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सियासत

बच्चों को इस तरह मरते नहीं देख सकते : सुप्रीम कोर्ट

चमकी बुखार से मासूमों की मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, यूपी को भी लपेटा, सात दिन में सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश

बिहार में चमकी बुखार (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानि दिमागी बुखार) से बच्चों की मौत पर उच्चतम न्यायालय ने गहरी चिंता जताते हुए केंद्र सरकार, बिहार सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से बच्चों की मौत पर जवाब मांगा है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बच्चे इस तरह नहीं मर सकते। कोर्ट ने बिहार सरकार से एक हफ्ते मे हलफनामा मांगा है, जिसमें वो बताएगी कि राज्य मे इलाज और डॉक्टरों की क्या स्थिति है। पोषाहार और साफ सफाई की क्या स्थिति है।उच्चतम न्यायालय ने जिन तीन बिंदूओं पर जवाब मांगा है, उनमें पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं, पोषाहार और साफ-सफाई शामिल है। साथ ही न्यायालय ने कहा कि ये ये मूल अधिकारों का मामला है। यह सिलसिला यूं ही जारी नहीं रह सकता।सरकारों ने इससे निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं?न्यायालय ने बीमार बच्‍चों के इलाज की बाबत यूपी और बिहार सरकार से सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिये हैं।

उच्चतम न्यायालय ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह बताए कि राज्‍य में इलाज, पोषाहार और डॉक्‍टरों की स्थिति क्‍या है। उच्चतम न्यायालयने राज्‍य सरकार को इन सवालों के जवाब के साथ हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। उच्चतम न्यायालय ने उक्‍त आदेश बिहार में चमकी बुखार से हो रही मौतों के मामले में दाखिल दो याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिए।इस बीमारी के कारण अभी तक बिहार के मुजफ्फरपुर में 130 बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं पूरे बिहार में मरने वालों की संख्या 152 हो चुकी है।

न्यायामूर्ति संजीव खन्ना और न्यायामूर्ति बी. आर. गवई की अवकाशकालीन पीठ ने बिहार सरकार को चिकित्सा सुविधाओं, पोषण एवं स्वच्छता और राज्य में स्वच्छता की स्थिति की पर्याप्तता पर एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया है। पीठ ने कहा कि सरकारों को इस बारे में हमें जवाब देना ही होगा। बीमारी की रोकथाम के लिए क्या प्रयास हुए और कौन से सुरक्षा कदम उठाए गए हैं यह हलफनामा दायर कर हमें केंद्र, बिहार और राज्य सरकार बताए।पीठ ने यह भी कहा कि राज्य सरकार बुखार की रोकथाम के लिए दवाइयों की उपलब्धता पर भी अपना जवाब दाखिल करे, क्योंकि जिनकी जान जा रही है वो बच्चे हैं। पीठ ने कहा कि इसे यू हीं जारी रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। मामले पर अगली सुनवाई 10 दिन के बाद की जाएगी।

याचिका में सरकार को बिहार में इलाज के पर्याप्‍त बंदोबस्‍त करने के निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में दावा किया गया था कि सरकारी सिस्टम इस बुखार का सामना करने में पूरी तरह से फेल रहा है।सुनवाई के दौरान बिहार सरकार ने अदालत को बताया कि बीमारी के इलाज के लिए जरूरी उपाय किए गए हैं और स्थिति काबू में है। जनहित याचिका में 500 आईसीयू और 100 मोबाइल आईसीयू की तत्काल व्यवस्था करने का भी अनुरोध किया गया है। साथ ही यह कहा गया है कि एक असाधारण सरकारी आदेश के तहत प्रभावित क्षेत्र के सभी निजी चिकित्सा संस्थानों को निर्देश दिया जाए कि वो मरीजों को निशुल्क उपचार प्रदान करें। राज्य मशीनरी की लापरवाही के कारण मरने वाले मृतकों के परिवार के सदस्यों को 10 लाख रुपये बतौर मुआवजा प्रदान किए जाए।

बिहार में बीते एक महीने से एईएस या चमकी बुखार को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। गौरतलब है की चमकी बुखार से बिहार के 40 जिलों में करीब 20 जिले प्रभावित हैं। इस रोग से एक जून से 600 से अधिक बच्चे पीड़ित हुए, जिससे करीब 140 बच्चों की मौत हुई। मुजफ्फरपुर सबसे बुरी तरह से प्रभावित जिला है जहां 430 बच्चों को भर्ती किया गया, जिनमें सिर्फ एसकेएमसीएच में ही 109 बच्चे भर्ती किए गए जबकि एक निजी अस्पताल केजरीवाल हॉस्पिटल ने 162 रोगियों को भर्ती किया और वहां 20 मौतें हुई। इस साल इस रोग से अधिक संख्या में मौत होने की मुख्य वजह खून में शर्करा (चीनी) के स्तर में कमी आना है।

मुजफ्फरपुर में पहली बारिश के बाद हास्पिटल में चकमी बुखार से पीड़ित बच्चों के केस में कमी आई है।दरअसल एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम बच्चों को उस वक्त अपनी चपेट में लेता है, जब भीषण गर्मी पड़ रही होती है और इलाके में बारिश होने पर इस रोग का प्रसार रूकता है। इस बार भी यही हो रहा है और बारिश है और आज दिन में अब तक एक भी बच्चा भर्ती नहीं किया गया।

इसबीच बिहार सरकार ने चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों के परिवार पर सोशल ऑडिट सर्वे कराया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। सर्वे में शामिल परिवारों में से 82% परिवारों की आय का जरिया मजदूरी है। तीन चौथाई परिवार गरीबी रेखा से नीचे आते हैं।इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि ज्यादातर परिवार बेहद गरीब हैं और उनमें से अधिकतर परिवार मजदूरी का काम करते हैं। इनमें से एक तिहाई परिवारों के पास राशन कार्ड तक नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार जे.पी. सिंह की रिपोर्ट.

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