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उत्तराखंड

दवाइयों में भी घोटाला करते रहे एम्स ऋषिकेश के डायरेक्टर

एम्स ऋषिकेश के डायरेक्टर प्रो रविकांत के खिलाफ हेल्थ मिनिस्ट्री में जो शिकायतें हुई हैं, उन्हें देखें तो एकबारगी यह शक जरूर होता है कि कहीं पीएम मोदी ने इन्हीं के भ्रष्टाचार के तरीकों से ही तो सीखकर पीएम केयर्स फंड बनाने की तो नहीं सोची! मोदी जी ने तो पीएम केयर्स फंड कुछ महीने पहले बनाया है, लेकिन रविकांत जी तो इसी तरह की हरकत साल 2018 से लगातार करते आ रहे हैं।

एम्स ऋषिकेश में जो जन औषधि केंद्र खुला, उसके लिए साहब ने सोसायटी बनवाई और खुद ही अध्यक्ष बन बैठे। अपने भरोसे के लोगों को इस सोसायटी का मेंबर बनवाया और जन औषधि केंद्र में ऐसी चीजें बिकवाने लगे, जिनकी ऑडिटिंग ही संभव नहीं है क्योंकि वे ऐसे किसी जन औषधि केंद्र की ऑडिटिंग के क्षेत्र में नहीं आते।

आपको बता दें कि भारत सरकार के ब्यूरो ऑफ फार्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया का नियम है कि जन औषधि केंद्र मेडिकल कॉलेजों सहित सरकारी अस्पतालों में खुलेंगे और इन्हें कोई एनजीओ या चैरिटेबल संगठन या कोई व्यक्ति भी चला सकते हैं। जन औषधि केंद्र कमाई, खासकर डॉक्टरी के पेशे में अवैध कमाई और कमीशन का बहुत बड़ा जरिया होती है, यह बात किसी से छुपी नहीं है।

प्रो रविकांत पर आरोप है और इस मामले की जांच भी चल रही है कि कैसे उन्होंने जन औषधि केंद्र खोलने के लिए खुद ही एक जन कल्याण सोसायटी बना डाली। उन पर आरोप है कि वे खुद इस सोसायटी के अध्यक्ष बने और 15 अगस्त 2018 को उन्होंने इसका उद्घाटन किया। और तो और, उस दुकान की कमाई पर कोई मुंह न खोलने पाए, इसके लिए उन्होंने कमाई पर पूरा कंट्रोल बनाए रखने के लिए एक और कमेटी बना दी और फिर से उसके अध्यक्ष बन बैठे।

आरोप है कि जब सब कुछ सेट हो गया, तब उन्होंने भ्रष्टाचार का खुला खेल फर्रुखाबादी खेलना शुरू किया। सबसे पहले तो उन्होंने इस जन औषधि केंद्र में सभी तरह के कार्डियक स्टेंट और ऑर्थोपेडिक इम्प्लांटेशन बेचने की अनुमति दे दी। कार्डियक स्टेंट दिल के दौरे से बचने के लिए लगाया जाता है और शरीर की हड्डियों की टूट-फूट होने पर कई तरह की प्लेटें लगाई जाती हैं, जिन्हें ऑर्थोपेडिक इम्प्लांटेशन कहते हैं। खास बात यह कि यह दोनों ही सरकारी ऑडिट की श्रेणी में नहीं आते हैं और दोनों में ही एक रुपये के सौ रुपये कम से कम मिलते हैं, अमूमन तो एक रुपये के पांच सौ तक मिलते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि इतने बड़े एम्स के डायरेक्टर को खुद आगे आकर सोसायटी बनाने की जरूरत क्या थी? बड़ी बात तो यह कि उन्होंने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से इस सोसायटी बनाने की अनुमति तक नहीं ली, और ऐसी अवैध सोसायटी में खुद को अध्यक्ष तक बना लिया। मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में जन औषधि केंद्र इसलिए खोले जाते हैं कि जिससे मरीजों को सस्ती दवाइयां मिल सकें।

सस्ती दवाइयां खरीदने के लिए सरकार टेंडर जारी करती है, लेकिन एम्स के डायरेक्टर ने बिना टेंडर जारी किए ही दवाइयां खरीदी और बेचीं। और जब कोई पूछने आता तो रेट कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर उसके सारे सवाल डायरेक्टरशिप की धौंस में गायब कर दिए जाते। बहरहाल, इस पूरे मामले की जांच स्वास्थ्य मंत्रालय करा रहा है। देखना यह है कि इनका भी हाल पीएम केयर्स फंड की ही तरह होता है, जिसकी कि ज्यादा उम्मीद है, या फिर कायदे कानून के हिसाब से होता है, जिसकी कि बिलकुल भी उम्मीद नहीं है।

देहरादून से आरपी की रिपोर्ट.

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