इस सरकार के पास तकरीबन हर संपादक की फाइल मौजूद है!

विश्व दीपक-

जर्मन अख़बार “बिल्ड” के बहाने… बात संपादक (व्यक्ति की नहीं संस्था की), मीडिया और नैतिकता की करनी पड़ी. हालांकि इस विषय को छूना नहीं चाहता था पर मुद्दा सामने आ ही गया.

याद करना चाहता हूं – पिछले बीस-तीस सालों में क्या किसी संपादक ने, किसी संस्थान से, किसी वैचारिक टकराव या प्रतिबद्धता के चलते इस्तीफा दिया है?

मुझे याद नहीं आ रहा. हो सकता है मेरी जानकारी में ही ना हो. पर अगर किसी को किसी का नाम याद आ रहा तो प्लीज़ मुझे बताइए. कट ऑफ इयर 2016 है. इसके बाद कई लोगों को देना पड़ा था. उसके पहले का बताइएगा.

“आउट ऑफ टर्न प्रमोशन” का पूरा खेल जिस एक बात पर टिका है वह है इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की सहमति.

फिर दोहरा रहा हूं. बात प्यार में पड़ने, रोमांस अफेयर या सेक्स की नहीं. बात है सत्ता का बेजा इस्तेमाल करने की.

देश के नंबर वन चैनल का एक पूर्व संपादक एक एंकर को बार बार टेक्स्ट भेजता था — सिर्फ एक बार मिल लो.

भूत, एलियन की पसंद हिमेश रेशमिया का गाना, मरघट में जवां होती महफ़िल, हिमालय में दिखी शंकर की आंख जैसे मौलिक प्रोग्राम लॉन्च करने वाला एक संपादक आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देने के लिए भी मशहूर था. एक बार उसने कमिंग अप दिया — आगे देखिए धोनी का 12 इंच का.

मैं आजतक में था. आदत के मुताबिक कमेंट किया – कौन मूर्ख है जिसने ऐसा कमिंग अप दिया. उस वक्त आजतक टीआरपी की रेस में लड़खड़ा रहा था.

आप हैरान होंगे जानकर कि मेरे कमेंट पर पहला प्रतिवाद जिसकी तरफ से आया वो एक महिला थीं. आजतक की उस पूर्व कर्मचारी ने मुझसे कहा था — जहां तुम्हारी सोच ख़तम होती है, वहां से उनकी (संपादक महोदय) की शुरू होती है.

यह बात मेरे दिमाग में कहीं गहरे घंस गई. थोड़ा उदारतापूर्वक विचार करने पर कल्चरल कंडिशनिंग, पितृसत्ता की संस्कृति, घर परिवार चलाने की मजबूरी आदि तर्क दिए जा सकते हैं.

लेकिन क्या यह सच है ? नहीं.

हिंदी के सबसे सभ्य, सौम्य और प्रगतिशील माने जाने वाले न्यूज़ चैनल के पूर्व संपादक के बारे में मशहूर था कि वो बिस्मार्क की तरह पांच गेदों से हमेशा खेलता था.

यह इसलिए कह रहा हूं क्यूंकि कहीं ना कहीं एक अफसोस बना रहा कि पत्रकारिता की कमांड इतने कमज़ोर, अनैतिक और भ्रष्ट संपादकों के हाथों में कैसे और क्यूं गई ? मैंने इस पेशे का हिस्सा बनने का फैसला किया ही क्यूं था?

यह सवाल उस वक्त भी मेरे ज़ेहन में आया था जब मैंने फरवरी 2016 में ज़ी न्यूज़ छोड़ा था. आज भी है. मोदी सरकार के सत्ता में आने के एक साल के अंदर ही जो बात मैं बहुत साफ तरीके से देख समझ रहा था, उसे कोई संपादक क्यूं नहीं देख पा रहा था ?

इधर बीच पता चला कि इस सरकार के पास तकरीबन हर संपादक की फाइल मौजूद है. फिर चाहे तिहाड़ी चौधरी हो या राष्ट्रवादी मूर्ख दीपक चौरसिया. इस सरकार के लिए चाटुकारिता मायने रखती है लेकिन एक सीमा से आगे नहीं. आप मुंह खोलेंगे,आपकी फाइल खुल जाएगी.

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