कर लोगों को जम कर चपत लगाई है। अब शिकार हुए लोग दर-दर भटक रहे हैं। पीड़ितों में महिला सब इंस्पेक्टर उज्जवला गुप्ता, गिरीश कुलश्रेष्ठ, रितेश अग्रवाल, शिरीष सिंह, तुषार, मोईन लारी, अंकित सिंह आदि बताए गए हैं। मामले में सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं का नाम आने से पुलिस का रवैया ढुलमुल बना हुआ है। डीएम, कमिश्नर, आईजी, डीआईजी तक ने मामला संज्ञान में आने के बाद चुप्पी साध रखी है। मामले का खुलासा एस.आर.न्यूज़ द्वारा सोशल मीडिया में किये जाने के बाद एक पीड़ित को तो उसके बच्चों के अपहरण तक की धमकी दी गई है। 

पूरा घटनाक्रम इस प्रकार बताया गया है। कुछ शातिर दिमाग़ लोगों ने कानपुर में रियल स्टेट कम्पनी का आफिस खोल कर लखनऊ में उस ज़मीन पर फ्लैट बना कर देने का सब्ज़ बाग दिखाया और करोड़ों रुपए वसूल लिए, जो उसकी थी ही नहीं। शानदार आफिस और लम्बे चौड़े स्टाफ की चका चौंध में फंसे लोगों ने अपने खून पसीने की कमाई के पैसे चेकों और नक़द के माध्यम से कम्पनी में जमा करा दिए जिन्हे दो साल में फ्लैट बना कर देने के सपने दिखाए गए थे।

बाक़ायदा ग्राहकों को लखनऊ के शहीद पथ स्थित सुशांत गोल्फ सिटी की ज़मीन दिखाई गयी जिसमे हैप्पी स्कवायर नाम से बिल्डिंग बन्नी थी शुरू में तो लोग मुतमईन हो गए मगर कई महीने बीतने के बाद जब लोकेशन पर एक भी फावड़ा नहीं चला तो लोगों को शंका हुई। दफ्तर में पूछ ताछ शुरू हुई जिस पर आफिस में बैठे लोगों ने कुछ महीने बाद काम शुरू होने का आश्वासन दिया। इसी बीच कम्पनी में वरिष्ठ मैनेजर रफत जमाल को शक हुआ तो उन्हों ने अंसल ए पी एल अमर शहीद पथ लखनऊ स्थित सुशांत गोल्फ सिटी के दफ्तर में जानकारी की तो उनके होश उड़ गए। 

वहाँ से बताया गया की ये तो अंसल की जगह है और यहां किसी और को बिल्डिंग बनाने के लिए कोई भी ज़मीन न तो आवंटित की गयी है न ही बेचीं गयी है। रफत जमाल ने अपने साथियों को कानपुर में पूरा मामला बताया। इससे पूर्व रफत और उनके द्वारा गठित टीम कई महीनों में अलग अलग लोगों से फ्लैट के नाम पर करोड़ों रूपये एडवांस के नाम पर वसूल चुकी थी। रफत व कर्मचारियों ने कंपनी के निदेशकों से जानकारी मांगी तो गोलमोल जवाब मिला। स्टाफ ने अपने द्वारा जमा कराया गया पैसा वापस माँगा तो उन्हें लालच देकर चुप रहने को कहा गया।

बाद में रफत जमाल और उनके जूनियर शिरीष सिंह ने कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस ने शिरीष की तहरीर पर कम्पनी के तीन निदेशकों राजीव सिंह, नक़ी रज़ा और मोहित बाजपाई के विरुद्ध धारा ४०६, ४२०, ५०४, ५०६ और १३८ के तहत मुक़दमा लिख लिया। रफत जमाल की तहरीर पर उक्त  तीनो निदेशकों के खिलाफ धरा ४०६, ४२०, ५०४ और ५०६ के तहत मुक़दमा पंजीकृत कर दिया गया। इन दोनो एफआईआर के बाद सिविल लाइंस स्थित कार्यालय बंद कर निदेशक घर बैठ गए और लोगों के फ़ोन उठाना बंद कर दिया।

इस तरह शुरू हुआ रीयल स्टेट माफिया का खेल

वर्ष 2012 में मकानो को कमीशन पर  बिकवाने वाले नौबस्ता निवासी राजीव सिंह ने मोहित बाजपेई और नक़ी राजा के साथ मिल कर हैप्पी होम्स इंफ्रा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की स्थापना की। कानपुर सिविल लाइंस भार्गव स्टेट में शानदार आफिस खोला और मार्केटिंग के लोगों को अपाइंट किया। प्रचार में बताया गया की लखनऊ के अंसल गोल्फ सिटी में हैप्पी स्क्वायर बिल्डिंग बन रही है, जिसमे लोग बुकिंग करा कर अपना फ्लैट सुरक्षित करा लें। इस झांसे में कानपुर, उन्नाव सहित कई ज़िलों के लगभग सौ लोगों ने 8 लाख से 29 लाख तक का भुगतान नक़द और चेक के माध्यम से कंपनी को कर दिया। जब राज़ खुला तो लोग अपना पैसा वापस माँगने लगे। कम्पनी ने बड़े ही शातिराना ढंग से सब को पोस्ट डेटेड चेकें थमा दीं। एक दो महीने बाद की दी गयीं चेकें बैंकों से बाउंस हो गईं। इस बीच पीड़ित ने आफिस के चक्कर लगाने शुरू किये तो वहाँ ताला मिला। कई लोगों ने कोतवाली में शिकायत की मगर पुलिस ने मामले में कोई रूचि नहीं दिखाई जिस के चलते बहुत से लोग कोर्ट के माध्यम से मुक़दमा लिखाने में व्यस्त हो गए। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘व्यापमं’ पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राजनाथ की आपात बैठक, शाम को राष्ट्रपति से मिलेंगे, रामनरेश का इस्तीफा संभव

नई दिल्ली : व्यापमं घोटाले में गवर्नर रामनरेश यादव को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस मिलने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इमरजेंसी बैठक कर रहे हैं। इसमें गवर्नर के भविष्‍य को लेकर फैसला हो सकता है। किसी इस तरह के निर्णय पर अंतिम मुहर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश से लौटने के बाद अगले हफ्ते हो सकती है। आज शाम 6 बजे गृह मंत्री राजनाथ सिंह राष्ट्रपति से मुलाकात करेंगे। व्यापमं घोटाले मे यादव पर गंभीर आरोप लगे हैं। केंद्र सरकार राज्यपाल रामनरेश यादव को आज सुप्रीम कोर्ट से नोटिस जारी होने के बाद इस्तीफा देने को कह सकती है। 

उधर, दिल्‍ली में बुधवार देर रात अनंत कुमार ने अपने घर पर मध्‍यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ बैठक की। मध्य प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष नंदकुमार चौहान को भी इस बैठक के लिए बुलाया गया। चौहान पुणे में थे। वे विशेष विमान से दिल्ली पहुंचे। बैठक में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे भी मौजूद थे। सूत्रों के अनुसार, शिवराज ने व्यापमं मामले में अपनी सरकार का पक्ष रखा। चर्चा यह भी है कि मध्य प्रदेश के कई मंत्री इस दौरान दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और सीनियर नेताओं के संपर्क में हैं।

मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि मोदी सीएम शिवराज सिंह चौहान और मध्‍य प्रदेश के पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से भी काफी नाराज हैं। मोदी के ऑर्डर पर ही अब इस मामले की जांच पड़ताल की जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार को सौंपी गई है। 

सूत्रों के मुताबिक जिस तरह से व्यापमं मामले को लेकर मीडिया में खबरें चल रही हैं उससे पार्टी की इमेज का बंटाढार हो रहा है। सोशल मीडिया पर भी एमपी सरकार को लेकर लोग कमेंट कर रहे हैं। सीएम चौहान ने इस मामले में एक्शन लेने में काफी देर कर दी। मोदी इसी से नाराज हैं। कैलाश विजयवर्गीय ने पत्रकार अक्षय सिंह की मौत पर जो बयान दिया उससे भी मोदी बेहद नाराज हैं। 

उधर, बताते हैं कि व्यापमं घोटाले के चर्चा में आने के बाद प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सर्वे करा रहा है। संघ के कुछ सीनियर लोग भाजपा और अन्य संगठनों के लोगों से पूरे मामले पर उनकी राय ले रहे हैं। इसके अलावा एक टीम सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर पोस्ट पर भी नजर रखे हुए है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत भोपाल आकर इस सर्वे का फीडबैक लेंगे। भागवत की मौजूदगी में रविवार को संघ की बैठक होगी। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

व्यापम घोटाले में एक बड़ा नाम भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का भी!

सुधांशु त्रिवेदी का व्यापम घोटाले से क्या रिश्ता है? क्या टेलीविज़न पर अक्सर दिखने वाला बीजेपी का न भूलने वाला चेहरा सुधांशु त्रिवेदी, व्यापम घोटाले से किस प्रकार जुड़े है? क्या अभी सुधांशु त्रिवेदी व्यापम में बड़े पद पर नहीं थे?

इन सारे प्रकरण से मध्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री अनभिज्ञ नहीं हैं। पार्टी की छवि और साख बचाने की नीयत से उन्होंने छुपी साध ली है, ऐसा दावा है इण्डिया संवाद का। मगर मौजूदा हालत और अंनगिनत मौतों के बाद प्रधानमंत्री ने जो रिपोर्ट तलब की है, उसमे सुधांशु त्रिवेदी, मास्टरमाइंड पंकज त्रिवेदी, पियूष त्रिवेदी और सुधीर शर्मा के सम्बन्धों की विस्तृत जानकारी मांगी गयी है।

यह कैसी विडंबना और मूर्खता है कि भाजपा व्यापम पर पार्टी का बचाव उसी आदमी से करवा रही है जो स्वयं व्यापम घोटाले से जुड़ा हुआ है। सूत्रों की मानें तो सुधांशु त्रिवेदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के काफी करीबी और और गृह मंत्री राजनाथ सिंह से आशीर्वाद प्राप्त हैं, जो मध्य प्रदेश के कभी सबसे बड़े घोटाले में शामिल कई प्रमुख खिलाड़ियों के साथ परिचित थे। त्रिवेदी अब अधिक व्यापक रूप में टीवी स्क्रीन पर पार्टी का बचाव करने के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं, “भाजपा के एक पदाधिकारी ने कहा।”

सूत्र बताते हैं कि सुधांशु त्रिवेदी अपने रसूख का इस्तेमाल कर मध्य-प्रदेश भवन, नई-दिल्ली में बतौर सम्पर्क अधिकारी (व्यापम) कार्यरत थे और उसी दौरान उनका सम्पर्क पंकज त्रिवेदी से हुआ जो PEB में बतौर परीक्षा नियंत्रक के पद पर आसीन थे। पंकज त्रिवेदी के माध्यम से सुधांशु त्रिवेदी मध्य-प्रदेश के मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा और रेत माफिया सुधीर शर्मा के सम्पर्क में आये जो सत्ता की दलाली करता था। अब टीम पूरी तरह से घोटाला करने और नौकरी से लालसा रखने वालों और मेडिकल कॉलेज में दाखिले की इच्छा रखने वाले लोगो के लिये काम करने को तैयार था। कहते हैं, व्यापम कुछ ही दिनों में उद्योग का रूप ले चुका था।

और आज जो कुछ हो रहा है, वह दुनिया के सामने है। सूत्रों का कहना है, मध्य प्रदेश में क्षेत्रीय अखबारों ने जब पूरे घोटाले को उजागर करना शुरू किया और ताबतोड़ गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हुआ तो पिछले साल पंकज त्रिवेदी की गिफ्तारी के उपरान्त सुधांशु त्रिवेदी पार्टी के प्रवक्ता बनकर चुपचाप व्यापम में अपने कार्यभार से इस्तीफा दे चले थे।

असद जफर के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडिया संस्थानों में चुपचाप चल रहा ‘व्यापम’ जैसा घिनौना खेल

इन दिनों देशभर में ‘व्यापम’ भर्ती घोटाले पर बवाल मचा है। ये घोटाला अपने नज़दीकी, रिश्तेदार या अयोग्य लोगों को धनबल के आधार पर सरकारी नौकरियों और मेडिकल-इंजीनियरिंग में प्रवेश दिलाने का है। घोटाले के उजागर होने के बाद से ही देशभर में मानो भूचाल आ गया है। ऐसे में मीडिया संस्थानों के आंतरिक भर्ती-भ्रष्टाचार पर कहावत याद आती है कि जिसके घर शीशे के होते हैं, पत्थरों से वैर नहीं पालता। बीते दिनों डीडी न्यूज़ में 10-12 पदों के लिए 500 से ज़्यादा अनुभवी पत्रकारों की भर्ती परीक्षा आयोजित की गयी थी, जिसके पैटर्न की सूचना प्रकाशित करना भी प्रसार भारती ने उचित नहीं समझा। राज्यसभा टीवी ने अयोग्य लोगों को भर्ती करने का अभियान जारी रखा हुआ है। इन भर्ती परीक्षाओं में ओएमआर शीट का इस्तेमाल न किये जाने, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता संदिग्ध होने सहित कईं खामियां देखी गयीं जो व्यापम की तर्ज पर घोटाले की तरफ इशारा करती हैं। निजी मीडिया संस्थानों में तो और भी बुरे हाल हैं। ताज़ा मामला देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान होने का दावा करने वाले ज़ी न्यूज़ समूह का है। आज तक, इण्डिया टीवी से लेकर एनडी टीवी और न्यूज़ नेशन से लेकर न्यूज़ 24 तक ऐसा कोई मीडिया संस्थान नहीं जो हायर एन्ड फायर का घिनौना खेल खेल कर हज़ारों होनहार पत्रकारों का भविष्य तबाह करने की इस दौड़ में शामिल न हो। 

