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बचपन में घर न होने का रोना, सब है तो जमीन पर सोना, 12 साल की उम्र में घर छोड़ देना और प्रचार का कोरस  

संजय कुमार सिंह

आज अमर उजाला में टॉप की खबर का शीर्षक है, “पीएम मोदी के छल्के आंसू … बोले-काश बचपन में मुझे भी रहने के लिए ऐसा घर मिला होता”। उपशीर्षक है, “महाराष्ट्र के सोलापुर में पीएम आवास की सबसे बड़ी हाउसिंग सोसाइटी का लोकार्पण”। दूसरी खबर नवोदय टाइम्स में बॉटम स्प्रेड है, “कठोर व्रत : सिर्फ फल खा रहे नारियल पानी पी रहे और जमीन पर कंबल बिछाकर सो रहे पीएम मोदी”। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री के आंसू पहले भी छल्के हैं और यह बड़ी खबर नहीं है। उपशीर्षक ज्यादा बड़ी खबर है पर उसे कम महत्व दिया गया है। दूसरी तरफ कठोर व्रत वाली खबर में हाईलाइट किया गया है, प्राणप्रतिष्ठा के दिन पूर्ण उपवास रखेंगे प्रधानमंत्री, करेंगे विशेष मंत्रों पर जाप। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री यह सब स्वेच्छा से कर रहे हैं। कुछ अनूठा नहीं है और उनका काम नहीं है। फिर भी कर रहे हैं तो खबर जरूर है पर दूसरे अखबारों में पहले छप चुका है तो वैसा भी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि दोनों खबरें तो पहले पन्ने पर हैं लेकिन राहुल गांधी की न्याय यात्रा खबर नहीं है।

बचपन में घर न होने पर सुबकने के बाद प्रधानमंत्री के बारे में कल सोशल मीडिया पर कुछ-कुछ चल रहा था। मैंने ध्यान नहीं दिया और पता नहीं चला कि घर तो उनने 12 साल की उम्र में ही छोड़ दिया था। तो किस घर के लिए भावुक हुये और जो कहा वह क्या था। यही नहीं, तब बताया गया था कि उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की थी। सच्चाई यह है कि आज भी बहुत सारे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। घर होते हुए या नहीं होने पर भी कितने गरीब होंगे जो आज भी स्कूल नहीं जा रहे हैं। खासकर उन 80 करोड़ में जो सरकारी राशन पर जी रहे हैं। दूसरी ओर, जो बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रहा था वो जेल में है। सवाल यह है कि घर था नहीं तो 12 साल में छोड़ा क्या और जो भी छोड़ा वह एसएससी पास करने के बाद छोड़ा तो चाय कब बेचते थे। उनके लिए अफसोस क्यों नहीं जो पढ़ नहीं पा रहे हैं। या जो कम से कम राजधानी में बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित कर रहा था।

कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने भले दावा किया हो कि वे बचपन में चाय बेचते थे और उनकी मां घरों में बर्तन मांजती थी उनका बचपन उतना बुरा नहीं था जितना अभी भी बहुत सारे लोगों का है। अगर आप प्रधानमंत्री की प्रतिभा और योग्यता से बहुत प्रभावित हैं तो संभव है ये सब सवाल दिमाग में आये ही नहीं। लेकिन खबरों का एक नियम है, व्हेयर देयर इज डाट, कट इट आउट। अगर शक हो तो निकालकर बाहर कर दीजिये। इस खबर के साथ भी यही किया जाना चाहिये था। पर हेडलाइन मैनजमेंट ऐसा है कि सब अखबार मिलकर प्रधानमंत्री के प्रचार का कोरस गा रहे हैं। जहां तक खबरों की बात है, पीएम आवास की सबसे बड़ी हाउसिंग सोसाइटी का लोकार्पण ज्यादा बड़ी खबर है। इसीलिए हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। यहां आंसू छलकने की खबर शीर्षक में नहीं है। लिखा है, भावुक हुए।

हालांकि, हिन्दुस्तान टाइम्स में भावुक होने और पानी पीने का प्रचार करने के लिए फोटो नहीं है। सिंगल कॉलम में भी नहीं। आज के अखबारों में बिलकिस बानो के दोषियों को राहत नहीं मिलने की खबर को भी कुछ ज्यादा ही प्रमुखता मिली है। मुझे लगता है कि किसी को गिरफ्तार करने से पहले या सजा देने से पहले पूछा नहीं जाता है और ना ही जेल में रहने के दौरान बाहर की व्यवस्था के लिए समय देने का रिवाज है।यह सब व्यक्ति सैर पर जाने से पहले करता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं ही मिलनी थी। नहीं मिली। इसलिए यह इतनी बड़ी खबर नहीं कि टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू आदि ने इसे लीड बना दिया है। लीड तब होती जब राहत मिल गई होती। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा कोई नियम नहीं है लेकिन रिवाज से जो खबर प्रमुखता पाने की हकदार है उसे प्रमुखता नहीं देनी हो तो प्रमुखता की परिभाषा बदल ही जायेगी। आजकल के अखबारों के पहले पन्ने की खबरों से वही होता दिख रहा है।

