टीवी पत्रकारिता का “अरनबी-करण”!

-प्रभात डबराल-

टीवी टीम को लोगों ने घेरा, गाँव से बाहर निकाल दिया, कवरेज नहीं करने दी, गाड़ी तोड़ दी- हर रोज़ ऐसी खबरें सुनने को मिल रही है. देखा जाए तो ये बुरी बात है, बहुत बुरी. पर मुझे बुरी नहीं लग रही.

पिछले तीन-चार साल में टीवी पत्रकारिता का जिस कदर “अरनबी-करण” हुआ है उसके बाद ये टीवी वाले पत्रकार कहलाने लायक़ रह गए हैं क्या? इसलिए इन्हें वो इज़्ज़त क्यों मिले जो पत्रकारों को एक जमाने मे मिला करती थी.

जो एंकर/ रिपोर्टर या दूसरे पत्रकार विपक्ष की पार्टियों और उनके नेताओं को “देशद्रोही” और ऐसी ही चुनींदा गलियों से नवाजते रहे हैं, क्या उन्हें खुद ऐसी गालियाँ झेलने के लिए तैयार नहीं रहना चाहिए.

आलोचना करने का हक़ सबको है, पत्रकारों को भी है. पर पत्रकार को ये हक़ किसने दिया कि वो जिस किसी को चाहे देशद्रोही करार दे दे, किसी की बात पसंद ना आए तो चीखने चिल्लाने लगे- पाकिस्तान समर्थक, सेना का विरोधी वग़ैरह तमग़े बाँटने लगे.

ठीक है, इधर ऑन-स्क्रीन गाली ग़लौज़ कुछ कम हुई लगती है.

पर अब तक जो पाप किए हैं उनका दंड तो किसी न किसी रूप में भुगतना ही होगा.मुझे इन पापियों कोई सहानुभूति नहीं है. इन्होंने पत्रकारिता का नाम बदनाम किया है. सार्वजनिक अपमान के भागी हैं ये.

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