व्यापम की तर्ज पर हो रहा ये भर्ती घोटाला तो व्यापम से भी प्राचीन है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस घोटाले का पता सबको है लेकिन आवाज़ उठाने की हिम्मत किसी में नहीं। सवाल ये है कि मीडिया संस्थानों में हो रहे पत्रकार भर्ती घोटाले में सब मौन क्यों हैं? ये जानकर शायद आश्चर्य हो कि बिना सिफारिश या पहुँच के पत्रकारिता में आपको इंटर्न भी नहीं रखा जाता। मध्य और उच्च पदों पर पत्रकारों की भर्ती सिफारिश और लॉबिंग के आधार पर होती है। यहां पत्रकारों की भर्ती के लिए कोई नियम कायदे नहीं है। ज़्यादातर मामलों में तो भर्ती के लिए कोई विज्ञापन तक जारी नहीं किया जाता। सारी भर्तियां अंदरखाने ही कर ली जाती हैं। यही कारण है कि आपको तमाम सरकारी मीडिया संस्थान जैसे दूरदर्शन, राज्यसभा टीवी, लोकसभा टीवी, आकाशवाणी इत्यादि में नेताओं और अफसरों के ऊंची पहुँच वाले रिश्तेदार और सगे सम्बन्धी आसानी से मिल जाएंगे। 

आलम ये है कि सरकारी मीडिया संस्थानों में बड़ी संख्या में पत्रकारों के पद खाली होने के बावजूद इक्का-दुक्का छोटे पदों पर ही भर्ती का विज्ञापन जारी होता है। ये सब इस रणनीति के तहत किया जाता है ताकि शेष बड़े पदों पर पिछले दरवाज़े से अपने लोगों की इंट्री का रास्ता तैयार किया जा सके। कुछ इसी तर्ज़ पर बीते दिनों डीडी न्यूज़ में भी आनन-फानन में कुल जमा 10-12 पदों के लिए 500 से ज़्यादा अनुभवी पत्रकारों की भर्ती परीक्षा आयोजित की गयी थी।  जिसके पैटर्न की सूचना प्रकाशित करना भी प्रसार भारती ने उचित नहीं समझा। इस परीक्षा में ओएमआर शीट का इस्तेमाल ना किये जाने, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता संदिग्ध होने सहित कईं ऐसी खामियां देखी गयीं जो व्यापम की तर्ज पर घोटाले की तरफ इशारा करती हैं।

संसदीय चैनल राज्यसभा टीवी तो इससे भी एक कदम आगे निकला। तमाम विवादों के बावजूद राज्यसभा टीवी ने अयोग्य लोगों को भर्ती करने का अभियान जारी रखा हुआ है। कुछ माह पहले हुए बेहद विवादित और संदिग्ध कहे जा रहे पत्रकार भर्ती इंटरव्यू के आधार पर चयनित उन तमाम लोगों को राज्यसभा टीवी ने व्यापम की तर्ज पर ही नौकरी दे दी है जिनकी योग्यता पर ही सवाल थे।जब राज्यसभा टीवी ने अपने संदिग्ध साक्षात्कार के बाद परिणामों की घोषणा की तो अप्रत्याशित परिणाम देखकर लोग चौंक गए….क्योंकि चयनित उम्मीदवारों से कहीं अधिक अनुभवी और योग्य उम्मीदवार एक दुसरे का मुंह ताकते रह गए थे। ये इंटरव्यू इस लिए संदिग्ध हुआ था क्योंकि भर्ती के लिए हुए इस साक्षात्कार में तमाम नियमों को ताक़ पर रखकर राज्यसभा टीवी ने एक ही दिन में सैंकड़ों उम्मीदवारों के इंटरव्यू लेने का रिकॉर्ड बनाया था। और जिन लोगों को अंतिम रूप से चयनित किया गया है वे साक्षात्कार पैनल शामिल अफसरों के बेहद नज़दीकी बताए जाते हैं।

निजी मीडिया संस्थानों में तो और भी बुरे हाल हैं। क्योंकि ये संस्थान पूरी तरह कायदे कानूनों से ऊपर हैं। यहाँ तो ‘अंधा बांटे रेवड़ी अपने अपनों को दे’ वाली कहावत चरितार्थ होती है। क्योंकि ये संस्थान कभी भी भर्ती का कोई विज्ञापन जारी नहीं करते। आप सोच रहे होंगे कि बिना विज्ञापन जारी किये ये पत्रकारों की भर्ती कैसे करते हैं? दरअसल यहां ठेके पर पत्रकार रखे जाते हैं। जिसके नियम और कायदे ‘ठेके’ पर काम करने वाले ‘बंधुआ मजदूरों’ की ही तरह होते हैं। किसी एक व्यक्ति को सर्वे सर्वा बना दिया जाता है। उसे नियुक्ति के सारे अधिकार दे दिए जाते हैं। फिर नियुक्ति की प्रक्रिया में कोई नियंत्रण या पारदर्शिता नहीं होती। ये सर्वे सर्वा संपादक या मैनेजर होता है जो भर्ती की इस खुली छूट का भरपूर फायदा उठाता है। सबसे पहले ये अपने रिश्तेदारों की बड़े पदों पर भर्ती करके अपनी कुर्सी सुरक्षित करता है। फिर इन्हीं रिश्तेदारों के ज़रिये  शुरू होता है व्यापम की ही तरह का भर्ती घोटाला, जिसमें पद, पैसा, पावर और सिफारिश का कॉकटेल तैयार होता है। जिसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है।

यहाँ हायर और फायर का नियम भी चलता है, या यूँ कहिये हायर एन्ड फायर की खुली छूट है। बिना कोई कारण बताए ही सैकड़ों पत्रकारों को एक साथ यहाँ बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। सामूहिक रूप से बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाले जाने पर भी कहीं क़ोई शोर नहीं होता। उसके बाद फिर पिछले दरवाज़े से नई भर्तियां करके मोटी कमाई की जाती है। इस तरह इस खेल में मालिक और मैनेजर दोनों को फायदा होता है। मालिक को हर वक्त कम पैसों में काम करने वाले पत्रकार मिलते रहते हैं। और संपादक और मैनेजरों को लगातार होने वाली नई भर्तीयों से मोटी आमदनी। लंबे समय तक पत्रकारों के ना टिक पाने से उन पर खर्च होने वाला वेतन भत्ता, पीएफ, और अन्य देनदारियों से मुक्ति मिल जाती है।शोषण के इस खेल के कुछ और भी फायदे हैं जिसे आसानी से समझा जा सकता है।

ताज़ा मामला देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान होने का दावा करने वाले ज़ी न्यूज़ समूह का है। जहां पिछले दिनों ही बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला गया है। आपको शायद यकीन ना हो लेकिन हायर एन्ड फायर के इस खेल के ढेरों फायदे हैं और इस खेल में सबसे तेज़ कहा जाने वाला आज तक, भी पीछे नहीं है। इण्डिया टीवी से लेकर एनडी टीवी और न्यूज़ नेशन से लेकर न्यूज़ 24 तक ऐसा कोई मीडिया संस्थान नहीं जो हायर एन्ड फायर का घिनौना खेल खेल कर हज़ारों होनहार पत्रकारों का भविष्य तबाह करने की इस दौड़ में शामिल ना हो। इन संस्थानों के सर्विस रिकॉर्ड इस पूरे घोटाले को बेनकाब करने के लिए काफी हैं।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘व्यापमं’ उर्फ एक व्यापक ‘राष्ट्रवादी’ घोटाला… क्योंकि यहां घोटाले के साथ दनादन हत्याएं भी होती हैं!

