गुनगुनी धूप और वो सभा! फिर न कभी वैसे सुनने वाले आए और न उन-सा बोलने वाला…

श्रीगंगानगर। डेट और दिन तो याद नहीं, लेकिन ये पक्का याद है कि सर्दी का मौसम था। दोपहर पूरी तरह ढली नहीं थी। सर्दी तो थी, लेकिन खिली हुई धूप ने पाने शहर के नेहरू पार्क को और अधिक निखार दिया था। घास ऐसे लग रही थी जैसे कोई कालीन बिछा हो। लगभग 5 बजे के आस पास का समय होगा। मंच पर बीजेपी के नेता भाषण दे रहे थे। शायद हरियाणा के प्रो राम बिलास शर्मा और प्रो गणेश लाल मेँ से कोई एक था। प्रो शर्मा अब हरियाणा सरकार मेँ मंत्री हैं और प्रो गणेश लाल उड़ीसा के राज्यपाल। यह 1993 के विधानसभा चुनाव की बात है।

भैरोंसिंह शेखावत श्रीगंगानगर से बीजेपी के उम्मीदवार थे। उनके समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित करने के लिए पार्टी के शीर्ष नेता, प्रखर वक्ता अटल बिहारी वाजपेई आने वाले थे। इससे पहले की अटल बिहारी वाजपेई आएं, ये जिक्र कर दूं कि नेहरू पार्क का माहौल कैसा था। ठीक वैसा, जैसा सर्दी की गुनगुनी धूप मेँ होता है। बहुत ही खूबसूरत। धूप की गरमाहट और अटल बिहारी वाजपेई को सुनने और देखने की कसक, लालसा लिए बड़ी संख्या मेँ नागरिक नेहरू पार्क मेँ मौजूद थे। इस सभा को 25 साल हो गए, किन्तु अटल जी सुनने के लिए आए जैसे व्यक्ति उस दिन मौजूद थे, उसके बाद किसी चुनावी सभा में दिखाई नहीं दिये।

वकील, डाक्टर, लेक्चरार, टीचर, कई अधिकारी जमीन पर बैठे थे, वह भी बड़ी आरामदायक मुद्रा में। जिनको किसी पार्टी और उसकी विचारधारा से कोई लेना देना प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं था। वे केवल अटल जी को सुनने और देखने ही आए थे। बीजेपी और अटल के पक्ष में नारे गूंजने लगे। कार में अटल जी आते हैं। धोती-कुर्ता और जाकेट पहने है। चाल में परिपक्वता के साथ विनम्रता। चेहरे पर ज्ञान और गुण के तेज के साथ उन शब्दों की दृढ़ता, जो उनके अंदर थे। मिलने मिलाने में सहजता। किसी बात पर कोई उत्तेजना नहीं।

अभिवादन के साथ मंच पर आते हैं। और जब वे मंच पर आए तो चारों तरफ छा गए। एक एक शब्द में जोश और तत्कालीन सरकारों के प्रति आक्रोश को कैसे कैसे शब्दों में व्यक्त किया, ये तो याद नहीं, लेकिन जब उस दिन की सभा को याद करता हूं तो कानों में उन तालियों के स्वर गूंजने लगते हैं जो अटल जी के शब्दों पर लगातार और बार बार बज रही थीं।

ताली बजाने वाले कोई बीजेपी के कार्यकर्ता ही नहीं थे। उनमें वे व्यक्ति भी थे जो अटल जी के फैन थे। अटल जी के भाषण के मूरीद थे। और वे उनके हर शब्द पर दाद दे रहे थे। अपनी पुरानी किसी यात्रा जिक्र करते हुए वे बोले थे, तब से आज तक नहरों मेँ ना जाने कितना पानी बह गया। इन शब्दों के साथ उनका आँख बंद कर गर्दन को झटका देने का अंदाज आज तक आँखों मेँ बसा है। याद नहीं वे कितने मिनट्स बोले। हां, ये ध्यान है कि जैसे ही वे लौटे, ऐसे लगा जैसे कोई अपना निकट से गले मिले बिना ही चला गया। उनके निकट तो जाने मेँ कामयाब हो गया था। किन्तु संवाद नहीं कर पाया था।

मुझे अटल जी से संवाद करने भी कौन देता, उनका कद पहाड़ जैसा था और मैं बस राई। तब से आज तक नहरों में ना जाने कितना पानी और बह गया। अनगिनत राजनीतिक सभाएं देखीं, नेताओं को सुना और कवरेज की, परंतु अटलजी जैसी फिर नहीं हुई। उनको सुनने के लिए हजारों संख्या में लोग नहीं आए थे, किन्तु जो आए, वे मन से आए। लाये नहीं गए। टीवी पर तो उनके बहुत रुप देखे। लेकिन उनको रूबरू फिर कभी देखने का अवसर नहीं मिला। आज वो जिस स्थिति में हैं, उससे ये आभास हो रहा है कि उनको देखने का मौका अब कभी मिलेगा भी नहीं। उस समय मोबाइल फोन तो थे नहीं, जो उनकी छवि को उसमें बंद कर लेता। दो लाइनें-

तेरी यादों में जब मैं खो जाता हूं
खुद ब खुद मुकम्मल हो जाता हूं।

लेखक गोविंद गोयल राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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