इन पत्रकारों का मकसद अलग-अलग सियासी खेमे में शामिल होकर अपना निजी हित साधना है!

Samarendra Singh

मेरी पिछली पोस्ट पर बहुत सारी टिप्पणियां आयी हैं. उनमें से कुछ पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी है, लेकिन एक जरूरी टिप्पणी पर मेरा जवाब थोड़ा बड़ा है. इसलिए मैं उसे अलग से पोस्ट कर रहा हूं. यह टिप्पणी है Anil Singh सर की. उनके साथ मेरा कुछ अच्छा समय बीता है. वो बेहद सहज और प्रतिबद्ध इंसान हैं. उनके जितना प्रतिबद्ध हो पाना मेरे लिए संभव नहीं. मैंने अपने जीवन में रोजी-रोटी के लिए बहुत से समझौते किए हैं. लेकिन अनिल जी को एक राह पर निरंतर चलते हुए देखा है. इसलिए मैं उनकी टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया देना जरूरी समझता हूं. इसमें मैंने पहले उनकी टिप्पणी लिखी है और उसके बाद अपना जवाब लिखा है.

अनिल जी की टिप्पणी :

समरेंद्र, इस समाज में कुछ भी निरपेक्ष / निष्पक्ष नहीं होता। निजी जीवन व व्यवहार में रवीश या प्रसून क्या हैं, इससे उनके सावर्जनिक काम के सामाजिक प्रभाव पर फर्क नहीं पड़ता। देखना पड़ेगा कि प्रणव राय या रवीश व प्रसून इस समय जो काम कर रहे हैं, वो लोकतांत्रिक चाहतों को मंच दे रहा है या नहीं। हमें यह देखना होता है कि क्या पॉलिटकली करेक्ट है। आपकी इस पोस्ट को मोदी-भक्त शेयर कर रहे हैं और सारे संघी वाह-वाह कर रहे हैं। कह रहे हैं कि एनडीटीवी को बंद कर देना चाहिए। अगर आप भी सचमुच यही चाहते हैं, तब बात अलग है। अन्यथा कोई भी ‘सच’ बयां करने से पहले सोच लेना चाहिए कि उसका resonance किसके पक्ष में जा रहा है।

मेरी प्रतिक्रिया :

मुझे लगता है कि मैंने अपनी पोस्ट में उनके निजी जीवन की कहीं कोई चर्चा नहीं की है. मैंने आज तक किसी के भी निजी जीवन के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है. ये और बात है कि कई बड़े संवेदनशील और महिलावादी पत्रकारों को मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी जीवन पर टिप्पणी करते देखा है और वह भी ओछे लहजे में. उन बड़े पत्रकारों में और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के निजी जीवन को लेकर टिप्पणी करने वालों में, मुझे कोई खास अंतर नजर नहीं आता.

आपने सही कहा है कि समाज में कुछ भी निरपेक्ष/ निष्पक्ष नहीं होता. बल्कि मैं तो यह मानता हूं कि होना भी नहीं चाहिए. जो भी व्यक्ति सोचने-समझने की क्षमता रखता है उसे एक राय रखनी ही चाहिए. लेकिन यहां प्रश्न यह है कि वह किसके पक्ष में खड़ा है और किस मकसद से खड़ा है? इसी सवाल को थोड़ा सा बदल कर रखता हूं – कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका मकसद जनता के पक्ष में खड़ा होना है और आप काम भी उसी मकसद से कर रहे हैं लेकिन आपके काम से जनता का ही अहित हो रहा है और आप एक बड़े सियासी खेल में शामिल हो गए हैं? (इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि मेरा मकसद यह नहीं था कि कोई सियासी लाभ के लिए मेरे पोस्ट को शेयर करे और एनडीटीवी को बंद करा देने की बात कहे, लेकिन यह हो रहा है) अगर यह अनजाने में हो रहा है तो इसे एक भूल समझ कर नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन अगर यह जानबूझ कर हो रहा है तब यह सवाल तो उठेगा ही कि आपकी पॉलिटिक्स क्या है? देश और जनता की बेहतरी या फिर सत्ता के खेल में शामिल होकर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा/हित साधना?