Krishna Kant :  व्यापमं घोटाले की जांच से जुड़े मेडिकल कॉलेज के डीन भी निपट गए. पत्रकार अक्षय सिंह को कल निपटाया गया था. अब तक देश में जो घोटाले हुआ करते थे उनमें हत्याएं नहीं होती थीं इसलिए वे राष्ट्रवादी नहीं थे.. उनसे भारत की नाक कट रही थी. देश शर्मिंदा हो गया था. राष्ट्र की सोच बड़ी हो इसलिए घोटाला भी बड़ा होना चाहिए. दो चार आरोपियों वाले घोटाले शर्मिंदा कर देते हैं. इसलिए व्यापक तौर पर व्यापमं हुआ है. 2500 आरोपी. 500 फरार 55 केस. 45 हत्याएं. जनता को भी घोटाला सोटाला में टांग न अड़ाने के लिए सबक मिलना चाहिए. मजबूत भारत बनाना है, इसलिए रोज एक हत्या. इस तरह रोज एक प्राण की आहुति देने से घोटालों के देवता प्रसन्न होते हैं और राष्ट्र तरक्की करता है.

देश में अब तक कमबख्त कांग्रेसियों का शासन था. उन्होंने देश को बदनाम किया. उन्होंने न बाजारवाद ठीक से लागू किया, न ही घोटाला ठीक से किया. अडाणी की तरह कांग्रेस एक भी घोटाला नहीं कर सकी कि करोड़ों अरबों पार कर जाओ और लोग टापते रहें. घोटाला का खुला खेल ऐसा फर्रुखाबादी हो कि जिससे भी खतरा महसुसाए, निपटाते जाओ. मजबूत राष्ट्र बनाना था न? मजबूत राष्ट्र कैसे बनता है? ऐसे कि प्रधानसेवक नौटंकी करे करता जाए. आलोचना करने वालों को भक्तों की फौज गरियाती जाए. बेटी बचाने का नारा लगाती जाए. बेटियों को गलीज गालियों से नवाजती जाए. लुटेरों की फौज लूटती जाए. लोगों को निपटाती जाए. एक इंदिरा गांधी मजबूत थीं. उनकी मजबूती भी देश पर धब्बा साबित हुई. एक साहेब हैं. वे परधान सेवक बनने से पहले ही देश पर धब्बा साबित हो चुके थे. परंतु लोगों को अच्छे दिन चाहिए थे. गुजरात में 41 प्रतिशत बच्चे भुखमरी के शिकार हैं. लोगों को और अच्छे दिन चाहिए थे. अच्छे दिन आ गए. सेल्फी है. गालियां हैं. हत्याएं हैं, तालियां हैं. सेल्फी सम्राट को माइक मिल जाए तो अभी फेंक फेंक के उलाट देंगे, लेकिन हत्याओं पर ऐसे चुप्पी साधेंगे कि मनमोहन का मौन भी शर्मा जाए. भक्तों! बोलो- भारत माता की जय, वंदे मातरम, नमो व्यापमं.

Sandip Naik : जबलपुर मेडिकल कॉलेज के दूसरे डीन है डा अरुण शर्मा जिनकी रहस्यमय ढंग से अभी मृत्यु हुई. पहली मौत डा साकल्ले की हुई थी. अजीब देश और व्यवस्थाएं है जिस प्रदेश के लोग एक के बाद एक मर रहे हो वहाँ समूची न्यायपालिका, सुप्रीम कोर्ट, मानव अधिकार आयोग और प्रणव मुखर्जी जैसे विद्वान् राष्ट्रपति की चुप्पी आश्चर्यजनक नही लगती? और ऊपर से 45 मौतों के बाद मुख्यमंत्री बने रहना कैसे किसी लोकतांत्रिक पद पर बैठे सूबे के सरदार को अच्छा लगता है. मोदी इसलिए चुप है कि वे कांग्रेस द्वारा उठाये मुद्दे के बाद शिवराज को बर्खास्त नही कर रहें क्योकि इससे उनकी साख और अमित शाह की चौकड़ी की किरकिरी हो जायेगी, बिहार चुनावों के मद्देनजर वे इन हत्याओं को बर्दाश्त कर रहे है और मन मोहन से ज्यादा मजबूर है इस समय !!! वसुंधरा, शिवराज और रमनसिंह के दबाव में दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का 56 इंची सीने वाला प्रधानमन्त्री !!! मप्र में भाजपा के बाकी लोगों का जमीर मर गया है, और संघ चुप इसलिए कि सुरेश सोनी जी का नाम भी शामिल ही था, लिहाजा सबसे भली चुप. कैसा देश है, सारा सच सामने है पर कोई कार्यवाही नही. अभी भी आपमें देश भक्ति शेष है? कहाँ है भक्त?

पत्रकार द्वय कृष्ण कांत और संदीप नाईक के फेसबुक वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें…

सोशल मीडिया का कोई पत्रकार अगर व्यापमं घोटाले की पड़ताल करने में मरा मिलता तो लोग उसे दलाल कहते!

xxx

अक्षय की मौत : टीवी पत्रकारों का संगठन बहुत ज़रूरी है पर ज्यादातर में हिम्मत ही नहीं

xxx

कैलाश विजयवर्गीय को इतनी चुल्ल क्यों है व्यापम की मौतों को स्वभाविक या आत्महत्या बताने की?

xxx

शिवराज या यमराज: व्यापम घोटाले में CM से लेकर राज्यपाल तक संदेह के घेरे में

xxx

व्यापमं घोटाला : पत्रकार के बाद मेडिकल कॉलेज के डीन की मौत

xxx

पत्रकारों ने शिवराज सिंह चौहान से पूछा- व्यापमं घोटाले और मौतों की सीबीआई जांच क्यों नहीं करवाते?

xxx

‘#खूनी_व्यापम’ ट्विटर पर टाप ट्रेंडिंग में सबसे उपर, CM शिवराज की भूमिका पर उठे सवाल

xxx

निगम बोध घाट पर अक्षय का अंतिम संस्कार, मौत की एसआईटी जांच कराएंगे एमपी के सीएम शिवराज सिंह चौहान

xxx

अक्षय सिंह की मौत पर वरिष्ठ पत्रकारों की त्वरित प्रतिक्रियाएं

xxx

अक्षय की लाश अब भी मध्य प्रदेश से लेकर गुजरात के आसपास के बीच एंबुलेंस में टहल रही है.. शेम शेम आजतक!

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अक्षय की लाश अब भी मध्य प्रदेश से लेकर गुजरात के आसपास के बीच एंबुलेंस में टहल रही है.. शेम शेम आजतक!

Yashwant Singh : शेम शेम आजतक. खुद को नंबर वन बताने वाला ये नपुंसक चैनल फिर वही ड्रामा कर रहा है जो सुरेंद्र प्रताप सिंह के मरने के बाद किया था. लाश मौत हत्या को लेकर सूचनाएं दबा रहे हैं या गलत सूचनाएं दे रहे हैं. अब तक ये लोग अपने चैनल पर सिर्फ मरने की सिंपल खबर दिखा रहे हैं. कोई गुस्सा नहीं. कोई विरोध नहीं. कोई तनाव नहीं. आजतक के पत्रकार अक्षय सिंह को व्यापमं घोटाले के कवरेज के दौरान मारे जाने की सूचना मिलने के बाद यह चैनल अभी तक उनकी लाश को झाबुआ के सरकारी अस्पतालों से लेकर नजदीकी प्राइवेट अस्पतालों तक और पचास किमी पड़ोसी गुजरात राज्य के दहोद तक में घुमा रहा है और शिवराज सिंह से निष्पक्ष जांच कराने के लिए पत्र लिखकर अनुरोध कर रहा है.