मुझे लगता है कि आज की इन सारी खबरों में पहले पन्ने की निश्चित खबर राम रहीम को 50 दिन की पैरोल मिलना है। खबरों के अनुसार, बलात्कार के अपराध में सजा काट रहे राम रहीम को दो साल में सातवीं बार यह रिहाई मिली है (टाइम्स ऑफ इंडिया)। अभी तक 30 और 40 दिन की मिली थी और इस बार 50 दिन की मिली है। सुप्रीम कोर्ट जब सरकार द्वारा बरी किये जा चुके दोषियों को फिर जेल भेज रहा है उन्हें समय नहीं दे रहा है, भ्रष्टाचार के आरोप में लगभग बिना सबूत और जांच के नाम पर जब कई निर्वाचित जनप्रतिनिधि जेल में हैं और कइयों को बचाया जा चुका है इस तरह पैरोल कानून के क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप और जनप्रतिनिधियों के मामले में अदालतों यानी कानून की लाचारी या सहयोग जैसा लगता है।

इसलिए मैंने कहा कि यह खबर निश्चित रूप से खास है। जनता को पता भी तो रहे है कि देश में कैसी व्यवस्था चल रही है। जहां तक खबरों की बात है, मैं नहीं कहता कि न्याय यात्रा की प्रशंसा की ही जानी चाहिये। मेरा मानना है कि उसकी उपेक्षा रेखांकित करने लायक है। खासकर इसलिए कि इसी मीडिया ने लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को भारी प्रचार दिया था। ठीक है कि अब समय बदल गया है। संचार के नये साधन हैं लेकिन मीडिया से निष्पक्षता की उम्मीद तो की ही जाती है। असम के मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी की यात्रा को लेकर बड़ा राजनीतिक बयान दिया है। राहुल गांधी ने उनपर सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री होने का आरोप लगाया है। आरोप तो मुख्यमंत्री के भी हैं लेकिन सत्ता में रहते हुए वे कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं और कह भी रहे हैं कि कार्रवाई दो तीन महीने बाद करेंगे। लेकिन इन दोनों अखबारों में पहले पन्ने पर यह नहीं है। बेशक यह संपादकीय विवेक का मामला है। नवोदय टाइम्स में कल खबर थी और आज नहीं होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन सरकारी विज्ञापन छापने वाले अखबार 14 तारीख से शुरू हुई यात्रा को महत्व नहीं दें तो रेखांकित करने वाली बात तो है ही। 

जहां तक खबरों की बात है इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड सबसे अनूठी है। वैसे तो यह द टेलीग्राफ में भी सिंगल कॉलम में है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में लीड बनने के अपने मायने हैं जो शायद मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इस खबर के अनुसार कांग्रेस ने कहा है कि एक देश, एक चुनाव या एक साथ चुनाव कराना अलोकतांत्रिक है और इस संबंध में सलाह आंखों में धूल झोंकना है। खबर के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पूर्व राष्ट्रपति के नेतृत्व में बने पैनल को भंग करने की मांग की है। टीएमसी और वामपंथी दल पहले ऐसी मांग कर चुके हैं। यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में नौ लाइनों में है। आज नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, गैंगस्टर प्रवेश मान के भाई को भूना तीन कॉलम में है। यहां ‘भूना’ शब्द अटपटा लगता है और हिन्दी में भाई को भूना का सौंदर्य बोध होने के बावजूद लगा कि यह सिंगल कॉलम की खबर होनी चाहिये थी।

मैंने खबर आगे नहीं पढ़ी। गैंगस्टर की खबर क्या पढ़ना। होगा कोई, मारा गया। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया में एक शीर्षक दिखा, एआई क्रू को नोएडा मार्केट में जिम के बाहर गोली मारी गई। यहां जिसे गोली मारी गई उसका नाम सूरज मान था और इससे पता चला कि दोनों खबरें एक ही है। खबर मैंने सिंगल कॉलम वाली पढ़ी, भाई को भूना जैसे शीर्षक के बावजूद। इससे तो यही लगता है कि खबर अपने शीर्षक से पढ़ी जाती है, कहां छपी है और क्या शीर्षक है उसका बहुत मतलब नहीं है फिर भी न्याय यात्रा की खबर नहीं छप रही है तो लोग ढूंढ़कर पढ़ रहे हैं, जान रहे हैं।

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