अपनी पोस्ट में भी मैंने रवीश कुमार, कारोबारी पत्रकार डॉ प्रणय रॉय और पुण्य प्रसून बाजपेयी की पत्रकारिता और उनकी उसी पॉलिटिक्स की चर्चा की है. वह भी बहुत सामान्य लहजे में की है. मैंने कहा कि वह जिस किस्म की पत्रकारिता कर रहे हैं दरअसल वह पत्रकारिता नहीं है. वह सियासत है. डॉ प्रणय रॉय के एनडीटीवी के बनने और उसके विस्तार में एक खास सियासी धड़े की बड़ी भूमिका रही है. मैंने यह भी कहा है कि जब राजनीतिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर हो तो उस परिस्थिति में बुद्धिजीवियों का दायित्व बढ़ जाता है. उन्हें देश और समाज के हित में अपनी राजनीतिक आस्था, अपनी महत्वाकांक्षा, अपनी नफरत और अपनी कुंठा को किनारे छोड़ कर मानवीय मूल्यों को केंद्र में रख कर काम करना चाहिए. ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों के दिल और दीमाग तक जो सही है वह बात तार्किक और संवेदनशील तरीके से पहुंचाई जा सके. मतलब किसी भी संवेदनशील परिस्थिति में पत्रकार का मकसद अगर जनता को जागरूक करना है, सही-गलत के अंतर को सामने रखना है, जनता के पक्ष में खड़ा होना है तब तो वह देश के हित में है. लेकिन बुद्धिजीवी का मकसद संवेदनशील माहौल का लाभ उठा कर, ध्रुवीकरण का फायदा उठा कर सियासी खेल में शामिल होकर सियासत का औजार या फिर हिस्सेदार बनना है तो वह गलत है. अभी रवीश कुमार और पुण्य प्रसून जैसे लोग यही काम कर रहे हैं. वो अपनी महत्वाकांक्षा के कारण सियासी ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के खेल में शामिल हैं. इस लिहाज से सुधीर चौधरी और उनमें कोई खास फर्क नहीं रह जाता. दोनों का मकसद अलग-अलग सियासी खेमे में शामिल होकर अपना निजी हित साधना है.

एनडीटीवी में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार समरेंद्र सिंह की एफबी वॉल से.

ढेरों टिप्पणियों में से कुछ चुनिंदा यूं हैं….

Hitendra Jha मीडिया अब एक उद्योग बन गया है… नैतिकता और शुचिता की बातें सिर्फ लोगों को लुभाने के लिए बोली जाती हैं हर मीडिया घराना अपने खास एजेंडे पर काम कर रहा है।लोग अचंभित और भ्रमित हैं कि सच क्या है।इन सबके ऊपर विज्ञापनों का संसार है।

Rajkumar Pandey समरेंद, साक्ष्य किसी के भी पक्ष में जा सकतें हैं। आपको याद दिलाना चाहूँगा, एक बार राजेंद्र माथुर साहेब ने कहा था, हम इतिहास के ढिढोंरचिए हैं। मैं इसे आगे बढाता हूं, जो भी इतिहास बनाने की कोशिश करता है वो कुछ और कर रहा होता है, पत्रकारिता नहीं।

Anil Singh बात पर बात ज़रूरी है, बहस ज़रूरी है। मेरी बात को इतनी तवज्जो दी, इसका शुक्रिया। बाकी पोस्ट को बाद में गंभीरता से पढ़ूंगा और मनन करूंगा। यकीनन कुछ न कुछ सार की बात मिलेगी, जिसका मेरा नज़रिया भी व्यापक बनेगा।

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए मूल खबर पढ़ें, जो यूं है…

जब PM मनमोहन के डांटने पर NDTV के मालिक प्रणय रॉय ने ‘बुरे मंत्रियों की सूची’ वाली खबर गिरा दी थी!

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