अक्षय तो मर गए लेकिन छोड़ गए अपनी लाश अरुण पुरी को बारगेनिंग करने के लिए. बुड्ढा अरुण पुरी अब अक्षय की लाश पर खेल रहा है. उसके भीतर तनिक भी नैतिकता होती तो वह अपना खुद का चार्टर प्लेन भेज कर प्राथमिक जांच के बाद तुरंत अक्षय को दिल्ली ले आता और यहां के डाक्टरों से इलाज कराता या पोस्टमार्टम कराता. ये हाल है खरबों रुपये हर साल कमाने वाले निष्पक्ष कहे जाने वाले भारतीय मीडिया मुगल का. ऐसा लोग कह रहे हैं कि ये सब आजतक वाले अक्षय की मौत का सौदा करने के लिए उनकी लाश को घुमा टहला रहे हैं और व्यापमं के बड़े घोटालेबाजों से सीधी इकट्ठा बारगेनिंग कर रहे हैं.

अक्षय की लाश अब भी गुजरात से लेकर मध्य प्रदेश के आसपास के बीच एंबुलेंस में टहल रही है. अक्षय शादीशुदा नहीं थे. उनकी बूढ़ी मां उनके साथ रहती थीं. जब उनकी डेथ की सूचना आजतक वालों को मिली तो वे लोग बजाय कार्रवाई करने के, अक्षय के घर गए. अक्षय अपनी मां से बोल गए थे कि मेरे बगैर गेट मत खोलना, चाहें जो आ जाए. अक्षय बड़े क्राइम रिपोर्टर थे और वो जानते थे कि दिल्ली में अकेले रहने वाले वृद्धों के साथ क्या क्या घटनाएं होती हैं. जब उनकी बूढ़ी मां ने दरवाजा नहीं खोला तो उनकी बहन का नंबर आजतक वालों ने मैनेज किया और उनको फोन किया. उनकी बहन को जाने क्या क्या समझाया गया लेकिन सच यही है कि अक्षय की लाश अब तक घोटालेबाजों के इलाके में घूम रही है और वही सब जांच कर रहे हैं. धन्य है अरुण पुरी और महाधन्य है आजतक. अब कहना पड़ रहा है कि कहीं ये लोग भी तो व्यापम घोटाले के हिस्से नहीं?

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


इन्हें भी पढ़ें…

व्यापमं घोटाला कवर करने गए आजतक के स्पेशल करेस्पांडेंट और एसआईटी हेड अक्षय सिंह की झाबुआ में लाश मिली

xxx

व्यापमं घोटालेबाजों ने अबकी पत्रकार अक्षय का किया शिकार… अब तो जागो हिंदुस्तान!

xxx

RIP Akshay Singh… You are a war hero…

xxx

अक्षय श्रद्धांजलि : किसी भी थाने में बेधड़क स्टिंग करता था… कोई उसे देख नहीं पाया… कमाल का लड़का है…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अक्षय श्रद्धांजलि : किसी भी थाने में बेधड़क स्टिंग करता था… कोई उसे देख नहीं पाया… कमाल का लड़का है…

Padampati Sharma : ऐसे ही अगर तुम्हे जाना था अक्षय… तो तुम मिले ही क्यों थे? जी हां, मैं बात कर रहा हूं एक जाबांज, दिलेर पत्रकार की जिसकी हिम्मत के किस्से उसके साथी ही नहीं उसके सीनियर्स भी सुनाते नहीं थकते. अपनी मां का लाडला और एक बहन का प्यारा भाई आजतक का विशेष संवाददाता वही अक्षय सिंह कर्तव्य निभाते निभाते शहीद हो गया या यूं कहूं कि व्यापम घोटाले का वह एक और शिकार बन गया.

शाम आठ बजने को थे… मैं वाशरूम से निकला ही था कि विमला ने बताया कि मध्य प्रदेश में एक पत्रकार की रहस्यमय मौत हो गयी. व्यापम घोटाले की एक शिकार हो चुकी मेडिकल की छात्रा के परिवार का वह इंटरव्यू कर रहा था कि मुंह से झाग फेकने लगा और अस्पताल में उसकी मौत हो गयी. यह खबर अपने आप में ही झटका था पर डिनर करते समय पहला कौर मुंह में डाला ही था कि सामने देखा कि अरे अरे ये तो वही मासूम चेहरे और दिल फरेब मुस्कान का स्वामी और सामने वाले को झट से अपना बना लेने वाला अक्षय है.

पिछली 26 जून की ही तो बात थी. अनुज सहयोगी दीपक शर्मा ने जब मेरा परिचय प्रेस क्लब में अक्षय से कराया तब मैं नहीं जानता था कि यह पहली मुलाकात अंतिम बन कर रह जाएगी. हम घंटों बतियाते रहे. साथ में दोसा खाया और उसके आग्रह पर ही मैंने लेमन टी भी पी. बाहर बरसात हो रही थी पुराना यार हरपाल बेदी भी टेबल पर साथ आ गया. निकले तो अक्षय ने कहा कि सर आपको मैं घर छोड़ना चाहता हूं. आप मीटिंग निबटा लीजिए. शाम को मैं आपको छोड़ते हुए नोएडा आफिस चला जाऊंगा.

साथ जुड़ गए थे वरिष्ठ पत्रकार भाई संजय पाठक. देरी तक बातचीत होती रही. मैं और दीपक साथ निकले. किसी एसाइनमेंट पर जाने के पहलेअक्षय से तय हो गया था कि चाणक्य सिनेमा के सामने मिलते हैं. दुर्योग से अक्षय जाम में फंस गया और दीपक को मुझे छोड़ना पड़ा रेसकोर्स मैट्रो तक. दीपक बता रहा था, ‘सर ऐसे निडर मैने कम ही देखे हैं. किसी भी थाने में बेधड़क स्टिंग करता था और आज तक कोई उसे देख नहीं पाया. कमाल का लड़का है.’ 

यार दीपक, तुम्हारा योग्य शिष्य ऐसे कैसे चला गया! सत्तर और अस्सी का दशक याद आ रहा है जब कई सीबीआई जांचों में रहस्यमय दुर्घटनाओं में जाने जाती रही थीं. क्या हो रहा है यह? कौन साजिश कर रहा है?  किसने इस तरह का अमानवीय तरीका अपनाया है? क्या इसमें प्रदेश सरकार से जुड़ा शख्स है या है कोई या कई माफियों के गिरोह. कौन सच्चाई दबाना चाहता है? कौन इन मौतों के रहस्य पर से पर्दा उठाएगा? अक्षय की बलि के मायने मीडिया पर भी नजर? क्या है वास्तविकता? सीबीआई जांच क्या अब भी जरूरी नहीं? भाई अक्षय मैं समझ सकता हूं तुम गये ही नहीं मां के बुढापे की लाठी भी छिन गयी. बहन के आंसूं थम नहीं रहे हैं. हे परमात्मा! ऐसा दुख तो किसी दुश्मन को भी मत देना ….आमीन!

कई अखबारों और न्यूज चैनलों में संपादक रह चुके वरिष्ठ खेल पत्रकार पदमपति शर्मा के फेसबुक वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें….

व्यापमं घोटाला कवर करने गए आजतक के स्पेशल करेस्पांडेंट और एसआईटी हेड अक्षय सिंह की झाबुआ में लाश मिली

xxx

व्यापमं घोटालेबाजों ने अबकी पत्रकार अक्षय का किया शिकार… अब तो जागो हिंदुस्तान!

xxx

RIP Akshay Singh… You are a war hero…

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

RIP Akshay Singh… You are a war hero…

Shesh Narain Singh : Was Akshay Singh of AAJ TAK reporting from a conflict zone that a bright professional had to lose his life? Why are the political establishment not taking vaapam scam seriously? RIP Akshay Singh. You are a war hero.

Mukesh Yadav : व्यापम मर्डर! आजतक के पत्रकार अक्षय सिंह के मुंह से खड़े-खड़े अचानक झाग आने लगा!…अचानक झाग कैसे आते हैं क्या यह बताने की जरुरत है!…लेकिन अफ़सोस, आजतक खुद इसे मौत साबित करने पर तुला है!!! समझा जा सकता है, किसी एक पत्रकार की हत्या की वजह से कोई मीडिया संस्थान सत्ता के साथ अपने प्रॉफिटेबल रिलेशन को ख़राब क्यों करेगा!

Sandip Naik : व्यापम की कवरेज के लिये दिल्ली से आये आजतक के संवाददाता अक्षय सिंह का झाबुआ में दुखद निधन। समझ नहीं आता कि SIT एक ऐसे माहौल में कैसे जांच कर सकती है जब प्रदेश का मुखिया और राज्यपाल इस काण्ड में शामिल हो……जिसकी बार बार आशंका जताई जा रही है, क्या SIT के लोग दूसरे ग्रह से आये है जो बगैर डर के काम करेंगे….अब सही समय है जब प्रदेश की मीडिया को एकजुट होकर इस काण्ड की जांच की मांग सीबीआई से करवाना चाहिए . अभी राहुल कँवल का बाईट आजतक पर देखा तो बेहद अफसोस हुआ. यानी अब मप्र में व्यापम के सबुत ही नहीं मिटायें जायेंगे, बल्कि कोई जानकारी लेने आयेगा तो उसे भी एक शांत मौत दे दी जायेगी, कितना शर्मनाक है, जेल में मौत और जेल के बाहर भी आरोपी को भी मौत और पत्रकार को भी मौत !!! क्या राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट स्वत संज्ञान लेकर इस पुरे प्रकरण की जांच सी बी आई को सौंपेगा? या हमारी मीडिया के साथी इंतज़ार कर रहे है. क्यों ना मप्र सरकार के सभी कार्यक्रमों का विरोध करके तब तक बहिष्कार करें जब तक जांच सीबीआई को नही दी जाती या प्रदेश के मुखिया राज्यपाल इस्तीफा नहीं देते. मुझे नहीं लगता जब तक शिवराज सिंह जी और राज्यपाल पदों पर आसीन है तब तक SIT निष्पक्ष रूप से जांच कर पायेगी. नरेंद्र मोदी तो भ्रष्ट लोगों को और अपने मुख्यमंत्रियों को बचाने में बिजी है बेचारे, शिवराज, फिर वसुंधरा और अब रमण सिंह आ गए है छत्तीस हजार करोड़ रुपयों के गबन में !!! और वे मन मोहन से ज्यादा मजबूर है और चुप्पी तो अब उनकी भी नियति बन गयी है.

Shishir Sinha : अक्षय का यूं जाना बिल्कुल समझ से परे है। प्रार्थना करता हूं कि उसकी आत्मा को शांति मिले।

Girijesh Vashistha : बारह साल पुराना रिश्ता आज टूट गया. आज शाम बचपन के दोस्त और इंडिया टीवी के भोपाल में ब्यूरो चीफ अनुराग का फोन आया और उन्होंने अक्षय के निधन की खबर दी. उन्होंने पूछा कोई अक्षय.सिंह रिपोर्टर है आपके यहा ? झाबुआ में उसका.निधन हो गया है. मुझे अक्षय का खयाल तक न आया. कल्र्पना भी नहीं की जा सकती थी इस दुखद घड़ी की..सहारा समय मध्य प्रदेश छत्तीस गढ़ के समय से ये संबंधों की डोर बंधी हुई थी. हमेशा बड़े भाई का सम्माम दिया, प्रेम दिया, और लिहाज किया. मेरे लिए दुखद समय है. मेरी श्रद्धांजलि.

Vikas Mishra : ये तो किसी सस्पेंस थ्रिलर और भुतही फिल्म का सीन लगता है… अक्षय चार दिन से मध्य प्रदेश में थे… शिकारी उनकी तलाश में थे…. जिस तरह अक्षय को मौत के घाट उतारा गया, वो सन्नाटे में ला देने वाला है… जो खबरें आ रही हैं, उसके मुताबिक किसी का इंटरव्यू लेते लेते अचानक उनके मुंह से झाग निकलने लगा.. कोई कुछ सोचता, उससे पहले ही उनकी मौत हो गई… शक तो यही जा रहा है कि किसी ने बड़े शातिराना तरीके से जहर देकर मारा है.

वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह, मुकेश यादव, संदीप नाईक, शिशिर सिन्हा, गिरिजेश वशिष्ठ, विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

व्यापमं घोटाला कवर करने गए आजतक के स्पेशल करेस्पांडेंट और एसआईटी हेड अक्षय सिंह की झाबुआ में लाश मिली

xxx

व्यापमं घोटालेबाजों ने अबकी पत्रकार अक्षय का किया शिकार… अब तो जागो हिंदुस्तान!

xxx

किसी भी थाने में बेधड़क स्टिंग करता था… आज तक कोई उसे देख नहीं पाया… कमाल का लड़का है…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

व्यापमं घोटालेबाजों ने अबकी पत्रकार अक्षय का किया शिकार… अब तो जागो हिंदुस्तान!

Yashwant Singh :  व्यापमं घोटाला कवर करने गए आजतक के स्पेशल करेस्पांडेंट अक्षय सिंह की झाबुआ में लाश मिली… ये घोटाला कितने लोगों की जान लेगा और इस पर कब तक मौन साधे रहेंगे नरेंद्र मोदी व शिवराज सिंह चौहान… यह घोटाला तो सभी घोटालों का बाप साबित हो चुका है क्योंकि इसके असली बड़े आरोपियों को बचाने की कवायद में दनादन हत्याएं मौतें लाशें बिछ रही हैं… आजतक के एसआईटी हेड अक्षय के मारे जाने से पूरा प्रकरण अब बेहद अहम मोड़ ले चुका है… अब तो इन भाजपाइयों को शेम शेम कहना होगा… किस मुंह से ये न खाने और न खाने देने की बात कहते हैं… ये तो न सिर्फ खाते हैं बल्कि जो इनके खाने की पोल खोलता है उसे मार डालते हैं… शेम शेम…

ये किस मुंह से कांग्रेस, सपा, बसपा आदि पार्टियों के करप्शन पर छाती पीटते हैं और खुद के इस महान व्यापक हत्यारे खूनी व्यापमं स्कैम पर चुप्पी साधे रहते हैं… इतने सारे लोगों की हत्याओं के बाद मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए… शिवराज सिंह चौहान में तनिक भी नैतिकता हो तो उन्हें खुद इस्तीफा दे देना चाहिए. आखिर नैतिकता और इस्तीफा जैसा मामला कितने बड़े घोटाले व कितनी मौतों के बाद एक्टिवेट होता होगा.. कोई तो लिमिट होगी इसकी… चुप्पी, कांइयापन, धूर्तता, बेशर्मी, भ्रष्टाचार, जंगलराज, माफियाराज का कोई तो हद होगा यार…

अक्षय को श्रद्धांजलि…

दोस्त, आपके मिशन को जिंदा रखने के लिए हम सब कसम खाते हैं.. मध्य प्रदेश के पत्रकारों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों पर जिम्मेदारी आन पड़ी है कि वे अपने कलम की ताकत दिखाएं… घोटाले के असली अपराधियों को बेनकाब करें… हत्यारों की पहचान कराने के लिए अभियान चलाएं… खोजी पत्रकारिता का परचम लहराकर अपराधी राजनीति और भ्रष्टतम नौकरशाही के गठजोड़ को ध्वस्त करें… आजतक के पत्रकार अक्षय के मारे जाने से संबंधित अन्य जानकारियां इस लिंक में है: http://goo.gl/K1Ytmu

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

व्यापमं घोटाला कवर करने गए आजतक के स्पेशल करेस्पांडेंट और एसआईटी हेड अक्षय सिंह की झाबुआ में लाश मिली

मध्य प्रदेश के कुख्यात व्यापमं घोटाले को कवर करने गए आजतक न्यूज चैनल के स्पेशल करेस्पांडेंट अक्षय सिंह की झाबुआ में मौत हो गई है. आशंका जताई जा रही है कि व्यापमं घोटाले के उन बड़े आरोपियों ने अक्षय को ठिकाने लगाया है जो इस घोटाले से जुड़े अब तक दर्जनों लोगों को निपटा चुके हैं. सूत्रों के मुताबिक अक्षय के हाथ व्यापमं घोटाले की ढेर सारी बातें हाथ लग गई थीं और वह पीड़ित परिवारों के इंटरव्यू कर रहे थे. कहा जा रहा है कि उन्हें खाने में जहर देकर मारा गया है. बेहद हट्टे कट्टे मजबूत कद काठी वाले अक्षय सिंह आजतक में करीब चार पांच वर्षों से कार्यरत थे.

दीपक शर्मा के आजतक से हटने के बाद स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम यानि एसआईटी की कमान अक्षय को सौंप दी गई. मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले की पड़ताल का काम करने के लिए अक्षय भोपाल गए और वहां से कई जिलों की यात्रा करते झाबुआ पहुंचे थे. अक्षय की मौत की जांच चल रही है लेकिन सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार पर कलंक की तरह चस्पा व्यापमं घोटाले में मारे गए दर्जनों लोगों में अब एक तेजतर्रार पत्रकार भी शुमार हो गया है जो इस घोटाले की सारी परतें खोलने पर आमादा था. अक्षय की मौत से टीवी टुडे ग्रुप में सारे मीडियाकर्मी स्तब्ध हैं.

जिसे भी व्यापामं घोटाले को कवर कर रहे आजतक के पत्रकार अक्षय के मारे जाने की खबर मिल रही है, वह ढेर सारे सवालों को लिए हुए स्तब्ध होकर भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ उंगलियां उठा रहा है. लोग कहने लगे हैं कि इस घोटाले के असली चरित्रों का चेहरा सामने ना आने देने के लिए मौतों का जो बेहद सनसनीखेज सिलसिला चल रहा है, वह न जाने कितनी और जानों को लेकर बंद होगा. व्यापमं घोटाले को अपनी प्रकृति और हत्याओं को लेकर अब तक का सबसे दुर्दांत घोटाला माना जा रहा है. आजतक न्यूज चैनल अपनी स्क्रीन पर अपने पत्रकार की मौत की खबर को प्रमुखता से चला रहा है. पत्रकार के मारे जाने के बाद अब पूरा देश नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान से व्यापमं घोटाले में हो रही मौतों को लेकर साधी गई चुप्पी व इस घोटाले के असली ‘खलनायकों’ को बचाने की कवायद को लेकर सवालिया निशान में उंगली उठाने लगा है.

इसे पूरे प्रकरण पर भड़ास के संपादक यशवंत सिंह की त्वरित टिप्पणी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: http://goo.gl/JLqmQH

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Rs 200 cr ADVT Scam : Supreme court will hear Shobhana Bhartia’s SLP No.1603 on 14 July 2015

New Delhi, June 25. In the globally talked Rs.200 crore Dainik Hindustan Government Advertisement Scandal, the Supreme Court of India on June 24,2015, has notified  through its website  that it is likely that the Supreme Court of India (New Delhi) will list ”the Special Leave Petition(Criminal) No-1603 of 2013 for hearing on July 14, 2015 next.

“It is Smt. Shobhana Bhartia, w/o Shri Shyam Sunder Bhartia, a resident of 19, Friends Colony(West), New Delhi -110065, who has filed the S.L.P(Criminal) No-1603 of 2013 in the Supreme Court of India,praying the supreme court to quash the Munger(Bihar) Kotwali P.S case No.445 of 2011,dated 18-11-2011).

It is important to note that Smt. Shobhana Bharatia is the  Chairperson of Mess. Hindustan Media Ventures Limited(New Delhi).Smt.Shobhana Bhartia’s company  prints, publishes and  distributes the popular Hindi daily ‘Dainik Hindustan’. What is in the Munger (Bihar) Kotwali P.S CaseNo.445 /20111(dated 18 Nov.2011) ? In the F.I.R No.445/2011, dt 18 Nov.2011,one social worker, Mantoo Sharma, a resident of Puraniganj locality of the Munger town has accused (1) the Principal accused Shobhana Bhartia (Chairperson, Hindustan Publication Group-Mess. Hindustan Media Ventres Limited, Head Office- 18-20, Kasturba Gandhi Marg, New Delhi, (2) Shashi Shekhar(Chief Editor, Dainik Hindustan, New Delhi, (3)Aakku Srivastawa(Acting Editor, Dainik Hindustan, Patna Edition), (4) Binod Bandhu(Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edititon,Bhagalpur) and (5) Amit Chopra, Printer & Publisher , Mess. Hindustan Media Ventures Limited,Lower Nathnagar Road, Parbatti,Bhagalpur of violating different provisions of the Press & Registration of Books Act, 1867 and the IPC,printing  and publishing the Bhagalpur and Munger editions of Dainik Hindustan (A Hindi daily) using the wrong registration No. and obtaining the govt. advertisements of the Union and the State governments upto Rs. 200 crore  approximately in the advertisement head by presenting the forged documents of registration before the Bihar and the Union governments.

The Munger(Bihar)Kotwali police have lodged a criminal case(F.I.R No.445/2011) u/s  8(B),14 &15 of the Press and Registration of Books Act, 1867 and sections 420,471 & 476 of the Indian Penal Code against (1) Shobhana Bhartia,(2) Shashi Shekhar,(3) Aakku Srivastawa,(4) Binod Bandhu and (5) Amit Chopra on Nov, 18,2011 .All five are named accused persons in this criminal case of forgery and cheatings.

The present status of the police investigation in this case:  The Deputy Police Superintendent(Munger) ,A.K.Panchlar and the Police Superintendent(Munger) ,P.Kannan have submitted the ” Supervision Report No.01 ” and ” the Supervision Report No.02” in this criminal case.In the Supervision Report No.01 & 02,the Dy.S.P and the S.P  have concluded the following facts:

“On the basis of facts, coming in course of investigation and supervisions , and available documents, the Kotwali P.S case No.445/2011 is prima-facie true.”

Patna High Court Order: It is worth mentioning that the Hon’ble Justice, Smt. Anjana Prakash , in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012( Smt. Shobhana Bhartia, Petitioner Vs (1) State of Bihar,(2) Mantoo Sharma,Munger & others)  on Dec, 17, 2012, has passed an order and has directed the Munger Investigating Police officer to expedite the investigation and  conclude the  same within a period of three months from the date of receipt of this order.

By ShriKrishna Prasad, Munger, Bihar

M-09470400813

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

व्यापम घोटाला : निजी मेडिकल कॉलेजों ने काउंसिलिंग के बाद ज्वॉइनिंग को छिपाया

भोपाल : प्रदेश शासन द्वारा निजी चिकित्सा महाविद्यालय में भरी जाने वाली सीटों की प्रक्रिया को लेकर जांच कर रही एएफआरसी ने अपने 21 मई 2015 के खुलासे में भारी अनियमितता का उल्लेख करते हुए बताया है कि धोखाधड़ी से महाविद्यालयों में निजी उम्मीदवारों को प्रवेश दिलवाया गया। 

आर.टी.आई. कार्यकर्ता अभय चोपडा ने बतलाया कि निजी चिकित्सा महाविद्यालय को पहले राउण्ड की काउंसिलिंग की रिपोर्ट 18 सितम्बर 2013 को एवं दूसरे राउण्ड की काउंसिलिंग की रिपोर्ट 24 सितम्बर 2013 को डी.एम.ई. को पूरी करनी थी। लेकिन उसने निजी मैनेजमेंट कोटे के छात्रों को प्रवेश देने के लिये यह तथ्य छुपाया और कट ऑफ डेट 30 सितंबर 2013 को खाली सीटें गैरकानूनी तरीके से फीस के नुकसान नहीं होने देने के आधार पर भर दीं। अंतिम तारीख निकल जाने के बावजूद पूरी सूची के साथ डी.एम.ई. को रिपोर्ट नहीं की गई। निजी महाविद्यालयों द्वारा शासन के कोटे की 197 सीटें भरने के लिए 29 और 30 सितंबर 2013 को एल.एन. मेडिकल कालेज में केंद्रीय काउंसिलिंग की गई। जो भी पी एम टी मेरिट छात्र सेन्ट्रलाईज्ड काउंसिलिंग में थे, 30 सितंबर को शाम 5 बजे के बाद कालेज लेवल की काउंसिलिंग में नहीं पहुंच सके और धोखे से 197 सीटें भर दी गईं। 29, 30 सितंबर 2013 को सेन्ट्रलाईज्ड काउंसलिंग में छात्रों का प्रवेश नहीं लेना और 30 सितंबर की शाम 5 बजे के बाद 197 छात्रों को कॉलेज लेवल काउंसिलिंग में प्रवेश देना संगठित गिरोह के धोखाधड़ी का दस्तावेजी प्रमाण है जो कि माननीय सर्वोच्य न्यायालय एवं कॉमन इण्ट्रेंस रूल्स 2013 के निर्देशो के विपरीत है और ए.आर.एफ.सी. ने इसे जानबूझकर ई. ई. रूल्स 2013 के 13.3 का तोड़ने का जवाबदेह माना है।

माननीय उच्चतम न्यायालय व मेडिकल काउंसिलिंग इंडिया के निर्देशानुसार चिकित्सा महाविद्यालयों में वर्ष 2013 के लिये 15 जून तक परिणाम घोषित होने के बाद पहले राउण्ड की काउंसिलिंग एवं सीट का आवंटन 25 से 31 जुलाई तक दूसरे राउण्ड की काउंसिलिंग एवं सीट का आवंटन 28 अगस्त एवं ज्वॉईनिंग 31 अगस्त तक होनी चाहिए। लेकिन म.प्र. के डी एम ई द्वारा पहले राउंड की काउंसिलिंग 1 अगस्त से 10 अगस्त तक तथा दूसरे राउंड की काउंसिलिंग 13 से 17 सितंबर 2013 तक करवाई गई। मजे की बात यह है कि निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में डी एम ई के अनुसार 29 सितंबर 2013 को कुल 378 सीटों में से 37 सीटें आवंटित की गईं और 29 सितंबर 2013 व 30 सितंबर 2013 को कुल मिलाकर 341 सीटों की सेन्ट्रल काउंसिलिंग होनी थी। 

28 सितम्बर 2013 तक टोटल स्टेट कोटा सीट में निजी महाविद्यलाय 341 सीटें भर चुके थे। जो कि आनलाइन काउंसिलिंग में 29 व 30 सितम्बर को छात्रों को उपलब्ध नहीं थीं। डी एम ई द्वारा निजी चिकित्सा महाविद्यालयों द्वारा की जा रही धोखाधड़ी को जानबूझकर अनदेखा किया गया। 341 सीटें निजी चिकित्सा महाविद्यालयों की झोली में डाल दी गईं। निजी महाविद्यालयों को घोटाले की छूट देना एवं काउंसिलिंग जानबूझकर निर्धारित समयावधि से बाद कराना डी एम ई के घोटाले में संलिप्त रहने का दस्तावेजी प्रमाण है। डी एम ई द्वारा कुल जमा 378 सीटों में से 29 सितम्बर तक मात्र 37 सींटे ही अलाट की गई थीं। तो ए एफ आर सी द्वारा जो 197 सीटों का घोटाला बताया जा रहा है वह 341 सीटों का घोटाला साबित हो रहा है। गौरतलब है कि 24 सितम्बर 2013 तक ज्वाईनिंग डेट पर आये 37 स्ट्यूडेंट्स के अतिरिक्त समस्त प्रवेश स्वतः निरस्त माने जायेंगे।

मननीय सर्वोच्च न्यायालय के काउंसिलिंग के निर्धारित शेड्यूल को डी एम ई द्वारा पालन नहीं करवाकर कन्टेन्ट का अपराध किया गया एवं निजी चिकित्सा महाविद्यालयों को घोटाले में खुली छूट देकर अपने पदीय कर्त्तव्य को पूरा नहीं किया गया, जो कि एक गंभीर अपराध है।

एक्सल शीट के 48 स्ट्यूडेंट्स के संदर्भ में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के विररुद्ध दमदार लडाई लड़ने वाले कांग्रेसी इस दस हजार करोड़ के घोटाले पर आक्रामक क्यों नहीं हैं? कांग्रेसी क्या जनता को इस बात का भी जवाब देंगे कि भाजपा के नेताओं के नाम उन्हे कहां से प्राप्त हुए हैं ? प्रारंभ से ही निजी चिकित्सा महाविद्यालय यह चाहते थे कि इस घोटाले की आंच उन तक नहीं पहुंचे और पी एम टी के सरकारी कोटे के इर्दगिर्द होते हुए व्यापम के घोटाले में उलझकर रह जाय।

मध्य प्रदेश के आरटीआई कार्यकर्ता अभय चोपड़ा से संपर्क : 9098084011

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: